प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
रामायण
यह एक तथ्य है कि महाभारत की ही तरह रामायण के भी एक-एक कर तीन संस्करण तैयार हुए। महाभारत में रामायण के बारे में दो प्रकार के संदर्भ मिलते हैं। एक प्रसंग में रामायण का तो संदर्भ आया है, किंतु उसके लेखक का उल्लेख कहीं नहीं मिलता; दूसरे प्रसंग में वाल्मीकि रामायण का उल्लेख हुआ है, किंतु इन दिनों जो रामायण उपलब्ध है, वह वाल्मीकि रचित नहीं है।¹ श्री सी.वी. वैद्य² के मतानुसारः
'वर्तमान रामायण वाल्मीकि द्वारा लिखित रामायण नहीं है, चाहे इसे इसी रूप में महान चिंतक और भाष्यकार कटक ने ही क्यों न स्वीकार किया हो। कट्टर से कट्टर विचारक भी इस तथ्य को स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाएगा। चाहे कोई वर्तमान रामायण को सरसरी तौर पर ही क्यों न पढ़े, वह उसमें आई असंगतियों को देखकर पूर्व प्रसंगों में परस्पर संबंधहीनता देखकर या काफी मात्रा में उपलब्ध नूतन, और पुरातन दोनों प्रकार के विचारों के गठबंधन को देखकर हतप्रभ रह जाएगा। यह बात रामायण के बंगाल या बंबई वाले किसी भी पाठ में देखी जा सकती है। इन सब बातों को देखकर कोई भी इस नतीजे पर अवश्य पहुंचेगा कि वाल्मीकि की रामायण में आगे चलकर बहुत फेर-बदल हुआ।'

महाभारत की ही तरह रामायण की कथावस्तु में भी कालांतर में क्षेपक जुड़ते गए। आरंभ में रामायण की कथा मात्र इतनी ही थी कि रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया, इसलिए राम और रावण के बीच युद्ध हुआ। अगले संस्करण में इस कथा में कुछ उपदेश भी जुड़ गए। तब एक विशुद्ध ऐतिहासिक काव्य के स्थान पर यह कृति भी उपदेशात्मक बन गई, जिसका उद्देश्य सामाजिक, नैतिक और धार्मिक कर्तव्यों के सही नियमों की शिक्षा देना था। जब इसका तीसरा संस्करण बना तो यह भी महाभारत की ही तरह दंतकथाओं, ज्ञान, शिक्षा, दर्शन तथा अन्य कलाओं और विज्ञानों का भंडार बन गई।
रामायण की रचना कब हुई, इसके बारे में एक सुस्थापित कथन यह है कि राम वाली घटना पांडवों वाली घटना से अधिक पुरानी है, किंतु रामायण और महाभारत का लेखन-कार्य साथ ही चला होगा। हो सकता है कि रामायण के कुछ अंश महाभारत से पहले लिखे गए हों, किंतु इस बात में किसी तरह का संदेह नहीं हो सकता कि रामायण का अधिकांश भाग महाभारत के अधिकांश भाग के लिखे जाने के बाद ही लिखा गया होगा ।³
पुराण
इस समय उपलब्ध पुराणों की संख्या अट्ठारह है।⁴ शुरू में पुराणों की संख्या इतनी
1. होपकिन्स, दि ग्रेट इपिक ऑफ इंडिया, पृ. 62.
2. दि रिडिल ऑफ दि रामायण, अध्याय 2, पृ. 6
3. इन दोनों महाकाव्यों में समान वाक्य खंडों के लिए होपकिन्स की पुस्तक दि ग्रेट इपिक ऑफ इंडिया का परिशिष्ट 'ए' देखें।
4. पुराणों की सामग्री के बारे में जो कुछ मैंने ऊपर कहा है, वह काले की पुराण निरीक्षण (मराठी) और पार्टीजर की एनसिएंट हिस्टोरिकल ट्रेडिशन नामक पुस्तक में दी गई सूचना पर आधारित है।
नहीं थी। परंपरागत मान्यता के अनुसार, और इस मान्यता में संदेह की गुंजाइश नहीं है, सबसे पहले केवल एक पुराण था । यह भी माना जाता है कि यह पुराण वेदों से भी पुराना था। अथर्ववेद में इस पुराण का उल्लेख है और ब्रह्मांड पुराण के अनुसार यह वेदों से भी पुराना है। यह एक कथा थी, जिसे राजा को शतपथ के लिए जानना आवश्यक था। ब्राह्मण कहता है कि यज्ञ के दसवें दिन अध्वर्यु द्वारा इसे राजा को सुनाने का विधान रहा।
अट्ठारह पुराणों के जन्म की कथा व्यास से संबंधित है। कहते हैं कि व्यास ने ही उस मूल पुराण को काट-छांटकर, अर्थात उसे घटा-बढ़ाकर उससे ही अट्ठारह पुराण बना दिए। इस तरह इन अट्ठारह पुराणों के निर्माण की घटना को पुराणों के विकास का द्वि तीय चरण माना जा सकता है। इन अठारह पुराणों में से प्रत्येक पुराण के आरंभ के अंश को जिसे व्यास ने अभिव्यक्त या प्रकाशित किया, आदि पुराण¹ कहते हैं। मूल कथा व्यास द्वारा रचित है। जब व्यास इन अट्ठारह पुराणों की रचना कर चुके, तब उन्होंने इनको अपने शिष्य रोमहर्षण को सुनाया। रोमहर्षण द्वारा रचित पुराणों का तीसरा संस्करण बना है। रोमहर्षण के छह शिष्य थे। इनमें से तीन शिष्यों, कश्यप, सावर्णी और वैशम्पायन, ने भी अपने-अपने संस्करण तैयार किए, जिन्हें पुराणों का चौथा संस्करण कहा जा सकता है। ये तीनों संस्करण अलग- अलग इन्हीं तीनों के नाम से जाने जाते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार पुराणों में संशोधन राजा विक्रमादित्य² के शासन काल में हुआ।
अब पुराणों की कथावस्तु के बारे में विचार करें। प्राचीनकाल से ही पुराण ज्ञान की एक शाखा रहा है। इसे इतिहास से भिन्न माना गया है। इतिहास का अर्थ था किसी शासक राजा से संबंधित प्राचीन घटनाओं का वर्णन । आख्यान से तात्पर्य था, आंखों देखी घटनाओं का मौखिक रूप से कथन। इसी तरह उपाख्यान सुनी हुई कथा के पुनर्कथन को कहते थे। पूर्वजों, प्रकृति और ब्रह्मांड विषयक गीतों को गाथा कहा जाता था ।
श्राद्ध और कल्प³ विषयक प्राचीन कर्मकांडों को कल्पशुद्धि⁴ कहते थे। ज्ञान की इन
1. आदि पुराण का यह अर्थ नहीं है कि यह इस नाम से एक अलग पुराण है। इसका अर्थ प्रत्येक अट्ठारह पुराणों के प्रथम संस्करण से है।
2. विक्रमादित्य कौन है, यह कोई नहीं जानता।
3. श्री हजारा (कल्प शुद्धि के बजाय ) कल्प ज्योति कहते हैं, जिसका अर्थ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही जनश्रुति से है- देखें, पुराण के कालतत्व, पृ. 4
4. 'कल्प' शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में होता है, जैसे, 1. व्यवहारिक, 2. उचित और 3. योग्य, सक्षम । अन्य स्थानों में इसका प्रयोग अनेक अर्थों में हुआ है जैसे, 1. धार्मिक नियम, 2. निर्धारित विकल्प, 3. अनुष्ठान में निर्मित, 4. संसार का अंत, प्रलय, 5. ब्रह्म युग का एक दिन, 6 रोगी का उपचार, और 7. छह वेदांगों में से एक, जिसमें अनुष्ठान तथा विभिन्न पर्व और यज्ञ-कर्म संपन्न करने की विधि निर्धारित की गई है।
शाखाओं से पुराण भिन्न माने जाते थे। पुराण में ये पांच विषय होते थे: 1. सर्ग, 2. प्रति सर्ग, 3. वंश, 4. मन्वंतर और 5. वंशचरित। सर्ग का अर्थ है ब्रह्मांड की रचना, प्रति सर्ग का अर्थ है ब्रह्मांड का विलय । वंश से तात्पर्य है जीवन का क्रम, अर्थात वंशावली । विभिन्न मनुओं के युगों को मन्वंतर कहते थे, विशेष रूप से उन चौदह मनुओं की परंपरा को जिनसे इस पृथ्वी पर सृष्टि का विकास हुआ माना जाता है। वंशचरित से तात्पर्य है, राजा-महाराजाओं की पीढ़ियों का वर्णन ।
पुराणों की विषय-वस्तु के क्षेत्र में पर्याप्त विस्तार हुआ लगता है क्योंकि आज पुराण जिन रूपों में मिलते हैं, उनमें उनकी विषय-वस्तु उपर्युक्त पांच विषयों तक ही सीमित नहीं है। उनमें इन पांच निर्धारित विषयों के अतिरिक्त भी अनेक नए विषय सम्मिलित हो गए हैं। वस्तुतः पुराणों के विषय क्षेत्र की अवधारणा में ही इतना परिवर्तन हो गया है कि कुछ पुराणों में तो पूर्व-निर्धारित विषयों में से किसी का विवेचन मिलता ही नहीं, उलटे उनमें केवल नए अथवा अतिरिक्त विषयों का विवेचन ही हुआ है। इन अतिरिक्त विषयों में निम्नलिखित विषय सम्मिलित हैं:
1. स्मृति धर्म - (क) वर्णाश्रम धर्म, (ख) आचार, (ग) अहनिका, (घ) भाष्याभाष्य, (ङ) विवाह, (च) अशौच, (छ) श्राद्ध, (ज) द्रव्यशुद्धि, (झ) पताका, (ट) प्रायश्चित, (ठ) नरक, (ड) कर्म विपाक, और (द) युग-धर्म,
2. व्रत धर्म - व्रत रखना, पर्व का पालन,
3. क्षेत्र धर्म - तीर्थ यात्रा, और
4. दान धर्म-दान-पुण्य करना ।
इनके अतिरिक्त दो विषय और हैं, जिनके बारे में इन पुराणों में बहुत-कुछ कहा गया है।
पहला विषय किसी मत या पंथ विशेष की पूजा-आराधना से संबंधित है। हर पुराण का कोई न कोई इष्ट देवता है और वह पुराण उसी देवता की आराधना पद्धति अपनाने और उसी देवता को अपना इष्ट बनाने पर बल देता है। अट्ठारह पुराणों में से पांच पुराण¹ विष्णु की आराधना पर बल देते हैं। आठ² शिव पूजा पर एक³ ब्राह्मण की पूजा पर, एक ⁴ सूर्य की पूजा पर, दो देवी की पूजा पर और एक गणेश की पूजा पर।
1. (1) विष्णु (2) भागवत् (3) नारद ( 4 ) वामन और (5) गरुड़
2. (1) शिव (2) ब्रह्म (3) लिंग, (4) वराह, (5) स्कंद, (6) मत्स्य (7) कर्म, और ( 8 ) ब्रह्मांड
3. पद्म
4. अग्नि
पुराणों की कथा - वस्तु का दूसरा सर्वाधिक प्रिय विषय है, ईश्वर के अवतार । पुराणों में भगवान का वास्तविक स्वरूप क्या है, और ईश्वर ने कौन-कौन से अवतार धारण किए थे, इसमें भेद किया गया है। जहां तक ईश्वर के स्वरूप का प्रश्न है, पुराण कहते हैं कि ईश्वर की सत्ता तो एक ही है किंतु उसे दो नामों से जाना जाता है। पर जब ईश्वर मानव या पशु के रूप में अवतार लेता है, तो वह कुछ न कुछ चमत्कार अवश्य दिखाता है। अवतारवाद के बारे में जानने का सर्वाधिक उपयोगी स्त्रोत विष्णु पुराण है, क्योंकि केवल विष्णु ने ही समय-समय पर अवतार लेकर अनेक अलौकिक कार्य किए हैं। पुराणों में अवतारवाद के इसी विषय पर अत्यंत विस्तार से चर्चा मिलती है।
यदि यह कहा जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी कि इन्हीं नए विषयों के विस्तार से जुड़ जाने के कारण पुराणों के असली स्वरूप को पहचानना कठिन हो गया है।
पुराणों के वास्तविक रचयिता कौन थे, यह प्रश्न भी विचारणीय है, क्योंकि ऐसा लगता है कि रचयिताओं के नाम बदलते रहें हैं। प्राचीन हिंदुओं में साहित्य सृष्टाओं के दो अलग-अलग वर्ग थे। एक वर्ग ब्राह्मणों का था, तो दूसरा सूतों का। ये सूत ब्राह्मणेत्तर थे । दोनों वर्गों ने अलग-अलग प्रकार के साहित्य की रचना की। सूतों का एकाधिकार पुराणों पर था। इन पुराणों की रचना अथवा इनके कथा - वाचन से ब्राह्मणों का कोई संबंध नहीं था। यह केवल सूतों के लिए आरक्षित था और इससे ब्राह्मणों का कोई संबंध नहीं था । यद्यपि सूतों ने पुराणों की रचना और उनके वाचन का पैतृक अधिकार प्राप्त कर लिया था और यह कार्य उनके लिए निर्धारित हो गया था, किंतु एक समय ऐसा आया जब ब्राह्मणों ने सूतों के हाथ से यह व्यवसाय छीनकर उस पर अपना एकाधिकार जमा लिया। इस प्रकार पुराणों के रचयिता बदल गए। सूतों के स्थान पर अब ब्राह्मण थे जो इनके रचयिता हो गए । ¹
जब पुराणों पर ब्राह्मणों का वर्चस्व स्थापित हो गया, तथा कदाचित इनके अंतिम संस्करण तैयार हुए और उनमें नए-नए विषय जोड़ दिए गए। नए-नए विषय जुड़ जाने से इनमें जो परिवर्धन-संशोधन हुए, वे अभूतपूर्व थे । ब्राह्मणों ने परंपरा से प्राप्त पुराणों कें अनेक नए अध्याय जोड़ दिए, पुराने अध्यायों को बदलकर नए अध्याय लिख दिए और पुराने नामों से ही अध्याय रच दिए। इस तरह इस प्रक्रिया से कुछ पुराणों की पहले वाली सामग्री ज्यों-की-त्यों रही, कुछ की पहले वाली सामग्री लुप्त हो गई, कुछ में नई सामग्री जुड़ गई तो कुछ नई रचनाओं में ही परिवर्तित हो गए ।
पुराणों के रचना - काल का निर्धारण टेढ़ी खीर है। ब्राह्मणों ने जिन-जिन इतिहास ग्रंथों की रचना की, उनमें निर्माण तिथि का कहीं उल्लेख नहीं मिलता। पुराण भी इसके अपवाद नहीं रहे। इसलिए पुराणों के रचना - काल का निर्धारण भी उन अन्य साक्ष्यों
1. पार्टिजर
के आधार पर ही किया जा सकता है, जिनसे संबंधित घटनाओं की तिथियां मान्य हो चुकी हैं। कौन-सा पुराण कब लिखा गया, इस विषय पर उतनी बारीकी से अभी तक विचार नहीं हुआ है, जितना अन्य ब्राह्मणवादी साहित्यिक विधाओं पर हो चुका है। विद्वान शोधकर्ताओं ने वैदिक साहित्य पर जितना अधिक ध्यान दिया है, उतना पुराण साहित्य पर नहीं दिया लगता है। मेरी जानकारी के अनुसार अब तक केवल श्री हजारा ने ही पुराणों के काल-निर्धारण के क्षेत्र में काम किया है। उनके काम का सारांश नीचे दिया जा रहा है :
| पुराण | रचना-काल | |
| 1. | मार्कडेय | सन् 200-600 के बीच |
| 2. | वायु | सन् 200-500 के बीच |
| 3. | ब्रह्मांड | सन् 200-500 के बीच |
| 4. | विष्णु | सन् 100-350 के बीच |
| 5. | मत्स्य | कुछ अंश लगभग सन् 325 कुछ अंश लगभग सन् 1100 |
| 6. | भागवत् | सन् 500-600 के बीच |
| 7. | कूर्म | सन् 550-1000 के बीच |
| 8. | वामन | सन् 700-1000 के बीच |
| 9. | लिंग | सन् 600-1000 के बीच |
| 10. | वराह | सन् 800-1500 के बीच |
| 11. | पद् म | सन् 600-950 के बीच |
| 12. | बृहन्नारदीय | सन् 875-1000 के बीच |
| 13. | अग्नि | सन् 800-900 के बीच |
| 14. | गरुड़ | सन् 850-1000 के बीच |
| 15. | ब्रह्म | सन् 900-1000 के बीच |
| 16. | स्कंद | सन् 700 के बाद |
| 17. | ब्रह्म वैवर्त | सन् 700 के बाद |
| 18. | भविष्य | सन् 500 के बाद |
पुराणों के रचना- काल का इससे अधिक सटीक निर्धारण फिलहाल संभव नहीं है। नई खोज से इस अवधि की ऊपरी और निचली, दोनों सीमाओं का पुनर्निर्धारण तो हो सकता है पर इस बात की संभावना बहुत कम है कि इस अवधि में कोई आमूल परिवर्तन हो जाए, अर्थात शताब्दियों का अंतर आ जाए।
उपर्युक्त संक्षिप्त सर्वेक्षण से यह बात साफ हो जाती है कि पुराण साहित्य की रचना बुद्धेतर काल में हुई थी। सर्वेक्षण से एक और महत्वपूर्ण तथ्य सिद्ध होता है कि पुराण साहित्य पुष्यमित्र के नेतृत्व में ब्राह्मणों की विजय के बाद के काल में लिखा गया था। इस सर्वेक्षण से एक बात और सामने आती है, वह यह है कि व्यास ने ही महाभारत की रचना की, व्यास ने ही गीता रची और व्यास ने ही पुराण भी लिखे। महाभारत में अट्ठारह पर्व हैं, गीता में अठारह अध्याय हैं और पुराणों की संख्या भी अट्ठारह है। तो क्या यह संख्या संयोग मात्र है? या यह एक सुनियोजित, अर्थात सोची-समझी युक्ति या किसी विद्वत गोष्ठी में हुई सहमति का परिणाम ? इसका उत्तर पाने के लिए हमें प्रतीक्षा करनी होगी।