प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
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ब्राह्मणवाद की विजय : राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर सोर्स मैटिरियल पब्लिकेशन कमेटी को 'दि ट्रम्फ ऑफ ब्राह्येनिज्म' (ब्राह्मणवाद की विजय ) शीर्षक के अंतर्गत केवल तीन टंकित पृष्ठ प्राप्त हुए थे। सौभाग्यवश, निबंध की एक प्रति श्री एस. एस. रेगे ने दी, ताकि उसे अंग्रेजी की पुस्तक में सम्मिलित किया जा सके। इन पृष्ठों की जांच करते समय कमेटी के सदस्यों ने यह देखा कि श्री रेगे से जो प्रति प्राप्त हुई है, उसमें तीन से सात तक और नौ से सत्रह तक के पृष्ठ नहीं हैं। इस लेख के कुल टकित पृष्ठों की संख्या बानवे थी, जिसमें लापता पृष्ठ भी सम्मिलित थे। श्री रेगे की प्रति पर 'दि ट्रम्फ ऑफ ब्राह्मेनिज्म' (ब्राह्मणवाद की विजय) शीर्षक दिया गया था, जब कि कमेटी को प्राप्त कागजों में पांडुलिपि के प्रथम पृष्ठ पर शीर्षक 'रेजिसाइड और दि बर्थ ऑफ काउंटर - रिवोल्यूशन' ( राजहत्या अथवा प्रतिक्रांति का जन्म ) दिया गया था। इस विषय का वर्गीकरण नौ अध्यायों में किया गया है और कमेटी को प्राप्त प्रति में इसका उल्लेख है, जब कि श्री रेगे की प्रति में यह लापता है। डॉ. अम्बेडकर की हस्तलिखित प्रति में शीर्षक और वर्गीकरण, दोनों का ही उल्लेख है। इसलिए उन्हें अंग्रेजी के प्रकाशन में यथावत रख लिया गया है। संयोगवश कमेटी को नौ से सत्रह तक के पृष्ठ किसी अन्य फाइल में बंधे प्राप्त हुए। इन सभी कागजों को अंग्रेजी प्रकाशन में यथोचित स्थान पर लगा दिया गया है। इस प्रकार पृष्ठ संख्याचार से सात के अतिरिक्त, यह पांडुलिपि पूर्ण है। कमेटी को प्राप्त प्रति में इस विषय के वर्गीकृत जिन नौ अध्यायों का उल्लेख है, वे हैं- 1. दि ब्राह्मेनिक रिवोल्ट अगेन्स्ट बुद्धिज्म (बौद्ध धर्म के विरुद्ध ब्राह्मणवादी विद्रोह), 2. मनु दि एपोस्टिल ऑफ ब्राह्मेनिज्म (ब्राह्मणवाद के देवदूत मनु), 3. ब्राह्मेनिज्म एंड दि ब्राह्मिन्स राइट टू रूल एंड रेजिसाइड (ब्राह्मणवाद तथा ब्राह्मण का शासन करने का अधिकार और राजहत्या), 4. ब्राह्येनिज्म एंड दि प्रिवीलेजज ऑफ ब्राह्मिन्स (ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों के विशेष अधिकार ), 5. ब्राह्मेनिज्म एंड दि क्रीएशन आफ कास्ट्स (ब्राह्मणवाद और जाति संरचना ), 6. ब्राह्येनिज्म एंड दि डिग्रेडेशन ऑफ नॉन-ब्राह्मिन्स (ब्राह्मणवाद और गैर-ब्राह्मण लोगों का अध: पतन ), 7. ब्राह्मेनिज्म एंड दि सप्रेशन ऑफ दि शूद्र (ब्राह्मणवाद और शूद्रों का दमन ), 8. ब्राह्मेनिज्म एंड दि सबजेक्शन ऑफ वीमेन (ब्राह्मणवाद और महिलाओं की पराधीनता), और 9. ब्राह्मेनिज्म एंड दि लीगेलाइजेशन ऑफ दि सोशल सिस्टम (ब्राह्मणवाद और सामाजिक व्यवस्था का वैधीकरण) - संपादक
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भारत के विषय में बोलते हुए प्रो. ब्लूमफील्ड अपनी भाषण माला 'वैदिक धर्म' के प्रारंभ में अपने श्रोताओं को स्मरण कराते हैं कि 'भारत कई अर्थों में अनेक धर्मों की भूमि है। इसने अपने स्वयं के संसाधन, अनेक अलग-अलग व्यवस्थाओं और पंथों को जन्म दिया है।
‘एक अन्य अर्थ में भारत अनेक धर्मों की भूमि है। अन्य किसी भी स्थान पर जीवन का तानाबाना धार्मिक विश्वासों और प्रथाओं से इतना अधिक अनुप्राणित नहीं मिलता।'¹......
इस अभिमत में बहुत सच्चाई है। उन्होंने इस सच्चाई का कहीं अधिक गहन तथा सटीक बखान किया होता, यदि उन्होंने यह कहा होता कि भारत परस्पर विरोधी धर्मों की भूमि है। वास्तव में कोई भी ऐसा देश नहीं है जहां धर्म ने उसके इतिहास में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो, जैसी कि उसने भारत के इतिहास में निभाई है। भारत का इतिहास और कुछ नहीं, सिर्फ बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच जातीय संघर्ष का इतिहास है। इस सत्य की इतनी अवहेलना की गई है कि कोई भी ऐसा नहीं मिलेगा जो इसे तुरंत स्वीकार कर ले। वास्तव में ऐसे कम व्यक्ति मिलेंगे जो इस प्रकार के अभिमत का खंडन कर सकें।
मैं यहां संक्षेप में भारतीय इतिहास के मुख्य-मुख्य तथ्यों को प्रस्तुत कर रहा हूं। यह इसलिए भी कि जिन लोगों ने भारत के इतिहास को कुछ भी समझा है, उनको यह जान लेना चाहिए कि यह इतिहास और कुछ नहीं है, बल्कि ब्राह्मणवाद और बौद्ध धर्म के बीच महत्ता के लिए संघर्ष का इतिहास है।
कहा जाता है कि भारत का इतिहास आर्यों के आगमन से प्रारंभ हुआ, जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया, इसे अपना घर बनाया और अपनी संस्कृति स्थापित की। आर्य लोगों के गुण, उनकी संस्कृति, उनका धर्म तथा उनकी सामाजिक पद्धति कुछ भी क्यों न हो, परंतु हम उनके राजनीतिक इतिहास के बारे में बहुत कम जानते हैं। अनार्यों की तुलना में आर्यों की श्रेष्ठता के जो भी दावे पेश किए जाते हैं, उस सबके बावजूद यह तो निश्चित है। कि आर्यों ने अपनी राजनीतिक उपलब्धियों के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहा है, जो इतिहास का अंग बन सके। नागा नाम की अनार्य जाति के उत्थान से भारत के राजनैतिक इतिहास का प्रारंभ होता है, जो कि शक्तिशाली लोग थे, जिन्हें आर्य पराजित नहीं कर सके तथा जिनके साथ आर्यों ने शांति समझौता किया और जिन्हें आर्यों को अपने समान ही मान्यता देने के लिए बाध्य होना पड़ा। भारत ने प्राचीन काल में राजनीतिक क्षेत्र में जो भी ख्याति और गौरव अर्जित किया, उसका श्रेय पूर्णतः अनार्य नागाओं को जाता है। यही वे लोग हैं, जिन्होंने भारत को विश्व के इतिहास में महान और शानदार स्थान दिलाया।
1. दि रिलीजन ऑफ दि वेद, पृ. 1
भारत के राजनीतिक इतिहास में सर्वप्रथम युगांतरकारी घटना थी, बिहार में 642 ईसा पूर्व मगध साम्राज्य का उदय । कहा जाता है कि मगध साम्राज्य के संस्थापक का नाम शिशुनाग¹ था और यह नागा नामक अनार्य जाति का था ।
शिशुनाग द्वारा स्थापित यह छोटा-सा मगध राज्य उसके वंश में उत्पन्न समर्थ शासकों के अधीन विशाल होता गया और बिम्बसार के अधीन तो यह एक साम्राज्य ही बन गया जो इस वंश में उत्पन्न पांचवां शासक था। यह राज्य मगध साम्राज्य कहा जाने लगा। शिशुनाग वंश ने 413 ईसा पूर्व तक शासन किया। उस समय शिशुनाग वंश के सम्राट महानंद का शासन था। इस सम्राट महानंद की नंद नाम के एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति ने हत्या कर दी और वह सम्राट बन बैठा। उसने नंद राजवंश की स्थापना की। इस नंद वंश ने मगध साम्राज्य पर 322 ईसा पूर्व तक शासन किया। इसके अंतिम सम्राट को चन्द्रगुप्त ने पदच्युत किया और उसने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। चन्द्रगुप्त शिशुनाग वंश के अंतिम सम्राट के परिवार से संबंधित था²। इसलिए कहा जा सकता है कि चन्द्रगुप्त ने जो क्रांति की, वह वस्तुतः मगध के नाग साम्राज्य की पुनर्स्थापना थी ।
मौर्यों को जो मगध साम्राज्य मिला, उसकी सीमाएं उन्होंने अपने पराक्रम से काफी दूर-दूर तक फैलाई। अशोक के अधीन इस साम्राज्य की सीमा यहां तक बढ़ी कि इसे एक दूसरा ही नाम दिया जाने लगा। इसे मौर्य साम्राज्य या अशोक साम्राज्य कहा जाने लगा। ( इसके आगे अंग्रेजी की मूल पांडुलिपि में पृ. चार से सात तक का अंश नहीं मिलता ) ।
उस समय जितने विभिन्न धर्म प्रचलित थे, यह उन जैसा नहीं रहा । अशोक ने इसे राजकीय धर्म घोषित किया। निश्चय ही यह ब्राह्मणवाद के लिए बहुत बड़ा आघात था।
1. इसे शिशुनाक भी कहा जाता है।
2. श्री हरिकृष्ण देव, स्मिथ द्वारा उल्लिखित, अर्ली हिस्ट्री आफ इंडिया (1924 ), पृ. 44 फुटनोट ।
इससे ब्राह्मणों को राज्य का संरक्षण मिलना बंद हो गया। अशोक साम्राज्य में उन्हें गौण या अधीनस्थों का दर्जा दिया जाने लगा और उनकी उपेक्षा की जाने लगी। निश्चय ही कहा जा सकता है कि यह दमन इस छोटे से कारण से हुआ कि अशोक ने सभी प्रकार के पशुओं की बलि पर रोक लगा दी थी, जो ब्राह्मणवाद का मूल आधार थी। ब्राह्मणों को न केवल राज्य का संरक्षण मिलना बंद हुआ, बल्कि उनका व्यवसाय भी छिन गया। यह व्यवसाय था यज्ञ-कर्म कराना और उसके बदले शुल्क लेना, जो कभी - कभी बहुत अधिक होता था और यही उनकी जीविका का मुख्य स्त्रोत था। इस प्रकार लगभग 140 वर्षों तक मौर्य साम्राज्य रहा, ब्राह्मण दलित और दलित वर्गों की तरह रहे ।¹
बेचारे ब्राह्मणों के पास बौद्ध साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह करने के अलावा कोई दूसरा चारा नहीं था। यही विशेष कारण था, जिससे पुष्यमित्र ने मौर्य साम्राज्य के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। पुष्यमित्र सुङ् गोत्र का था। सुङ् लोग सामवेदी ब्राह्मण होते थे,² जो पशुबलि और सोमबलि में विश्वास करते थे। इसलिए समूचे मौर्य साम्राज्य में पशुबलि निषिद्ध होने और अशोक द्वारा जगह-जगह शिलालेखों आदि पर उसकी घोषणा लिखवा देने से सुङों को अनेक कष्टों का भोगना स्वाभाविक था । यदि पुष्यमित्र ने, जो एक सामवेदी ब्राह्मण था बौद्ध साम्राज्य को जो ब्राह्मनों के सभी कष्टों का कारण था, नष्ट कर ब्राह्मणों का उद्धार करने और उन्हें अपने धर्म के पालन की छूट देने का बीड़ा उठाया, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं हुई।
"पुष्यमित्र ने जो राजहत्याएं कीं, उनका उद्देश्य राज्यधर्म के रूप में बौद्ध धर्म को नष्ट करना और ब्राह्मणों को भारत का सर्वोच्च शासक बनाना था, जिससे राजा की राजनैतिक सत्ता की सहायता से बौद्ध धर्म पर ब्राह्मण धर्म की विजय हो सके। इस तथ्य की पुष्टि दो अन्य तथ्यों से होती है। पहला तथ्य स्वयं पुष्यमित्र के आचरण से संबंधित था। उपलब्ध साक्ष्य से पता चलता है कि राजगद्दी पर बैठने के बाद पुष्यमित्र ने अश्वमेघ यज्ञ अथवा अश्व यज्ञ कराया और इस वैदिक अनुष्ठान को केवल परम प्रभुतासंपन्न व्यक्ति ही करा सकता था। जैसा कि विन्सेंट स्मिथ कहते हैं :
"बौद्ध धर्म की सबसे अधिक उल्लेखनीय विशेषता है, पशुओं को अवध्य मानकर उनको अभय जीवन प्रदान करना । अशोक की विधि-व्यवस्था की यही सबसे बड़ी विशेषता थी । इस पर बहुत अधिक बल देने के परिणामस्वरूप ऐसे सभी यज्ञ-कर्मों पर रोक लग गई, जिनमें पूजा-विधि के रूप में रक्त का उपयोग होता था और जिस विधि को कट्टर ब्राह्मण अपना प्रधान अनुष्ठान मानते थे, ब्राह्मणों ने
1. मनु ने मनुस्मृति में ब्राह्मणों के लिए जो विशेषाधिकार मांगे, उनसे मौर्य शासन में ब्राह्मणों की हीन भावना का पता चलता है। उनमें यह हीन भावना अपनी दलित स्थिति के कारण आई होगी।
2. बुद्धिस्टिक स्टडीज (सं. लॉ), अध्या. 34, पृ. 819 में श्री हरप्रसाद शास्त्री का लेख देखें ।
इस क्षेत्र में जो प्रतिक्रिया व्यक्त की, उसकी शुरुआत पुष्यमित्र द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने से हुई। इस प्रकार के यज्ञ-कर्म बाद में पांच शताब्दियों, समुद्रगुप्त और उसके उत्तराधिकारियों के समय तक जोर-शोर से प्रचलित रहे । "
एक और प्रमाण यह है कि पुष्यमित्र ने अपने राज्यारोहण के बाद बौद्धों और बौद्ध धर्म के विरुद्ध जोर-शोर से और कटुतापूर्वक उन्हें सताने का आंदोलन छेड़ दिया था।
पुष्यमित्र ने बौद्ध धर्म को किस निर्दयता से कुचला, इसका अनुमान उसकी उस घोषणा से लगाया जा सकता है, जो उसने बौद्ध भिक्षुओं के विरुद्ध जारी की थी। इस घोषणा में पुष्यमित्र ने हर बौद्ध भिक्षु के कटे हुए सिर की कीमत सौ स्वर्ण मुद्राएं निर्धारित की थी।¹
पुष्यमित्र के शासन में बौद्धों पर किस प्रकार अत्याचार किया गया, इस बारे में टिप्पणी करते हुए डॉ. हरप्रसाद शास्त्री कहते हैं ²:
“कट्टर और धर्मांध सुङ् के शासन काल में बौद्धों की स्थिति का अनुमान करना, उसका वर्णन करने की अपेक्षा अधिक सरल होगा। चीनी अधिकारियों से यह पता चलता है कि बहुत से बौद्ध आज भी पुष्यमित्र का नाम उसे भला-बुरा कहे बिना नहीं लेते हैं।"