प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
भागवत्गीता
भागवत्गीता, महाभारत नामक महाकाव्य के भीष्म पर्व का अंग है। यह महाकाव्य मुख्यतः चचेरे भाइयों, धृतराष्ट्र-पुत्र कौरवों और पांडु पुत्र पांडवों के बीच प्रभुसत्ता के संबंध में परस्पर संघर्ष से संबंधित है। पांडु, धृतराष्ट्र का अनुज था। धृतराष्ट्र के अंधे होने की वजह से राजसिंहासन पर पांडु बैठा। पांडु की असामयिक मृत्यु के पश्चात पांडवों और धृतराष्ट्र - पुत्र कौरवों के बीच राजसिंहासन के उत्तराधिकार के प्रश्न पर कलह शुरू हो गया। इस संघर्ष की चरम परिणति कुरुक्षेत्र ( आधुनिक पानीपत के पास ) के युद्ध के रूप में हुई। इस युद्ध में कृष्ण ने पांडवों का साथ दिया और वह उनका पथप्रदर्शक, मित्र और दार्शनिक, तीनों ही था। लेकिन वह पांडवों में से उनके भाई अर्जुन का सारथी, अर्थात रथ-चालक बना।
कौरवों और पांडवों की सेनाएं कुरुक्षेत्र के मैदान में युद्ध के लिए तैयार खड़ी हैं। सारथी के रूप में कृष्ण के साथ अर्जुन रथ में आरूढ़ होकर युद्ध के मैदान में आते हैं और पांडव सेना के अग्र भाग में अपना स्थान ग्रहण करते हैं। युद्ध की कामना के लिए वह शूरवीर अपनी विपक्षी कौरव सेना को निहारता है, तो उसे चारों ओर अपना ही कुल, अपने ही बंधु-बांधव, अपने ही गुरुजन दिखाई पड़ते हैं। स्वजनों के साथ होने वाले इस भयानक युद्ध में उसे अपने ही भाइयों भतीजों, अपने ही गुरुजनों, अपने ही स्नेहियों, अपने ही श्रद्धेयों, आदि का रक्तपात करना पड़ेगा, इस विचार के आते ही वह युद्ध की भयानकता के परिणाम से भय ग्रस्त हो जाता है। उसके मन में विषाद उत्पन्न होता है और वह अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग कर युद्ध से मना कर देता है। कृष्ण उसके साथ तर्क-वितर्क करते हैं और उसे युद्ध करने के लिए उकसाते हैं। अर्जुन और कृष्ण के बीच का यही वाद-विवाद प्रश्नोत्तर रूप में गीता है। कृष्णार्जुन संवाद के परिणामस्वरूप अंत में अर्जुन युद्ध करने के लिए तैयार हो जाता है।

भागवत्गीता का आरंभ वृद्ध धृतराष्ट्र और संजय के बीच युद्ध करने के बारे में बातचीत से होता है। कौरवों का पिता धृतराष्ट्र युद्ध-काल में जीवित होते हुए भी अंधा होने की वजह से स्वयं कुछ नहीं देख सकता। युद्ध भूमि में क्या-क्या हो रहा है, यह जानने के लिए वह दूसरे पर आश्रित है। धृतराष्ट्र को युद्ध भूमि का आंखों देखा हाल कौन सुनाएगा, इस कठिनाई का पूर्वाभास होने पर कहते हैं कि महाभारतकार व्यास ने धृतराष्ट्र का रथ हांकने वाले संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की ताकि वह युद्ध क्षेत्र में होने वाली प्रत्येक घटना को घटना ही नहीं मनुष्य के मन में उठने वाले सभी विचारों को जान ले और उन्हें ज्यों-का-त्यों धृतराष्ट्र को सुना दे । इसलिए भागवत्गीता की कथा मुख्यतः धृतराष्ट्र और संजय के बीच हुए प्रश्नोत्तरों के रूप में है। किन्तु गीता वस्तुत: अर्जुन और कृष्ण के बीच हुई बातचीत से संबंधित है। इसलिए तो इसे 'कृष्णार्जुन संवाद' कहा गया है, जो उचित जान पड़ता है।
इस कृष्णार्जुन संवाद में, जो भागवत्गीता का वास्तविक नाम है, विवाद का मुख्य विषय यह है कि युद्ध किया जाए या नहीं। विवाद का और कोई प्रश्न नहीं है। केवल इसी विषय पर दोनों में वाद-विवाद होता है। केवल इसी दृष्टिकोण से विचार करें तो स्पष्ट है कि तब यह अवसर नहीं था कि कृष्ण सामान्य जनता को नैतिक उपदेश दे या कि वह अपनी किसी धार्मिक मान्यता का प्रतिपादन करे अथवा किसी पंथ विशेष की प्रश्नोत्तरी शैली का सहारा ले। किंतु गीता में यही बात तो उभरकर सामने आती है। अर्जुन का प्रश्न था, युद्ध करूं या नहीं? कृष्ण का उत्तर हां या न में आना चाहिए था, किंतु कहते हैं, गीता में तो कृष्ण ने अर्जुन को अपना सारा का सारा धर्म संदेश ही सुना दिया।
सबसे पहला प्रश्न है, यह कृष्ण कौन है? आश्चर्य है कि गीता में ही इस प्रश्न के अनेक प्रकार के उत्तर निहित हैं। गीता के आरंभ में कृष्ण एक सामान्य मानव के रूप में, अर्थात मानवीय व्यक्तित्व लिए उभरता है। वह योद्धा है। महान योद्धा होने के बावजूद वह अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार करता है।¹ अर्जुन का रथ चलाने जैसा तुच्छ समझा जाने वाला काम अपनाता है। मानव से वह अतिमानव बन जाता है जो युद्ध का संचालक और नियामक ही नहीं, अपितु उसका भविष्य-दृष्टा भी है। अतिमानव से उसका विकास, देवतुल्य मानव और अधिनायक के रूप में होता है। जब उसके सारे तर्क अर्जुन को युद्ध के लिए सन्नद्ध करने में असफल हो जाते हैं, तो वह सीधे तौर पर अर्जुन को युद्ध करने का आदेश देता है और इस तरह भय-ग्रस्त अर्जुन उठ खड़ा होता है और उसके कथनानुसार कार्य करने को तैयार हो जाता है। तब देवतुल्य मानव से उठकर वह ईश्वर का स्थान ग्रहण कर लेता है। इस प्रसंग में उसे ईश्वर ही कहा गया है।
उपर्युक्त विवरणानुसार कृष्ण के व्यक्तित्व का निरंतर विकास हुआ है किंतु इससे भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसी गीता में कृष्ण को ईश्वर के अन्य रूपों का प्रतिनिधित्व करने वाला भी बताया गया है। यदि कोई व्यक्ति, चाहे संयोगवश ही गीता का पाठ क्यों न करे, उसे कृष्ण के इस प्रकार के चार प्रतिनिधि चरित्रों की अवश्य जानकारी मिल जायेगी। कृष्ण वासुदेव है:
भागवत्गीता
10.37. वृष्णिकुल में मैं वासुदेव हूं, पांडवों में धनंजय मैं हूं, मुनियों में व्यास मैं हूं, ऋषियों के लिए ऋषि उशना मैं हूं।
कृष्ण, विष्णु भगवान के अवतार हैं।
10.12. आप परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं।
10.21. आदित्यों में विष्णु मैं हूं, ज्योतिष्कों में ज्योतिष्मान सूर्य मैं हूं, वायुओं में मरीचि मैं हूं, तारापुंज में चंद्र मैं हूं।
11.24. आपको आकाश का स्पर्श करते, नाना वर्णों में जगमगाते, आपके मुख को विशाल रूप से विवृत और आपके दीप्तमान विशाल नेत्रों को देखकर हे विष्णु, मेरा हृदय व्याकुल हो उठा है और मैं धैर्य या शांति नहीं रख पा रहा हूं।
1. यह घटना कृष्ण और कौरवों के नायक दुर्योधन के बीच हुए समझौते का परिणाम थी। युद्ध शुरू होने से पहले एक बार कृष्ण दुर्योधन के पास पहुंचा और उसे कौरवों की ओर लड़ने के लिए आमंत्रित किया। कृष्ण ने दुर्योधन के सामने विकल्प रखा, मुझे चाहते हो या मेरी यादव सेना को दुर्योधन ने यादव सेना को लेना स्वीकार किया । इसलिए कृष्ण और यादव सेना परस्पर दलों के साथ थे।
11.30. हे विष्णु! आप सब लोकों को सब ओर से निगलकर अपने धधकते हुए मुख से उन्हें चाट रहे हैं। हे सर्वव्यापी विष्णु ! आपका उग्र प्रकाश समूचे जगत को तेज से पूरित कर रहा है और तपा रहा है।
कृष्ण शंकर के भी अवतार हैं:
10.23. रुद्रों में शंकर मैं हूं, यक्ष और राक्षसों में कुबेर मैं हूं, वसुओं में अग्नि मैं हूं, पर्वतों में मेरु मैं हूं।
कृष्ण ब्रह्मा हैं :
15.15. मैं सबके हृदय में अधिष्ठित हूं। स्मृति, ज्ञान और उनका अभाव मेरे कारण होता है। मैं वस्तुतः वह हूं जो समस्त वेदों जानने योग्य है। वेदांत का प्रणेता वस्तुतः मैं हूं और वेदों का ज्ञाता भी मैं हूं।
15.16. इस लोक में दो पुरुष हैं। एक क्षर और दूसरा अक्षर है। सभी जीव क्षर हैं और उनमें जो आत्मा है, वह अक्षर कहलाती है।
15.17. इसके सिवाय कुछ और है परम पुरुष, जो परमात्मा कहलाता है। अव्यय ईश्वर जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पोषण करता है।
15.18. चूंकि मैं क्षर से परे हूं, इसलिए वेदों और लोकों में मैं पुरुषोतम नाम से प्रख्यात हूं।
15.19. हे भरत के वंशज ! जो मोह रहित होकर मुझे पुरुषोतम को इस प्रकार जानता है, वह सब कुछ जानता है और मुझे पूर्ण भाव से भजता है ।
अब अगला प्रश्न लें। कृष्ण ने अर्जुन को किस सिद्धांत का उपदेश दिया ? कहा जाता है कि यह सिद्धांत मोक्ष का सिद्धांत है। यद्यपि कृष्ण ने जिस सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, वह मोक्ष से संबंधित है किंतु कृष्ण ने तो मोक्ष के तीन अलग-अलग सिद्धांतों का उपदेश दिया है।
'ज्ञानमार्ग' से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है जिसका सांख्य योग ने प्रतिपादन किया है।
2.39. तुझे आत्मज्ञान के गुण के विषय में बताया गया, अब तू योग के विषय में सुन हे पार्थ, इसे सुनकर तू कर्म के बंधनों का नाश करेगा।
यह सांख्य योग पर उपदेश का अंतिम छंद है, जिसकी व्याख्या दूसरे अध्याय के ग्यारहवें से सोलहवें और अट्ठाहरवें से तीसवें छंदों में की गई है।
2. कर्म मार्ग से मोक्ष प्राप्त हो सकता है:
5.2. कर्मों का त्याग और योग, दोनों ही मोक्ष देने वाले हैं, इनमें से कर्मों का योग कर्मों के संन्यास से बढ़कर है।
3. भक्तिमार्ग से मोक्ष संभव है:
9.13. लेकिन हे पार्थ, दैवी प्रकृति से मुक्त महात्माजन मुझे सब प्राणियों का कारण और अक्षर स्वरूप जानकर अनन्य मन से मुझे भजते हैं।
9.14. ये लोग मेरी सदा स्तुति करते तथा दृढ़ निश्चय से प्रयत्न करते, भक्तिपूर्वक मुझे प्रणाम करते, सदा संकल्प युक्त मुझे भजते हैं।
9.15 और अन्य लोग भी ज्ञान के यज्ञ के ( अर्थात् सभी में आत्मा को देखते हुए, मुझे जो पूर्ण है, जो एक है, जो सबसे पृथक है, जो बहुगुण है, भजते हैं)
9.17. मैं इस जगत का पिता हूं, माता हूं, धाता और पितामह हूं, गेय हूं, ओउम हूं और ऋक्, साम तथा यजुर्वेद हूं।
11. 22. जो लोग मुझे अनन्य समझ मेरा ध्यान करते हैं, सभी प्राणियों में भजते हैं:, उनके लिए इस प्रकार मैं सदा उस वस्तु का वहन करता हूं जिसका उनमें अभाव है, मैं उस चीज की रक्षा करता हूं जो उनके पास है।
भगवद्गीता के दो अन्य लक्षण भी हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं।
1. वेदों और वैदिक कर्मकांडों तथा बलि के प्रति वितृष्णा प्रकट की गई है:
2.42-44. हे पार्थ, जो लोग भोग विलास में लिप्त हैं और जिनकी बुद्धि को अविवेकी जनों की अलंकारमयी वाणी ने हर लिया है, जिनकी बड़ी बड़ी इच्छाएं हैं और जो लोग स्वर्ग को अपना चरम लक्ष्य समझते हैं, जो लोग वेदों की चित्ताकर्षक शब्दावली से प्रसन्न होते हैं और यह कहते हैं कि इसके बाद कुछ नहीं है, उन्हें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती। उनकी अलंकारमयी वाणी योग और ऐश्वर्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के विशिष्ट कर्मकांडों के वर्णन से भरीपूरी रहती है, उनके शब्द (नए) जन्मों के कारण रूप होते हैं, ठीक उनके कर्मों के परिणाम की तरह (जो सकाम किए जाते हैं) ।
2.45. वेदों में तीन गुणों का वर्णन है, हे अर्जुन, तू अपने को इन तीनों से मुक्त कर सदा संतुलित रह, प्राप्ति और ग्रहण (के विचारों) से मुक्त हो और आत्मस्थित रह ।
2.46. ऐसे ब्राह्मण के लिए, जिसने आत्मा को जान लिया है, उसे सभी वेदों से उतना ही प्रयोजन होता है जितना किसी जलाशय से ऐसे समय होता है जब सर्वत्र बाढ़ आई होती है।
9.21. इस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर वे पुण्य का क्षय हो जाने पर मृत्युलोक में प्रवेश करते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों की निषेधाज्ञाओं का पालन करते, इच्छाओं की पूर्ति की कामना लिए वे आते और जाते हैं।
(अपूर्ण)