Buddha or Karl Marx – Bhimrao Ambedkar - बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 2 मुख्य मजकूराकडे जा

बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Buddha or Karl Marx – Bhimrao Ambedkar

Page 2 of 5
03 मे 2023
Book
5,12,11,7,1,2,,

बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

    जो मार्क्सवादी सिद्धांत अस्तित्व में है, उससे कुछ बातों को लेकर अब बुद्ध तथा कार्ल मार्क्स के बीच तुलना की जा सकती है।

    पहली बात पर बुद्ध तथा कार्ल मार्क्स में पूर्ण सहमति है। उनमें कितनी अधिक सहमति है, इस बात को दर्शाने के लिए मैं नीचे बुद्ध तथा पोत्तपाद नामक ब्राह्मण के बीच हुए वार्तालाप के एक अंश को उद्धृत करता हूँ:

    ‘इसके बाद उन्हीं शब्दों में पोत्तपाद ने बुद्ध से निम्नलिखित प्रश्न पूछे:

1. क्या संसार शाश्वत नहीं है?

2. क्या संसार सीमित है?

3. क्या संसार असीम है?

4. क्या आत्मा वैसी ही है, जैसा शरीर है?

5. क्या आत्मा एक वस्तु है और शरीर दूसरी?

6. क्या सत्य को पा लेने वाला व्यक्ति मृत्यु के बाद फिर जन्म लेता है?

7. क्या वह न तो पुनः जन्म लेता है, न मृत्यु के बाद फिर रहता है?

और प्रत्येक प्रश्न का बुद्ध ने एक ही उत्तर दिया, जो इस प्रकार था:-

11. पोत्तपाद यह भी एक विषय है, जिस पर मैंने कोई मत प्रकट नहीं किया है।

28. ‘परंतु बुद्ध ने उस पर कोई मत प्रकट क्यों नहीं किया है?’

    (क्योंकि) ‘ये प्रश्न उपयोगी नहीं हैं, उनका संबंध धर्म से नहीं है, यह सही आचरण के लिए भी सहायक नहीं है, न अनासक्ति, न लालसा व लोभ से शुद्धिकरण, न शांति, न हृदय की शांति, न वास्तविक ज्ञान, न अंतर्ज्ञान की उच्चतर अवस्था, न निर्वाण में सहायक है। अतएव, यही कारण है कि मैं इस संबंध में कोई विचार प्रकट नहीं करता।’

Comparison between Buddha and Karl Marx - Buddha or Karl Marx – Bhimrao Ambedkar

    दूसरी बात के संबंध में मैं नीचे बुद्ध तथा कौशल नरेश प्रसेनजित के बीच हुए वार्तालाप से एक उदाहरण प्रस्तुत करता हूँ:

    ‘इसके अतिरिक्त राजाओं के बीच, कुलीनों के बीच, ब्राह्मणों के बीच, गृहस्थों के बीच, माता तथा पुत्र के बीच, पुत्र तथा पिता के बीच भाई तथा बहन के बीच, साथियों तथा साथियों के बीच सदा संघर्ष चलता रहता है।’

    यद्यपि ये शब्द प्रसेनजित के हैं, परंतु बुद्ध ने इस बात से इंकार नहीं किया कि यह समाज का सही चित्र प्रस्तुत करता है।

    जहां तक वर्ग संघर्ष के प्रति बुद्ध के दृष्टिकोण का संबंध है, अष्टांग मार्ग का उनका सिद्धांत इस बात को मान्यता देता है कि वर्ग संघर्ष का अस्तित्व है और यह वर्ग संघर्ष ही है, जो दुःख व दुर्दशा का कारण होता है।

29. तीसरे प्रश्न के संबंध में मैं बुद्ध तथा पोत्तपाद के वार्तालाप में से उक्त यह अंश उद्धृत करता हूँ –

    ‘फिर वह क्या है, जिसका आप महानुभाव ने निश्चय किया है।’

   ‘पोत्तपाद’, मैंने यह स्पष्ट किया है कि दुःख तथा कष्ट का अस्तित्व है। वे विद्यमान रहते हैं।’

    मैंने यह समझाया है कि दुःख का मूल व उत्पत्ति क्या है। मैंने यह भी स्पष्ट किया है कि दुःख का अंत क्या है, मैंने यह भी स्पष्ट किया है कि वह कौन सा तरीका है, जिसके द्वारा व्यक्ति दुःख का अंत कर सकता है।

30. ‘और बुद्ध ने उसके संबंध में यह कथन क्यों किया?’

    ‘पोत्तपाद, क्योंकि वह प्रश्न उपयोगी है, वह धर्म से संबंधित है, वह सही आचरण, अनासक्ति, लालसा व लाभ से त्राण, शांति, हृदय की शांति, वास्तविक ज्ञान, पथ की उच्चतर अवस्था और निर्वाण में सहायक है। इसलिए पोत्तपाद यही कारण है कि मैंने उसके संबंध में कथन किया है।’

    यहां शब्द यद्यपि भिन्न हैं, परंतु उनका अर्थ वही हे। यदि हम यह समझ लें कि दुःख का कारण शोषण है, तब बुद्ध इस विषय में मार्क्स से दूर नहीं हैं। व्यक्तिगत संपत्ति के प्रश्न के संबंध में बुद्ध तथा आनंद के बीच वार्तालाप के निम्नलिखित उदाहरण से पर्याप्त सहायता मिलती है। आनंद द्वारा पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए बुद्ध ने कहा –

    ‘मैंने कहा है कि धन-लोलुपता संपत्ति के स्वामित्व के कारण होती है। यह ऐसा किस प्रकार है, इस बात को आनंद। इस प्रकार समझा जा सकता है। जहां पर किसी प्रकार की संपत्ति व अधिकार नहीं है, वह चाहे किसी व्यक्ति के द्वारा या किसी भी वस्तु के लिए हो, वहां कोई संपत्ति या अधिकार न होने के कारण संपत्ति की समाप्ति या अधिकार की समाप्ति पर क्या कोई धनलोलुप या लालची दिखाई पड़ेगा?’

   ‘नहीं, प्रभु।’

    ‘तब आनंद, स्वामित्व के आधार, उसकी उत्पत्ति, दुराग्रह का प्रश्न ही कहां होता?’

    31. ‘मैंने कहा कि दुराग्रह स्वामित्व का मूल है। अब आनंद वह ऐसा किस प्रकार व क्यों है? इसे इस प्रकार समझना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति में किसी वस्तु के संबंध में, वह चाहे जो हो, किसी प्रकार की कोई भी आसक्ति नहीं है तो क्या ऐसा होने पर आसक्ति के अंत होने पर अधिकार या संपत्ति का आभास होगा?’

    ‘नहीं होगा, प्रभु।’

    चौथी बात के संबंध में किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। भिक्षु संघ के नियम इस विषय में सर्वोत्तम प्रमाण हैं। नियमों के अनुसार एक भिक्षु केवल निम्नलिखित आठ वस्तुओं को ही व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में रख सकता है। इनसे अधिक नहीं। ये आठ वस्तुएं इस प्रकार हैं:

1.2.3. प्रतिदिन पहनने के लिए तीन वस्त्र (त्रिचीवर),
4. कमर में बांधने के लिए एक पेटी (कटिबांधनी),
5. एक भिक्षापात्र,
6. एक उस्तरा (वाति),
7. सुई धागा, और
8. पानी साफ करने की एक छलनी या छन्ना (अलक्षाधक)


    इसके अलावा एक भिक्षु के लिए सोने या चांदी को प्राप्त करना पूर्णतया निषिद्ध है, क्योंकि इससे यह आशंका होती है कि सोने या चांदी से वह उन आठ वस्तुओं के अलावा, जिनको रखने की उसे अनुमति है, कुछ और वस्तुएं खरीद सकता है।

   ये नियम रूस में साम्यवाद में पाए जाने वाले नियमों से बहुत अधिक कठोर हैं।

साधन

     अब हम साधनों पर आते हैं। साम्यवाद, जिसका प्रतिपादन बुद्ध ने किया, उसे कार्यांवित करने के लिए साधन भी निश्चित थे। इन साधनों को तीन भागों में रखा जा सकता है –

    भाग एक – पंचशील का आचरण। बुद्ध ने एक नए सिद्धांत का प्रतिपादन किया। यह उन समस्याओं की कुंजी है, जो उनके मन में बार-बार उठा करती थीं।

    नए सिद्धांत का आधार यह है कि यह सारा संसार कष्टों और दुखों से भार हुआ है। यह एक ऐसा तथ्य था, जिस पर न केवल ध्यान देना आवश्यक था, बल्कि मुक्ति की किसी भी योजना में इसे प्रथम स्थान देना था। इस तथ्य को मान्य कर बुद्ध ने इसे अपने सिद्धांत का आधार बनाया।

   उनका कहना था कि उक्त सिद्धांत को यदि उपयोगी होना है, तो कष्ट तथा दुःख का निवारण हमारा लक्ष्य होना चाहिए।

   इस कष्ट तथा दुःख के कारण क्या हो सकते हैं? इस प्रश्न के उत्तर में बुद्ध ने यह पाया कि इसके कारण केवल दो हो सकते हैं।

    मनुष्य के कष्ट तथा दुःख उसके अपने ही दुराचरण के फलस्वरूप हो सकते हैं। दुःख के इस कारण का निराकरण करने के लिए उन्होंने पंचशील का अनुपालन करने का उपदेश दिया।

पंचशील में निम्नलिखित बातें आती हैं: –

1.      किसी जीवित वस्तु को न ही नष्ट करना और न ही कष्ट पहुंचाना ।

2.     चोरी अर्थात दूसरे की संपत्ति की धोखाधड़ी या हिंसा द्वारा न हथियाना और न उस पर कब्जा करना ।

3.     झूठ न बोलना ।

4.     तृष्णा न करना ।

5.     मादक पदार्थों का सेवन न करना ।

    बुद्ध का मत है कि संसार में कुछ कष्ट व दुःख मनुष्य का मनुष्य के प्रति पक्षपात है। इस पक्षपात का निराकरण किस प्रकार किया जाए? मनुष्य के प्रति मनुष्य के पक्षपात का निराकरण करने के लिए बुद्ध ने आर्य अष्टांग मार्ग निर्धारित किया। इस अष्टांग मार्ग के तत्व इस प्रकार हैं: –

1. सम्यक दृष्टि, अर्थात अंधविश्वास से मुक्ति।

2. सम्यक संकल्प, जो बुद्धिमान तथा उत्साहपूर्ण व्यक्तियों के योग्य होता है।

3. सम्यक वचन अर्थात दयापूर्ण, स्पष्ट तथा सत्य भाषण।

4. सम्यक आचरण अर्थात शांतिपूर्ण, ईमानदारी तथा शुद्ध आचरण।

5. सम्यक जीविका अर्थात किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार की क्षति या चोट न पहुंचाना।

6. अन्य सात बातों में सम्यक परिरक्षण।

7. सम्यक स्मृति अर्थात एक सक्रिय तथा जागरूक मस्तिष्क, और

8. सम्यक समाधि अर्थात जीवन के गंभीर रहस्यों के संबंध में गंभीर विचार।

    इस आर्य अष्टांग मार्ग का उद्देश्य पृथ्वी पर धर्मपरायणता तथा न्यायसंगत राज्य की स्थापना करना तथा उसके द्वारा संसार के दुःख तथा विषाद को मिटाना है।

    सिद्धांत का तीसरा अंग निब्बान का सिद्धांत है। निब्बान का सिद्धांत आर्य अष्टांग मार्ग के सिद्धांत का अभिन्न अंग है। निब्बान के बिना अष्टांग मार्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती।

   निब्बान का सिद्धांत यह बताता है कि अष्टांग मार्ग की प्राप्ति के मार्ग में कौन-कौन-सी कठिनाइयां आती हैं।

    इन कठिनाइयों में से मुख्य कठिनाइयां दस हैं। बुद्ध ने उनको आसव, बेड़ियां या बाधाएं कहा है।

   प्रथम बाधा अहम् का मोह है, जब तक व्यक्ति पूर्णतया अपने अहम् में रहता है, प्रत्येक भड़कीली चीज का पीछा करता है, जिनके विषय में वह व्यर्थ ही यह सोचता है कि वे उसके हृदय की अभिलाषा की तृप्ति व संतुष्टि कर देंगी, तब तक उसको आर्य मार्ग नहीं मिलता। जब उसकी आंखें इस तथ्य को देखकर खुलती हैं कि वह इस असीम व अनंत का एक बहुत छोटा सा अंश है, तब वह यह अनुभूति करने लगता है कि उसका व्यक्तिगत अस्तित्व कितना नश्वर है, तभी वह इस संकीर्ण मार्ग में प्रवेश कर सकता है।

    दूसरी बाधा संदेह तथा अनिर्णय की स्थिति है। जब मनुष्य अस्तित्व के महान रहस्य, व्यक्तित्व की नश्वरता को देखता है तो उसके अपने कार्य में भी संदेह तथा अनिर्णय की स्थिति की संभावना होती है, अमुक कार्य किया जाए या न किया जाए, फिर भी मेरा व्यक्तित्व अस्थाई नश्वर है, ऐसी कोई चीज प्रश्न क्यों बन जाती है, जो उसे अनिर्णायक, संदेही या निष्क्रिय बना देती है, परंतु वह चीज जीवन में काम नहीं आएगी। उसे अपने शिक्षक का अनुसरण करने, सत्य को स्वीकार करने तथा संघर्ष की शुरुआत करने का निश्चय कर लेना चाहिए अन्यथा उसे और आगे कुछ नहीं मिलेगा।

    तीसरी बाधा संस्कारों तथा धर्मानुष्ठानों की क्षमता पर निर्भर करती है। किसी भी उत्तम संकल्प से वह चाहे जितना दृढ़ हो, किसी चीज की प्राप्ति उस समय तक नहीं होगी, जब तक मनुष्य कर्मकांड से छुटकारा नहीं पाएगा, जब तक वह इस विश्वास से मुक्त नहीं होगा कि कोई बाह्य कार्य, पुरोहिती शक्ति तथा पवित्र धर्मानुष्ठान से उसे हर प्रकार की सहायता मिल सकती है। जब मनुष्य इस बाधा पर काबू पा लेता है, केवल तभी यह कहा जा सकता है कि वह ठीक धारा में आ गया है और अब देर-सवेर विजय प्राप्त कर सकता है।

    चौथी बाधा शारीरिक वासनाएं हैं। पांचवीं बाधा दूसरे व्यक्तियों के प्रति द्वेष व वैमनस्य की भावना है छठी भौतिक वस्तुओं से मुक्त भावी जीवन के प्रति इच्छा का दमन है और सातवीं भौतिकता से मुक्त संसार में भावी जीवन के प्रति इच्छा का होना है। आठवी बाधा अभिमान है और नौवीं दंभ है। ये वे कमजोरियां हैं, जिन पर मनुष्य के लिए विजय प्राप्त करना बहुत कठिन है और जिनके लिए विशेष रूप से श्रेष्ठ व्यक्ति उत्तरदायी हैं। यह उन लोगों के लिए निंदा की बात है, जो अपने आप से कम योग्य तथा कम पवित्र हैं।

    दसवीं बाधा अज्ञानता है। यद्यपि अन्य सब कठिनाइयों व बाधाओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है, फिर भी यह बनी ही रहेगी, बुद्धिमान तथा अच्छे व्यक्ति के शरीर में कांटे के समान चुभती रहेगी। यह मनुष्य की अंतिम तथा सबसे बड़ी शत्रु है।

    आर्य अष्टांग मार्ग का अनुसरण करके इन बाधाओं पर विजय प्राप्त करना ही निब्बान है। आर्य अष्टांग मार्ग सिद्धांत यह बताता है कि मनुष्य को मन की कौन सी स्थिति व मनोवृत्ति का परिश्रमपूर्वक पोषण करना चाहिए। निब्बान का सिद्धांत उस प्रलोभन या बाधा के विषय में बताता है, जिस पर यदि व्यक्ति आर्य अष्टांग मार्ग का अनुसरण करना चाहता है तो उन पर गंभीरतापूर्वक विजय प्राप्त करनी चाहिए। नवीन सिद्धांत का चौथा भाग परिमिता का सिद्धांत है। परिमिता का सिद्धांत एक व्यक्ति के दैनिक जीवन में दस गुणों का आचरण करने के लिए प्रेरित करता है। वे दस गुण इस प्रकार हैं।
(1) पन्न, (2) शील, (3) नेक्खम, (4) दान, (5) वीर्य, (6) खांति (शांति) , (7) सच्च, (8) अधित्थान, (9) मेत्त और (10) उपेक्खा।

    पन्न या बुद्धि वह प्रकाश है, जो अविद्या, मोह या अज्ञान के अंधकार को हटाता है। पन्न के लिए यह अपेक्षित है कि व्यक्ति अपने से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति से पूछकर अपनी सभी शंकाओं का समाधान कर ले, बुद्धिमान लोगों से संबंध रखे और विभिन्न कलाओं और विज्ञान का अर्जन करे, जो उसकी बुद्धि विकसित होने मे सहायक हों। शील नैतिक मनोवृत्ति अर्थात बुरा न करने और अच्छा करने की मनोवृत्ति, गलत काम करने पर लज्जित होना है। दंड के भय से बुरा काम न करना शील है। शील का अर्थ है, गलत काम करने का भय। नेक्खम संसार के सुखों का परित्याग है।

   दान का अर्थ अपनी संपत्ति, रक्त तथा अंग का उसके बदले में किसी चीज की आशा किए बिना, दूसरों के हित व भलाई के लिए अपने जीवन तक को भी उत्सर्ग करना है।

   वीर्य का अर्थ है, सम्यक प्रयास। आपने जो कार्य करने का निश्चय कर लिया है, उसे पूरी शक्ति से कभी भी पीछे मुड़कर देखे बिना करना है।

   खांति (शांति) का अभिप्राय सहिष्णुता है। इसका सार है कि घृणा का मुकाबला घृणा से नहीं करना चाहिए, क्योंकि घृणा, घृणा से शांत नहीं होती। इसे केवल सहिष्णुता द्वारा ही शांत किया जाता है।

   सच्च (सत्य) सच्चाई है। बुद्ध बनने का आकांक्षी कभी भी झूठ नहीं बोलता। उसका वचन सत्य होता है। सत्य के अलावा कुछ नहीं होता।

   अधित्थान अपने लक्ष्य तक पहुंचने के दृढ़ संकल्प को कहते हैं।

    मेत्त (मैत्री) सभी प्राणियों के प्रति सहानुभूति की भावना है, चाहे कोई शत्रु हो या मित्र, पशु हो या मनुष्य, सभी के प्रति होती है।

   उपेक्खा अनासक्ति है, जो उदासीनता से भिन्न होती है। यह मन की वह अवस्था है, जिसमें न तो किसी वस्तु के प्रति रुचि होती है, परिणाम से विचलित व अनुत्तेजित हुए बिना उसकी खोज व प्राप्ति में लगे रहना ही उपेक्खा है।

    प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह इन गुणों को अपनी पूर्ण सामर्थ्य के साथ अपने व्यवहार में अपनाए। इन पर आचरण करे। यही कारण है कि इन्हें परिमिता (पूर्णता की स्थिति) कहा जाता है। यही वह सिद्धांत है, जिसे बुद्ध ने संसार में दुःख तथा क्लेश की समाप्ति के लिए अपने बोध व ज्ञान के परिणामस्वरूप प्रतिपादित किया है।

    स्पष्ट है कि बुद्ध ने जो साधन अपनाए, वे स्वेच्छापूर्वक अनुसरण करके मनुष्य की नैतिक मनोवृत्ति को परिवर्तित करने के लिए थे।

    साम्यवादियों द्वारा अपनाए गए साधन भी इसी भांति स्पष्ट संक्षिप्त तथा स्फूर्तिपूर्ण हैं। ये हैं: (1) हिंसा और (2) सर्वहारा वर्ग की तानाशाही।

    साम्यवादी कहते हैं कि साम्यवाद को स्थापित करने के केवल दो साधन हैं, पहला है हिंसा। वर्तमान व्यवस्था को भंग करने व तोड़ने के लिए इससे कम कोई भी कार्य या योजना पर्याप्त नहीं होगी। दूसरा साधन है, सर्वहारा वर्ग की तानाशाही। नई व्यवस्था को जारी रखने के लिए उससे कम कोई चीज पर्याप्त नहीं होगी।

    स्पष्ट हो जाता है कि बुद्ध तथा कार्ल मार्क्स में क्या समानताएं हैं तथा क्या विषमताएं है। अंतर व विषमता साधनों के विषय में है। साध्य दोनों में समान हैं।

Book Pages

Page 2 of 5