प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
वेदांत सूत्र
पहले कहा जा चुका है कि वैदिक साहित्य में वेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक और उपनिषद् सम्मिलित हैं। विषय-वस्तु के अनुसार इस तरह के साहित्य को दो वर्गों में बांटा जा सकता है : (1) कर्मकांड अर्थात धार्मिक नियम, संस्कार तथा अनुष्ठान आदि से संबंधित साहित्य, और (2) ज्ञानकांड अर्थात ईश्वर ( वैदिक संज्ञा - ब्रह्म) का ज्ञान कराने वाला साहित्य। चारों वेद और ब्राह्मण ग्रंथ वैदिक साहित्य के प्रथम वर्ग में आते हैं, तो आरण्यक और उपनिषद द्वितीय वर्ग में।
वैदिक साहित्य की मात्रा बढ़ते-बढ़ते असीमित हो गई, किंतु महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि यह वृद्धि जंगली घास की तरह हुई। इस तरह जो दुर्व्यवस्था फैली, उससे छुटकारा
1. भंडारकर मैमोरियल वॉल्यूम
पाने के लिए किसी तरह की व्यवस्था किसी तरह के समन्वय की आवश्यकता थी। इसलिए जिज्ञासा संबंधी एक शाखा विकसित हुई, जिसे 'मीमांसा' कहते हैं। मीमांसा में वैदिक साहित्य के पाठ से संबंधित अर्थ पर विचार हुआ। जिन्होंने इस व्यवस्था, कार्य और समन्वय के काम को हाथ में लेना आवश्यक समझा, वे कर्मकांड को व्यवस्थित करने वाले, और ज्ञानकांड को व्यवस्थित करने वाले इन दो संप्रदायों में बंट गए । परिणाम यह हुआ कि मीमांसा शास्त्र की दो शाखाएं विकसित हो गईं, जिनमें से एक पूर्वमीमांसा शाखा और दूसरी उत्तर मीमांसा शाखा कहलाई । जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, पूर्व मीमांसा शाखा ने वैदिक साहित्य के आरंभिक अंश, अर्थात दो और ब्राह्मण ग्रंथों पर विचार किया। इसलिए यह पूर्व मीमांसा कहलाई । उत्तर मीमांसा शाखा ने वैदिक साहित्य के बाद वाले अंश, अर्थात आरण्यकों और उपनिषदों पर विचार किया, इसलिए यह उत्तर मीमांसा कही जाती है।

इन दोनों शाखाओं से संबंधित विपुल मात्रा में साहित्य उपलब्ध है। इनमें से सूत्रों के दो संग्रह प्रमुख और अन्यतम मानने जाते हैं। पहला सूत्र संग्रह जैमिनि की रचना माना जाता है, जब कि दूसरा बादरायण का। जैमिनि के सूत्र संग्रह में कर्मकांड¹ का विवेचन हुआ जब कि बादरायण के सूत्र संग्रह में 'ज्ञानकांड' का निस्संदेह इन दोनों के पहले भी कुछ लेखकों ने इन्हीं विषयों पर व्याख्या लिखी थी। फिर भी, मीमांसा शास्त्र की दोनों शाखाओं में जैमिनि और बादरायण की कृतियां ही आदर्श ग्रंथ माने जाते हैं।
यद्यपि इन दोनों के सूत्र मीमांसा शास्त्र से संबंधित हैं, फिर भी जैमिनि के सूत्र मीमांसा सूत्र² कहलाते हैं, जब कि बादरायण के सूत्र वेदांत सूत्र । वेदांत का अर्थ है, वेद का अंत, अर्थात वेदों के अंतिम अध्याय में प्रतिपादित सिद्धांत । वेदों के अंतिम अध्याय से अर्थ है, उपनिषद और उपनिषदों को वेदों का अंतिम लक्ष्य माना जाता है। चूंकि बादरायण के सूत्रों ने इनके व्यवस्थापन और समन्वय का काम किया है, इसलिए इन सूत्रों का वेदांत सूत्र³ कहते हैं। वेदों के अध्याय में प्रतिपादित इन्हीं सिद्धांतों के अनुसार संजय को उक्त आदेश दिया गया था। वेदांत सूत्रों का यही उद्गम है।
1. वस्तुत: वैदिक साहित्य के कर्मकांड विषयक अंश के व्यवस्थापन से दो प्रकार की कृतियां तैयार हुई: 1. कल्प सूत्र, और 2. पूर्व मीमांसा सूत्र कल्प सूत्रों में ब्राह्मण ग्रंथों में विहित कर्मकांडों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है, जब कि पूर्व मीमांसा सूत्रों में उस सामान्य की व्याख्या और समर्थन किया गया है, जिसका अनुसरण करना कल्प सूत्रकार के लिए आवश्यक है, बशर्ते कि वह अपने नियमों को वेदों की शिक्षा के अनुरूप पूरी तरह व्याख्यातित करना चाहे ।
2. इन्हें पूर्व मीमांसा अथवा कर्म मीमांसा भी कहते हैं।
3. इनके और भी नाम हैं, यथा-उत्तर मीमांसा सूत्र, ब्रह्म सूत्र या शारीरिक सूत्र या शारीरिक मीमांसा सूत्र ।
यह बादरायण कौन है? उसने इन सूत्रों का प्रणयन क्यों किया और कब किया? इस नाम को छोड़कर बादरायण के बारे में और कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।¹ यह भी निश्चित नहीं है कि लेखक का यह नाम वास्तविक नाम था या नहीं। यहां तक कि इन सूत्रों के बड़े-बड़े भाष्यकारों में भी इन सूत्रों के रचयिता के बारे में पर्याप्त मतभेद हैं। कुछ कहते हैं कि इनके लेखक बादरायण थे। कुछ कहते हैं कि इन सूत्रों के रचयिता व्यास हैं। शेष लोगों का मत है कि बादरायण और व्यास एक ही व्यक्ति हैं। इन सूत्रों के रचयिता के बारे में इतने मतभेद देखकर आश्चर्य होता है।
उसने इन सूत्रों की रचना क्यों की? हर कोई इस बात को भली-भांति स्वीकार कर लेगा कि ब्राह्मणों का यह कर्तव्य था कि वे वैदिक साहित्य के कर्मकांड विषयक साहित्य को व्यवस्थित और वर्गीकृत करें, क्योंकि कर्मकांड से उनका गहरा संबंध था । उनकी आजीविका का साधन कर्मकांड ही था। दूसरी ओर, वैदिक साहित्य की ज्ञानकांड शाखा में उनकी रुचि नहीं थी। तब वे इसे भी व्यवस्थित करने का प्रयत्न क्यों करते? ऐसा प्रश्न अभी तक न तो किसी ने उठाया है, और न ही इस विषय में अभी तक कुछ विचार ही हुआ है। किंतु यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है और इसका उत्तर देना भी अत्यंत महत्वपूर्ण होगा। प्रश्न महत्वपूर्ण क्यों है और उसका उत्तर क्या है, इसका विवेचन मैं आगे चलकर करूंगा।
वेदांत सूत्र के बारे में दो प्रश्न और हैं। पहला, इसे धर्मशास्त्र विषयक कृति माना जाए या विशुद्ध दर्शन विषयक ? या सूत्रकार ने इसकी रचना कर दर्शन को स्थापित धर्मशास्त्र के साथ गठबंधन करना चाहा है, ताकि धार्मिक कर्मकांड को घातक और हानिकर होने से बचाया जा सके। अगला प्रश्न वेदांत सूत्र के भाष्यों से संबंधित है। कुल मिलाकर पांच भाष्य उपलब्ध हैं, जो सुप्रसिद्ध आचार्यों के हैं। ये सभी बौद्धिक दृष्टि से मेधावी विद्वान थे। इनके नाम हैं: 1. शंकराचार्य ( 788 - 820 ई.), 2. रामानुजाचार्य ( 1017- 1137 ई.), 3. निंबार्काचार्य (मृत्यु लगभग 1162 ई.), 4. मध्वाचार्य ( 1197 1276 ई.), और 5. बल्लभाचार्य (जन्म 1417 ई.) । इन आचार्यों की वेदांत सूत्र की व्याख्या वेदांत सूत्र से भी अधिक प्रसिद्ध हुई। इनके बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि वेदांत सूत्र के एक ही पाठ
1. यही बात जैमिनि पर भी लागू होती है। केन का कथन है - 'जैमिनि के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है। जैमिनि के नाम से एक ब्राह्मण ग्रंथ, एक स्त्रोत सूत्र और एक गृह्य सूत्र मिलते हैं। किंतु इस बात की संभावना प्रतीत नहीं होती कि ये ग्रंथ पूर्व मीमांसाकार की ही रचनाएं हैं। आश्वलायन गृह्य सूत्र के 'तर्पण' में सुमंतु और वैशम्पायन के साथ जैमिनि का उल्लेख मिलता है। भगवत् पुराण में जैमिनि को सुमंतु का गुरु और सामवेद का प्रणेता बताया गया है। पंचतंत्र के अनुसार, मीमांसाकार जैमिनि की मृत्यु हाथी के पांव तले दब कर हुई थी। (ए ब्रीफ स्केच आफ दि पूर्व मीमांसा सिस्टम, पृष्ठ 12 )
की इन पांचों आचार्यों ने पांच अलग-अलग विचारधाराओं के अनुसार व्याख्या प्रस्तुत की। शंकर ने बताया कि वेदांत सूत्र परम अद्वैत की शिक्षा देते हैं, जब कि रामानुज के अनुसार विशिष्ट द्वैत की, निंबार्क के अनुसार द्वैताद्वैत की, माधव के अनुसार द्वैत की और वल्लभ के अनुसार शुद्ध द्वैत की। इन सभी पारिभाषिक शब्दों का क्या अर्थ है, यहां मैं इस पर विचार नहीं करूंगा। मैं तो केवल इतना भर बताना चाहता हूं कि एक ही सूत्र संग्रह की पांच अलग-अलग व्याख्याओं के परिणामस्वरूप पांच अलग-अलग संप्रदायों के उदय और विकास की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या यह केवल व्याकरण का विषय है? या इन विविध व्याख्याओं या टीकाओं के पीछे और कोई उद्देश्य छिपा है ? इतने प्रकार की टीकाओं के कारण एक और प्रश्न उठता है। इन पांचों टीकाओं में आत्मा और परमात्मा को पहचानने के पांच रास्ते अपनाए गए हैं, जब कि वस्तुतः ये रास्ते दो ही हैं। एक रास्ता वह है जो शंकराचार्य ने अपनाया और दूसरा रास्ता वह है जिस पर शेष चारों आचार्य चले । यद्यपि चारों आचार्यों के बीच परस्पर मतभेद रहा, किंतु शंकराचार्य के विपक्ष में उनकी दो बातों को लेकर उनमें पूर्ण सहमति थी : 1. आत्मा और परमात्मा के बीच पूर्ण एकरूपता है, और 2. संसार माया है। यहीं तीसरा प्रश्न और उठता है । बादरायण के वेदांत सूत्रों की व्याख्या करते हुए शंकराचार्य ने अपना इतना अनदेखा मत क्यों प्रतिपादित किया? क्या उन्होंने सूत्रों का आलोचनात्मक विवेचन कर ऐसा किया? या क्या ऐसा करना उनके लिए अपने पूर्व विचारित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अभिलाषा कल्पित चिंतन मात्र था ?
मैं केवल यह प्रश्न कर रहा हूं। यहां उसका उत्तर पाने के लिए विवेचन करना नहीं चाहता। मैं तो यहां केवल यह जानने का इच्छुक हूं कि यह साहित्य किस काल की रचना माना जाए-बौद्ध-काल के पूर्व की अथवा बौद्ध काल के बाद की।
वेदांत सूत्र के रचना-काल को निर्धारित करने में आरंभिक कठिनाई यह सामने आती है कि भागवत्गीता की ही तरह इस ग्रंथ के पाठ में भी अनेक बार संशोधन होते रहे हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार¹ वेदांत सूत्र में तीन बार संशोधन हुए। इसी वजह से इसके निर्माण की सही-सही तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती।² जो विचार अब तक सामने आए हैं, वे केवल संभावित काल की ही सूचना देते हैं। निस्संदेह वेदांत सूत्र की रचना बुद्ध धर्म के जन्म के बाद ही हुई होगी, क्योंकि इन सूत्रों में स्पष्ट उल्लेख न होते हुए भी बौद्ध धर्म के बारे में संकेत अवश्य मिलते हैं। वेदांत सूत्रों की रचना मनु के बाद की नहीं मानी जा सकती, क्यों मनुस्मृति में वेदांत सूत्रों का उल्लेख मिलता है। प्रो. कीथ की मान्यता है कि इन सूत्रों की रचना सन् 200 के आस-पास हुई होगी। प्रो. जेकोबी कहते हैं कि इनकी रचना सन् 200 और सन् 450 के बीच हुई होगी।
1. देखे बेलवल्कर, बसु मलिक लेक्चर्स ऑन वेदांत, लेक्चर 4
2. देखें, राधाकृष्णन, इंडियन फिलोसफी, खंड 2, पृ. 430, जहां संबंधित साक्ष्य संकलित है।