बुद्ध अथवा कार्ल मार्क्स - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Buddha or Karl Marx – Bhimrao Ambedkar
लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
राज्य की शिथिलता या समाप्ति
साम्यवादी स्वयं इस बात को स्वीकार करते हैं कि एक स्थाई तानाशाही के रूप में राज्य का उनका सिद्धांत उनके राजनीतिक दर्शन की कमजोरी है। वे इस तर्क का आश्रय लेते हैं कि राज्य अंततः समाप्त हो जाएगा। दो ऐसे प्रश्न हैं, जिनका उन्हें उत्तर देना है। राज्य समाप्त कब होगा? जब वह समाप्त हो जाएगा, तो उसके स्थान पर कौन आएगा? प्रथम प्रश्न के उत्तर का कोई निश्चित समय नहीं बता सकते। लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए भी तानाशाही अल्पावधि के लिए अच्छी हो सकती है और उसका स्वागत किया जा सकता है, लेकिन तानाशाही अपना काम पूरा कर चुकने के बाद लोकतंत्र के मार्ग में आनेवाली सब बाधाओं तथा शिलाओं को हटाने के बाद तो स्वयं समाप्त क्यों नहीं हो जाती, क्या अशोक ने इसका उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया था? उसने कलिंग के विरुद्ध हिंसा को अपनाया, परंतु उसके बाद उसने हिंसा का पूर्णतया परित्याग कर दिया। यदि आज हमारे विजेता केवल अपने विजितों को ही नहीं, बल्कि स्वयं को भी शस्त्र-विहीन कर लें, तो समस्त संसार में शांति हो जाएगी।
साम्यवादियों ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया है। जब राज्य समाप्त हो जाएगा तो उसके स्थान पर क्या आएगा, इस प्रश्न का किसी भी प्रकार कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया, यद्यपि यह प्रश्न कि राज्य कब समाप्त होगा, की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है। क्या इसके बाद अराजकता आएगी? यदि ऐसा होगा तो साम्यवादी राज्य का निर्माण एक निरर्थक प्रयास है। यदि इसे बल-प्रयोग के अलावा बनाए नहीं रखा जा सकता और जब उसे एक साथ बनाए रखने के लिए बल-प्रयोग नहीं किया जाता और यदि इसका परिणाम अराजकता है, तो फिर साम्यवादी राज्य से क्या लाभ हैं।

बल-प्रयोग को हटाने के बाद जो चीज इसे कायम रख सकती है, वह केवल धर्म ही है, परंतु साम्यवादियें की दृष्टि में धर्म अभिशाप है। धर्म के प्रति उनमें घृणा इतनी गहरी बैठी है कि वे साम्यवादियों के लिए सहायक धर्मों तथा जो उनके लिए सहायक नहीं हैं, उन धर्मों के बीच भी भेद नहीं करेंगे। साम्यवादी ईसाई मत के प्रति अपनी घृणा को बौद्ध धर्म तक ले गए हैं। उन्होंने इन दोनों के बीच अंतर की जांच करने का भी कष्ट नहीं किया। साम्यवादियों ने ईसाई मत के विरुद्ध दुहरे आरोप लगाए हैं। ईसाई मत के विरुद्ध उनका प्रथम आरोप यह था कि वह लोगों को परलोक के प्रति सजग तथा इस लोक में दरिद्रता भोगने के लिए बाध्य करता है। जैसा कि बौद्ध धर्म की उक्तियों से देखा जा सकता है, ऐसा आरोप बौद्ध धर्म के विरुद्ध नहीं लगाया जा सकता।
ईसाई धर्म के विरुद्ध साम्यवादियों द्वारा दूसरा जो आरोप लगाया जाता है, उसे बौद्ध धर्म के विरुद्ध नहीं लगाया जा सकता। इस आरोप को संक्षेप में इस प्रकार कहा जाता है कि धर्म जनता के लिए अफीम है। यह आरोप ईसा के पर्वत प्रवचन (सरमन आन दि माउंट) पर आधारित है, जो बाइबिल में मिलता है। यह निर्धन, दरिद्र तथा दुर्बल के लिए स्वर्ग के द्वार खोलता है। बुद्ध के उपदेश में पर्वत प्रवचन नहीं मिलता। उनकी शिक्षा व उपदेश धन व संपत्ति अर्जित करने से संबंधित हैं। मैं नीचे उनके द्वारा इस विषय में उनके एक शिष्य अनाथपिंडक को दिए गए प्रवचन का उल्लेख कर रहा हूँ।
एक बार अनाथपिंडक उस स्थान पर आया, जहां पर बुद्ध ठहरे हुए थे। वहां आकर उसने उनको प्रणाम किया और एक ओर आसन ग्रहण किया और उनसे पूछा, ‘क्या भगवन, यह बताएंगे कि गृहस्थ के लिए कौन-सी बातें स्वागत योग्य, सुखद तथा स्वीकार्य हैं, परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन है।’
बुद्ध ने इस प्रश्न को सुनकर कहा –
इनमें प्रथम विधिपूर्वक धन अर्जित करना है। दूसरी बात यह देखना है कि आपके संबंधी भी विधिपूर्वक ही धन-संपत्ति अर्जित करें। तीसरी बात है, दीर्घकाल तक जीवित रहो और लंबी आयु प्राप्त करो।
गृहस्थ को इन चार चीजों की प्राप्ति करनी है, जो कि संसार में स्वागत योग्य, सुखकारक तथा स्वीकार्य हैं, परंतु जिन्हें प्राप्त करना कठिन है, चार अवस्थाएं भी हैं, जो इनसे पूर्ववर्ती हैं। वे हैं श्रद्धा, शुद्ध आचरण, स्वतंत्रता और बुद्धि।
शुद्ध आचरण दूसरे का जीवन लेने अर्थात् हत्या करने, चोरी करने, व्यभिचार करने, झूठ बोलने तथा मद्यपान करने से रोकता है।
स्वतंत्रता ऐसे गृहस्थ का गुण होती है, जो धनलोलुपता के दोष से मुक्त उदार, दानशील, मुक्तहस्त, दान देकर आनंदित होने वाला और इतना शुद्ध हृदय का हो कि उसे उपहारों का वितरण करने के लिए कहा जा सके।
बुद्धिमान कौन है?
वह जो यह जानता है कि जिस गृहस्थ के मन में लालच, धन लोलुपता, द्वेष, आलस्य, उनींदापन, निद्रालुता, अन्यमनस्कता तथा संशय है और जो कार्य करना चाहिए, उसकी उपेक्षा करता है और ऐसा करने वाला प्रसन्नता तथा सम्मान से वंचित रहता है।
लालच, कृपणता, द्वेष, आलस्य तथा अन्यमनस्कता तथा संशय मन के कलंक हैं। जो गृहस्थ मन के कलंकों से छुटकारा पा लेता है, वह महान, बुद्धि, प्रचुर बुद्धि एवं विवेक, स्पष्ट दृष्टि तथा पूर्ण बुद्धि व विवेक प्राप्त कर लेता है।
अतएव, न्यायपूर्ण ढंग से तथा वैध रूप से धन प्राप्त करना, भारी परिश्रम से कमाना, भुजाओं की शक्ति व बल से धन संचित करना तथा भौंहों का पसीना बहाकर परिश्रम से प्राप्त करना, एक महान वरदान है।
ऐसा गृहस्थ स्वयं को प्रसन्न तथा आनंदित करता है और हमेशा प्रसन्नता व हर्ष से परिपूर्ण रहता है तथा अपने माता-पिता, पत्नी तथा बच्चों, मालिकों और श्रमिकों, मित्रों तथा सहयोगियों, साथियों को भी प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता से परिपूर्ण रखता है।
रूसी विचारक ऐसी स्थिति में, जब बल नहीं रहता, साम्यवाद को बनाए रखने के लिए अंतिम सहायता के रूप में बौद्ध धर्म की ओर ध्यान देते नहीं प्रतीत होते।
रूसी विचारक अपने साम्यवाद पर गर्व करते हैं, परंतु वे भूल जाते हैं कि सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि बुद्ध ने, जहां तक संघ का संबंध है, उसमें तानाशाही-विहीन साम्यवाद की स्थापना की थी। यह हो सकता है कि वह साम्यवाद बहुत छोटे पैमाने पर था, परंतु वह तानाशाही-विहीन साम्यवाद था, वह एक चमत्कार था, जिसे करने में लेनिन असफल रहा।
बुद्ध का तरीका अलग था। उनका तरीका मनुष्य के मन को परिवर्तित करना, उसकी प्रवृत्ति व स्वभाव को परिवर्तित करना था, ताकि मनुष्य जो भी करे, उसे स्वेच्छा से बल-प्रयोग या बाध्यता के बिना करे। मनुष्य की चित्तवृत्ति व स्वभाव को परिवर्तित करने का उनका मुख्य साधन उनका धम्म (धर्म) था तथा धम्म के विषय में उनके सतत उपदेश थे। बुद्ध का तरीका लोगों को उस कार्य करने के लिए, वे जिसे पसंद नहीं करते थे, बाध्य करना नहीं था, चाहे वह उनके लिए अच्छा ही हो। उनकी पद्धति मनुष्यों की चित्तवृत्ति व स्वभाव को बदलने की थी, ताकि वे उस कार्य को स्वेच्छा से करें, जिसको वे अन्यथा न करते।
यह दावा किया गया है कि रूस में साम्यवादी तानाशाही के कारण आश्चर्यजनक उपलब्धियां हुई हैं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसी कारण मैं यह कहता हूँ कि रूसी तानाशाही सभी पिछड़े देशों के लिए अच्छी व हितकर होगी, परंतु स्थाई तानाशाही के लिए यह कोई तर्क नहीं है। मानवता के लिए केवल आर्थिक मूल्यों की ही आवश्यकता नहीं होती, उसके लिए आध्यात्मिक मूल्यों को बनाए रखने की आवश्यकता भी होती है। स्थाई तानाशाही ने आध्यात्मिक मूल्यों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया और वह उनकी ओर ध्यान देने की इच्छुक भी नहीं है। कार्लाइल ने राजनीतिक अर्थशास्त्र को ‘सुअर दर्शन’ की संज्ञा दी है। कार्लाइल का कहना वास्तव में गलत है, क्योंकि मनुष्य की भौतिक सुखों के लिए तो इच्छा होती ही है, परंतु साम्यवादी दर्शन समान रूप से गलत प्रतीत होता है, क्योंकि उनके दर्शन का उद्देश्य सुअरों का मोटा बनाना प्रतीत होता है, मानों मनुष्य सुअरों जैसे हैं। मनुष्य का विकास भौतिक रूप के साथ-साथ आध्यात्मिक रूप से भी होना चाहिए। समाज का लक्ष्य एक नवीन नींव डालने का रहा है, जिसे फ्रांसीसी क्रांति द्वारा संक्षेप में तीन शब्दों में-भ्रातृत्व, स्वतंत्रता तथा समानता-कहा गया है। इस नारे के कारण ही फ्रांसीसी क्रांति का स्वागत किया गया था। वह समानता उत्पन्न करने में असफल रही। हम रूसी क्रांति का स्वागत करते हैं, क्योंकि इसका लक्ष्य समानता उत्पन्न करता है, परंतु इस बात पर अधिक जोर नहीं दिया जा सकता कि समानता लाने के लिए समाज में भ्रातृत्व या स्वतंत्रता का बलिदान किया जा सकता है। भ्रातृत्व या स्वतंत्रता के बिना समानता का कोई मूल्य व महत्त्व नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि ये तीनों तभी विद्यमान रह सकती हैं, जब व्यक्ति बुद्ध के मार्ग का अनुसरण करे। साम्यवादी एक ही चीज दे सकते हैं, सब नहीं ।