जातिप्रथा और उन्मूलन
jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar
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श्री संत रामजी, जातपांत तोड़क मंडल, लाहौर ने इच्छा व्यक्त की कि उनका निम्नलिखित व्यक्तव्य प्रकाशित किया जाए।
"मैंने डॉ. अम्बेडकर और जातपांत तोड़क मंडल, लाहौर के बारे में आपकी टिप्पणी पढ़ी। इस संबंध में मैं निवेदन करना चाहता हूं :
हमने डॉ. अम्बेडकर को अपने सम्मेलन की अध्यक्षता करने के लिए नहीं बुलाया क्योंकि वे दलित वर्ग के हैं, चूंकि हम लोग छूत और अछूत में भेद नहीं करते हैं। इसके विपरीत हमने डॉ. अम्बेडकर का चुनाव इसलिए किया कि हिन्दू समाज की गंभीर बीमारी का निदान उनका और हमारा एक जैसा है, अर्थात उनका भी यही मत था कि हिन्दुओं में विघटन और पतन का मूल कारण जाति-व्यवस्था है। डाक्टर की डाक्टरेट की थीसीस का विषय भी जाति-व्यवस्था था। उन्होंने इस विषय पर संपूर्ण रूप से अध्ययन किया हुआ था । हमारे सम्मेलन का उद्देश्य जाति-व्यवस्था समाप्त करने के लिए हिन्दुओं को राजी करना था, लेकिन एक गैर-हिन्दू की सामाजिक और धार्मिक मामलों में सलाह कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। डाक्टर अपने भाषण के पूरक भाग में यह बात कहने पर अड़े रहे कि हिन्दू के रूप में उनका यह अंतिम भाषण है, जो सम्मेलन के हित में अप्रासांगिक और घातक था। इसलिए हमने उनसे निवेदन किया था कि वे अपने भाषण से वह वाक्य निकाल दें, क्योंकि वही बात कहने के लिए उन्हें कोई अन्य अवसर भी मिल सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा करने से इन्कार कर दिया, ऐसी स्थिति में हमने देखा कि केवल सम्मेलन का दिखावा करने का कोई प्रयोजन नहीं था। इस सबके बावजूद उनके भाषण की मैं प्रशंसा करता हूं क्योंकि इस विषय पर यह सबसे विद्वतापूर्ण थीसिस है, जिसका अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए।" "इसके अलावा, मैं इस ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि जाति और वर्ण में जो आपने दार्शनिक अंतर बताया है, वह इतना अधिक सूक्ष्म है, जो आम आदमी की समझ में नहीं आता है, क्योंकि व्यावहारिक दृष्टि में जाति और वर्ण एक ही चीज हैं चूंकि दोनों का कृत्य एक समान है, अर्थात् अंतर्जातीय विवाह और सहभोज पर रोक। आपका वर्ण व्यवस्था का सिद्धांत वर्तमान में अव्यावहारिक है और निकट भविष्य में इसके पुनरुत्थान की कोई आशा नहीं है। केवल हिन्दू जातपांत के गुलाम हैं तथा इसे वे नष्ट नहीं करना चाहते। अतः जब आप काल्पनिक वर्ण-व्यवस्था की वकालत करते हैं तो वे जातपांत से चिपकने को न्यायसंगत पाते हैं। इस प्रकार आप वर्ण भेद की उपयोगिता से समाज सुधार को क्षति पहुंचा रहे हैं, क्योंकि इससे हमारे रास्ते में रोड़ा अटकता है। वर्ण व्यवस्था की जड़ पर हमला किए बिना छुआछूत मिटाने की कोशिश करना रोग के बाहरी लक्षणों का इलाज करने या पानी की सतह पर लकीर खींचने जैसा है। द्विज लोग हृदय के किसी कोने से भी तथाकथित छूत और अछूत शूद्रों को सामाजिक समानता नहीं देना चाहते हैं, इसलिए वे जातपांत को तोड़ने तथा छुआछूत को मिटाने में उदारता दिखाने से इन्कार करते हैं, जिसका साधारण अर्थ है कि वे इस मुद्दे से बचना चाहते हैं। छुआछूत मिटानो के लिए शास्त्रों की मदद लेने का अर्थ है, कीचड़ साफ करना।

श्री संत रामजी के पत्र का प्रथम पैराग्राफ अंतिम पैरे को रद्द करता है। यदि मंडल शास्त्रों की मदद लेना अस्वीकार करता है तो वह बिल्कुल वही कर रहा है, जो डॉ. अम्बेडकर कर रहे हैं, अर्थात् हिन्दू न बने रहने तक कैसे वह डॉ. अम्बेडकर के भाषण पर आपत्ति उठा सकते हैं, जिसमें उन्होंने कहा है कि हिन्दू के रूप में उनका यह अंतिम भाषण है? स्थिति पूरी तरह अतर्क-संगत हो जाती है, विशेष तौर पर जब मंडल के प्रवक्ता बनने का दावा करते हुए श्री संत राम डॉ. अम्बेडकर के भाषण के तर्कों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं।
यहां यह पूछना उचित है कि यदि शास्त्रों को अस्वीकार करता है तो मंडल किस बात में विश्वास रखता है। कुरान को अस्वीकार कर कोई मुसलमान कैसे बना रह सकता है और बाईबल को अस्वीकार कर कोई ईसाई कैसे बना रह सकता है? यदि जाति और वर्ण एक दूसरे के पर्याय हैं और वर्ण शास्त्रों का अंगभूत हिस्सा है, जिसमें हिन्दू धर्म की परिभाषा निहित है तो मैं नहीं समझता कि जाति अर्थात् वर्ण को अस्वीकार कर कोई हिन्दू कैसे कहला सकता है।
श्री संत राम शास्त्रों को कीचड़ मानते हैं। जहां तक मुझे याद है डॉ. अम्बेडकर ने शास्त्रों को ऐसा विलक्षण नाम नहीं दिया है। मेरा अर्थ निश्चित रूप से यही है कि यदि शास्त्र छुआछूत का समर्थन करते हैं तो मैं अपने को हिन्दू कहलाना नहीं चाहूंगा। इसी प्रकार यदि शास्त्र जातपांत का समर्थन करते हैं तो मैं अपने आपको हिन्दू कहलाना या रहना नहीं चाहूंगा, क्योंकि सहभोज और अंतर्जातीय विवाह से मुझे बिल्कुल भी संकोच नहीं है। मैं शास्त्र और उसकी व्याख्या के बारे में अपनी स्थिति को दोहराना नहीं चाहता हूं। मैं श्री संत राम को साहसिक सुझाव देना चाहता हूं कि यहीं तर्कपूर्ण, सही और नैतिक रक्षात्मक स्थिति है और हिन्दू परम्परा में इसे उचित प्रामाणिक सिद्ध करने का आधार मौजूद है।
('हरिजन' 15 अगस्त 1936)