जातिप्रथा और उन्मूलन
jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar
परिशिष्ट II
डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा महात्मा को उत्तर
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मैं महात्मा का बड़ा आभारी हूं कि उन्होंने जाति पर जातपांत तोड़क मंडल के लिए लिखे गए मेरे भाषण पर अपने समाचार पत्र 'हरिजन' में विचार व्यक्त करके मुझे सम्मानित किया है। मेरे भाषण के पुनरावलोकन के परिशीलन से पता चलता है कि महात्मा मेरे जाति पर व्यक्त किए गए विचारों से पूरी तरह असहमत हैं। मैं अपने विरोधियों के वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहता हूं, जब तक अन्यथा कार्यवाही करने के विशेष कारण मुझे मजबूर न करें। यदि मेरा विरोधी क्षुद्र और अज्ञात व्यक्ति होता तो मैं उसके पीछे नहीं पड़ता। लेकिन मेरे विरोधी महात्मा स्वयं हैं, इसलिए मैं महसूस करता हूं कि मुझे उन मुद्दों पर प्रत्युत्तर देने का प्रयास अवश्य करना चाहिए, जो उन्होंने उठाए हैं। यद्यपि मैं आभारी हूं, उन्होंने मेरा सम्मान किया है, मुझे इस बात पर आश्चर्य है कि महात्मा ने मुझ पर आरोप लगाया है कि भाषण न देने के बाद भी भाषण इसलिए प्रकाशित किया है कि मेरा प्रचार हो और लोग मुझे 'भूल'न जाएं। महात्मा चाहे जो कहें, भाषण प्रकाशित करने का मेरा उद्देश्य केवल यह था कि हिन्दू सोचें और अपनी स्थिति को जानें। अगर मैं ऐसा कहूं कि मैं अपने प्रचार के पीछे नहीं हूं क्योंकि मेरी इच्छा और आवश्यकता से अधिक मेरी प्रसिद्धि पहले से ही है। लेकिन यदि मान भी लिया जाए कि मैंने प्रसिद्धि पाने के उद्देश्य से भाषण छापा है तो मेरे ऊपर पत्थर कौन फेंक सकता था? निश्चित रूप से वे नहीं, जो महात्मा की तरह कांच के मकान में रहते हैं ।
प्रयोजन के अलावा, भाषण में उठाए गए प्रश्न के बारे में महात्मा को क्या कहना है ? पहली बात यह है कि जो भी मेरा भाषण पढ़ेगा, उसे अहसास होगा कि महात्मा ने मेरे द्वारा उठाए गए मुद्दों को पूरी तरह छोड़ दिया है और उन्होंने जो मुद्दे उठाए हैं, वे मुद्दे उस भाषण से उत्पन्न नहीं होते, जिसे उन्होंने हिन्दुओं के लिए मेरा अभियोग पत्र बताने में प्रसन्नता अनुभव की है। प्रमुख मुद्दे जिन्हें मैंने अपने भाषण में उठाए हैं, उनको निम्नलिखित रूप में सूचीबद्ध किया जा सकता है।
(1) यह कि जातपांत ने हिन्दुओं को बरबाद किया है।
(2) यह कि हिन्दू समाज को चातुर्वर्ण्य के आधार पर पुनर्गठित करना असंभव है, क्योंकि वर्ण-व्यवस्था रिसते हुए एक बर्तन की तरह है या उस आदमी की तरह है, जो नाक की सीध में दौड़ रहा है। यह अपने गुणों के कारण अपने को कायम रखने में अक्षम है तथा इसमें जाति-व्यवस्था के रूप में विकृत हो जाने की प्रवृत्ति अंतर्निहित है जब कि वर्ण का उल्लंघन करने पर कानूनी रोक नहीं लगती।
(3) यह कि चातुर्वर्ण्य के आधार पर हिन्दू समाज को पुनर्गठित करना हानिकारक है, क्योंकि वर्ण-व्यवस्था ज्ञात प्राप्त करने के अवसर से वंचित कर लोगों को निम्न कोटि बनाती है तथा अस्त्र धारण करने से वंचित कर उन्हें दुर्बल बनाती है।
(4) यह कि हिन्दू समाज को ऐसे धर्म के आधार पर पुनर्गठित करना चाहिए, जिसमें स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व के सिद्धांत को मान्यता दी जाए।
(5) यह कि इस लक्ष्य को पाने के लिए जाति और वर्ण के पीछे धार्मिक पवित्रता की भावना को नष्ट किया जाना चाहिए।
( 6 ) यह कि जाति और वर्ण की पवित्रता केवल तभी नष्ट हो सकती है, जब शास्त्रों की दिव्य सत्ता को अलग कर दिया जाए।
ऐसा देखा गया कि महात्मा द्वारा उठाए गए प्रश्न मुद्दे से बिल्कुल अलग हैं, जिससे भाषण के मुख्य तर्क उसमें खो गए थे।
3
मैं महात्मा द्वारा उठाए गए प्रश्न के सार को जांचना चाहूंगा। महात्मा ने पहला प्रश्न उठाया है कि मेरे द्वारा उद्धृत उदाहरण प्रामाणिक नहीं हैं। मैं स्वीकार करता हूं कि मैं इस विषय का विशेषज्ञ नहीं हूं। लेकिन मैं कहना चाहूंगा कि जो उदाहरण मैंने उद्धृत किए हैं, वे श्री तिलक के लेखों से लिए गए हैं, जो संस्कृत भाषा और हिन्दू शास्त्रों के जाने- माने विद्वान थे। उन्होंने दूसरी बात यह कही है कि शास्त्र की व्याख्या विद्वानों द्वारा नहीं, बल्कि संतों द्वारा की जानी चाहिए और जैसा संतों ने समझा है कि शास्त्र जातपांत और छुआछूत का समर्थन नहीं करते हैं। पहले प्रश्न के बारे में, मैं महात्मा से पूछना चाहता हूं कि इससे किसी को क्या लाभ या हानि होगी यदि गद्यांश अंतर्वेशित है और संतों द्वारा उनकी व्याख्या अलग-अलग की गई है। आम लोग असली मूलपाठ और अंतर्वेशित मूलपाठ में अंतर नहीं कर पाते हैं। आम लोग यह भी नहीं जानते कि शास्त्रों के मूलपाठ क्या है। वे इतने अनपढ़ हैं कि शास्त्रों में क्या लिखा है, यह भी नहीं जानते। जो उनसे कहा जाता है, वे उसी पर विश्वास कर लेते हैं, और उनसे कहा गया है कि शास्त्रों में जातपांत और छुआछूत की प्रथा को धार्मिक कर्तव्य माना गया है।

जहां तक संतों का प्रश्न है तो मानना पड़ेगा कि विद्वान लोगों की तुलना में संतों के उपदेश कितने ही अलग और उच्च हों, वे शोचनीय रूप से निष्प्रभावी रहे हैं। वे निष्प्रभावी दो कारणों से रहे हैं। पहला, किसी भी संत ने जाति-व्यवस्था पर कभी भी हमला नहीं किया। इसके विपरीत वे जातपांत की व्यवस्था के पक्के विश्वासी रहे हैं। उनमें से अधिकतर उसी जाति के होकर जिए और मरे जिस जाति के वे थे। ज्ञानदेव ब्राह्मण के रूप में अपनी प्रतिष्ठा से इतने उत्कट रूप से जुड़े हुए थे कि जब ब्राह्मणों ने उन्हें समाज में बने रहने से इन्कार कर दिया, तो उन्होंने ब्राह्मणों के पद की मान्यता पाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया था और संत एकनाथ जो अछूतों को छूने तथा उनके साथ भोजन करने का साहस दिखाने के लिए धर्मात्मा बने हुए हैं, उन्होंने ऐसा इसलिए नहीं किया कि वे जातपांत और छुआछूत के विरुद्ध थे, जब कि उनकी मान्यता यह थी कि प्रदूषण को पवित्र गंगा नदी (अंत्याजाचा विटाल ज्यासी । गंगास्नाने शुद्धत्व न्यासी। 'एकनाथी भागवत, अ.28, ओ 191) में स्नान कर धोया जा सकता है। जहां तक मेरा अध्ययन है किसी भी संत ने जातपांत और छुआछूत के विरुद्ध कोई अभियान नहीं चलाया। मनुष्यों के बीच चल रहे संघर्ष से वे चिंतित नहीं थे। वे मनुष्य और ईश्वर के बीच संबंध के लिए ही चिंतित थे। उन्होंने यह शिक्षा नहीं दी थी कि सारे मनुष्य बराबर हैं। यह एक बहुत अलग और बहुत अहानिकर प्रस्ताव है, जिसकी शिक्षा देने में किसी को काई परेशानी नहीं होगी या जिसके मानने में कोई खतरा नहीं है। दूसरा कारण यह है कि संतों की शिक्षा प्रभावहीन रही है, क्योंकि लोगों को पढ़ाया गया है कि संत जाति का बंधन तोड़ सकते हैं, लेकिन आम आदमी ये बंधन नहीं तोड़ सकता। इसलिए संत अनुसरण करने का उदाहरण नहीं बने। वह सम्मान योग्य धर्मपरायण व्यक्ति बने रहे। लोग जाति और छुआछूत में पक्का विश्वास करते हैं। यह दर्शाता है कि शास्त्रों की शिक्षाओं के विरुद्ध धर्मपरायण जीवन तथा आदर्शपूर्ण उपदेशों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। इस प्रकार इस बात से कोई सांत्वना नहीं मिलती कि संत थे या एक महात्मा है, जो शास्त्रों को थोड़े से विद्वानों और कई अज्ञानियों से अलग तरीके से समझते हैं। यह कि आम लोग शास्त्रों के बारे में गलत विचार रखते हैं, उसी तथ्य को ही ध्यान में रखना चाहिए और उसी को ध्यान में रखना पड़ेगा। शास्त्रों की सत्ता को समाप्त किए बिना और कैसा व्यवहार किया जाए, जो आज भी लोगों के आचरण को संचालित करते हैं, इस प्रश्न पर महात्मा ने विचार नहीं किया है। लेकिन शास्त्रों की जकड़ से मुक्त कराने की जो भी प्रभावशाली योजना महात्मा बताएं, उन्हें यह मानना चाहिए कि किसी संत के धर्मपरायण जीवन से यह स्वयं ऊंचे उठ सकते हैं लेकिन आम आदमी की संत और महात्माओं के प्रति यही मनोवृत्ति है कि वे उनका सम्मान करते हैं, लेकिन अनुसरण नहीं करते। इससे कोई कुछ अधिक नहीं कर सकता।
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तीसरा प्रश्न महात्मा ने उठाया है कि चैतन्य, ज्ञानदेव, तुकाराम, तिरुवल्लूवर, रामकृष्ण परमहंस इत्यादि द्वारा ज्ञापित धर्म गुण रहित नहीं हो सकता, जैसा कि मैंने बताया है, और यह कि किसी भी धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं, बल्कि सबसे अच्छे परिणाम से परखना होगा। मैं इस वक्तव्य के प्रत्येक शब्द से सहमत हूं। लेकिन मैं बिल्कुल नहीं समझ पाया कि महात्मा इससे क्या सिद्ध करना चाहते हैं । यह सत्य है कि धर्म को सबसे खराब नमूने से नहीं, बल्कि सबसे अच्छे से परखना चाहिए, लेकिन क्या मामला यहीं समाप्त हो जाता है? मैं कहता हूं-नहीं। प्रश्न अभी भी उठता है कि सबसे खराब इतने अधिक क्यों हैं और सबसे अच्छे इतने थोड़े से क्यों? मेरे दिमाग से इसके दो कल्पनीय उत्तर हैं: (1) कुछ अपने मूल दुराग्रह के कारण सबसे खराब हैं, जो नैतिक रूप से शिक्षणीय नहीं हैं, इसलिए धर्म के आदर्श के दूर-दूर तक पहुंचने में अक्षम हैं, या (2) धर्म का आदर्श पूरी तरह गलत आदर्श है, जिसने अधिकतर लोगों के जीवन में गलत नैतिक मोड़ दिया है और गलत आदर्श के बावजूद सबसे अच्छे लोग बने रहे वास्तव में गलत मोड को सही दिशा की ओर मोड़ दिया है। इन दो स्पष्टीकरणों में से मैं पहले को मानने के लिए तैयार नहीं हूं और मुझे विश्वास है कि महात्मा भी इसके विपरीत जाने को जोर नहीं देंगे। मेरे विचार में दूसरा स्पष्टीकरण ही तर्कपूर्ण और उचित हैं, जब तक कि महात्मा के पास कोई तीसरा विकल्प यह समझाने के लिए न हो कि सबसे खराब इतने अधिक क्यों हैं और सबसे अच्छे इतने थोड़े से क्यों हैं। यदि दूसरा स्पष्टीकरण ही एकमात्र स्पष्टीकरण है, तब स्पष्ट रूप से महात्मा का यह कथन कि धर्म की परख उससे सबसे अच्छे मानने वालों से होती है, हमको कहीं नहीं ले जाता है, सिवाय इसके कि उन बहुत से लोगों पर दया आती है जो गलत हो गए हैं, क्योंकि वे गलत आदर्शों की पूजा करने को बाध्य हैं।
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महात्मा ने तर्क दिया है कि यदि संतों के उदाहरण को अपनाएं तो हिन्दू धर्म सहनीय हो जाएगा। * महात्मा का यह तर्क भी अन्य कारण से गलत सिद्ध होता है। चैतन्य जैसे सुविख्यात संत का नाम लेकर मोटे और सबसे सरल तरीके से महात्मा सुझाव देना चाहते हैं कि ढांचे में मूलभूत परिवर्तन किए बिना हिन्दू समाज सहनीय और खुशहाल हो सकता है, यदि बड़ी जाति के हिन्दुओं को इस बात के लिए राजी किया जाए कि वे छोटी जाति के हिन्दू से व्यवहार करते समय उच्च स्तर की नैतिकता अपनाएंगे। मैं इस विचारधारा का | पूरी तरह विरोधी हूं। मैं उस बड़ी जाति के हिन्दू का सम्मान करता हूं, जो अपने जीवन में उच्च सामाजिक आदर्श अपनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे लोगों के बिना भारत में रहना आज से भी अधिक भद्दा और कम खुशहाल होगा। फिर भी, जो इस बात पर निर्भर हैं कि वह बड़ी जाति के हिन्दू को एक अच्छा इंसान बनाएंगे तथा व्यक्ति चरित्र सुधारेंगे, वह मेरे विचार से अपनी शक्ति बरबाद कर रहा है और एक भ्रम पाले हुए है। क्या व्यक्तिगत चरित्र शस्त्र बनाने वाले को एक अच्छा आदमी बना सकता है, अर्थात् जो आदमी गोला बेचता हो, वह ऐसा गोला बनाए जो न फटे और गैस जहर न फैलाएं? अगर ऐसा नहीं हो सकता तो आप कैसे मान सकते हैं कि जाति की चेतना से भरा व्यक्ति अपने व्यक्तिगत चरित्र के कारण अच्छा व्यक्ति हो सकता है, अर्थात् वह व्यक्ति अपने साथियों के साथ मित्रता तथा समान व्यवहार कैसे करेगा? सच बात यह है कि वह अपने साथियों को जाति के आधार पर ऊंच और नीच मानेगा, किसी भी हालत में वह अपनी जाति वालों से जैसा बर्ताव करेगा, वैसा दूसरों से नहीं करेगा। उससे यह आशा नहीं की जा सकती है कि वह अपने साथियों के साथ रिस्तेदारों जैसा बर्ताव करेगा और उन्हें समान मानेगा। सच बात तो यह है कि हिन्दू अपनी जाति के बाहर वाले व्यक्ति को पराया मानता है, उसके साथ भेदभाव करके भी दंड मुक्त रह सकता है और बिना शर्म किए उसके साथ धोखा कर सकता है या दाव पेंच खेल सकता है। कहने का मतलब है कि बेहतर और बदतर हिन्दू मिल सकता है। लेकिन एक अच्छा हिन्दू नहीं मिल सकता। ऐसा इसलिए नहीं है। कि उसके व्यक्तिगत चरित्र में कोई कमी है। असल में, अपने साथियों के साथ उसके संबंधों का आधार ही गलत है। सबसे अच्छा आदमी भी सदाचारी नहीं माना जा सकता, अगर उसका उसके साथियों के साथ संबंधों का आधार ही मूलभूत रूप से गलत है। एक गुलाम के लिए उसका मालिक बेहतर या बदतर हो सकता है। लेकिन मालिक अच्छा नहीं हो सकता। अच्छा आदमी मालिक नहीं हो सकता और मालिक अच्छा आदमी नहीं हो सकता। यही ऊंची जाति और नीची जाति के संबंधों के बीच लागू होता है। अन्य ऊंची जातियों के लोगों की तुलना में नीची जाति के व्यक्ति के लिए ऊंची जाति का आदमी बेहतर या बदतर हो सकता है। ऊंची जाति का व्यक्ति अच्छा नहीं हो सकता, जब तक उसके पास ऊंची जाति का भेद करने के लिए छोटी जाति मौजूद है। छोटी जाति के लिए यह अच्छा नहीं है कि उसकी चेतना में यह बात बैठी है कि उसके ऊपर बड़ी जाति है। मैंने अपने भाषण में दलील दी थी कि वर्ण और जाति पर आधारित समाज एक ऐसा समाज है जो गलत संबंधों पर आधारित है। मैंने आशा की थी कि महात्मा मेरी दलीलों को नष्ट कर देंगे। लेकिन ऐसा करने की बजाए उन्होंने पृष्ठभूमि बताए बिना केवल चातुर्वर्ण्य में अपना विश्वास दोहराया है।
* इस संबंध में श्री एच. एन. बेल्सफोर द्वारा लिखित भव्य लेख मोरालिटी एंड द सोशल स्ट्रकचर (नैतिकता एवं सामाजिक संरचना) देखें, जो अप्रैल, 1936 के 'आर्य पथ' में प्रकाशित हुआ है।