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बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Buddha or Karl Marx – Bhimrao Ambedkar

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03 मे 2023
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लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

साधनों का मूल्य क्या है? किसके साधन अंततः श्रेष्ठ तथा स्थाई हैं?

    क्या साम्यवादी यह कह सकते हैं कि अपने मूल्यवान साध्य को प्राप्त करने में उन्होंने अन्य मूल्यवान साध्यों को नष्ट नहीं किया है? उन्होंने निजी व्यक्तिगत संपत्ति को नष्ट किया है। यह मानकर कि यह एक मूल्यवान साध्य है, क्या साम्यवादी यह कह सकते हैं कि उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया में उन्होंने अन्य मूल्यवान साध्यों को नष्ट नहीं किया है? अपने साध्य व लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उन्होंने कितने लोगों की हत्या की है? क्या मानव जीवन का कोई मूल्य नहीं है? क्या वे संपत्ति को उसके स्वामी का जीवन लिए बिना उससे नहीं ले सकते?

    तानाशाही को लीजिए। तानाशाही का साध्य व लक्ष्य क्रांति को एक स्थाई क्रांति बनाना होता है। यह एक मूल्यवान साध्य है, परंतु क्या साम्यवादी यह कह सकते हैं कि इस साध्य को उपलब्ध करने के लिए उन्होंने अन्य मूल्यवान साध्यों को नष्ट नहीं किया है? तानाशाही के बारे में यह कहा गया है कि इसमें स्वतंत्रता और संसदीय सरकार का प्रायः अभाव होता है, अर्थात दोनों व्याख्याएं पूर्णतया स्पष्ट नहीं है। स्वतंत्रता का अभाव तो संसदीय सरकार में भी होता है, क्योंकि कानून का अभिप्राय होता है, स्वतंत्रता का अभाव। इसी में तानाशाही तथा संसदीय सरकार का अंतर निहित है। संसदीय सरकार में प्रत्येक नागरिक को अपनी स्वतंत्रता पर सरकार द्वारा थोपे गए बंधनों की आलोचना करने का पूरा अधिकार होता है। संसदीय सरकार में आपके कुछ कर्तव्य तथा कुछ अधिकार होते हैं। आपका कर्तव्य है कि आप कानून का पालन करें और यह अधिकार है कि उसकी आलोचना करें। तानाशाही में आपका केवल कर्तव्य होता है कि आप कानून का पालन करें, परंतु आपको उसकी आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं होता है।

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किसके साधन अधिक प्रभावोत्पादक व अमोघ हैं

    अब हमें इस बात पर विचार करना है कि किसके साधन अधिक टिकाऊ तथा स्थाई हैं। हमें बल प्रयोग तथा नैतिक प्रवृत्ति पर आधारित सरकार के बीच चयन करना होगा।
बर्क ने कहा है कि बल प्रयोग स्थाई साधन नहीं हो सकता। अमरीका के साथ सहमति के संबंध में उसने यह अविस्मरणीय चेतावनी दी थी –

    “महोदय, पहले मुझे यह बात कहने की अनुमति दीजिए कि एकमात्र बल का प्रयोग केवल अस्थाई होता है। यह कुछ समय के लिए किसी को वश में ला सकता है, परंतु यह उसे पुनः वश में करने की आवश्यकता को समाप्त नहीं करता और किसी भी ऐसे राष्ट्र पर शासन नहीं किया जा सकता, जिस पर बार-बार विजय के लिए चढ़ाई करनी पड़े।”

    “मेरी अगली आपत्ति इसकी अनिश्चितता के संबंध में है। बल प्रयोग का परिणाम हमेशा आतंक नहीं होता और युद्ध सामग्री विजय नहीं होती। आप साधनविहीन हैं, क्योंकि समझौता असफल होने पर बल बना रहता है, परंतु यदि बल प्रयोग असफल हो जाए, तो समझौते की कोई आशा नहीं रहती। शक्ति तथा सत्ता कभी-कभी दया से भी प्राप्त की जा सकती हैं, परंतु अशक्त तथा पराजित हिंसा के द्वारा उसकी कभी भीख नहीं मांगी जा सकती।

    “बल प्रयोग के बारे में मेरी अगली आपत्ति यह है कि आप अपने लक्ष्य को अपने ही प्रयत्नों से धूल-धूसरित कर देते हैं, जो आप उसे अक्षत बनाने के लिए करते हैं। आपने जिस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पहले संघर्ष किया था, वह आपको पुनः मिल तो जाता है, लेकिन वह इस कारण तुच्छ, गलित, अपशिष्ट और छीनी हुई वस्तु सरीखा होता है।”

    बुद्ध ने भिक्षुओं को अपने एक प्रवचन में न्यायसंगत शासन तथा कानून के शासन के बीच अंतर दर्शाया है। भिक्षुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा –

    (2) बंधुओं, बहुत समय पहले स्त्रात्रय (स्ट्रांग टायर) नामक एक प्रभुसत्ता संपन्न अधिपति था। वह एक ऐसा राजा था, जो धर्मपरायणता से शासन करता था। वह पृथ्वी की चारों दिशाओं का स्वामी, विजेता तथा अपनी जनता का रक्षक था। उसके पास दिव्य चक्र था। वह समुद्र पर्यंत पृथ्वी पर परमाधिकारपूर्वक रहता था। उसने इस पर विजय प्राप्त की थी, साहस से नहीं, तलवार से नहीं, बल्कि धर्मपरायणता से।

    (3) अब बंधुओं, बहुत वर्षों के बाद, सैकड़ों वर्षों के बाद, मनु के हजार वर्षों बाद, राजा स्त्रात्रय ने किसी व्यक्ति को आदेश दिया और यह कहा कि ‘महोदय, आप यह देखें कि दिव्य चक्र थोड़ा सा धंस गया है, वह अपने स्थान से नीचे की ओर सरक गया है। इसके विषय में आप मुझे आकर बताइए।’

    सैकड़ों वर्षों के बाद वह अपने स्थान से सरक गया। इसे देखने के बाद वह व्यक्ति राजा स्त्रात्रय के पास गया और कहा, ‘महाराज, यह सच मानिए कि दिव्य चक्र धंस गया है, वह अपने स्थान से सरक गया है।’

    बंधुओ, राजा स्त्रात्रय ने अपने बड़े राजकुमार को बुलाया और उससे इस प्रकार कहा, ‘प्रिय पुत्र, देखो, मेरा दिव्य चक्र थोड़ा सा धंस गया है। वह अपने स्थान से सरक गया है। मुझे यह बताया गया है कि चक्र को घुमाने वाले राजा का दिव्य चक्र जब धंस या झुक जाएगा, वह अपने स्थान से सरक जाएगा, तब वह राजा और अधिक समय तक जीवित नहीं रहेगा। मैंने मानव जीवन के सब सुख व आनंद भोग लिए हैं, अब ईश्वरीय आनंद की खोज करने का समय है। प्रिय पुत्र, आओ, तुम महासागर से घिरी इस पृथ्वी का कार्यभार संभालो, परंतु मैं अपने सिर व दाढ़ी का मुंडन कराकर तथा पीले वस्त्र पहनकर घर को छोड़कर यहां से गृहविहीन हो जाऊंगा।’

    इस प्रकार, बंधुओं, राजा स्त्रात्रय ने उपयुक्त ढंग से अपने बड़े पुत्र को सिंहासन पर बिठा दिया। अपने सिर तथा दाढ़ी का मुंडन कराया, पीले वस्त्र पहने और वह उसी समय गृह-विहीन हो गया। जब वह राजा संन्यासी होकर चला गया, ‘तब उसके सातवें दिन दिव्य चक्र भी लुप्त हो गया।’

    (4) तब कोई व्यक्ति नए राजा के पास गया और उसे बताया, ‘महाराज, आप यह सच मानिए, दिव्य चक्र वास्तव में लुप्त हो गया है।’

    इसके बाद, बंधुओं, वह राजा इस बात को सुनकर शोक संतप्त, दुखी एवं विक्षुब्ध हो गया। वह संन्यासी राजा के पास गया और उसको यह बताया, ‘महाराज, यह सही जानिए कि दिव्य चक्र लुप्त हो गया है।’

    ‘और उस नए अभिषिक्त राजा के यह कहने पर, संन्यासी राजा ने उत्तर दिया, प्रिय पुत्र, तुम अब इस बात पर दुःखी मत हो कि दिव्य चक्र लुप्त हो गया है, और न इस बात पर विषाद करो, क्योंकि प्रिय पुत्र, दिव्य चक्र तुम्हारी कोई पैतृक संपत्ति नहीं है, परंतु, प्रिय पुत्र, चक्र प्रवर्तक बनने का प्रयत्न करो (संसार में सच्चे राजाओं ने अपने लिए जो आदर्श, कर्तव्य स्वयं निर्धारित किए हैं, तुम उन आदर्शों के अनुसार कार्य करो)। फिर हो सकता है कि अगर तुम चक्र प्रवर्तक राजा के श्रेष्ठ कर्तव्य कर रहे होंगे, तब चंद्र पर्व के दिन जब तुम स्नान कर सबसे ऊपर वाले छज्जे पर चंद्र दर्शन के लिए जाओ, तब दिव्य चक्र अपने सहस्त्रों अरो, चक्रनाभि तथा अपने संपूर्ण अवयवों के साथ पूर्ण रूप में प्रकट हो जाएगा।’

    (5) ‘किंतु महाराज, चक्र प्रवर्तक राजा का आर्य श्रेष्ठ कर्तव्य क्या है?’

    ‘प्रिय पुत्र, कर्तव्य यह है कि आदर्श, सत्य तथा धर्मपरायणता के नियम को सामने रख उसको सम्मान, सत्कार तथा आदर प्रदान कर, उसके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित कर, श्रद्धापूर्वक स्वयं आदर्श बन, आदर्श को अपना स्वामी मानकर, अपनी जनता, सेना, विद्वान वर्ग के लोगों, सेवकों तथा आश्रितों, ब्राह्मणों तथा ग्रहस्थों, नगर तथा ग्रामवासियों, धार्मिक लोगों तथा पशु-पक्षियों को सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए और उनकी अच्छी प्रकार से रखवाली तथा देख-रेख करनी चाहिए। तुम्हारे समूचे राज्य में कोई भी काम गलत व अनुचित नहीं होना चाहिए और तुम्हारे राज्य में जो भी व्यक्ति निर्धन है, उसको धन दिया जाए।

    ‘और, प्रिय पुत्र, तुम्हारे राज्य में धार्मिक व्यक्ति, स्वस्थ व्यक्ति तथा सहिष्णु व्यक्ति, और स्वार्थहीन व्यक्ति और आत्मरक्षा करने वाला व्यक्ति जब समय-समय पर तुम्हारे पास आए और वह पूछे कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है, क्या अपराध है और क्या नहीं, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, सुख-दुःख के लिए अंततोगत्वा कौन सी कार्यप्रणाली सफल होगी? जब वह उक्त प्रकार के प्रश्न करे, तब तुम्हें उसकी बात सुननी चाहिए और तुम्हें उनको बुराई व पाप से रोकना चाहिए और उनको जो अच्छे काम हैं, करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। प्रिय पुत्र, संसार के राजा का यह ही आर्य कर्तव्य है।’

    अभिषिक्त राजा ने कहा, ‘ऐसा ही होगा।’ उसने आज्ञा का पालन करते हुए राजा के श्रेष्ठ कर्तव्य का पालन किया। इस प्रकार आचरण करते हुए वह चंद्र पर्व पर, स्नान कर, अनुष्ठान करने के लिए सबसे ऊपरी धज्जे पर गया, तो दिव्य चक्र अपने सहस्त्रों अरों (स्पोक्स), चक्रनाभि तथा अपने संपूर्ण अवयवों सहित प्रकट हुआ। उसे देखकर राजा के मन में आया, ‘मुझे यह बताया गया है कि जिस राजा के सम्मुख ऐसे अवसर पर यदि दिव्य चक्र स्वयं पूर्ण रूप में प्रकट होता है, तो वह राजा चक्र प्रवर्तक प्रभुता संपन्न राजा हो जाता है। मैं भी संसार का सर्व प्रभुत्व राजा बन सकता हूँ।’

    (6) इसके बाद बंधुओं, वह राज अपने स्थान से उठा और उसने अपने एक कंधे से वस्त्र हटाकर अपने बाएं हाथ में एक घड़ा लिया और अपने दाएं हाथ से चक्र पर जल छिड़का और यह कहा, ‘हे, दिव्य चक्र आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’

    फिर बंधुओं, दिव्य चक्र पूर्व दिशा की ओर बढ़ा और इसके बाद वह चक्र प्रवर्तक राजा उसके पीछे-पीछे, उसके साथ उसकी सेना, अश्व, रथ तथा हाथी और मनुष्य गए। जिस भी स्थान पर, बंधुओं, वह चक्र रुका, उसी स्थान पर, वह राजा युद्ध में विजयी हुआ। उस राजा ने तथा उसके साथ उसकी चतुरंगिनी सेना ने वहीं अपना आवास बनाया। इसके बाद उस प्रदेश के अन्य प्रतिद्वंद्वी राजा उस चक्रवर्ती राजा के पास आए और उससे कहा, ‘आइए, हे महान राजन। आपका स्वागत है, यहां सब कुछ आपका है, हमें शिक्षा दीजिए।’

    उस चक्रवर्ती राजा एवं योद्धा ने इस प्रकार कहा, ‘आप किसी प्राणी की हत्या नहीं करेंगे, जो आपको नहीं दिया गया है, आप उसे नहीं लेंगे। आप इच्छाओं के गलत व अनुचित कार्य नहीं करेंगे। आप झूठ नहीं बोलेंगे। आप कोई मादक पेय नहीं पिएंगे। आप अपनी संपत्ति व अधिकारों का उसी प्रकार प्रयोग न करें, जैसा कि आप अभ्यस्त हैं।’

   (7) इसके बाद बंधुओं! दिव्य चक्र पूर्वी महासागर में डुबकी लगाकर बाहर निकला और फिर दक्षिण प्रदेश की ओर बढ़ा (और यहां सब कुछ उसी प्रकार, वैसा ही हुआ जैसा पूर्व प्रदेश में हुआ था)। और उसी भांति दक्षिणी महासागर में डुबकी लगाकर दिव्य चक्र पुनः बाहर निकला और पश्चिम प्रदेश की ओर आगे बढ़ा और फिर उत्तरी प्रदेश की ओर बढ़ा और वहां भी वहीं सब बातें हुई, जो दक्षिणी तथा पश्चिम प्रदेश में हुई थीं।

    इसके बाद जब दिव्य चक्र संपूर्ण पृथ्वी पर, महासागर की सीमा तक विजय पताका फहराता हुआ घूम चुका है, तो वह राजसी नगर में वापस आया और रुक गया, ताकि उसे चक्र प्रवर्तक राजा के आंतरिक कमरों में प्रवेश द्वार पर न्याय कक्ष के सामने स्थित करने के संबंध में विचार किया जा सके, जिससे वह विश्व के अधिपति, प्रभुसत्ता संपन्न राजा के आंतरिक कमरों के सामने अपने गौरव के साथ चमकता रहे।

    (8) और बंधुओं, एक दूसरा राजा भी चक्र प्रवर्तक हुआ और तीसरा और चौथा राजा और पांचवां तथा छठा और सातवां राजा एक विजेता योद्धा बहुत सालों बाद, कई सौ सालों के बाद, हजारों सालों के बाद, किसी व्यक्ति को यह कहकर आदेश देता है कि ‘यदि आपको यह दिखाई पड़े कि दिव्य चक्र नीचे धंस गया है, अपने स्थान से खिसक गया है, तो मुझे आकर बताओ।’

    ‘बहुत अच्छा, महाराज।’ उस मनुष्य ने उत्तर दिया। इस प्रकार बहुत सालों के बाद कई सौ सालों के बाद, हजारों सालों के बाद व्यक्ति ने देखा कि दिव्य चक्र धंस गया है, वह अपने स्थान से खिसक गया है, ऐसा देखकर वह वीर राजा के पास गया और उसको बताया। फिर उस राजा ने वैसा ही किया, जैसा कि स्त्रात्रय ने किया था और राजा के संन्यासी हो जाने के सातवें दिन दिव्य चक्र लुप्त हो गया।

    फिर कोई व्यक्ति राजा के पास गया और उससे जाकर कहा। वह राजा चक्र के लुप्त हो जाने पर दुखी हुआ और शोक से पीड़ित हुआ, परंतु वह राजा प्रभुसत्ता संपन्न, अधिपति के श्रेष्ठ कर्तव्य के संबंध में पूछने के लिए संन्यासी राजा के पास नहीं गया, बल्कि अपने विचार से ही, निशंक होकर जनता पर अपना शासन चलाता रहा। लोगों पर उसका शासन पहले शासन से अलग प्रकार का था। प्रभुसत्ता संपन राजा के आर्य श्रेष्ठ कर्तव्य का पालन करने वाले, पूर्ववर्ती राजाओं के शासन में वे जिस प्रकार से समृद्धिशाली थे, उस प्रकार इस राजा के शासन में समृद्ध नहीं रहे।

    फिर, बंधुओं, मंत्री तथा दरबारी, वित्त अधिकारी, रक्षक व पहरेदार, द्वारपाल तथा धार्मिक अनुष्ठान करने वाले, सभी व्यक्ति मिलकर राजा के पास आए और उससे इस प्रकार बोले, ‘हे राजन, आप अपनी जनता पर शासन अपने विचारों के अनुसार करते हैं, जो शासन-विधि से भिन्न है, जिस विधि से आपके पूर्ववर्ती राजा, आर्य (श्रेष्ठ) कर्तव्य का पालन करते हुए किया करते थे, अतः उसके इस शासन में आपकी जनता समृद्ध नहीं है। अब आपके राज्य में मंत्री तथा दरबारी, वित्त अधिकारी, रक्षा तथा अभिरक्षक एवं धार्मिक अनुष्ठान करने वाले हम दोनों तथा अन्य लोग हैं, जिन्हें प्रभुसत्ता-संपन्न राजा के आर्य (श्रेष्ठ) कर्तव्य का ज्ञान व जानकारी है। हे राजन, आप उसके संबंध में हमसे पूछिए। आपके पूछने पर हम उसे आपको बताएंगे।’

    (9) इसके बाद, बंधुओ उस राजा ने मंत्रियों तथा उन सभी शेष लोगों को एक साथ बिठाया, उनसे प्रभुसत्ता-संपन्न शूरवीर राजा के श्रेष्ठ कर्तव्य के संबंध में पूछा और उन्होंने उसे बताया। जब उसने उनकी बात सुन ली तो उसने उनको उचित सावधानी तथा निगरानी व अभिरक्षा प्रदान की, परंतु उसने दीनहीन व असहाय लोगों को धन प्रदान नहीं किया और चूंकि यह नहीं किया गया, इसलिए दरिद्रता व निर्धनता व्यापक रूप में फैल गई।

    इस प्रकार जब निर्धनता भरपूर व प्रचुर मात्रा में फैल गई, तो किसी व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति की चीज उठा ली, जो उसे दूसरे व्यक्ति ने नहीं दी थी। उसे लोगों ने पकड़ लिया और राजा के सामने प्रस्तुत किया। उन्होंने राजा से कहा, ‘हे महाराज, इस व्यक्ति ने वह चीज उठा ली है, जो उसे नहीं दी गई थी और ऐसा करनाचोरी है।’

    इस बात को सुनकर राजा ने उस व्यक्ति से इस प्रकार कहा, ‘क्या यह सच है कि जो चीज तुम्हें किसी व्यक्ति ने नहीं दी, तुमने उसे उठाया है। क्या तुमने वह काम किया है, जिसे लोग चोरी कहते हैं।’ ‘महाराज, यह सच है।’ ‘लेकिन क्यों?’ महाराज, मेरे पास जीवनयापन के लिए कुछ नहीं है, तब राजा ने उस व्यक्ति को धन दिया और उससे कहा, ‘इस धन से तुम अपने आपको जीवित रखो। अपने माता-पिता, अपने बच्चों तथा पत्नी का पालन-पोषण करो और अपना कारोबार व धंधा चलाओ।’ ‘महाराज, ऐसा ही होगा’, उस मनुष्य ने उत्तर दिया।


    (10) अब एक दूसरे व्यक्ति ने चोरी करके दूसरे व्यक्ति की वह चीज उठा ली, जो उसे नहीं दी गई थी। उसे लोगों ने पकड़ लिया और राजा के सामने लाए। उन्होंने राजा को बताया, ‘महाराज इस व्यक्ति को जो चीज नहीं दी गई थी, उसे इसने चोरी से उठा लिया है।’ और राजा ने वही बात कही एवं उसी प्रकार किया भी, जिस प्रकार उसने पहले व्यक्ति को कहा था और उसके लिए किया था।

    (11) अब बंधुओ, लोगों ने सुना कि जिन लोगों ने चोरी से उन वस्तुओं को उठाया, जो उनको नहीं दी गई थीं, उन लोगों को राजा धन दे रहा है, और इस बात को सुनकर उन्होंने सोचा कि हम भी उन चीजों को चोरी से उठा लें, जो हमें नहीं दी गई हैं।

   अब फिर किसी व्यक्ति ने वैसा किया। उसे उन्होंने पकड़कर राजा के समक्ष उस पर आरोप लगाया। राजा ने पहले की भांति उससे पूछा, ‘तुमने चोरी क्यों की?’ क्योंकि महाराज मैं अपना जीवनयापन नहीं कर सकता।’

    तब राजा नपे सोचा कि यदि मैं हमेशा ऐसे किसी भी व्यक्ति को धन देता रहूँगा, जिसने चोरी से उस वस्तु को उठा लिया है, जो उसे नहीं दी गई थी, तो चोरी में वृद्धि होगी। अब मुझे इसे अंतिम रूप से रोकना होगा और उसे समुचित दंड देना होगा, उसका सिर कटवा देना चाहिए।

    अतः उसने अपने व्यक्तियों से कहा, ‘देखो इस आदमी की बाहों को इसकी कमर के पीछे एक मजबूत रस्सी से बांध दो, उसमें गांठ दे दो, इसके सिर का मुंडन करके गंजा बना दो, इसे सड़कों पर, चौराहों पर ढोल बजाते हुए घुमाओ, इसे दक्षिण द्वार से बाहर लेकर नगर के दक्षिण की ओर ले जाओ। इस कार्य पर अंतिम रोक लगा दो। इसे भारी दंड दो, इसका सिर काट दो’। उन लोगों ने उत्तर दिया, ‘महाराज (ऐसा ही हो)’ और उसके आदेश का पालन किया।

    (12) बंधुओ, अब लोगों ने सुना कि जो लोग दूसरों की चीज चोरी से उठाते हैं, जो उनको नहीं दी गई है, तो उन्हें मृत्यु दंड दिया जाता है। इस बात को सुनकर उन्होंने सोचा, अब हमे भी तेजधार वाली तलवारें उनके लिए स्वयं तैयार करनी चाहिए, जिनकी हम वस्तु उठाते हें, जो हमें नहीं दी गईं, वे उसे जो कुछ कहें, हमें उनको रोकना होगा। उनको भारी दंड देना होगा और उनके सिर काटने होंगे।

   अतः उन्होंने तेजधार वाली तलवारें तैयार करा लीं और वे ग्राम, कस्बों तथा नगर को लूटने तथा राजमार्ग पर लूटपाट करने के लिए निकल पड़े। जिन लोगों को लूटते थे, उनके सिर काटकर उनको मार डालते थे।

   (13) इस प्रकार बंधुओ, दीन-हीनों को वस्तुएं व सामान न दिए जाने से निर्धनता फैल गई, निर्धनता से हिंसा बढ़ी और फैली। हिंसा के बढ़ने से जीवन का विनाश सामान्य बात हो गई। हत्याओं की संख्या में वृद्धि होने से उन प्राणियों व व्यक्तियों के जीवन की अवधि भी सामान्यता समाप्त हो गई।

    अब बंधुओ, कुछ बुजुर्गों में से किसी ने दूसरे व्यक्ति की कोई चीज चुराकर उठा ली, जो उसे नहीं दी गई थी और उस पर भी अन्य लोगों के समान आरोप लगाया गया और उसे भी राजा के समक्ष लाया गया। राजा ने उससे पूछा कि

    क्या सच है कि तुमने चोरी की है।’ उसने उत्तर दिया, ‘नहीं, हे राजन, वे जान-बूझकर झूठ बोल रहे हैं।’

    (14) इस प्रकार दीन-हीनों व दरिद्रों को समान वस्तुएं न दिए जाने से निर्धनता फैली, चोरी, हिंसा, सामान्य हो गई। फिर किसी व्यक्ति ने राजा से कहा, ‘हे राजन, अमुक व्यक्ति ने चोरी से वह वस्तु उठा ली है, जो उसे नहीं दी गई थी और इस प्रकार उसकी बुराई की।’

    (15) और बंधुओ, इसलिए दीन-हीनों, दरिद्रों को वस्तुएं व माल न दिए जाने से निर्धनता फैली, उसका विस्तार हुआ, चोरी, हिंसा, हत्या, झूठ बुराई करना आदि जैसी बातें प्रचुर मात्रा में बढ़ गईं।

    (16) झूठ बोलने से जार कर्म में वृद्धि हुई।

    (17) इस प्रकार दीन-हीनों, दरिद्रों को माल व वस्तुएं न दिए जाने के कारण निर्धनता, चोरी, हिंसा, झूठ, चुगलखोरी, अनैतिकता फैली, उसका विस्तार हुआ।

    (18) बंधुओ, उनके बीच तीन चीजों में वृद्धि हुई। ये थीं, कौटुम्बी व्यभिचार अनियंत्रित लालच तथा विकृत लाभ।

    इसके बाद, इन तीन चीजों की वृद्धि से माता व पिता के प्रति पुत्रोचित श्रद्धा-भक्ति का अभाव, पवित्र व्यक्तियों के प्रति धार्मिक निष्ठा का अभाव वे कुल के प्रधान के प्रति आदर व सम्मान का अभाव हो गया।

     (19) बंधुओ, एक समय आएगा, जब उन मानवों के वंशजों के जीवन की अवधि दस वर्ष की हो जाएगी। इस जीवन-अवधि वाले मानवों में पांच वर्ष की कुमारियां विवाह योग्य आयु की हो जाएंगी। ऐसे मानवों में इस प्रकार की रुचियों (स्वाद), जैसे घी, मक्खन, तिल का तेल, चीनी, नमक का लोप हो जाएगा। ऐसे मानवों में कुदरूसा अनाज सर्वोत्तम किस्म का भोजन होगा। इसलिए उस समय कुदरूसा ऐसे किस्म का अनाज होगा, जैसे आजकल चावल (भात) और दाल आदि हैं। ऐसे मानवों के बीच आचार के दस नैतिम आचरणों का बिल्कुल लोप हो जाएगा और कार्य के दस अनैतिक मार्ग अत्यधिक प्रचलित हो जाएंगे, ऐसे मानवों के बीच नैतिकता के लिए कोई स्थान नहीं होगा, उनमें नैतिकता बहुत कम रह जाएगी, ऐसे मानवों के बीच, बंधुओ, जिन लोगों में पुत्र-भाव तथा धार्मिक निष्ठा का अभाव होगा और जो अपने कुल के प्रधान के प्रति सम्मान नहीं दिखाएंगे, उन लोगों को उसी तरह की आदर, श्रद्धा तथा प्रशंसा प्रदान की जाएगी, जैसी श्रद्धा तथा प्रशंसा आज पुत्र-भाव वाले, पावन मनोवृत्ति वाले तथा कुल के प्रधान को आदर करने वाले व्यक्तियों को प्रदान की जाती है।

    (20) बंधुओ, ऐसे मानवों में माता या पिता की बहन (मौसी), मां की भाभी (मामी), गुरु की पत्नी या पिता की भाभी जैसे (आदरपूर्वक विचार, जो अंतर्विवाह के लिए बंधनस्वरूप होते हैं) नहीं होंगे। संसार भेड़-बकरियों-मुर्गे-मुर्गियों, सुअरों, कुत्तों और गीदड़ों की तरह स्वच्छंद संभोग में लिप्त हो जाएगा।

    बंधुओ, ऐसे मानवों में माता में अपने बच्चे के प्रति, बच्चे में अपने पिता के प्रति, भाई में भाभी के प्रति, भाई में बहन के प्रति, बहन में भाई के प्रति पारस्परिक शत्रुता, दुर्भावना, वैर-भाव, हत्या करने तक के क्रोधपूर्ण विचार नियम बन जाएंगे। जैसा कि एक खिलाड़ी उस खेल के प्रति महसूस करता है, जिसे वह देखता है, उसी प्रकार से वे भी महसूस करेंगे।

    जब नैतिक बल असफल हो जाएगा और उसके स्थान पर पाशविक बल आ जाएगा, तब क्या होगा, संभवतः यह उस स्थिति का सबसे उत्तम चित्र है। बुद्ध यह चाहते थे कि प्रत्येक व्यक्ति नैतिक रूप में इतना प्रशिक्षित होना चाहिए कि वह स्वयं ही धर्मपरायणता व न्यायसंगतता का प्रहरी हो जाए।

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