मुख्य मजकूराकडे जा

जातिप्रथा और उन्मूलन

jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar

Page 21 of 21
03 मे 2023
Book
5,,7,1,3,,

9

     कुछ लोग सोचते हैं कि महात्मा ने बहुत प्रगति की है, क्योंकि वह अब केवल वर्ण में विश्वास करते हैं और जाति में विश्वास नहीं करते हैं। यह भी सत्य है कि एक समय था, जब महात्मा पूर्णरूप से कुलीन सनातनी हिन्दू थे। वह वेदों, उपनिषदों, पुराणों और जो भी हिन्दू ग्रंथ हैं, उनमें विश्वास करते थे। इसीलिए अवतारों और पुनर्जन्म में भी विश्वास करते थे। वह जाति में विश्वास करते थे और पूरी शक्ति से एक रूढ़िवादी की तरह इसका समर्थन करते थे। उन्होंने सहभोज, सहपान और अंतर्जातीय विवाह की मांग की निंदा की थी और कहा था कि सहभोज का विरोध करना चाहिए, क्योंकि इससे बहुत हद0तक “इच्छा शक्ति पैदा करने और सामाजिक शुद्धता बनाए रखने में मदद मिलती है। " यह अच्छी बात है कि उन्होंने पाखंडपूर्ण मूर्खता का परित्याग कर दिया है और स्वीकार किया है कि “जातपांत आध्यात्मिक और राष्ट्रीय विकास, दोनों के लिए हानिप्रद है" और हो सकता है कि उनके पुत्र का जाति के बाहर विवाह इन्हीं विचारों के परिवर्तन की देन है। लेकिन क्या महात्मा ने वास्तव में प्रगति की है? वर्ण की प्रकृति क्या है, जिसे महात्मा मानते हैं। क्या वह यही वेदों की धारणा है, जिसे दयानंद सरस्वती और उनके अनुयायियों, आर्यसमाजियों ने प्रतिपादित किया है? वेद में वर्ण की धारणा का सारांश यह है कि व्यक्ति वह पेशा अपनाए, जो उसकी स्वाभाविक योग्यता के लिए उपयुक्त हो । महात्मा की वर्ण की धारणा का सार यह है कि व्यक्ति पैतृक पेशा ही अपनाए चाहे वह उसकी स्वाभाविक योग्यता के अनुरूप हो या न हो। जाति और वर्ण में क्या अंतर है, जो महात्मा ने समझा है। मैं कोई अंतर नहीं पाता हूं। जो परिभाषा महात्मा ने दी है उसमें मैं कोई अंतर नहीं पाता हूं। जो परिभाषा महात्मा ने दी है उसके अनुसार तो वर्ण ही जाति का दूसरा नाम है, इसका सीधा कारण यह है कि दोनों का सार एक है- अर्थात् पैतृक पेशा अपनाना, प्रगति करना तो दूर, महात्मा ने अवनति की है। वर्ण की वैदिक धारणा की व्याख्या करके उन्होंने जो उत्कृष्ट था उसे वास्तव में उपहासप्रद बना दिया है। यद्यपि मैं वैदिक वर्ण-व्यवस्था को अस्वीकार करता हूं जिसका कारण मैंने अपने भाषण में बताया है। लेकिन मैं मानता हूं कि स्वामी दयानंद व कुछ अन्य लोगों ने वर्ण के वैदिक सिद्धांत की जो व्याख्या की है, बुद्धिमत्तापूर्ण है और घृणास्पद नहीं है। मैं यह व्याख्या नहीं मानता है कि जन्म किसी व्यक्ति का समाज में स्थान निश्चित करने का निर्धारक तत्व हो । वह केवल योग्यता को मान्यता देती है। वर्ण के बारे में महात्मा के विचार न केवल वैदिक वर्ण को मुर्खतापूर्ण बनाते हैं, बल्कि घृणास्पद भी बनाते हैं। वर्ण और जाति, दो अलग-अलग धारणाएं हैं। वर्ण इस सिद्धांत पर टिका हुआ है कि प्रत्येक को उसकी योग्यता के अनुसार, जब कि जाति का सिद्धांत है कि प्रत्येक को उसके जन्म के अनुसार दोनों में इतना ही अंतर है, जिता खड़िया और पनीर में वास्तव में दोनो विपरीत हैं। अगर महात्मा विश्वास करते हैं, जो वह अवश्य करते हैं, कि प्रत्येक को अपना पैतृक पेशा अपनाना चाहिए, तो निश्चित रूप से जातपांत की वकालत कर रहे हैं तथा इसको वर्ण-व्यवस्था बताकर न केवल परिभाषिक झूठ बोल रहे है।, बल्कि बदतर और हैरान करने वाली भ्रांति फैला रहे हैं। मेरा मानना है कि सारी भ्रांति इस कारण से है कि महात्मा की धारणा निश्चित और स्पष्ट नहीं है कि वर्ण क्या है और जाति क्या है तथा हिन्दूवाद के संरक्षण के लिए इसमें से किसकी जरूरत है। उन्होंने कहा है और वह आशा करते हैं कि वह अपने विचार बदलने के लिए कोई रहस्यवादी कारण नहीं ढूंढेंगे कि जाति हिन्दू धर्म का सार नहीं है। क्या वे वर्ण को हिन्दू धर्म का सार मानते हैं? अभी भी कोई सुनिश्चित उत्तर नहीं दे सकता है। उनका लेख 'डॉ. अम्बेडकर का अभ्यारोपण' पढ़ने वाले भी कहेंगे, 'नहीं'। अपने लेख में वह नहीं बताते कि वर्ण का धर्म सिद्धांत हिन्दूवादी पंथ का एक आवश्यक हिस्सा है। वर्ण को हिन्दू धर्म का सार बताने की बजाए, वह कहते हैं कि "हिन्दू धर्म का सार इस कथन में निहित है कि एक ओर केवल एक सत्य ही ईश्वर है और अहिंसा मानव परिवार का एक कानून इसकी सुस्पष्ट स्वीकृति है।" लेकिन श्री संत राम के पत्र के उत्तर में लिखे लेख के पढ़ने वाले 'हां' कहेंगे। उस लेख में उन्होंने कहा है कि एक मुसलमान कैसे मुसलमान रह सकता है यदि वह कुरान को अस्वीकार करता है, या एक ईसाई कैसे ईसाई रह सकता है यदि वह बाइबल को अस्वीकार करता है? यदि जाति और वर्ण विनिमय शब्द है और यदि वर्ण शास्त्रों का अंगभूत भाग है जो हिन्दू धर्म को परिभाषित करता है, तो मैं नहीं जानता कि जाति, अर्थात् वर्ण को अस्वीकार करने वाला अपने आपको हिन्दू कैसे कहलवा सकता है।" फिर यह छलकपट क्यों? महात्मा हिचकिचा क्यों रहे हैं? वह किसको प्रसन्न करना चाहते हैं? क्या संत सत्य का अर्थ समझने में असफल हो गए हैं? या क्या राजनीतिज्ञ संत के रास्ते में रोड़ा बन रहे हैं, महात्मा की भ्रांति का वास्तविक कारण क्या इन दो साधनों से पता लगाया जा सकता है? पहला है, महात्मा का स्वभाव। वह प्रत्येक बात में बच्चे जैसी सरलता और बच्चे जैसा स्वयं को धोखा देने वाला स्वभाव रखते हैं। बच्चे की तरह वह किसी भी बात में जिसे वह चाहते हैं, विश्वास करने लगते हैं। इसलिए हमें प्रतीक्षा करनी चाहिए कि उन्होंने जिस तरह जाति में विश्वास करना छोड़ दिया है, उसी तरह वे वर्ण में विश्वास करना छोड़ देंगे। दूसरा साधन उनकी महात्मा और राजनीतिज्ञ की दोहरी भूमिका है। महात्मा के रूप में वह शायद राजनीति का आध्यात्मीकरण करने को कोशिश कर रहे हैं। इसमें वह सफल हुए हों या न हुए हों, राजनीति ने उनका व्यापारीकरण कर दिया है।

     राजनीतिज्ञ को यह जानना जरूरी है कि समाज पूर्ण सत्य को सहन नहीं कर सकता और उन्हें पूर्ण सत्य नहीं बोलना चाहिए। अगर वह पूर्ण सत्य बोल रहे हैं तो यह उनकी राजनीति के लिए खराब होगा। महात्मा जाति और वर्ण का समर्थन हमेशा क्यों कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यदि उन्होंने इसका विरोध किया तो वे राजनीति में अपना स्थान खो देंगे। उनकी भ्रांति का कोई भी कारण हो, महात्मा को यह कह दिया जाना चाहिए कि वह अपने आपको धोखा दे रहे हैं तथा वर्ण के नाम पर जाति को उपदेश देकर लोगों को धोखा दे रहे हैं।

Reply to the Mahatma by Dr. Bhimrao Ambedkar

10

     महात्मा कहते हैं कि हिन्दू और हिन्दू धर्म की जांच करने के लिए जो मानक मैंने अपनाए हैं, उन मानकों के आधार पर प्रत्येक वर्तमान धर्म शायद असफल हो जाएगा। यह शिकायत हो सकती है कि मेरे मानक ऊंचे हैं और यह सच हो सकता है। लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि ये मानक ऊंचे हैं या नीचे हैं। प्रश्न यह है कि यह मानक लागू करने के लिए उचित हैं। या नहीं। किसी अन्य मानक को कोई अर्थ नहीं है, अगर यह माना जाए कि धर्म आवश्यक रूप से लोगों के कल्याण के लिए होता है। अब मैं कहता हूं कि हिन्दू तथा हिन्दू धर्म को जांचने के लिए जो मानक मैंने लागू किए हैं, वे सबसे अधिक उपयुक्त हैं और इससे बेहतर मानक नहीं जानता हूं। यह निष्कर्ष सत्य हो सकता है कि यदि मेरे मानक लागू किए जाएं, तो प्रत्येक वर्तमान धर्म असफल हो जाएगा। लेकिन यह तथ्य हिन्दू और हिन्दू धर्म के हिमायती महात्मा को दिलासा या और अधिक आधार नहीं देता कि एक पागल आदमी के होने से दूसरे पागल आदमी को दिलासा हो या एक अपराधी के होने से दूसरे अपराधी को दिलासा हो। मैं महात्मा को आश्वासन देना चाहता हूं कि यह केवल हिन्दू और हिन्दू धर्म की असफलता नहीं है, जिसने मेरे मन में घृणा और अवमानना की भावना भर दी है, जिसका मुझ पर आरोप लगाया गया है। मैं मानता हूं कि यह दुयिा एक अपूर्ण दुनिया है और जो भी इसमें जीना चाहता है, उसे अपूर्णता को सहन करना चाहिए । लेकिन जब कि मैं समाज की अपूर्णता तथा कमियों में जीने के लिए तैयार हूं, जिसमें मुझे कठिनाई से आगे बढ़ना मेरी नियति है तो मैं महसूस करता हूं कि उस समाज में जीने के लिए मैं सहमत नहीं हूं जो गलत आदर्शों को संजोए रखता है या एक ऐसा समाज जिसके आदर्श सही हैं, परंतु वह अपने सामाजिक जीवन को उन आदर्शों के अनुरूप ढालना नहीं चाहता है। अगर मुझे हिन्दू और हिन्दू धर्म से ऊब पैदा होती है तो यह इसलिए है, क्योंकि मुझे विश्वास है कि वे गलत सिद्धांतों और गलत सामाजिक जीवन का पोषण करते हैं। हिन्दू और हिन्दू धर्म से मेरा झगड़ा उनके सामाजिक आचरण की अपूर्णता से नहीं है। यह बहुत अधिक मौलिक है। यह झगड़ा उनके सिद्धांतों से है।

11

     मुझे प्रतीत होता है कि हिन्दू समाज को नैतिक पुनरुद्वार की आवश्यकता है, जिसे विलंबित करना खतरनाक होगा। प्रश्न यह है कि इस नैतिक पुनरुद्वार को कौन निर्धारित और नियंत्रित कर सकता है? स्पष्ट रूप से वे लोग जो अपना बौद्धिक पुनरुद्वार कर चुके हैं और वे जो इतने ईमानदार हैं कि बौद्धिक उद्धार से पैदा हुए दृढ़ विश्वास को दिखाने का साहस जिनके पास है। इस मानक से जांचने से पता चलता है कि माने हुए हिन्दू नेता, मेरे विचार से इस कार्य के लिए बिल्कुल अयोग्य है। यह कहना असंभव है कि वे प्रारंभिक रूप से भी बौद्धिक पुनरुद्वार कर चुके हैं। अगर उन्होंने अपना बौद्धिक पुनरुद्धार कर लिया है तो वे न तो अशिक्षित बहुसंख्या की तरह अपने आपको धोखा देंगे और न ही वे आदिम अज्ञान का फायदा ही उठाएंगे, जैसा कि आजकल देखा जाता है। टुकड़े-टुकड़े होते हिन्दू समाज के बावजूद भी ये नेतागण निर्लज्जता से पुराने सिद्धांतों की दुहाई देंगे, जिनका हर हालत में वर्तमान से संबंध समाप्त हो चुका है; जो आरंभिक दिनों में कितने भी उपयुक्त रहे हो। वे अब मार्गदर्शक की बजाए एक चेतावनी बन चुके हैं। वे प्रारंभिक सिद्धांतों के प्रति अभी भी रहस्यपूर्ण सम्मान रखते हैं, जो उन्हें अनिच्छुक नहीं, बल्कि समाज की नींव की जांच करने का विरोधी बनाते हैं। हिन्दू लोग वास्तव में अपनी मान्यता के निर्माण में अविश्सनीय रूप से ध्यान नहीं देते। यही हाल हिन्दू नेताओं का है। बदलर बात यह है कि अब कोई उनकी संगति छुड़ाने का प्रस्ताव करता है तो वे अपनी मान्यताओं के लिए अवैध भावावेश से भर जाते हैं। महात्मा कोई अपवाद नहीं । ऐसा लगता है कि महात्मा सोचने में विश्वास नहीं करते। वह संतों का अनुसरण करने को प्राथमिकता देते हैं। एक रूढ़िवादी की तरह वे पवित्र धारणा में श्रृद्धा रखते हैं उन्हें डर है कि यदि एक बार उन्होंने सोचना शुरू किया तो कई आदर्शों और मान्यताओं का जिनसे वह चिपके हुए हैं, सत्यानाश हो जाएगा। प्रत्येक को उनसे सहानुभूमि होनी चाहिए। स्वतंत्र सोच का प्रत्येक कार्य स्पष्टतया स्थिर दुनिया के कुछ भाग को संकट में डाल देता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि संतों पर निर्भर रहकर ही हम सत्य को नहीं जान सकते। आखिर संत भी मनुष्य हैं और जैसा कि लार्ड बेलफोर ने कहा है, "सूअर की थूथनी से अधिक मनुष्य का दिमाग सत्य का पता लगाने वाला उपकरण नहीं है।" जहां तक वह सोचते हैं, मुझे वह हिन्दुओं के पुरातन ढांचे के लिए समर्थन ढूंढने हेतु बुद्धि का दुरुपयोग करते प्रतीत होते हैं। वह इसके सबसे प्रभावशाली समर्थक हैं और इसलिए हिन्दुओं के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

     महात्मा से अलग ऐसे हिन्दु नेता भी हैं, जो केवल विश्वास और अनुसरण करने से ही संतुष्ट नहीं है। वे सोचने का साहस करते हैं और अपनी सोच के परिणाम के अनुसार कार्य करते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश या तो वे बेईमान लोग हैं या जब लोगों को सही मार्गदर्शन देने का प्रश्न उठता है तो वे उदासीन बन जाते हैं। लगभग सभी ब्राह्मणों ने जाति के नियम का उल्लंघन किया है। जूते बेचने वाले ब्राह्मणों की संख्या उनसे अधिक है, जिन्होंने पुरोहिताई छोड़ दी है। उन्होंने न केवल ऐसे व्यवसाय अपना लिए हैं। जो उनके लिए शास्त्रों द्वारा वर्जित हैं। लेकिन ऐसे कितने ब्राह्मण हैं जो रोज जाति का नियम तोड़ते हैं, जो जाति और शास्त्रों के विरुद्ध उपदेश देंगे? क्योंकि उसकी मूल प्रवृत्ति और नैतिक विवेक उनकी दृढ़ धारणा का समर्थन नहीं कर सकता लेकिन ऐसे सैंकड़ों हैं जो रोज जाति को तोड़ते हैं तथा शास्त्रों को रौंदते हैं लेकिन जो जाति के सिद्धांत और शास्त्रों की पवित्रता के कट्टर समर्थक हैं। यह दोगलापन क्यों? क्योंकि वे महसूस करते हैं कि यदि जाति का जुआ लोगों ने उतार फेंका, तो ब्राह्मण वर्ण की सत्ता और सम्मान के लिए वे संकट पैदा कर देंगे। बुद्धिजीवी वर्ग की इस बेईमानी से आम लोग उनके विचारों के फल से वंचित हो जाते हैं। यह एक लज्जाजनक तथ्य है।

     मैथ्यू आरनोल्ड के शब्द हैं कि "हिन्दू दो दुनिया में विचर रहे है- एक है मृत दुनिया और दूसरी शक्ति रहित जन्म लेने वाली।" उन्हें क्या करना चाहिए ? महात्मा जिससे वे मार्गदर्शन की अपील करते हैं, वह सोचने में विश्वास नहीं करते, इसलिए मार्गदर्शन नहीं कर सकते जो अनुभव की कसौटी पर खरा उतरे। बुद्धिजीवी वर्ग जिनकी ओर लोग मार्गदर्शन के लिए निहारते हैं, वे या तो अधिक बेईमान हैं या उदासीन, इसलिए सही दिशा की ओर जाने की शिक्षा उन्हें नहीं मिल पाती है। इस त्रासदी की स्थिति में हम विलाप करते हुए कह सकते हैं - अरे हिन्दुओं, तुम्हारे नेतागण ऐसे हैं ।

Book Pages

Page 21 of 21