हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
परिशिष्ट - 4
स्मार्त धर्म तथा तांत्रिक धर्म
II - स्मार्त धर्म
स्मृत-धर्म के पवित्र साहित्य में स्मृतियां अथवा संहिताएं आदि समाविष्ट हैं। ये स्मृतियां भारत की विधि-विधान हैं। इस विधि-विधान की परिधि इतनी व्यापक हो गई कि उसमें विधि, सरकार, समाज, विभिन्न जातियों के नागरिकों के अधिकार और कर्त्तव्य, पापों का प्रायश्चित और अपराधों के लिए दंड व्यवस्था का प्रावधान है। इसके शुरू के निरपेक्ष अंशों पर हम इस समय अध्ययन नहीं कर रहे हैं। इसके उसी भाग के अंश प्रासंगिक हैं जो पूर्णतः धार्मिक हैं।
स्मृत-धर्म अर्थात् स्मृतियों पर आधारित धर्म पांच सिद्धांतों पर आधारित है। इसका प्रथम सिद्धांत है, त्रिदेव में आस्था, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश सम्मिलित हैं। इस त्रिमूर्ति में ब्रह्मा जगत का सृष्टा है, विष्णु पालनहार और शिव संहारक हैं। श्रुत-धर्म के तैंतीस देवताओं के स्थान पर स्मृत-धर्म तीन देवों तक सीमित हैं।
स्मृत-धर्म का दूसरा सिद्धांत है संस्कार । स्मृत-धर्म के अनुसार प्रत्येक गृहस्थ को कुछ संस्कार करने होते हैं। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो पतित हो जाता है, गरिमा से च्युत हो जाता है......
पौराणिक धर्म में दंड एवं प्रायश्चित का महत्वपूर्ण स्थान है। श्रुत धर्म में यम दुरात्माओं को और दंड नहीं देता। जीवन में किए गए पाप का दंड मृत्यु के पश्चात् भोगना पड़ता है अथवा नहीं, यह ज्ञात नहीं है परन्तु इस संबंध में पुराणों ने यम की शक्ति का बहुत विस्तार कर दिया है।
(मूल अंग्रेजी में उपरोक्त सामग्री टाइप किए हुए 21 पृष्ठ में है। आगे के पृष्ठ गायब हैं। पृष्ठ सं. 55 से 65 पर नीली स्याही से संशोधित एवं अनुदेशित यह सामग्री, सिर्फ पृष्ठ 56 को छोड़कर लेखक की हस्तलिपि में है । - संपादक)
'स्मार्त-धर्म और तात्रिक धर्म' पर अंग्रेजी में कुछ पृष्ठ मिले थे। स्मृत-धर्म, खंड-2 और तांत्रिक धर्म, खंड-3 में प्रस्तुत किया गया है। खंड 1 में श्रुत धर्म पर सामग्री थी। स्मृत धर्म पर मात्र एक पृष्ठ की सामग्री भी पृ. 21 पर है। अंग्रेजी में तांत्रिक धर्म 55वें पृष्ठ से प्रारम्भ होता है और पृष्ठ 56 को छोड़कर 65 तक चलता है। लेखक ने हाथ से लिखे तीन पृष्ठ और जोड़े हैं। संपादक
"यम मृतकों का न्याय करता है। वह नरक का स्वामी है। जो मरता है, उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। फिर उसका सामना पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाले चित्रगुप्त से होता है। पुण्यात्मा स्वर्ग अथवा एलीसियम को भेज दी जाती है जबकि पापात्माओं को नरक अथवा तरतारस में डाल दिया जाता है।"
'भयानक चित्रगुप्त की गर्जना प्रलयंकारी बादलों की गरज के समान है, वह काजल के चमकते पर्वत के समान है। शस्त्रों की चमक के समान आतंकोत्पादक है, उसकी बत्तीस भुजाएं हैं, जो तीन योजन लंबी है, लाल-लाल आंखें हैं, लंबी नाक है, उसके नुकीले और लंबे-लंबे दांत हैं, उसकी आंखें दीर्घ पोखर के समान हैं। उसके भंडार में काल और व्याधियों की भरमार है। "
पाप का दंड मृत्योपरांत भोगना पड़ेगा। इसी प्रकार पापमुक्ति के लिए निश्चित प्रायश्चित का विधान है।
परन्तु पाप क्या है? पौराणिक धर्म के अनुसार, इसका अर्थ नैतिक दुराचार नहीं है, इसका अर्थ है पौराणिक विधि-विधान का पालन न करना । यह है पौराणिक धर्म ।
III- तांत्रिक धर्म
तांत्रिक धर्म शक्ति की पूजा कर केन्द्रित है। शक्ति का शाब्दिक अर्थ है, ऊर्जा किन्तु तंत्रवाद में इसका तात्पर्य है पुरुषदेवता की सहगामिनी नारी । तांत्रिक धर्म का विशाल साहित्य है और हिंदुओं के धार्मिक साहित्य की अलग शाखा है। यह समझना आवश्यक है कि हिंदुओं के शाक्त मत में अपने व्यापक पौराणिक चरित्र मौजूद हैं। अनेक नारी देवियां हैं, जिनका हिंदू देवकुल में विशिष्ट स्थान है।
मूलरूप से तांत्रिक धर्म पौराणिक धर्म का विस्तार है। पुराणों में ही प्रथम बार अविवाहित नारी देवियों को मान्यता मिली। फिर विवाहित देवियों की मान्यता हुई, जो देव - पत्नियां थीं। इसका आधार यही है कि देवताओं की पत्नियों की देवी - रूप में पूजा की जाए। इसी कारण पुराणों ने शक्तिमत चलाया। पुराणों के अनुसार कोई देवता चाहे अकेला हो, उसका दोहरा चरित्र है। उनका एक रूप प्रशांत है और दूसरा विकराल । क्रियाशील रूप शक्ति कहलाता है। पुराणों में देवताओं की शक्ति का मानवीकरण देव पत्नी के रूप में किया गया है। यही शक्ति मत ( शाक्तमत) का आधार है अर्थात् किसी देवपत्नी की आराधना ।
शक्ति मत का सार है- देवी की नैसर्गिक शक्ति के रूप में विशिष्ट पूजा, जो एक जगतजननी, जगदंबा है, एक शक्तिशाली रहस्यमय तत्व है। जो दो विशिष्ट कार्यों का संचालन और नियंत्रण करती है। पहला है प्राकृतिक भुभुक्षा और आवेग पर, चाहे शारीरिक संवर्धन के लिए खान-पान अथवा कामवासना अर्थात् साहचर्य से जीव- वृद्धि। दूसरा, सिद्धि, चाहे किसी के व्यक्तिगत उत्कर्ष हेतु हो अथवा शत्रु विनाश के लिए |
यहां यह समझना आवश्यक है कि हिंदुओं के शाक्त मत में इतने व्यापक पौराणिक चरित्र हैं, इनमें अनेक नारी देवियां हैं, जिनका हिंदू देवकुल में विशिष्ट स्थान है।
इसके बावजूद, तांत्रिक नारी देवकुल की व्यूह रचना फैलती गई। इसके अनेक रूप-स्वरूप बने। शक्ति मत का उद्गम शिवभार्या है। इस बात पर सभी सहमत हैं। कि वही सम्पूर्ण नारी पौराणिक प्रथा का उद्गम है। इस परम्परा में उनका सर्वोच्च स्थान है और यह भी उल्लेखनीय है कि उनमें पुरुष देवता शिव के लक्षण विद्यमान हैं। उनका सामान्य दाम्पत्य संबंध ही नहीं हैं अपितु उनके गुणों का भी संचरण हो गया है। हम पहले ही उल्लेख कर चुके हैं कि किस प्रकार देवगण शिव के प्रभामण्डल के चारों ओर एकत्र हो गए। सभी देवों के गुण और कर्म उनमें समा गए और वे स्वयं अपने उपासकों के लिए देवाधिदेव महादेव बन गए। इसी प्रकार, बल्कि इससे भी बढ़कर उनकी भार्या शक्ति - पूजा परम्परा की महादेवी बन गई जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव की नारी अभिव्यक्ति होती है और वह उनके कार्यो को स्वयं सम्पन्न करती है। इसी कारण ब्रह्मा और विष्णु की पत्नियां भी उनकी पुत्री मानी जाती हैं क्योंकि उनके गुण-कर्म विपरीत और प्रतिफूल हैं। इसलिए इनसे हिंदू विचारधारा के सम्मुख कोई कठिनाई नहीं आती। वह हर प्रकार अपने पति का दूसरा रूप हैं बल्कि एक ऐसा स्वरूप जिसमें और भी रंग भर दिए गए हैं। क्योंकि एक समय शिव भी वर्ण और प्रकृति से श्वेत-शुक्ल थे और एक समय श्याम। इस प्रकार उनके श्वेत गुण भी अर्ध श्वेत ( जब उनका नाम गौरी है) और अर्ध श्याम (जब उनका नाम काली है)।
फिर इन विपरीत लक्षणों में विभिन्न संशोधन हुए और इनमें अनवरत रूप से वृद्धि होती गई। गौरवर्ण और शांत स्वभाव वाली देवियां उमा, गौरी, लक्ष्मी, सरस्वती आदि कहलाईं और जिस प्रकार शिव के 1008 नाम अथवा विशेषण हैं, उसी प्रकार उनकी भार्या के भी। उन सबसे संबंध जुड़ा हुआ है। उनकी न्यूनतम एक सहस्र नाम से प्रार्थना की जाती है। कुछ उनकी सौम्य मूर्ति के नाम से हैं और कुछ विकराल के। उल्लेखनीय हैं कि तंत्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति "म" अक्षर से आरम्भ होने वाले उनके आठ नामों का जाप करता है तो राजा स्वयं उसका सेवक बन जाएगा, सभी उसे प्रेम करेंगे और उनके सभी दुख- संताप दूर हो जाएंगे।
संक्षेप में, शाक्तों की सभी देवियां अथवा शक्तियां शव की नारी शक्ति में समा. हित हो जाती हैं। उनकी संख्या अगणित हो जाती है और उनके भिन्न-भिन्न रूप उभर आते हैं।