हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
परिशिष्ट - 3
त्रिमूर्ति की पहेली
जितनी सच्चाई इस बात में है कि हिंदू धर्म सम्प्रदायों का मिश्रण है, उतना ही सच यह भी है कि यह धर्म विभिन्न जातियों से मिलकर बना है। परन्तु जितना ध्यान सम्प्रदायों के अध्ययन पर दिया गया है, उससे आधा भी जातियों के अध्ययन पर नहीं दिया गया। यह जितनी दुर्भाग्य की बात है उतनी ही विचित्र भी । सम्प्रदायों ने भी भारत के इतिहास में उतनी ही भूमिका निभाई है जितनी जातयों ने। दरअसल जिस प्रकार कुछ जातियों ने भारत का इतिहास रचा है, उसी प्रकार सम्प्रदायों का भी उसमें योगदान है।
जितने सम्प्रदायों से मिलकर हिंदू धर्म बना है वे असंख्य हैं उन सबका उद्भव पता लगाना असम्भव है और इन पंथों की तुलना करना इस अध्याय की परिधि में नहीं आ सकता। हम इतना ही कर सकते हैं कि उनमें से कुछ अति महत्वपूर्ण पंथों को ही देखें और तत्संबंधी समस्याओं पर विचार करें। भारतीय इतिहास में इनमें से तीन अति महत्वपूर्ण हैं। एक वह है जो ब्रह्मा से संबद्ध है, दूसरा विष्णु से और तीसरा पंथ शिव अथवा महेश का अनुयायी है। जिन्होंने इन पंथों के इतिहास का अध्ययन किया है, निम्नांकित प्रश्न उन्हें झकझोर देंगे।
बौद्धों की रचना चुल्ल निदेश में तत्कालीन भारत के विभिन्न पंथों का संकेत दिया है। हम इन्हें सम्प्रदाय और पंथों में निम्नांकित रूप में विभाजित करते हैं:
1. पंथ
| क्रम सं. | सम्प्रदाय का नाम | मत का तत्व |
| 1. | आजीविका श्रावक¹ | आजीविका² |
| 1. श्रावक का अर्थ है अनुशासन 2. अपनी आजीविका के लिए विशेष नियमों का पालन करने वाला भिक्षुक |
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इस पहेली को पहेली सं. 11 के साथ पढ़ा जाये जो देवताओं के उत्थान तथा पतन सं संबंधित हैं। 'त्रिमूर्ति की पहेली ' मूल विषयसूची में नहीं है, न ही सरकार को प्राप्त पाण्डुलिपि में यह निहित थी। यह प्रति श्री एस. एस. रेगे ने उपलब्ध कराई है। संपादक |
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| 2. | निगंठ श्रावक | निगंठ¹ |
| 3. | जटिल श्रावक | जटिल² |
| 4. | परिव्राजक श्रावक | परिवाजक³ |
| 5. | अवरुद्ध श्रावक | अवरुद्धक |
2. पंथ
| क्र. सं. | सम्प्रदाय का नाम | पूजा देव का नाम |
| 1. | हस्ति वृत्तिका ( व्रती ) ⁴ | हस्ति⁵ |
| 2. | अश्व वृत्तिका | अश्व⁶ |
| 3. | गो वृत्तिका | गो⁷ |
| 4. | कुकुर वृत्तिका | कुकुर⁸ |
| 5. | काक वृत्तिका | काक⁹ |
| 6. | वासुदेव वृत्तिका | वासुदेव |
| 7. | बल्देव वृत्तिका | बल्देव |
| 8. | पूर्णभद्र वृत्तिका | पूर्ण भद्र |
| 9. | मणिभद्र वृत्तिका | मणिभद्र |
| 10. | अग्नि वृत्तिका | अग्नि |
| 11. | नाग वृत्तिका | नाग |
| 12. | सुपर्ण वृत्तिका | सुपर्ण |
| 13. | यक्ष वृत्तिका | यक्ष |
| 14. | असुर वृत्तिका | असुर |
| 15. | गंधर्व वृत्तिका | गंधर्व |
| 16. | महाराज वृत्तिका | महाराज |
| 17. | चन्द्र वृत्तिका | चन्द्र |
| 18. | सूर्य वृत्तिका | सूर्य |
| 19. | इन्द्र वृत्तिका | इन्द्र |
| 20. | ब्रह्म वृत्तिका | ब्रह्मा |
| 21. | देव वृत्तिका | देव |
| 22. | दिशा वृत्तिका | दिशा |
1. सभी बन्धनों से मुक्त भिक्षुक
2. अपने सिर के केशों की चोटी बनाने वाले भिक्षुक
3. समाज को छोड़ने वाले भिक्षुक
4. तपस्वी
5. हाथी
6. घोड़ा
7. गाय
8. कुत्ता
9. कौआ
त्रिदेवो के पंथों की उपर्युक्त सूची में विभिन्न देवों के पंथों के साथ तुलना से दो निष्कर्ष निकलते हैं। एक निष्कर्ष यह है कि ब्रह्मा और महेश की उपासना नई कपोल कल्पना है जो चुल्ल निदेश के बाद आरम्भ हुई। दूसरा निष्कर्ष यह है कि सभी पुरानी आस्थाएं लुप्त हो गई। इस अद्भुत परिवर्तन का कारण स्पष्ट है कि नई पद्धति उस समय तक प्रचलित नहीं हो सकती थी जब तक कि ब्राह्मण उनका प्रचार न करते। साथ ही यदि ब्राह्मण उनके प्रचार से हाथ नहीं खींच लेते तो पुरानी पद्धति लुप्त नहीं हो सकती थी । इतिहास के विद्यार्थी को जो प्रश्न भ्रम में डालता है, वह है कि ब्राह्मणों ने नये पंथों की कल्पना क्यों की? प्राचीन आस्थाओं को तिलांजलि क्यों दे डाली ? यह प्रश्न केवल जटिल ही नहीं है बल्कि विद्वानों को भ्रम में भी डाल देता है कि इस उथल-पुथल में इन्द्र जैसे देवताओं का भी लोप हो गया। इन्द्र एक वैदिक देवता है। वैदिक देवताओं में वह महानतम है। यदि हजारों साल तक भी नहीं तो सैकड़ों वर्षों तक ब्राह्मणों ने इन्द्र की परम देव के रूप में पूजा और स्तुति की। वह क्या वजह थी कि ब्राह्मणों ने इन्द्र की अवहेलना करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश की पूजा आरंभ कर दी ? ब्राह्मणों द्वारा आस्थाएं बदल देने का कारण आध्यात्मिक था अथवा व्यावसायिक ?
शिव कौन थे जिन्हें इन्द्र के स्थान पर अपना लिया गया ? दक्ष प्रजापति का यज्ञ और उसमें शिव की भूमिका शिव के विषय में महत्वपूर्ण प्रकाश डालती है। कथा इस प्रकार है कि राजा दक्ष ने हिमालय पर कहीं एक यज्ञ किया। इस यज्ञ में देव, दानव, पिशाच, नाग, राक्षस और ऋषि सभी सम्मिलित हुए। परंतु दक्ष ने शिव को आमंत्रित नहीं किया, इसलिए वे नहीं आए। एक ऋषि दधीचि ने दक्ष की भर्त्सना की कि शिव को क्यों निमंत्रित नहीं किया और यज्ञ करना चाहते हो । दक्ष ने शिव को आमंत्रित करने से इंकार कर दिया और कहा "मैंने आपके रूद्र जैसे बहुत से देखें हैं आप जाइए मैं शिव को कुछ नहीं समझता " । दधीचि ने कहा " तुमने शिव के विरुध षडयंत्र किया है, ध्यान रखना तुम्हारा यज्ञ सफल संपन्न नहीं होगा । " महादेव ने यह सुना तो अपने मुख से एक राक्षस उत्पन्न किया और राक्षस ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंश कर दिया। इससे पता चलता है कि एक समय ब्राह्मण शिव को पूज्य देवता नहीं मानते थे या इससे पता चलता है कि शिव ब्राह्मणों की यज्ञ प्रथा के विरुद्ध थे।
आर्यों और अनार्यों के बीच भिन्नता संस्कृति के आधार पर थी, जातीय आधार पर नहीं। सांस्कृतिक भेद दो बिन्दुओं पर था। आर्य चातुर्वर्ण्य में विश्वास रखते थे। अनार्य इसके विरुद्ध थे। दक्ष के यज्ञ के विषय में इन तथ्यों के संदर्भ में यह स्पष्ट है कि शिव एक अवैदिक और अनार्य देव थे। प्रश्न यह है कि वैदिक संस्कृति के स्तंभ ब्राह्मणों ने शिव को देवता कैसे मान लिया?
एक विद्वान के मस्तिष्क को उलझा देने वाला तीसरा प्रश्न वह परिवर्तन और संशोधन है जिसे ब्राह्मणों ने शिव और विष्णु के मौलिक स्वरूप में कर डाला।
हिंदू इससे परिचित नहीं हैं कि शिव एक अवैदिक और अनार्य देवता है । वे उन्हें वेदों में उल्लिखित रुद्र के साथ जोड़ते हैं। इसी कारण हिंदुओं का रुद्र शिव के समान है। यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता में एक मंत्र है, जिसमें रुद्र की स्तुति है। इस मंत्र में रुद्र अर्थात् शिव को चोरों, दस्युओं, डकैतों के देवता के रूप में वर्णित किया गया है। उन्हें पतितों, कुम्हारों और लोहारों का राजा बताया गया है। प्रश्न यह है कि ब्राह्मणों ने चोरों, डाकुओं के राजा को अपना परमदेव कैसे मान लिया?
रुद्र के चरित्र के संबंध में भी एक परिवर्तन हुआ जिसे ब्राह्मणों ने अपना देव शिव मानकर किया था। आश्वलायन गृह्य सूत्र में रुद्र की उपासना की समुचित विधि बताई गई है। इसके अनुसार शिव की उपासना में बृषभ बलि दी जाती है। इस सूत्र में बलि की ऋतु और नक्षत्र का भी उल्लेख है। इसमें गृहस्थों से कहा गया है कि वे अपने बाड़े के सर्वश्रेष्ठ बृषभ का चयन करें, उसका रंग भी बताया गया है, और कहा गया है कि वह मोटा-ताजा होना चाहिए। उसे चावल के मांड और जौ के पानी से छका दिया जाना चाहिए। तब इसका वध किया जाए और रुद्र के नामों का उच्चारण कर उसे बलि चढ़ा दिया जाए। उसकी पूंछ, खाल और पैर अग्नि को सौंप दिए जाएं। स्पष्ट है कि रुद्र एक हिंसक देव था जिसके लिए जीव- बलि आवश्यक थी। प्रश्न यह है कि ब्राह्मणों ने शिव से मांसाहार क्यों छुड़वा दिया और उन्हें शाकाहारी क्यों बना दिया ?
हिंदू भारत भर में बिना लज्जा और पश्चाताप के लिंग पूजा - शिश्न पूजा का महत्व स्वीकारते हैं। लिंग पूजा शिव से जुड़ी है और सामान्यतः यह कहा जाता है कि शिव की सच्ची पूजा की विधि शिव लिंग पूजा ही है। क्या लिंग पूजा का संबंध शिव से सदा था? प्रोफेसर दाण्डेकर के लेख 'विष्णु इन द वेदाज' में एक रोचक तथ्य दिया गया है। प्रोफेसर दाण्डेकर कहते हैं:
“इस संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द "सिपिविष्त" हैं। इसका वेदों में विष्णु के संबंध में विशिष्ट उल्लेख है। जिस छंद में यह शब्द आया है वह है ऋ. वे. (7-99.7; 7-100.5-6) और जान -बूझकर इस शब्द का अर्थ दुर्बोध सा रखना ही इसका उद्देश्य है। वैदिक मंत्र - दृष्टाओं ने जानबूझ कर विष्णु के स्वाभाविक संदर्भ में बड़ी चतुराई से छिपाकर 'सिपिविष्त' शब्द का प्रयोग किया है। इस शब्द की व्याख्या के लिए अनेक प्रयास किए गए। परन्तु कुछेक ने ही दार्शनिक पक्ष संतुष्ट करने का प्रयत्न किया, लेकिन विष्णु के सही चरित्र का वर्णन नहीं हुआ। भाषाशास्त्र की दृष्टि से "सेप" शब्द (लिंग) को "सिपि " से अलग नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार 'सिप' शब्द जिसकी मूल धातु प्राकृत 'क्षेप', लैटिन ओइपपुस, सैपियो आदि मिलता है। यहां तक कि निरुक्त (5-7) में भी संकेत से इस विचार की पुष्टि होती है। यद्यपि इसकी असली व्याख्या स्पष्ट नहीं है। इसी के साथ इस शब्द का मूल यह आभास देता है कि पूरे शब्द का अर्थ है "परिवर्तनशील लिंग, फूला हुआ और सिकुड़ता हुआ लिंग"। अब हम सहज ही समझ सकते हैं कि वैदिक मंत्र-दृष्टाओं ने विष्णु के संदर्भ में छिपाते हुए और घुमा-फिरा कर इस शब्द की व्याख्या की है। इस संबंध में यह उल्लेखनीय है जो निरुक्त (5-89) में विष्णु के नाम के बारे में प्रयुक्त किया है। विष्णु के संबंध में वैदिक साहित्य में ऐसे ही और भी प्रसंग हैं जिनमें उनकी सृजनशीलता, उत्पादन क्षमता और स्वजीवन का अन्तर्बोध होता है।
वैदिक श्राद्ध में एक और अस्पष्ट-सी क्रिया है और वह है अंगुष्ठ। बिना नाखून है का अंगूठा पितरों को चढ़ाई जाने वाली सामग्री में डुबोया जाता है। यह क्रिया विष्णु के नाम पर की जाती है। अंगुष्ठ निःसंदेह लिंग का द्योतक है। इस प्रकार विष्णु इस क्रिया में, वैदिक कर्मकाण्ड में लिंग से संबद्ध हैं। बाद के साहित्य में अंगुष्ठ विष्णु की पहचान है। इस बारे में हमें एक और साक्ष्य मिलता है आई. एस. ( 6.2. 4.2)। धरतीमाता के गर्भ में विष्णु का प्रवेश गर्भाधान संस्कार का सांकेतिक वर्णन है। "तनवर्धनः" विष्णु के संदर्भ में प्रयुक्त होता है ( 7-99.1:8-100.2 ) । इसे भी लिंग प्रवृत्ति में गिना जा सकता है। परवर्ती साहित्य में विष्णु को हिरण्यगर्भ और नारायण कहा गया है। विष्णु के व्यक्तित्व पर सिनीवली ( अ.वे. 7-46, 3) भी उल्लेखनीय है। 'विस्तीर्ण नितम्बा' नारी रति क्रिया को सुखद बनाने वाले विष्णु के चरित्र पर प्रकाश डालती है। सांख्यायन के गृह्यसूत्र (1.22.13 ) के मंत्र (10. 184.1) के अनुसार वह गर्भधारण संस्कार में सहभागी होता है। इससे पता चलता है कि विष्णु भ्रूण का अमोघ संरक्षक है। अ.वे. ( 7.17.4) के अनुसार विष्णु का रतिक्रिया से प्रत्यक्ष संबंध है, विष्णु के दो विशेषण, विष्णु निसिकाय ( 7.36.9) वीर्य संरक्षक और “सुमज्जनी ( 1 156.2 ) सहज प्रसूति स्वयं में इसके प्रमाण हैं। शब्द पौरुषेय विष्णु के लिए प्रयुक्त हुआ है। ऋ. वे. (ई 155.3 - 4 ) वृषकपि मंत्रों (10.86) में कहा गया है कि इन्द्र क्लांत हो गए। तब एक सुगठित शरीर कामुक वानर ने उनमें कोई औषधि प्रविष्ट की। इसके माध्यम से उनकी शक्ति फिर लौट आई। परवर्ती साहित्य में वृषकपि विष्णु को ही कहा गया है। यह शब्द विष्णु सहस्रनाम में भी सम्मिलित है।
प्रो. दाण्डेकर द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के अनुसार लिंग पूजा मूल रूप में विष्णु से ही संबद्ध थी, पुराणों में लिंग पूजा विष्णु से नहीं जुड़ी हुई है। पुराणों में इसे शिव के साथ जोड़ दिया गया। यह आश्चर्यजनक परिवर्तन है। विष्णु, जो आरंभ से ही लिंग पूजा से संबद्ध थे, उनका संबद्ध इससे तोड़ दिया गया और शिव का लिंग पूजा से कोई लेना-देना नहीं था, वह उनके मत्थे मढ़ दी गई। प्रश्न यह है कि ब्राह्मणों का क्या इरादा था जो उन्होंने विष्णु को लिंग पूजा से मुक्त करके शिव को इसके साथ लपेट दिया ?