प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
महाभारत
महाभारत की रचना-तिथि का निर्धारण करना असंभव सा है। हां, उसकी रचना के युग-निर्धारण का प्रयास अवश्य किया जा सकता है। महाभारत के तीन संस्करण हुए हैं और हर संस्करण के संपादक ने उसके शीर्षक और कथावस्तु, दोनों में परिवर्तन किए हैं। अपने मूल रूप में यह जय के नाम से जाना जाता था। यही मूल नाम तीसरे संस्करण के आरंभ और अंत, दोनों स्थानों में आया है। इस मूल रूप जय की रचना किसी व्यास ने की थी। इसका दूसरा संस्करण भारत कहलाया। भारत का संपादन वैशम्पायन ने किया था। भारत नामक इस काव्य का वैशम्पायन कृत द्वितीय संस्करण ही अकेला संस्करण नहीं था । व्यास के शिष्यों में वैशम्पायन के अतिरिक्त सुमंतु, जैमिनि पैल और शुक भी थे। इन सभी ने व्यास से विद्या ग्रहण की थी। इन्होंने अपने - अपने संस्करण तैयार किए। इस प्रकार भारत के ही चार और संस्करण उपलब्ध थे। वैशम्पायन ने इन सभी को नए रूप में ढालकर अपना नया संस्करण तैयार किया। तीसरे संस्करण का संपादक सौति था । उसने वैशम्पायन के संस्करण को नए रूप में ढाला। सौति का संस्करण अंततोगत्वा महाभारत के नाम से जाना गया। यह संस्करण आकार और कथावस्तु, दोनों रूपों में अपने पूर्ववर्ती संस्करणों का परिवर्धित रूप था। व्यास के जय नामक लघु काव्य ग्रंथ में 8,800 से अधिक श्लोक नहीं थे। वैशम्पायन के भारत में यह संख्या बढ़कर 24,000 हो गई। सौति ने श्लोकों की संख्या में विस्तार किया और इस तरह महाभारत में श्लोकों की संख्या बढ़कर 96,836 हो गई। कथावस्तु के रूप में व्यास के मूल काव्य में केवल कौरवों और पांडवों की युद्ध कथा थी। वैशम्पायन के काव्य में कथावस्तु में दोगुनी वृद्धि हो गई। मूल युद्ध - कथा के साथ में उपदेश, अर्थात शिक्षाप्रद घटनाएं भी जुड़ गईं। इस तरह एक विशुद्ध ऐतिहासिक काव्य के स्थान पर इस कृति ने उपदेशात्मक रूप ग्रहण कर लिया, जिसका उद्देश्य सामाजिक, नैतिक और धार्मिक कर्तव्यों, अर्थात नित्य नियमों की शिक्षा देना हो गया। अंतिम संपादक के रूप में सौति ने इस महाभारत को दंतकथाओं, आख्यानों, घटनाओं आदि का एक विशाल सर्वतोमुखी संग्रह बना दिया। भारत में वर्णित कथा के अतिरिक्त स्वतंत्र रूप से जितनी भी दंतकथाएं या ऐतिहासिक आख्यान प्रचलित थे, उन सबको सौति ने अपने ग्रंथ में समाविष्ट कर लिया, ताकि वे विस्मृत न हो जाएं अथवा कम से कम एक स्थान पर तो उपलब्ध हो जाएं। सौति की एक आकांक्षा यह भी थी कि भारत को शिक्षा और ज्ञान का अक्षय भंडार बना दिया जाए इसलिए उसने इसमें राजनीति, भूगोल, धनुर्विद्या आदि ज्ञान और शिक्षा की सभी शाखाओं से संबंधित सामग्री जोड़ दी। सौति पुनरावृत्ति का शौकीन था । इसे ध्यान में रखते हुए किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि यह कहा जाए कि उसके हाथों से निकलकर भारत, महाभारत बन गया।

अब तिथि निर्धारण के बारे में विचार करें। निस्संदेह कौरवों और पांडवों का युद्ध एक अत्यंत प्राचीन घटना थी। किंतु इससे यह अर्थ नहीं निकलता कि व्यास की कृति भी उस घटना की ही तरह प्राचीन है अथवा उस घटना की समकालीन रचना है। प्रत्येक संस्करण का तिथि निर्धारण करना कठिन कार्य है। इस संपूर्ण कृति पर विचार करते हुए प्रो. होपकिन्स लिखते हैं :¹
“इस तरह मोटे तौर पर संपूर्ण महाभारत का रचना काल सन् 200 से सन् 400 के बीच का ठहरता है। यह निर्धारण करते समय न तो उत्तरवर्ती काल में हुए बाद के संस्करणों को, जैसा कि हम जानते हैं, ध्यान में रखा गया है और न ही उन वाचिक रूप में हुए परिवर्तनों-परिवर्धनों को ध्यान में रखा गया है, जो परवर्ती प्रतिलिपिकारों के हाथों हुए होंगे।"
किंतु कुछ अन्य साक्ष्यों के आधार पर निश्चयपूर्वक यह कहा जा सकता है कि इसकी रचना इससे भी बाद में हुई होगी।
महाभारत में हूणों का उल्लेख मिलता है। स्कंदगुप्त ने हूणों से युद्ध किया था और उन्हें सन् 455 में या उसके आसपास पराजित किया। इसके बावजूद हूणों के आक्रमण सन् 528 तक होते रहे। स्पष्ट है कि महाभारत की रचना उस समय या उसके बाद में हुई होगी।
प्रो. कोसांबी² ने कुछ और भी संकेत दिए हैं, जो इसे और बाद की रचना सिद्ध करते हैं। महाभारत में म्लेच्छों अथवा मुसलमानों का जिक्र हुआ है। महाभारत के वन पर्व के 190वें अध्याय के 29वें श्लोक में रचनाकार कहता है कि 'सारा संसार इस्लामय हो जाएगा। सभी यज्ञ, अनुष्ठान, विधि-विधान, पर्व और त्यौहार समाप्त हो जाएंगे।' इस कथन का सीधा संबंध मुसलमानों से है। यद्यपि इसका संबंध भविष्यत काल से है, फिर भी, चूंकि महाभारत पुराण काव्य है और पुराणों में जो हो गया है, उसी का कथन होता है, इसलिए इसे भी इसी अर्थ में लेना चाहिए । इस श्लोक की इस तरह व्याख्या कर लेने पर यह सिद्ध हो जाता है कि महाभारत की रचना भारत पर मुसलमानों के आक्रमण के बाद ही हुई होगी।
कुछ अन्य संदर्भों से भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।
इसी अध्याय के 59वें श्लोक में कहा गया है कि 'वृषलों के सताए हुए ब्राह्मण भय से पीड़ित हो हाहाकार करने लगेंगे और कोई रक्षक न मिलने के कारण सारी पृथ्वी पर निश्चय ही भटकते फिरेंगे।'
1. प्रो. होपकिन्स, दि ग्रेट इपिक आफ इंडिया, पृ. 389
2. हिंदू संस्कृति आणि अहिंसा ( मराठी )
इस श्लोक में जिन वृषलों की ओर संकेत है, वे बौद्ध नहीं हो सकते। इस बात का लेशमात्र भी प्रमाण नहीं मिलता कि बौद्धों के हाथों ब्राह्मणों को कभी सताया गया हो । उलटे, इस बात के प्रमाण तो मिले हैं कि बौद्धों के शासन काल में बौद्ध भिक्षुओं की ही तरह ब्राह्मणों के साथ उदारता का व्यवहार किया जाता था। यहां वृषल से अर्थ है असभ्य और ऐसा विशेषण मुसलमान आक्रांताओं के लिए ही प्रयुक्त हुआ लगता है।
यदि यह बात सही है, तब तो यह मानना ही पड़ेगा कि महाभारत का कुछ अंश निश्चय ही भारत पर मुसलमानों के आक्रमण के बाद लिखा गया होगा।
वन पर्व के इसी अध्याय में कुछ अन्य श्लोक भी हैं जो इसी निष्कर्ष की ओर संकेत करते हैं। ये हैं: 65वां, 66वां और 67वां श्लोक। इनसे भी यही निष्कर्ष निकलता है। इनमें कहा गया है कि 'समाज अव्यवस्थित हो जाएगा। लोग एडूकों की पूजा करेंगे। वे देवों का बहिष्कार करेंगे। शूद्र, द्विजों की सेवा नहीं करेंगे। सारे संसार में एडूक व्याप्त हो जाएंगे। युग का अंत हो जाएगा। '
यहां ‘एडूक' शब्द का बहुत ही महत्व है। कुछ ने इस शब्द का अर्थ बौद्ध चैत्य लगाया है। यह इसलिए कि एडूक का अर्थ है हड्डी, विशेषकर बुद्ध की अस्थियां आगे चलकर इसका अर्थ हुआ चैत्य, क्योंकि चैत्य में बुद्ध की अस्थियां होती हैं, किंतु श्री कोसांबी के मतानुसार यह अर्थ ठीक नहीं है। न तो बौद्ध साहित्य में, और न ही वैदिक साहित्य में कहीं भी ‘एडूक' शब्द 'चैत्य' के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। उलटे, अमरकोश और उसके व्याख्याकार महेश भट्ट के अनुसार तो एडूक का अर्थ ऐसी दीवार है, जिसे लकड़ी के ढांचे से पुष्ट किया गया हो। इस अर्थ को ध्यान में रखते हुए कोसांबी ने इस शब्द का अर्थ ‘ईदगाह' लगाया है, जहां मुसलमान नमाज अदा करते हैं। यदि यह व्याख्या सही है, तब तो स्पष्ट रूप से यही कहा जा सकता है कि महाभारत के कुछ अंश मुसलमानों के आक्रमणों, विशेषकर मौहम्मद गौरी के आक्रमणों के बाद लिखे गए थे। मुसलमानों का पहला आक्रमण इब्ने कासिम के नेतृत्व में सन् 721 में हुआ था। उसने उत्तरी भारत के कुछ भागों पर कब्जा तो कर लिया था, किंतु वहां के मंदिरों और विहारों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया, और न ही दोनों धर्मों के पुजारियों का संहार ही किया था। उसने मस्जिदें और ईदगाह नहीं बनवाईं। यह काम तो मौहम्मद गौरी ने किया। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि महाभारत का लेखन सन् 1200 तक चलता रहा होगा ।