बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Buddha or Karl Marx – Bhimrao Ambedkar
बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
साधनों का मूल्यांकन
अब हमें साधनों के मूल्यांकन का विवेचन करना चाहिए। हमें इस बात को देखना चाहिए कि किसके साधन श्रेष्ठ तथा दीर्घ काल तक ठहरने व स्थाई बने रहने वाले हैं, किंतु दोनों ओर कुछ भ्रांतियां हैं। उनको स्पष्ट करना आवश्यक है।
हिंसा को लीजिए। जहां तक हिंसा का संबंध है, हिसां का नाम सुनते ही उसके विचार से बहुत से लोगों को कंपकंपा आ जाएगी, परंतु यह केवल भावुकता है। हिंसा का पूर्णतया त्याग नहीं किया जा सकता। यहां तक कि गैर-साम्यवादी देशों में भी हत्यारे को फांसी पर लटकाया जाता है। क्या फांसी पर लटकाना हिंसा नहीं है? गैर-साम्यवादी देश एक-दूसरे के साथ युद्ध करते हैं। युद्ध में लाखों लोग मारे जाते हैं। क्या यह हिंसा नहीं है? यदि एक हत्यारे को इसलिए मारा जा सकता है, क्योंकि उसने एक नागरिक को मारा है, उसकी हत्या की है, यदि एक सिपाही को युद्ध में इसलिए मारा जा सकता है, क्योंकि वह शत्रु राष्ट्र से संबंधित है, तो यदि संपत्ति का स्वामी स्वामित्व के कारण शेष मानव जाति को दुःख पहुंचाता है, तो उसे क्यों नहीं मारा जा सकता? संपत्ति के स्वामी के लिए उसके पक्ष में बचाव करने का कोई कारण नहीं है। व्यक्तिगत संपत्ति को परम पावन क्यों माना जाना चाहिए?
बुद्ध हिंसा के विरुद्ध थे, परंतु वह न्याय के पक्ष में भी थे और जहां पर न्याय के लिए बल प्रयोग अपेक्षित होता है, वहां उन्होंने बल प्रयोग करने की अनुमति दी है। यह बात वैशाली के सेनाध्यक्ष सिंहा सेनापति के साथ उनके वार्तालाप में भलीभांति सोदाहरण समझाई गई है। इस बात को जानने के बाद कि बुद्ध अहिंसा का प्रचार करते हैं, सिंहा उनके पास गया और उनसे पूछा –

‘भगवन, अहिंसा का उपदेश देते व प्रचार करते हैं। क्या भगवन एक दोषी को दंड से मुक्त करने व स्वतंत्रता देने का उपदेश देते व प्रचार करते हैं? क्या भगवन यह उपदेश देते हैं कि हमें अपनी पत्नियों, अपने बच्चों तथा अपनी संपत्ति को बचाने के लिए, उनकी रक्षा करने के लिए युद्ध नहीं करना चाहिए? क्या अहिंसा के नाम पर हमें अपराधियों के हाथों कष्ट झेलते रहना चाहिए। क्या तथागत उस समय भी युद्ध का निषेध करते हैं, जब वह सत्य तथा न्याय के हित में हो?’
बुद्ध ने उत्तर दिया –
“मैं जिस बात का प्रचार करता हूँ व उपदेश देता हूँ, आपने उसे गलत ढंग से समझा है। एक अपराधी व दोषी को दंड अवश्य दिया जाना चाहिए और एक निर्दोष व्यक्ति को मुक्त व स्वतंत्र कर दिया जाना चाहिए। यदि एक दंडाधिकारी एक-एक अपराधी को दंड देता है, तो यह दंडाधिकारी का दोष नहीं है। दंड का कारण अपराधी का दोष व अपराध होता है। जो दंडाधिकारी दंड देता है, वह न्याय का ही पालन कर रहा होता है। उस पर अहिंसा का कलंक नहीं लगता। जो व्यक्ति न्याय तथा सुरक्षा के लिए लड़ता है, उसे अहिंसा का दोषी नहीं बनाया जा सकता। यदि शांति बनाए रखने के सभी साधन असफल हो गए हों, तो हिंसा का उत्तरदायित्व उस व्यक्ति पर आ जाता है, जो युद्ध को शुरू करता है। व्यक्ति को दुष्ट शक्तियों के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। यहां युद्ध हो सकता है, परंतु यह स्वार्थ की या स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों की शर्तों के लिए नहीं होना चाहिए।”
इसमें संदेह नहीं कि हिंसा के विरुद्ध अन्य ऐसे आधार भी हैं, जिन पर प्रो.जॉन डिवी द्वारा बल दिया गया है। जिन लोगों का यह तर्क है कि साध्यों की सफलता साधन को उचित सिद्ध करती है, तो यह नैतिक रूप से एक विकृत सिद्धांत है, उनसे डिवी ने यह ठीक ही पूछा है कि यदि साध्य नहीं, तो फिर साधनों को कौन सी चीज उचित सिद्ध करती है? केवल साध्य ही साधनों को उचित सिद्ध कर सकता व न्यायोचित ठहरा सकता है। बुद्ध कदाचित इस बात को स्वीकार कर लेते हैं कि यह केवल साध्य ही है, जो साधनों को उचित सिद्ध करता है। इसके अलावा और क्या चीज उचित सिद्ध कर सकती है और उन्होंने यह कहा होता कि यदि साध्य हिंसा को उचित ठहराता है, तो प्रत्यक्ष उपस्थित की पूर्ति साध्य के लिए हिंसा एक उचित साधन है।
यदि बल प्रयोग साध्य को प्राप्त करने का एकमात्र साधन होता, तो वह निश्चय ही संपत्ति के स्वामियों को बल का प्रयोग करने की छूट न देते। इससे पता चलता है कि साध्य के लिए उनके साधन भिन्न थे। प्रो.डिवी ने कहा है कि हिंसा बल प्रयोग का केवल एक दूसरा नाम है और यद्यपि बल का प्रयोग सृजनात्मक उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए, परंतु शक्ति के रूप में बल प्रयोग तथा हिंसा के रूप में बल प्रयोग के बीच अंतर समझाना आवश्यक है। एक साध्य की उपलब्धि में अन्य अनेक साध्यों का विनाश शामिल होता है, जो उस साध्य से अभिन्न होते हैं, जिसे नष्ट करने का प्रयास किया जाता है। बल प्रयोग को इस प्रकार नियमित करना चाहिए कि वह अनिष्टकर साध्य को नष्ट करने की प्रक्रिया में यथासंभव अधिक से अधिक साध्यों की रक्षा कर सके। बुद्ध की अहिंसा उतनी निरपेक्ष नहीं थी, जितनी जैन मत के संस्थापक महावीर की अहिंसा थी। उन्होंने केवल शक्ति के रूप में बल प्रयोग की अनुमति दी होगी। साम्यवादी हिंसा का प्रतिपादन एक निरपेक्ष सिद्धांत के रूप में करते हैं। बुद्ध इसके घोर विरोधी थे।
जहां तक तानाशाही का संबंध है, बुद्ध इसका बिल्कुल समर्थन नहीं करते। वह लोकतंत्रवादी के रूप में पैदा हुए थे और लोकतंत्रवादी के रूप में ही मरे। उनके समय में चौदह राजतंत्रीय राज्य थे और चार गणराज्य थे। वह शाक्य थे और शाक्यों का राज्य एक गणराज्य था। उन्हें वैशाली से अत्यंत अनुराग था, जो उनका द्वितीय घर था, क्योंकि वह एक गणराज्य था। उन्होंने महानिर्वाण से पूर्व अपना वर्षावास वैशाली में व्यतीत किया था। अपने वर्षावास के पूरा हो जाने के बाद उन्होंने वैशाली को छोड़कर कहीं और जाने का निश्चय किया, जैसी उनकी आदत थी। कुछ दूर जाने के बाद, उन्होंने मुड़कर वैशाली की ओर देखा और फिर आनंद से कहा, ‘तथागत वैशाली के अंतिम बार दर्शन कर रहे हैं।’ उससे पता चलता है कि इस गणराज्य के प्रति उनका कितना लगाव व प्रेम था।
वह पूर्णतः समतावादी थे। भिक्षु और स्वयं बुद्ध भी मूलतः जीर्ण-शीर्ण वस्त्र (चीवर) पहनते थे। इस नियम को इसलिए प्रतिपादित किया गया था, ताकि कुलीन वर्ग के लोगों को संघ में शामिल होने से रोका जा सके। बाद में जीवक नामक एक प्रसिद्ध वैद्य ने अनुनय कर बुद्ध को थान से निर्मित वस्त्र को स्वीकार करने के लिए सहमत कर लिया। बुद्ध ने मूल नियम को तुरंत बदल दिया और उसे सब भिक्षुओं के लिए भी लागू कर दिया।
एक बार बुद्ध की मां महाप्रजापति गौतमी ने, जो भिक्षुणी संघ में शामिल हो गई थी, सुना कि बुद्ध को सर्दी लग गई है। उन्होंने उनके लिए एक गुलूबंद तैयार करना तुरंत शुरू कर दिया। इसे पूरा करने के बाद वह उसे बुद्ध के पास ले गईं और उसे पहनने के लिए कहा, परंतु उन्होंने यह कहकर इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया कि यदि यह एक उपहार है, तो उपहार समूचे संघ के लिए होना चाहिए, संघ के एक सदस्य के लिए नहीं। उन्होंने बहुत अनुनय-विनय की, परंतु उन्होंने (बुद्ध ने) उसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया, वह बिल्कुल नहीं माने।
भिक्षु संघ का संविधान सबसे अधिक लोकतंत्रात्मक संविधान था। वह इन भिक्षुओं में से केवल भिक्षु थे। अधिक से अधिक वह मंत्रिमंडल के सदस्यों के बीच एक प्रधानमंत्री के समान थे। वह तानाशाह कभी नहीं थे। उनकी मृत्यु से पहले उनको दो बार कहा गया कि वह संघ पर नियंत्रण रखने के लिए किसी व्यक्ति को संघ का प्रमुख नियुक्त कर दें, परंतु हर बार उन्होंने यह कहकर इंकार कर दिया कि धम्म संघ का सर्वोच्च सेनापति है। उन्होंने तानाशाह बनने और तानाशाह नियुक्त करने से इंकार कर दिया।