हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
मनु द्वारा सदियों तक निर्दिष्ट अहिंसा तंत्रों द्वारा ध्वस्त कर दी गई, जिसका यह विकृततम रूप है। इसमें पशु और मानव हिंसा का प्रभुत्व है। हिंसा का यह उपदेश, जो काली पुराण के रुधिर आध्याय में दिया गया है, काफी प्रचलित हो गया था । पशु बलि के पुनर्राम्भ के प्रमाण कलकत्ता के काली मंदिर में मिलते हैं। यह मंदिर पूरी तरह वधशाला बन गया है जहां हजारों बकरे, देवी काली को प्रसन्न करने के लिए चढ़ाए जाते हैं। यह काली पुराण के उपदेशों का परिचायक है । आजकल देवी काली को मनुष्य - बलि नहीं चढ़ाई जाती । परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि ऐसा कभी नहीं हुआ। इसके विपरीत ऐसे अनेक साक्ष्य हैं कि काली पुराण के उपदेशों के अनुसार पशु बलि की तरह ही मानव बलि दी जाती थी। डॉ. राजेन्द्रलाल मित्र ने लिखा है:¹

"यह सर्वविदित है कि बहुत समय तक यह पूजा (मनुष्य-बलि) पूरे हिन्दुस्तान में आम बात थी। ऐसे लोगों का अभाव नहीं है, जिन्हें संदेह है कि भारत में कुछ ऐसे स्थल हैं, जहां देवी को प्रसन्न करने के लिए कभी-कभार आज भी मनुष्य की बलि दे दी जाती है। वामाचारियों से संबद्ध पुराने परिवारों में, जिनके पूर्वजों ने दुर्गा और काली-पूजा में विधिपूर्वक मानव - बलियां दी थीं, आजकल भी जीवित मनुष्यों के स्थान पर उनके पुतलों की बलि चढ़ाई जाती है। एक फुट ऊंचा पुतला खोए से बनाया जाता है और काली पुराण की विधि के अनुसार उसका बलिदान किया जाता है। अंतर केवल इतना है कि उस पुतले में प्राण-प्रतिष्ठा के लिए कुछ मंत्र और जोड़ दिए गए हैं। चौबीस परगना के मेरे डिप्टी कलेक्टर मित्र बाबू हेमचन्द्र केर ने बंगाल में पटसन संस्कृत पर एक उत्तम पुस्तक लिखी है उन्होंने मुझे बताया कि बंगाल के पूर्वी क्षेत्रों में इस प्रकार की बलि प्रायः दी जाती है। परन्तु पुतला एक व्यक्ति द्वारा न काटा जाकर परिवार के सभी वयस्क लोगों द्वारा एक साथ काटा जाता है। वे या तो अलग-अलग चाकुओं से एक साथ वार करते हैं अथवा एक ही चाकू को संयुक्त रूप से पकड़ते हैं। इसे शत्रुबल कहा जाता है। नरबलि और शत्रुबलि गुप्त रूप से मध्यरात्रि में दी जाती है । बहरहाल, शत्रुबलि कालिका पुराण की नरबलि से एक भिन्न पूजा है, इसका निर्देश वृहन्नला तंत्र में हैं, जिसमें कहा गया है कि उल्लिखित अन्य पूजाएं सम्पूर्ण हो जाने के बाद राजा को खोए से बने अपने शत्रु ( पुतला स्वरूप) की बलि देनी चाहिए। उसे अग्नि के समान दहकती आंखों से देखें। भरपूर वार करें और एक ही बारी में उसके दो टुकड़े कर दें। इससे पूर्व उसकी प्राण-प्रतिष्ठा कर ली जाए और जिस व्यक्ति का विनाश किया जाना है, उसका नाम लिया जाए। ओ महेश भार्या ! उसके शत्रु का नाश कर। "
1. इंडो-आर्यन्स, भाग 2, पृ. 109-111
इस संबंध में यह जानना महत्वपूर्ण है कि काली शिव की पत्नी हैं। प्रश्न यह है कि क्या शिव पशुबलि स्वीकार करते हैं? उत्तर यह है कि एक समय शिव पशु - बलि पर निर्भर थे। आज के शिवभक्तों को यह बात अनोखी लग सकती है। परन्तु यह यथार्थ है और जो कोई इसका प्रमाण चाहे वह आश्वलायन गृह्यसूत्र देखें जिसमें शिव की संतुष्टि के लिए वृषभ की बलि का विस्तृत विवरण है। मैं इस आश्वलायन गृह्य-सूत्र¹ का यथावत पाठ प्रस्तुत करता हूं। उसका कथन है:
1. अब छिद्रित वृषभ (रुद्र के लिए) बलि चढ़ाया जाता है।
2. आर्द्रा नक्षत्र में अथवा वसंत में।
3.अपने झुण्ड में समाविष्ट ।
4. (वृषभ) न कोढ़ी और न ही चितला ।
5. कुछ के मत में काली चित्ती वाला ।
1. सैक्रेड बुक्स ऑफ दी ईस्ट (एस.बी.ई.) भाग 29, पृ. 255-259 (मैक्समूलर ) ।
6. यदि वह चाहे काला, यदि इच्छा हो तो ताम्रवर्णी ।
7. वह उस पर पानी छिड़कता है, जिसमें उसने चावल और जौ डाले होते हैं।
8. सिर से पूंछ तक (सर्वांग ) ।
9. मंत्र ( सहित ) महान देव रुद्र के लिए तैयार हो जा।
10. वह उसे बड़ा होने दे, जब उसके दांत आ जाएं अथवा वृषभ बन जाए ।
11. उस क्षेत्र में जो विशिष्ट रूप से शुद्ध हो ।
12. ऐसे स्थान पर जो गांव से दिखाई न दे।
13. मध्यरात्रि के पश्चात् ।
14. कुछ के मत में सूर्योदय के पश्चात् ।
15. फिर पूजा के ज्ञाता ब्राह्मण को बिठाएं। इससे पहले पेड़ के पत्तीदार तने से बलिखम्ब बनाएं, उसमें दो लताओं अथवा कुश की दो रस्सियां मेखला की तरह बांधें। एक सिरा बलि-पशु के सिर के मध्य में बांधें। फिर वही मंत्र बोलें कि जिसकी बलि के लिए लाया गया है, उसकी सहमत् से मैं तुम्हें बांधता हूं।
16. पानी का छींटा उसी प्रकार दिया जाएगा जैसे पशु बलि में दिया जाता है।
17. हमें भिन्नता बचानी होगी।
18. फिर श्रुतानुसार पत्री के साथ बलि दी जाए।
19. (मंत्र) के साथ " तव हर, मृदा, सर्व शिवा, भव, महादेव, उग्र, भीम, पशुपति, रुद्र, शंकर, ईशाना स्वाहा " ।
20. अथवा अंतिम छ (सूत्र के )।
21. अथवा मंत्र " तव रुद्र स्वाहा " ।
22. फिर चारों दिशाओं में बलि अर्पित करें। मंत्र का भाव है "रुद्र, यह भेंट तुझे प्रस्तुत है। तू मुझे हानि न पहुंचा।" इस प्रकार चारों दिशाओं में भेंट चढ़ाई जाए।
23. निम्नांकित मंत्रों से चारों दिशाओं की पूजा की जाए "रुद्र हम क्या करें" । " यह प्रार्थना रुद्र के लिए हैं" "हे पिता तेरे लिए" " अति नमन के साथ ये गीत रुद्र के लिए है"। (ऋग्वेद 1. 43 114 11 33 सप्तम 46 )
24. रुद्र के लिए सभी बलियों के समय इस क्षेत्र - पूजा की जाए।
25. (चावल की) पुआल और भूसी, पूंछ और खाल, सर, पैर, (बलि दिए गए पशु के) अग्नि में डाले जाएं।
26. समवात्य के अनुसार खाल का कुछ उपयोग किया जाए।
27. अग्नि के उत्तर में दूर्वा घास पर या कुशा के घेरे में (बलि दिए गए पशु का) रक्त चढ़ाया जाए। उसके मंत्र का भाव है, फुफकारने वाले, गर्जनवाले, ढूंढने वाले, जकड़ने वाले सरिसृप जो यहां है, यह तेरे लिए है, इसे ग्रहण कर"।
28. फिर उत्तर की ओर घूमकर, जो सरिसृप के लिए नियत है, कहें- फुफकारने वाले सरिसृप, यहां जो कुछ है, तेरे लिए है, इसे ग्रहण कर
29. बलिदाता जानता है कि सभी नाम, सभी आयोजक, सारी उत्तेजना से वह प्रसन्न होता है।
30. उन व्यक्तियों की भी वह हानि नहीं करेगा जो पूजा में बैठते हैं। ऐसा समझा जाता है (श्रुति में)।
31. वह बलि के भाग में साझीदार नहीं होगा ।
32. वह बलि से संबद्ध कोई पदार्थ गांव में नहीं ले जाएंगे।
33. वह बलि-स्थान से अपने लोगों को दूर रखेंगे।
34. पर वे एक निर्दिष्ट अवसर पर वह (बलि के भोजन) से भाग ले लें, वह सौभाग्यशाली होगा।
35. कटे हुए वृषभ की बलि से धन, क्षेत्र, शुद्धता, पुत्र, पशु, दीर्घायु, दीप्ति मिलती है।
36. बलिदान के पश्चात् वह अन्य पशु न खाए ।
37. उसे ऐसे पशुओं का अभाव नहीं रहेगा।
38. फिर वह पशु-विहीन नहीं रहेगा ऐसा जाना जाता है (श्रुति में ) ।
39. वह संततीय मंत्र जपता हुआ अपने घर जाए।
40. यदि उसके पशुओं को व्याधि हो तो वह गोशाला में ही उसी देव के लिए बलि दे ।
41. पके भोजन का भोग जो उसने बलि में चढ़ाया।
42. बलि-स्थल की घास और अग्य आग में डाल दिया जाए, और वह अपनी गायों को धुएं के बीच से निकालें ।
43. संततीय मंत्र पढ़ते हुए वह पशुओं के बीच जाएं।
44. शौनक को नमन - शौनक को नमन ।
आजकल शिव, पशु-बलि स्वीकार नहीं करते। शिव पूजा का यह रूप अहिंसा स्वीकार करने के पश्चात् बदला है । हिंसा से अहिंसा अपनाने के बाद ब्राह्मणों ने शिव को हिंसक से अहिंसक बना डाला। शिव के अहिंसक देवता बन जाने के बहुत बाद काली - पूजा आरम्भ हुई। कुछ भी हो, उनकी पत्नी काली हिंसक देवी बन गई। परिणाम यह हुआ कि हमें अहिंसक (रक्तपातहीन ) देवों को पत्नी रूप में क्रूर - रक्तपिपासु स्त्रियां (देवियां ) मिलीं । क्या यह पहेली नहीं ? ब्राह्मणों ने ऐसा क्यों किया ?