प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
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ब्राह्मण साहित्य
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर सोर्स मैटिरियल पब्लिकेशन कमेटी को पृष्ठ छह से चौदह और पृष्ठ सत्रह से उनतालीस तक मूल अंग्रेजी के इस निबंध के बिखरे हुए पन्ने मिले थे। ऐसा लगता है कि ये पृष्ठ 'दि डिक्लाइन एंड फाल आफ बुद्धिज्म' ( बौद्ध धर्म की अवनति तथा पतन) नामक लेख के ही अंतिम अंश के रूप में लिखे गए थे। कुछ पन्ने मूल हैं, तो शेष की कार्बन प्रति है। इनके अतिरिक्त चौदह पृष्ठ और मिले हैं, जिनमें वेदांत सूत्रों और भागवत्गीता का विवेचन हुआ है। जिन कागजों पर ( 1 ) दि डिक्लाइन एंड फाल आफ बुद्धिज्म (बौद्ध धर्म की अवनति तथा पतन, (2) दि लिटरेचर ऑफ ब्राह्मेनिज्म (ब्राह्मण साहित्य), तथा (3) वेदांत सूत्र एंड भागवत्गीता, टंकित किए गए हैं, उनका आकार-प्रकार एक जैसा है, किंतु अन्य अध्यायों के आकार-प्रकार से यह भाग भिन्न है - संपादक
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बौद्ध धर्म के पतन के कारणों से संबंधित तथ्यों को उस ब्राह्मण साहित्य से छानबीन कर एकत्र किया जाना चाहिए, जो पुष्यमित्र की राजनैतिक विजय के बाद लिखा गया
था।
इस साहित्य को छह भागों में बांटा जा सकता है: ( 1 ) मनुस्मृति (2) गीता, (3) शंकराचार्य का वेदांत, (4) महाभारत, (5) रामायण, और (6) पुराण | मैं इस साहित्य का विश्लेषण केवल इसी उद्देश्य से कर रहा हूं कि इससे उन तथ्यों का पता चल जाए, जो अनुमानतः बौद्ध धर्म के पतन के कारण रहे होंगे। चूंकि साहित्य समाज का ऐसा दर्पण होता है, जिसमें लोगों का जीवन देखा जा सके। यह कोई अनुचित कार्य नहीं होगा। एक बात मैं पहले ही स्पष्ट कर दूं। उसका संबंध इस साहित्य के रचना - काल से है। हो सकता है, सभी इसे स्वीकार न करें कि यह साहित्य पुष्यमित्र की क्रांति के बाद की रचना है। इस तथ्य के विपरीत अधिकांश हिंदू, चाहे परंपरावादी हों या विरोधी, चाहे शिक्षित हों या अशिक्षित, इस बात में अटूट विश्वास रखते हैं। कि उनका पवित्र साहित्य अति प्राचीन है। अपने धार्मिक साहित्य को सबसे प्राचीन साहित्य मानना उनके लिए किसी धार्मिक सिद्धांत के मानने जैसा ही है।
मनु के काल-निर्धारण के प्रसंग में मैंने संदर्भ देते हुए बताया था कि मनुस्मृति की रचना ईसा पूर्व 185, अर्थात पुष्यमित्र की क्रांति के बाद सुमति भार्गव द्वारा की गई थी। इस विषय में मुझे अधिक कुछ नहीं कहना है।
भागवत्गीता के लेखन-काल के बारे में अनेक मतभेद हैं। श्री तेलंग के अनुसार गीता तीसरी सदी ईसवी पूर्व के पहले की रचना होनी चाहिए, किंतु कितने समय पहले, इस बारे में वह मौन हैं।
प्रो. गार्बे का कहना है¹: 'गीता का वर्तमान स्वरूप उसके मूल स्वरूप से भिन्न है।' अनेक भारतविद् भी अब यह मानने लगे हैं कि भगवत् गीता जिस रूप में आज उपलब्ध है, उसमें समय-समय पर अनेक मूलभूत रूपांतरण होते रहे हैं। प्रो. गार्बे बताते हैं: 'गीता में एक सौ छियालीस श्लोक नए हैं। ये श्लोक मूल गीता में नहीं थे। उसके रचना - काल के बारे में प्रो. गार्बे ने कहा, 'संभवत: इसे ईसा पूर्व दूसरी सदी से पहले की रचना नहीं माना जा सकता।'
प्रो. कोसांबी गीता को बालादित्य सम्राट के शासन काल की रचना मानते हैं। बालादित्य गुप्त वंश का सम्राट था, जिसने आंध्र राजवंश सत्ताच्युत कर दिया था। वह सन् 467 में राजगद्दी पर बैठा। गीता को इतने बाद की रचना मानने के उन्होंने दो कारण बताए हैं। शंकराचार्य से पूर्व (जन्म 788 - मृत्यु 820) उन्होंने भगवत्गीता की टिप्पणी लिखी, इससे पहले वह अज्ञात रचना थी। शांतरक्षित के तत्वसंग्रह में इसका कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता, जब कि यह ग्रंथ शंकराचार्य के आगमन के केवल पचास वर्ष पहले लिखा गया था। उन्होंने दूसरा कारण यह बताया है कि वसुबंधु 'विज्ञानवाद' नामक एक संप्रदाय का प्रणेता था। शंकराचार्य के ब्रह्म सूत्र भाष्य में इस विज्ञानवाद की आलोचना मिलती है। गीता² में एक जगह ब्रह्म सूत्र भाष्य का उल्लेख मिलता है। गीता को वसुबंधु और ब्रह्म सूत्र भाष्य के बाद की रचना माना जाना चाहिए। वसुबंधु गुप्तवंशीय नरेश बालादित्य का गुरु था । तद्नुसार यह माना जा सकता है कि गीता की रचना या तो बालादित्य के शासन काल में हुई होगी या उसके बाद ।
1. प्रो. उटगीकर के अंग्रेजी अनुवाद 'इंट्रोडक्शन टू दि भगवद्गीता' में प्रो. गार्बे की भूमिका देखें।
2. गीता अध्याय 13 श्लोक 4
शंकराचार्य के काल-निर्धारण के बारे में इससे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। उनके जीवन काल और रचना काल के बारे में अब सामान्यतः एक ही स्वीकार्य मत पाया जाता है। पर हां, उनकी जीवन संबंधी घटनाओं के बारे में अधिक शोध की आवश्यकता है। इस विषय पर मैं अन्यत्र अपने विचार प्रकट करूंगा। यहां बस इतना कहना ही पर्याप्त होगा।
महाभारत के रचना-काल का ठीक-ठीक निर्धारण करना लगभग असंभव है। इसके रचना-काल के निर्धारण के बारे में कुछ प्रयत्न किया जा सकता है। महाभारत के अब तक तीन संस्करण माने जा सकते हैं। प्रत्येक संपादक ने उसके नाम और कथावस्तु में भी परिवर्तन किया। अपने मूल रूप में यह ग्रंथ जय नाम से जाना जाता था । यह नाम तृतीय संस्करण के आरंभ और अंत, दोनों स्थानों में आया है। जय नामक यह मूल ग्रंथ किसी व्यास नाम के लेखक की रचना था। इसका दूसरा संस्करण भारत कहलाया । इसका संपादक कोई वैशम्पायन नाम का व्यक्ति था । वैशम्पायन का संस्करण भारत का अकेला द्वितीय संस्करण नहीं था । वैशम्पायन के अतिरिक्त व्यास के और भी कई शिष्य थे, जिनमें से प्रमुख चार थे सुमंतु, जैमिनि, पैल, और शुक। इन सभी ने व्यास से शिक्षा पाई थी। सभी ने भारत के अपने-अपने संस्करण तैयार किए। इस तरह तब भारत के चार और संस्करण तैयार हुए। वैशम्पायन ने इन चारों संस्करणों की पुनर्रचना कर अलग से अपना संस्करण तैयार किया। तीसरे संस्करण का संपादक सौति था । उसने वैशम्पायन के भारत को नया रूप प्रदान किया। सौति का यही संस्करण आगे चलकर महाभारत कहलाया । आकार और कथावस्तु, दोनों ही रूपों में यह संस्करण अपने पूर्ववर्ती संस्करण का विस्तार था। व्यास का जय काव्य एक लघु काव्य था, जिसमें 8,800 से अधिक श्लोक नहीं थे। वैशम्पायन के संस्करण में इस काव्य के श्लोकों की संख्या बढ़कर 24,000 हो गई। सौति के महाभारत में 96,836 श्लोक हैं। कथावस्तु की दृष्टि से व्यास के जय काव्य में केवल कौरवों और पांडवों के युद्ध की कथा थी । वैशम्पायन की कलम ने इस कथा सू में नैतिक उपदेशों को पिरो दिया। इस तरह एक विशुद्ध ऐतिहासिक कृति रूपांतरित होकर एक उपदेश-प्रधान रचना बन गई, जिसका उद्देश्य सामाजिक, नैतिक और धार्मिक कर्तव्यों के नियम सिखाना था। सौति ने अंतिम संपादक के रूप में इस कृति को पौराणिक गाथाओं का एक विशाल भंडार बना दिया। भारत काव्य में जितनी भी प्रचलित दंतकथाएं या स्वतंत्र रूप से विख्यात जो भी ऐतिहासिक आख्यान थे, उन सबको सौति ने इस काव्य में सम्मिलित कर दिया, ताकि वे विस्मृत न हो जाएं अथवा कम से कम सभी एक स्थान पर मिल जाएं। सौति की एक अन्य आकांक्षा यह भी थी कि इस ग्रंथ को शिक्षा और ज्ञान का अक्षय भंडार बना दिया जाए। इसलिए राजनीति, भूगोल, धनुर्विद्या जैसे ज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों से संबंधित सामग्री उन्होंने इसमें सम्मिलित की। सौति आवृति या पुनर्कथ्य के इतना अभ्यस्त थे कि भारत उनके हाथों से निकलकर निश्चय ही महाभारत बन गया। इसमें तनिक भी आश्चर्य नहीं लगता ।
अब इसके तिथि-निर्धारण की बात करें। इसमें यद्यपि कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध की घटना अत्यंत प्राचीन घटना है फिर भी यह नहीं माना जा सकता कि व्यास रचित जय काव्य भी उतनी ही प्राचीन है, अर्थात हम उसे किसी घटना का समसामयिक काव्य नहीं कह सकते। तीनों संस्करणों का तिथि निर्धारण करना संभव नहीं है। फिर भी इन सबके बारे में प्रो. होपकिन्स का निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य है¹
"इस तरह महाभारत का रचना काल सामान्यतः सन् 200 से सन् 400 के बीच ठहरता है। इस निर्णय पर पहुंचते वक्त हमने न तो इसके उत्तरवर्ती संस्करणों पर ध्यान दिया है और न ही इसके विभिन्न कथ्यों के परिवर्तित रूपों पर, जो कदाचित अनुगामी प्रतिलिपिकारों के हाथों से गुजरते हुए माने जा सकते हैं।"
किंतु कुछ ऐसे साक्ष्य हैं, जिनके आधार पर निश्चयपूर्वक यह कहा जा सकता है कि यह बाद की रचना है।
महाभारत में हूणों से संबंधित उल्लेख आया है। स्कंदगुप्त ने हूणों से युद्ध किया था और उसने इन पर सन् 455 में या उसके आसपास विजय पाई थी। इस पराजय के बावजूद हूणों के आक्रमण सन् 528 तक होते रहे। इससे स्पष्ट हो जाता है कि महाभारत की रचना उसके काल में या इसके बाद हुई होगी।
कुछ और भी संकेत मिले हैं, जो इसे और भी बाद की रचना बताते हैं। महाभारत में म्लेच्छों अथवा मुसलमानों का उल्लेख हुआ है। महाभारत के वन पर्व के 190वें अध्याय के 29वें श्लोक में रचनाकार कहता है कि 'सारा संसार इस्लाममय हो जाएगा। सभी यज्ञ, अनुष्ठान, विधि-विधान, पर्व और त्यौहार समाप्त हो जाएंगे, इसका सीधा संबंध मुसलमानों से है। यद्यपि इसका संबंध भविष्य से है, फिर भी चूंकि महाभारत पुराण काव्य है और पुराणों में 'जो हो गया है' उसका कथन होता है, इसलिए इसे भी इसी अर्थ में लेना चाहिए। इस श्लोक की इस तरह व्याख्या कर लेने पर यह सिद्ध हो जाता है कि महाभारत की रचना भारत पर मुसलमानों के आक्रमण के बाद हुई होगी।
1. दि ग्रेट इपिक आफ इंडिया, प्रो. होपकिन्स, पृ. 389
कुछ अन्य संदर्भों से भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। इसी अध्याय के 59वें श्लोक में कहा गया है कि 'वृषलों के सताए हुए ब्राह्मण भय से पीड़ित हो हाहाकार करने लगेंगे और कोई रक्षक न मिलने के कारण सारी पृथ्वी पर निश्चय ही भटकते फिरेंगे।'
इस श्लोक में जिन वृषलों की ओर संकेत है, वे बौद्ध नहीं हो सकते। इस बात का लेशमात्र भी प्रमाण नहीं मिलता कि बौद्धों के हाथों ब्राह्मणों को कभी सताया गया हो । उलटे, इस बात के प्रमाण तो मिले हैं कि बौद्धों के शासन काल में बौद्ध भिक्षुओं की ही तरह ब्राह्मणों के साथ भी उदारता का व्यवहार किया जाता था। यहां 'वृषल' से अर्थ है, असभ्य और ऐसा विशेषण मुसलमान आक्रांताओं के लिए ही प्रयुक्त हुआ लगता है।
वन पर्व के इसी अध्याय में अन्य श्लोक भी हैं। ये श्लोक हैं: 65, 66 और 671 इनमें कहा गया है कि 'समाज अव्यवस्थित हो जाएगा। लोग एडूकों की पूजा करेंगे। वे देवों का बहिष्कार करेंगे। द्विजों की सेवा नहीं करेंगे सारे संसार में एडूक व्याप्त हो जाएंगे। युग का अंत हो जाएगा।'
इस 'एडूक' शब्द का अर्थ क्या है? कुछ ने इसका अर्थ 'बौद्ध चैत्य' किया है। किंतु श्री कोसांबी के अनुसार यह ठीक नहीं है।¹ न तो बौद्ध साहित्य में, और न ही वैदिक साहित्य में, अर्थात कहीं भी 'एडूक' शब्द 'चैत्य' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। उलटे अमरकोश और उसके व्याख्याकार महेश्वर भट्ट के अनुसार तो 'एडूक' का अर्थ ऐसी दीवार से है जिसे लकड़ी का ढांचा लगा कर पुष्ट किया गया हो। इस अर्थ को ध्यान में रखते हुए कोसांबी ने इस शब्द का अर्थ 'ईदगाह' लगाया है, जहां मुसलमान नमाज अदा करते हैं। यदि यह व्याख्या सही है, तो फिर स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि महाभारत के कुछ अंश मोहम्मद गौरी के आक्रमण के बाद लिखे गए थे। मुसलमानों का पहला आक्रमण इब्ने कासिम के नेतृत्व में सन् 712 में हुआ था। उसने उत्तरी भारत के कुछ नगरों पर कब्जा तो कर लिया था, किंतु उन्हें कोई बहुत नुकसान नहीं पहुंचाया। उसके बाद मौहम्मद गजनी ने हमला किया। उसने मंदिरों और विहारों को बुरी तरह से तोड़-फोड़ा और दोनों धर्मों के पुरोहितों का कत्लेआम किया। किंतु उसने भारत में मस्जिदें या ईदगाहें नहीं बनवाई। ऐसा तो मौहम्मद गौरी ने किया। इससे यह साबित होता है कि महाभारत का लेखन सन् 1200 तक पूर्ण नहीं हुआ था ।
ऐसा लगता है कि महाभारत की ही तरह रामायण के भी एक-एक कर तीन संस्करण तैयार हुए। महाभारत में रामायण के बारे में दो प्रकार के संदर्भ मिलते हैं। एक प्रसंग में
1. हिंदू संस्कृति आणि अहिंसा, पृ. 156
रामायण का संदर्भ तो आया है, किंतु उसके लेखक का उल्लेख नहीं मिलता। दूसरे प्रसंग में वाल्मीकि की रामायण का उल्लेख हुआ है। किंतु इन दिनों जो उपलब्ध रामायण है, वह वाल्मीकि¹ रचित नहीं है। श्री सी.वी. वैद्य के मतानुसार² :
वर्तमान रामायण वाल्मीकि द्वारा मूलतः लिखित रामायण नहीं है, चाहे इसे इसी रूप में महान चिंतक और भाष्यकार कटक ने ही क्यों न स्वीकार किया हो। रूढ़िवादी विचारक भी इस तथ्य को स्वीकार करने में नहीं हिचकिचाएगा। चाहे कोई वर्तमान रामायण को सरसरी तौर पर ही क्यों न पढ़े, वह उसमें आई असंगतियों, पृथक प्रसंगों में परस्पर संबंधहीनता या प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नूतन और पुरातन, दोनों प्रकार के विचारों के गठबंधन को देखकर अवश्य हतप्रभ रह जाएगा। यह बात रामायण के बंगाल या बंबई वाले किसी भी पाठ में देखी जा सकती है। इन सब बातों को देखकर कोई भी इस नतीजे पर अवश्य पहुंचेगा कि वाल्मीकि रामायण में आगे चलकर बहुत फेर-बदल हुआ।
महाभारत की ही तरह रामायण की कथावस्तु में भी कालांतर में क्षेपक जुड़ते गए। आरंभ में रामायण की कथा इतनी भर थी कि रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया, इसलिए राम और रावण युद्ध हुआ। अगले संस्करण में इस कथा में कुछ उपदेश भी जुड़ गए। तब एक विशुद्ध ऐतिहासिक काव्य के स्थान पर यह कृति उपदेशात्मक बन गई, जिसका उद्देश्य सामाजिक, नैतिक और धार्मिक कर्तव्यों के सही नियमों की शिक्षा देना था। जब इसका तीसरा संस्करण बना तो यह भी महाभारत की ही तरह दंतकथाओं, ज्ञान, शिक्षा, दर्शन तथा अन्य कलाओं और विज्ञानों का भंडार बन गई।
रामायण की रचना कब हुई, इसके बारे में एक सर्वसम्मत दृष्टिकोण यह है कि राम की घटना पांडवों की घटना से अधिक पुरानी है, किंतु रामायण और महाभारत का लेखन-कर्म साथ-साथ ही चला होगा। हो सकता है कि रामायण के कुछ अंश महाभारत से पहले लिखे गए हों, किंतु इस बात में किसी तरह का संदेह नहीं है कि रामायण का अधिकांश भाग महाभारत के अधिकांश भाग के लिखे जाने के बाद ही लिखा गया होगा।³
(अपूर्ण)
1. दि ग्रेट इपिक ऑफ इंडिया, होपकिन्स पू. 62
2. दि रिडिल ऑफ दि रामायण, अध्याय 2, पृ. 6
3. इन दोनों महाकाव्यों में समान पदावली के लिए होपकिन्स की दि ग्रेट इपिक आफ इंडिया में परिशिष्ट 'ए' देखें।