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जातिप्रथा और उन्मूलन

jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar

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03 मे 2023
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     महात्मा जी उपदेश देते हैं, क्या उसी के अनुसार आचरण करते हैं? जिस बहस का व्यापक रूप में प्रयोग होता है, उसमें व्यक्तिगत उल्लेख पसंद नहीं किया जाता है। लेकिन जब कोई किसी सिद्धांत का उपदेश देता है और धर्म सिद्धांत मानकर उसे धारण कर लेता है तो यह उत्सुकता पैदा होती है कि वह जो उपदेश देता, उस पर कितना आचरण करता है। हो सकता है कि आचरण करने में असफलता का कारण यह हो कि आदर्श इतना अधिक ऊंचा हैं कि उसे प्राप्त करना संभव नहीं है। आचरण करने में असफलता का कारण व्यक्ति का अंतर्जातीय पाखंड भी हो सकता है। किसी भी स्थिति में उन्होंने अपने आचरण को परीक्षण के लिए खोलकर रख दिया है और मुझे दोष नहीं दिया जाना चाहिए, यदि मैं पूछें कि अपने आदर्श को उन्होंने अपने जीवन में उतारने के लिए कितना प्रयास किया है। महात्मा जन्म से बनिया है। उनके पूर्वजों ने मंत्री पद पाने के लिए व्यापार करना छोड़ दिया था, जो कि ब्राह्मण का पेशा है। अपने जीवन में महात्मा बनने से पहले, जब पेशा चुनने का अवसर आया तो उन्होंने तराजू की बजाए वकालत को प्राथमिकता दी । वकालत का परित्याग कर वह आधे संत और आधे राजनीतिज्ञ बन गए। उन्होंने व्यापार को कभी छुआ तक नहीं, जो उनका पैतृक पेशा है। उनका सबसे छोटा पुत्र मैं केवल उस पुत्र की बात कर रहा हूं, जो अपने पिता का अनुयायी है जो वैश्य के घर में जन्मा, लेकिन उसने एक ब्राह्मण लड़की से विवाह किया तथा जिसने एक बड़े पूंजीपति के समाचार-पत्र में नौकरी को चुना है। ऐसी जानकारी नहीं है कि महात्मा ने पैतृक पेशा न अपनाने के लिए उसकी कभी निंदा की हो। किसी आदर्श को उसके सबसे खराब नमूने से परखना गलत होगा और यह उदारता नहीं होगी। लेकिन निःसंदेह महात्मा के पास इससे बेहतर नमूना नहीं है और यदि वह इस आदर्श को अपनाने में असफल होते हैं तो यह आदर्श एक असंभव आदर्श है, जो आदमी की व्यावहारिक मूल प्रवृत्तियों के बिल्कुल विपरीत है। कार्लाइल के विद्यार्थी जानते हैं कि किसी विषय पर सोचने से पहले वे उस पर बोलते थे। क्या जातपांत के मामले में महात्मा के साथ ऐसा तो नहीं हुआ होगा अन्यथा जो प्रश्न मेरे मन में आते हैं, वे उनसे छूटे नहीं होते। कोई भी पेशा कब पैतृक पेशा बन जाता है, जिसे अपनाना आदमी के लिए बाध्यकारी हो जाए? क्या व्यक्ति को अपना पैतृक पेशा ही अपनाना चाहिए, चाहे वह क्षमता के अनुकूल और लाभकारी नहीं हो? क्या आदमी को अपना पैतृक पेशा ही अपनाना चाहिए, वह अनैतिक पेशा ही क्यों न हो? यदि प्रत्येक को अपना पैतृक पेशा ही जारी रखना पड़े, तो इसका अर्थ होगा कि किसी आदमी को दलाल का पेशा इसलिए जारी रखना पड़ेगा, क्योंकि उसके दादा दलाल थे और किसी औरत को इसलिए वेश्या का पेशा अपनाना पड़ेगा, क्योंकि उसकी दादी एक वेश्या थी । क्या महात्मा अपने सिद्धांत के इस तार्किक परिणाम को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं? मेरे लिए उनका पैतृक पेशा अपनाने का आदर्श न केवल असंभव, बल्कि अव्यावहारिक आदर्श भी है, उसके अलावा नैतिक रूप से भी यह अरक्षणी आदर्श है।

Reply to the Mahatma by Dr. Bhimrao Ambedkar

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     महात्मा जीवन भर ब्राह्मण बने रहने में महान उत्कर्ष देखते हैं। इस तथ्य को छोड़ भी दिया जाए तो ऐसे कई ब्राह्मण हैं, जो जीवन भर ब्राह्मण बने रहना नहीं चाहते। हम उन ब्राह्मणों के बारे में क्या कहें, जो अपनी पुरोहिताई का पैतृक पेशा अपना लेते हैं ? क्या वे पैतृक पेशा अपनाने के सिद्धांत की वजह से ऐसा करते हैं, या गंदे आर्थिक लाभ के इरादे से ऐसा करते हैं? महात्मा इन प्रश्नों से चिंतित प्रतीत नहीं होते। वह इस बात से संतुष्ट हैं कि “सच्चे ब्राह्मण वे हैं, जो मुफ्त में उन्हें दी जा रही भिक्षा पर जीते हैं और जितना भी उनके पास आध्यात्मिक खजाना है, उसे वे मुफ्त में बांट रहे हैं। 'पुश्तैनी ब्राह्मण पुजारी महात्मा को आध्यात्मिक खजाना ढोते हुए प्रतीत होते हैं। लेकिन पुश्तैनी ब्राह्मण के अन्य चित्र भी खींचे जा सकते हैं। ब्राह्मण विष्णु का पुजारी हो सकता है, जो प्रेम के देवता हैं। वह शंकर का पुजारी भी हो सकता है, जो विनाश के देवता हैं। वह बुद्ध गया में भी पुजारी हो सकता है और बुद्ध की पूजा कर सकता है, जो मानवता के महानतम् शिक्षक हैं, जिन्होंने सबसे श्रेष्ठ सिद्धांत 'प्रेम' का पाठ पढ़ाया है। वह 'काली' का पुजारी भी हो सकता है, जो ऐसी देवी है जिसकी खून की प्यास बुझाने के लिए रोज एक पशु की बलि देनी पड़ती है, वह राम के मंदिर का पुजारी भी होगा, जो 'क्षत्रिय' भगवान है। वह परशुराम के मंदिर का पुजारी भी हो सकता है जो ऐसा भगवान है, जिसने क्षत्रियों का नाश करने के लिए अवतार लिया था। वह ब्रह्मा का पुजारी भी हो सकता है, जिसने संसार की रचना की है। वह पीर का पुजारी भी हो सकता है, जिसका भगवान अल्ला संसार के ऊपर ब्रह्मा का आध्यात्मिक प्रभुत्व का दावा बरदाश्त नहीं करेगा। कोई यह नहीं कह सकता कि जीवन का यह चित्र सही नहीं है। अगर यह सही चित्र है तो कोई नहीं जानता कि उन देवताओं और देवियों के प्रति भक्ति को धारण करने के बारे में क्या कहा जाए कि उनके लक्षण इतने विरोधात्मक हैं कि कोई ईमानदार व्यक्ति उन सभी का भक्त नहीं हो सकता । हिन्दू लोग इस असाधारण तथ्य को अपने धर्म का महानतम सदगुण मानते हैं जैसे कि इनकी उदारता, इनकी सहनशीलता की भावना । इस सहज दृष्टिकोंण के विपरीत कहा जा सकता है कि सहनशीलता और उदारता वास्तव में उदासीन या शिथिल सिद्धांत निरपेक्षता के अलावा और अधिक प्रशंसनीय नहीं हैं। इन दो प्रवृत्तियों में बाहरी तौर पर भेद करना मुश्किल है। लेकिन अत्यावश्यक रूप से वास्तविक गुणों में ये इतने अधिक भिन्न हैं कि गहराई से जांच करने वाला एक-दूसरे को एक जैसा मानने की गलती नहीं कर सकता। यह कि एक व्यक्ति जो बहुत सारे देवी-देवताओं का सम्मान करता है, उसे सहनशीलता की भावना का सबूत माना जा सकता है, लेकिन क्या यह समय के साथ चलने की इच्छा से पैदा हुए पाखंड का सबूत नहीं है? मेरी पक्की धारणा है कि यह केवल पाखंड है। अगर यह दृष्टिकोण अच्छे आधार पर स्थापित है तो कोई पूछ सकता है कि उस व्यक्ति के पास कौन सा आध्यात्मिक खजाना है, जो किसी भी देवी-देवता की पूजा और आराधना करने के लिए तैयार है? न केवल ऐसा व्यक्ति आध्यात्मिक खजाने से दिवालिया हो गया है, बल्कि पुजारी के महान पेशे को बिना अस्था और बिना विश्वास के इसलिए अपनाता है, क्योंकि साधारणतः वह पैतृक पेशा है, जो एक मशीनी प्रक्रिया के अंतर्गत पीढ़ी दर पीढ़ी अपनाया गया है। एक सदगुणों का संरक्षण नहीं है, यह वास्तव में एक महान पेशे का दुरुपयोग है, जो धर्म की सेवा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

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     महात्मा इस सिद्धांत से क्यों चिपके हुए हैं कि हर व्यक्ति को अपना पैतृक पेशा अपनाना चाहिए। उन्होंने इसका कारण कहीं नहीं बतलाया है। लेकिन कोई कारण तो होना चाहिए. यद्यपि उन्हें खुले आम कहने की चिंता नहीं है। वर्षों पहले उन्होंने अपने समाचार पत्र 'यंग इंडिया' में जाति बनाम वर्ग विषय पर लिखते हुए कहा था कि जाति-व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था से बेहतर है, क्योंकि जाति द्वारा समाज में स्थिरता लाने के लिए सबसे उत्तम और संभव सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। यदि यही कारण है कि महात्मा इस विचार से चिपके हुए हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को पैतृक पेशा ही अपनाना चाहिए तो वे सामाजिक जीवन के मिथ्या विचार से चिपके हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक स्थिरता चाहता है और व्यक्तियों और वर्गों के संबंधों में कुछ सामंजस्य स्थापित होना ही चाहिए, जिससे समाज में स्थिरता कायम हो सके। मेरा विश्वास है कि दो बातें कोई भी नहीं चाहता है। पहली बात जो कोई नहीं चाहता वह है निश्चल संबंध, कुछ ऐसा जिसे बदला न जा सके, कुछ ऐसा जो सार्वकालिक रूप से स्थिर रहे । स्थायित्व भी जरूरी है, लेकिन वह बदलाव की कीमत पर नहीं होना चाहिए, क्योंकि बदलाव अवश्यंभावी है। दूसरी बात जो कोई नहीं चाहता, वह है केवल सामंजस्य सामंजस्य की भी आवश्यकता है, लेकिन वह सामाजिक न्याय की बलि देकर नहीं किया जाना चाहिए। क्या यह कहा जा सकता है कि जाति के आधार पर सामंजस्य अर्थात् अपने पैतृक व्यवसाय के आधार पर सामंजस्य होने से इन दो बुराइयों से बचना संभव है? मैं मानता हूं कि ऐसा नहीं है। मुझे कोई संदेह नहीं है कि सबसे अच्छे संभव सामंजस्य की बात तो दूर, यह सबसे खराब प्रकार का सामंजस्य है, क्योंकि यह सामाजिक सामंजस्य के दोनों सिद्धांतों जैसे धारा प्रवाहिकता और समानता का उल्लंघन करता है।

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