मुख्य मजकूराकडे जा

हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 47 of 92
25 ऑगस्ट 2023
Book
5,7,2,1,,

     ब्रह्मा के विरुद्ध ऐसा अपकर्ष एवं अपमानजनक आक्रमण होने से वे तिरस्कृत हो गए। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भारत में उनकी उपासना लुप्त हो गई और वे औपचारिक रूप में ही त्रिमूर्ति में सहयोगी रह गए।

Trimurti ki Paheli - Hindu Dharm Ki Paheliyan - Dr Babasaheb Ambedkar     ब्रह्मा के मैदान से बाहर हो जाने पर रह गए शिव और विष्णु । ये दोनों भी कभी शांति से नहीं बैठे। दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा, संघर्ष जारी रहा। आइए, देखें इस प्रचार - युद्ध में उन्होंने अपने विपक्षियों की क्या गत बनाई। कोई- ई-सा भी पक्ष अपने विरोधी देव का पंथ समाप्त करने में सफल न हो सका। शिव और विष्णु की उपासना जारी रही और फलती-फूलती रही। इसके बावजूद कालांतर में अनेक पंथ अस्तित्व में आए और उनको कभी राहु ने नहीं ग्रसा। इसका प्रमुख कारण यह है कि ब्राह्मणों ने धुंआधार प्रचार और प्रतिप्रचार जारी रखा । प्रचार तंत्र किस प्रकार चलता रहा, वह कुछ निम्न उदारहणों से जाना जा सकता है।

     विष्णु वैदिक देवता सूर्य से संबद्ध है और शिवभक्त उनका संबंध अग्नि से जोड़ते हैं। इसका आशय यह प्रकट करना था कि यदि विष्णु का उद्गम वैदिक है तो शिव का उद्गम भी वैदिक है। जन्म के आधार पर कोई भी एक-दूसरे से घट कर नहीं है ।

     शिव विष्णु से बड़े हों और विष्णु इनसे कम न हों। विष्णु के सहस्र नाम¹ हैं तो शिव के भी सहस्र नाम होने चाहिए और ऐसा ही हुआ ।² विष्णु के अपने प्रतीक³ हैं।  इसी प्रकार  शिव के भी होने चाहिए और उनके अपने⁴ प्रतीक हैं।


1. देखें विष्णु सहस्रनाम ।
2. पद्म पुराण में उद्धृत ।
3. ऊपर देखें।
4. वे है। (1) बहती गंगा, (2) चन्द्र, (3) शेष नाग, (4) जटाजूट ।


     महिमा - मण्डन के लिए एक देव के भक्तों ने जिस प्रकार पक्ष में प्रचार किया, उसके उत्तर में दूसरों ने भी अपने पक्ष में वैसा ही प्रतिप्रचार किया। गंगावतरण¹ का प्रसंग एक उदाहरण है। शिव भक्त उसकी उत्पत्ति शिव की जटाओं से मानते हैं, परन्तु वैष्णव इसे मानने को तैयार नहीं थे। उन्होंने एक और कथा गढ़ डाली । वैष्णवों के आख्यान के अनुसार पतित पावनी गंगा बैकुंठ (विष्णु के निवास) से निकलती है। उसका उद्गम विष्णु के चरणों से है और कैलाश पर आकर वह शिव के मस्तक पर उतरती है। इस कथा के दो निष्कर्ष हैं। प्रथम यह कि गंगा का उद्गम विष्णु के चरणों से है, शिव की जटा से नहीं। फिर, शिव का पद विष्णु से नीचा है क्योंकि उनके मस्तक पर गंगा की धार विष्णु के चरणों से गिरती है।

     दूसरा उदाहरण देखें जो देवों और असुरों द्वारा सागर मंथन का है। उन्होंने मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया और शेषनाग को रस्सी (रज्जू)। विष्णु ने कूर्म अवतार लिया और पृथ्वी को अपनी पीठ पर धारण किया तथा मंथन के समय उसके स्पंदन को नियंत्रित किया। यह कथा विष्णु की महिमा बढ़ाने के लिए रची गई। शिव का स्थान, इसमें गौण है। इसके अनुसार समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकले। इनमें से हलाहल एक था। यदि कोई इस हलाहल का पान न करता, वह समस्त विश्व को नष्ट कर सकता था। शिव ही उसके पान के लिए तत्पर हुए। इससे यह संकेत मिलता है कि विष्णु द्वारा दोनों विरोधी समूहों, देव और असुरों का सागर मंथन की अनुमति देकर विश्व के विनाश का द्वारा खोल दिया गया था और उन्होंने अविवेकपूर्ण कार्य किया था। शिव की महिमा बताई गई है कि उन्होंने विष पान करके विष्णु की करतूत से होने वाले अनिष्ट से विश्व को बचा लिया।

     तीसरा उदाहरण भी यह प्रकट करता है कि विष्णु मूर्ख थे और शिव ने ही अपनी विलक्षण बुद्धिमत्ता और पराक्रम से विष्णु को उनकी करनी से त्राण दिलाया। यह कथा अक्रूरासुर² की है। अक्रूर ऋक्ष के मुख वाला एक राक्षस था । इसके बावजूद वह नियमित रूप से वेद पाठ करता था और भक्ति कर्म करता था । विष्णु उससे अत्यंत प्रसन्न हो गए और उसे मनचाहा वरदान देने का वचन देने को मान गए। अक्रूरासुर ने वर मांगा कि त्रैलोक्य का कोई भी प्राणी उससे अधिक बलशाली न हो, न उसे मार सके। विष्णु ने उसे वरदान दे दिया । परन्तु वह इतना ढीठ हो गया कि जब उसने देवताओं को त्रास दिया तो वे छिप गए और वह विश्व का शासक बन बैठा। असुर के अत्याचारों से लाचार विष्णु काली तट पर चिंतित बैठे थे। उनका रोष स्पष्ट दिख रहा था। उनकी आंखों के सामने ऐसे आकार जीव प्रकट हुआ जो पहले त्रिलोक में विद्यमान नहीं था। वह रौद्र रूपी महादेव थे, जिन्होंने क्षण भर में विष्णु को त्राण दिलाया।



1. मूर, हिंदू पेनथियन, पृ. 40-41
2. यह कहानी विष्णु आगम में कही जाती है और मूर के हिंदू पेनथियन पृ, 19-20 में उल्लिखित है।


     इसके जवाब में भस्मासुर की कथा प्रचलित हुई जिसमें शिव को मूर्ख बताया गया है और विष्णु उस के परित्राण कर्त्ता दिखाए गए हैं। भस्मासुर ने शिव को एक वरदान के लिए प्रसन्न कर लिया। वरदान यह था कि भस्मासुर जिसके भी सिर पर हाथ फिराएगा, वह भस्म हो जाएगा। शिव ने वरदान दे दिया। भस्मासुर ने शिव के वरदान से उन्हें ही भस्म करने की ठानी। शिव भयभीत होकर भागे और विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया और भस्मासुर के पास गए। वह उन्हें देखकर आसक्त हो गया। मोहिनी रूपी विष्णु ने कहा कि वह एक शर्त पर उसकी हो जाएगी, जैसे-जैसे वह क्रिया करे, वैसे ही भस्मासुर अनुसरण करे। विष्णु ने इस प्रकार भस्मासुर का हाथ उसके सिर पर रखवा दिया। परिणाम यह निकला कि भस्मासुर का काम तमाम हो गया और विष्णु को यह श्रेय मिला कि उन्होंने शिव को उनकी भूल के संभावित विनाश से बचा लिया।

     इन देवताओं के बीच इस प्रश्न पर प्रतिस्पर्धा और शत्रुता का ज्वलंत प्रमाण मिलता है कि पहले कौन जन्मा? एक कथा स्कंद पुराण में आती है। स्कंद पुराण कहता है कि विष्णु देवी के वक्षस्थल पर सो रहे थे। उनकी नाभि से कमल प्रकट हुआ और वह पुष्प जल की सतह पर आ गिया। उसमें से ब्रह्मा प्रकट हुए। उन्होंने जब यह देखा कि इस अनन्त में कोई जीव नहीं है तो उन्होंने सोचा सर्वप्रथम वे ही उत्पन्न हुए हैं और इस प्रकार उन्होंने स्वयं को भावी सृष्टि से पूर्व जन्मा बताया । फिर भी यह विश्वास करने के लिए कि उनकी प्रभुसत्ता को चुनौती कौन दे सकता है, उन्होंने कमल-नाल को खींचा तो विष्णु को सोता हुआ पाया। उन्होंने जोर से पूछा तू कौन है।' विष्णु ने कहा, मैं प्रथम जन्मा हूं और जब ब्रह्मा ने अपने को पूर्व जन्मा बताया तो दोनों में युद्ध छिड़ गया। तभी महेश प्रकट हुए और कहा पहले मेरा जन्म हुआ। परन्तु मैं तुम दोनों में से किसी के भी लिए यह स्थिति त्यागने के लिए तैयार हूं, जो मेरी शिखा तक पहुंचे अथवा मेरे पांवों के तल तक। ब्रह्मा तुरन्त तैयार हो गए किन्तु वे थक गए थे पर बिना बात के प्रयत्न के अनिच्छुक हो गए। इसलिए उन्होंने अपना इरादा त्याग दिया। वे महादेव की ओर मुड़े और कहा, 'उन्होंने अपनी बात पूरी कर दी है और उनके माथे का मुकुट देख लिया है और साक्षी के लिए प्रथम जन्मी गाय को बुला लिया। इस गर्व और झूठ पर शिव को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा कि ब्रह्मा की कोई पूजा नहीं होगी और गाय मुख विकृत हो जाएगा। ' फिर विष्णु आए। उन्होंने यह स्वीकार किया कि वे शिव के चरण तल नहीं देख पाए। तब उन्होंने उनसे कहा कि देवों में वही प्रथम जन्मे हैं और उनका पद सर्वोच्च है। इसके पश्चात् शिव ने ब्रह्मा का पांचवा मुख काट डाला और इस प्रकार उनका मान भंग हुआ। उनकी शक्ति और प्रभाव क्षीण हो गए।

     इस कथा के अनुसार ब्रह्मा का यह दावा झूठा था कि उनका जन्म सर्वप्रथम हुआ है। इसके लिए वे शिव के दण्ड के भागी बने। विष्णु को प्रथम जन्मा कहलाने का अधिकार मिला। ब्रह्मा के अनुयायियों ने शिव की सहायता के लिए विष्णु द्वारा ब्रह्मा का स्थान छीन लेने पर बदला लेने की ठानी। इसलिए उन्होंने एक और कथा' रच डाली। जिसके अनुसार, विष्णु ब्रह्मा के नथुनों से सूकर में उत्पन्न हुए और स्वाभाविक रूप से वाराह बन गए। विष्णु के वाराह अवतार का यह बहुत क्षुद्र विश्लेषण है।

     देवताओं के बीच खींचतान ने वही रूप ले लिया जैसे व्यापारियों में प्रतिस्पर्धा पनप जाती है। इसका परिणाम यह निकला कि शैव वैष्णवों और वैष्णव शैवों को गरियाने लगे।

     यह तथ्य त्रिदेवों के विषय में है जिसका परवर्ती इतिहास में जिक्र है कि त्रिदेव की अवधारणा कोई नवीन नहीं थी। यह यास्क से प्राचीन है। अनगिनत देवताओं की संख्या घटाने के उद्देश्य से प्राचीन ब्राह्मणों ने कुछ देवताओं की जड़ काटने का मार्ग अपनाया और शेष से श्रेष्ठ बताने की चेष्टा की। इन प्रमुख देवताओं की संख्या तीन निश्चित की गई। इनमें से दो अग्नि और सूर्य थे। तीसरे स्थान के लिए इन्द्र और वायु में प्रतिस्पर्धा थी। परिणामस्वरूप एक त्रिमूर्ति बनी जिसमें अग्नि, इन्द्र और सूर्य थे अथवा अग्नि, वायु और सूर्य थे। नई त्रिमूर्ति की अवधारणा से प्राचीन अवधारणा के ही समान थी किन्तु उसके देवता बदल गए। इस त्रिमूर्ति का प्रत्येक देवता नवीन था। ऐसा लगता है प्रथम त्रिमूर्ति के विलुप्त हो जाने के काफी बाद तक किसी नई परम्परा का अस्तित्व नहीं था। चुल्ल निदेश में केवल ब्रह्म-वृत्तिका का उल्लेख है। शिव वृत्तिका तथा विष्णु वृत्तिका का कोई चिह्न नहीं है। इसका अर्थ यह हुआ कि चुल्ल निदेश के समय तक शिव और विष्णु की पूजा शुरू नहीं हुई थी। ब्रह्मा के पश्चात् इन्हें उनके साथ जोड़कर त्रिमूर्ति बना दी गई। हमारे मानस में ब्राह्मणों द्वारा त्रिमूर्ति - रचना में निभाई गई भूमिका के विषय में अनेक प्रश्न उत्पन्न होते हैं।

     पहला प्रश्न यह है कि ब्राह्मणों को अपने देवताओं पर कितनी आस्था है? उन्होंने कितने सरल ढंग से अपने देवताओं के एक समूह को दूसरे के लिए तिरस्कृत कर दिया? इस संबंध में यहूदी पुजारियों और 'नेबूचादनेज्जार' की याद आती है :

     1. " नेबूचादनेज्जार¹ राजा ने एक स्वर्ण मूर्ति बनवाई, जिसकी ऊंचाई साठ हाथ और चौड़ाई छह हाथ की थी। उसने उसे बेबीलोन के मैदान दुरा में स्थापित कराया।

     2. तब नेबूचादनेज्जार ने प्रान्तों के सभी क्षत्रपों, शासकों, न्यायाधीशों, कोषाधिपतियों, अमात्यों आदि को बुलाया कि वे मूर्ति के समर्पण के समय उपस्थित हों।


1. ओल्ड टैस्टमैंट डोनियाल, अध्याय 3, पद्य 1-23


     3. फिर क्षत्रप, शासक, न्यायाधीश, कोषाधिपति, अमात्य आदि उस समय तक उपस्थित रहे जब तक कि राजा द्वारा बनवाई गई मूर्ति स्थापित हुई ।

     4. तब अग्रदूतों ने ऊंचे स्वर में कहा "हे लोगो! हे शासको! तुम्हारे लिए आदेश है।"

     5. कि जिस समय तुम वाद्यवृंद (कार्नेट, बांसुरी, वीणा, बीन, सारंगी, तारवाद्य ) सुनो तो नेबूचादनेज्जार द्वारा निर्मित स्वर्णमूर्ति को साष्टांग दंडवत् पूजा करो ।

     6. और जो कोई भी दण्डवत् नहीं करेगा, उसे आग में झौंक दिया जाएगा।

     7. इसलिए उस समय जब सब लोगों ने विभिन्न वाद्यों का नाद सुना तो सभी लोग, सभी राष्ट्र, बहुभाषा-भाषी लेट गए और नेबूचादनेज्जार राजा द्वारा स्थापित मूर्ति की पूजा की।

     8. तभी कोई चाल डीएन्स वहां आया और यहूदियों को अपशब्द कहे।

     9. उन्होंने राजा नेबूचादनेज्जार से कहा "हे राजा तू अमर रहे। "

     10. हे राजा! तूने एक आदेश जारी किया है कि जब कोई व्यक्ति विशेष वाद्यवृंद सुने तो वह स्वर्णमूर्ति की पूजा करे ।

     11. जो आदेश का पालन नहीं करेंगे उन्हें भट्टी में झौंक दिया जाएगा।

     12. कुछ ऐसे यहूदी हैं, जो आप के आदेश से बेबीलोन में बसे हैं। वे हैं शाद्राच, मेशाच, अबेद-नेगो। हे राजा! ये तेरे आदेश का पालन नहीं करते, वे तेरे देवता का वंदन भी नहीं करते, तेरे द्वारा स्थापित मूर्ति को नहीं पूजते ।

     13. तब नेबूचादनेज्जार भड़क उठा। तब कुपित राजा ने आदेश दिया कि शाद्राच, मेशाच और अबेदा- नेगो को पेश किया जाए। तब वे राजा के सामने लाए गए।

     14. नेबूचादनेज्जार ने उनसे पूछा - "क्या यह सच है शाद्राच, मेशाच, अबेद - नेगो तुम मेरे देवता की दंडवत् अभ्यर्थना नहीं करते, स्वर्णमूर्ति की पूजा नहीं करते जो मैंने स्थापित की है?

     15. अब तुम तैयार रहो। जब तुम अमुक-अमुक वाद्यों की आवाज सुनो तो झुक कर उस मूर्ति की पूजा करो जो मैंने बनवाई हैं। परन्तु यदि तुम पूजा नहीं करोगे तो तुम्हें तुरन्त दहकती हुई भट्टी में झौंक दिया जाएगा और ऐसा कौन-सा देवता है जो तुम्हें मेरे हाथों से बचा लेगा ।

     16. शाद्राच, मेशाच और अबेद- नेगो ने राजा से कहा "हे नेबूचादनेज्जार, इस मामले में हम तेरी परवाह नहीं करते।

     17. अगर ऐसा होता है तो जिस देवता की हम पूजा करते हैं वह हमें उस दहकती भट्टी से निकाल लेगा और हे राजा वह हमें तेरे हाथों से भी बचा लेगा ।

     18. तो हे राजा, यह जान ले, यदि ऐसा होता है तो हम किसी देवता की पूजा नहीं करेंगे, न ही उस स्वर्णमूर्ति की, जो तूने स्थापित की है। "

     19. तब नेबूचादनेज्जार आग-बबूला हो गया और उसके चेहरे की रंगत बदल गई। वह बोला और आदेश दिया कि भट्टी को गर्माएं।

     20. फिर उसने सेना के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति से कहा कि वह शाद्राच, मेशा और अबेद - नेगो को बांध कर दहकती भट्टी में डाल दें।

     21. तब उन व्यक्तियों को उनके कोट, उनके जुराबों, उनके टोप और दूसरे कपड़ों समेत बांध कर दहकती भट्टी में डाल दिया।

     22. क्योंकि राजा के आदेश थे, भट्टी दहक उठी थी। लपटों ने उन लोगों को जलाकर भस्म कर दिया, जो शाद्राच, मेशाच और अबेद - नेगो लाए थे।

     23. और वे तीनों व्यक्ति शाद्राच, मेशाच और अबेद-नेगा दहकती भट्टी में झोंक दिए गए। "

     ब्राह्मणों ने पहली त्रिमूर्ति को क्यों तिरोहित कर दिया? इसका कोई संकेत नहीं कि देवों के प्रति आस्था की पूर्व शपथ हेतु उन्हें बाध्य किया गया था। क्या यह लाभ प्राप्ति का सौदा था ?

     दूसरा प्रश्न यह है कि क्या तीन देवों के भक्तों ने जीओ और जीने दो का मार्ग अपना लिया था? एक सम्प्रदाय दूसरे की पोल खोलने के लिए क्यों उद्यत था ? इन सम्प्रदायों के बीच नाम के लिए सैद्धांतिक मतभेद भी नहीं था। उनका धर्मशास्त्र, ब्रह्मांड विज्ञान और दर्शनशास्त्र सभी समान था । इसलिए गुत्थी और जटिल हो जाती है । क्या यह पांथिक संघर्ष राजनीतिक था ? क्या ब्राह्मणों ने धर्म को राजनीति बना दिया था? वरना झगड़े का कारण क्या था ?