हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
परन्तु यह पूजा एक साधारण बात बन गई। शिव के साथ दुर्गा, विष्णु के साथ लक्ष्मी, कृष्ण के साथ राधा, राम के साथ सीता की उपासना आरम्भ हो गई। शक्तियों की संख्या निश्चित नहीं की गई है।
किसी समय केवल आठ शक्तियां गिनी जाती थी, किसी समय नौ । जैसे, वैष्णवी, ब्राह्मणी, रौद्री माहेश्वरी, नरसिंही, वाराही, इन्द्राणी, कार्तिकी और प्रधाना । लक्ष्मी के अतिरिक्त विष्णु की पचास शक्तियां और गिनी जाती हैं, शिव अथवा रुद्र की दुर्गा अर्थात् गौरी सहित पचास ओर शक्तियां हैं। सरस्वती, विष्णु, रुद्र और ब्रह्मा की शक्ति हैं। वायु पुराण के अनुसार शिव की नारी प्रवृति के दो रूप हैं, आधी असित (अश्वेत) और आधी सित (श्वेत), इनमें से प्रत्येक का विस्तार हो गया। श्वेत और शांत स्वभाव की देवियों में उमा, गौरी, लक्ष्मी, सरस्वती आदि सम्मिलित हैं ओर अश्वेतों तथा विकराल देवियों में दुर्गा, काली, चण्डी और चामुण्डा आदि शामिल हैं।
बहरहाल, शीघ्र ही सारी शक्तियों का लोक प्रचार हो गया। इसके परिणामस्वरूप उनके अनगिनत स्वरूप और रूप उभर आए ।
इस मानवीकरण का आधार विष्णु के अवतार थे जिसमें दैवी - प्रभाव की मात्रा के अनुसार वर्गीकरण हुआ जैसे पूर्णशक्ति, अंशरूपिणी, काल रूपिणी कालांश रुपिणी । इसकी अंतिम श्रेणी में ब्राह्मण से लेकर नीचे तक की जातियों की साधारण स्त्री भी सम्मिलित कर ली गईं। जिन्हें यह समझकर पूजा जाने लगा कि इन पर देवी आती है। यह नहीं भूलना चाहिए शाक्त मतावलंबियों की दृष्टि से प्रत्येक स्त्री साक्षात देवी है।
फिर भी अधिक प्रचलित वर्गीकरण महाविद्याओं के रूप में प्रारंभ हुआ। विष्णु के दस अवतारों की तरह इनकी संख्या भी दस ही रखी गई है। यह महाविद्याएं कहलाती हैं और देवी की महान विद्याओं का स्रोत हैं। इनके विभिन्न गुण हैं। इसी प्रकार इनका नामकरण किया गया है। 1. काली (श्यामा) कृष्ण वर्ण विकराल और प्रचण्ड स्वभाव, 2. तारा, सौम्य स्वरूप, विशेष रूप से कश्मीर में पूजी जाती है। 3. षोड्शी, सोलह वर्ष की सुंदर कन्या (त्रिपुरा भी कहलाती है जो मालाबार में पूजी जाती है)। 4. भुवनेश्वरी 5. भैरवी 6. छिन्नमस्तका निर्वस्त्र देवी, हाथ में रक्त रंजित खड्ग दूसरे हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर जो अपने ही शीशहीन धड़ से उबलते रक्त का पान करती है, 7. धूमवती, धुएं के रूप में, 8. बगुला, बकमुखी, 9. मातंगी, भंगी जाति की स्त्री 10. कमलात्मिका । इनमें से प्रथम दो विशेष रूप से महाविद्याएं हैं। अगली पांच विद्याएं हैं और शेष तीन सिद्ध विद्याएं हैं।
देवियों का अगला मानवीकरण अथवा स्वरूप मातृ अथवा मातृका अथवा महामातृ कहलाता है। भारत के कृषक वर्ग में प्रत्येक पंथ में उपासनीय मातृदेवी से महाविद्याओं के संबंध अधिक महत्वपूर्ण हैं। इस पर अगले अध्याय में और विस्तारपूर्वक विचार किया जाएगा।
मातृ इस प्रकार है- 1. वैष्णवी, 2. ब्राह्मी अथवा ब्राह्मणी । प्रायः ब्रह्मा की भांति चतुर्मुखी होती है। 3. कार्तिकेयी कभी - कभी मयूरी कहलाती है, 4. इन्द्राणी, 5. यमी, 6. वाराही, विष्णु के वाराह अवतार से सम्बद्ध, 7. देवी अथवा इंसानी, शिव भार्या के रूप में एक हाथ में त्रिशूल धारी 8. लक्ष्मी । इनमें से प्रत्येक देवी माता की गोद में एक बच्चा है।
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माताओं से घनिष्ठ संबंधित आठ नायिकाओं का भी मानवीकरण किया गया है। इनका माता होना आवश्यक नहीं। इनकी कल्पना केवल अवैध संभोग के संबंध में की गई है। इनके नाम हैं, बालिनी, कामेश्वरी, विमला, अरुणा, मेदिनी, जयनी, सर्वेश्वरी तथा कौलेसी।
दूसरा रूप है योगिनियों का। ये आठ पिशाचिनियां हैं, जो दुर्गा की सेवा के लिए बनाई गई हैं। कभी-कभी उस देवी का रूप भी धारण कर लेती हैं। इनकी संख्या साठ अथवा चौंसठ हैं और ये एक करोड़ तक हो सकती हैं।
एक अन्य नगण्य-सा वर्ग है डाकिनी और साकिनी । ये साधारणतः प्रेमिकाएं अथवा अति घृणित प्रवृतियों वाली राक्षसियां हैं और देवियों के समक्ष इनका रूप चंचल भृत्या के समान है, जो हर समय इनकी सेवा में रहती हैं।
परन्तु इनका प्रचण्डतम रूप काली है जिसकी कलकत्ता में पूजा होती है।
काली के स्वरूप के संबंध में तांत्रिकों के दो परिच्छेदों का रूपांतरण इस प्रकार है :
“मद्य और नैवेद्य से पूजा की जानी चाहिए उस काली की जिसका मुख भयानक रूप से खुला हुआ है, बाल बिखरे हुए हैं, जो चतुर्भुजा है, उसने उन महाबलियों की मुंडमाला पहन रखी है जिनका उन्होंने संहार किया है और रक्तपान किया है। उनके करकमलों में खडग है जो निर्भीक है और वरदान देती है। जो विशाल मेघ के समान काली है और आकाश ही उसके वस्त्र हैं। उन्होंने नरमुण्ड माला धारण की है। उसी में रक्त की बूंद टपकाती हुई एक गर्दन है। दो शवों के कुण्डल पहने है । उनके हाथों में दो शव हैं, जिनके लंबे-लंबे दांत और मुस्कराता चेहरा है, जिनका रूप विरूप है, जो श्मशानवासिनी है। ( लाशें खाती है) जो अपने पति महादेव की छाती पर खड़ी है।"
(अंग्रेजी पांडु लिनपि के पृष्ठ संख्या 63-64 अप्राप्य हैं। 65 वें पृष्ठ की सामग्री नीचे दी जा रही है जिसका अंतिम पैरा लेखक की हस्तलिपि में है। )
तांत्रिक पूजा ऋतु अथवा पौराणिक पूजा से बिलकुल भिन्न है। इसका मूल दर्शन जो उपासना का सर्वोत्तम रूप है वह यह है कि मनुष्य की स्त्री के साथ मैथुन इच्छाओं की पूर्ण रूपेण संतुष्टि होनी चाहिए। तांत्रिक पूजा में पंच मकार की प्रधानता है। पंचमकार निम्न प्रकार हैं:
1. मद्यपान, 2. मांस भक्षण, 3. मत्स्य सेवन, 4 मुद्रा सेवन, और 5 मैथुन ।
तांत्रिक पूजा में भी ये क्रियाएं सम्पन्न की जाती हैं। यह बताने की आवश्यकता नहीं कि जो निषेध हैं, तंत्र में वे भी मान्य हैं, बल्कि तंत्र पूजा में स्त्री से मैथुन पूजा का एक अंश है। हिन्दू धर्म का इस तरह का विकास है। इस इतिहास को पढ़कर सच्चे धर्म का विद्वान यह पूछने के लिए अवश्य बाध्य हो जाएगा “हिन्दू धर्म में नैतिकता का क्या स्थान है। "
धर्म, निःसन्देह रूप से कई प्रश्नों से आरम्भ होता है।
“मैं क्या हूं?” ब्रह्मांड किसने बनाया?" "यदि ईश्वर ने बनाया है तो उससे हमारा क्या संबंध है?” “ईश्वर को प्रसन्न करने का सम्यक मार्ग क्या है?” “अहं तथा ब्रह्म में क्या अंतर है?" "किसे श्रेष्ठ जीवन कहते हैं?" अथवा " ईश्वर कैसे प्रसन्न होता है" ? आदि ।
इनमें से कई प्रश्न धर्मतत्व, आत्मतत्व, दर्शन और नैतिकशास्त्र से जुड़े हुए हैं, जो धर्म के विभिन्न तत्व हैं। परन्तु एक प्रश्न है, जो धर्म की शिक्षा एवं प्रचार से पूछा जाता है और जो अनुत्तरित है कि श्रेष्ठ जीवन क्या है? जिस धर्म में ऐसा नहीं वह धर्म नहीं।
ब्राह्मणों ने हिंदूधर्म को इस प्रकार नग्न क्यों किया? उसे नैतिकता विहीन क्यों किया? हिंदूधर्म इसको छोड़कर कुछ नहीं है जिसमें अनगिनत देवी-देवता और पेड़-पौधे पूजे जाते हैं, तीर्थ यात्राएं की जाती हैं, और ब्राह्मण को दक्षिणा दी जाती है। क्या इस धर्म की रचना मात्र इसलिए की गई है कि ब्राह्मणों की रोटी-रोजी चलती रहे ? क्या उन्होंने कभी सोचा है कि नैतिकता ही समाज का आधार है और जब तक धर्म में नैतिकता का समावेश नहीं किया जाता वह..... तत्व है । ब्राह्मणों को इन प्रश्नों का उत्तर देना है।¹
1. पाण्डुलिपि में यह अक्षर नष्ट हो गया है ।