नागपुर से बनारस चुनावी सफ़र !

(Motherland to Fatherlands )

डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी 

     नागपुर (मदरलैंड/आरएसएस का वैचारिक उद्गम स्थल) और वाराणसी (फादरलैंड/प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का राजनीतिक क्षेत्र) होने के बावजूद दोनों ही जगहों पर भाजपा को स्नातक चुनावों में शिकस्त का सामना करना पड़ा है।

     नागपुर (आरएसएस का प्रमुख केंद्र) से लेकर बनारस/काशी तक के संकेत के रूप में। नागपुर पदवीधर विधान परिषद निर्वाचन क्षेत्र के नतीजे में भाजपा को नुकसान हुआ—कांग्रेस के अभिजीत वंजारी विजयी घोषित हुए, जबकि भाजपा के सुधाकर कोहले हार गए।

Nagpur se Banaras BJP ki Graduate Seat par Karari Haar

• पहली वरीयता की गिनती में वंजारी 28,998 और कोहले 28,071 मत पाकर 927 मतों से आगे थे; बाद की गिनती में यह मुकाबला और करीबी हुआ।

“करारी हार”

     यह हार इसलिए बड़ी मानी जा रही है क्योंकि नागपुर को भाजपा-आरएसएस का मजबूत गढ़ माना जाता है, और वहाँ पदवीधर सीट पर कांग्रेस की जीत प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण है। नतीजे में दूसरी वरीयता के मतों ने निर्णायक भूमिका निभाई, जिससे वंजारी को बढ़त मिली।राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी दलों द्वारा नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के नतीजों को इसी रूप में रेखांकित किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय (जन्मभूमि) होने के कारण नागपुर को भाजपा का सबसे मजबूत और पारंपरिक गढ़ माना जाता है। इस प्रबुद्ध और शिक्षित वर्ग के निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा की यह पराजय राजनीतिक तौर पर बेहद चर्चा में है।

     “नागपुर से बनारस” का भाव

     इस वाक्यांश को आमतौर पर राजनीतिक टिप्पणी के रूप में पढ़ा जा सकता है—नागपुर से शुरू होकर बनारस तक भाजपा के लिए चुनौती या असंतोष का संकेत। 

वाराणसी

     उत्तर प्रदेश विधान परिषद (MLC) की वाराणसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र सीट पर समाजवादी पार्टी (SP) के आशुतोष सिन्हा ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रत्याशी केदारनाथ सिंह को हरा दिया है। लगातार तीन दिनों तक चली मतगणना के बाद अंतिम नतीजों में आशुतोष सिन्हा ने 18,459 वोटों के अंतर से बड़ी जीत हासिल की (प्रथम वरीयता के मतों की गिनती के बाद आशुतोष सिन्हा को 50,462 वोट मिले, जबकि केदारनाथ सिंह को 33,478 वोट प्राप्त हुए थे)।

     वाराणसी खंड शिक्षक सीट से 

     लाल बिहारी यादव (समाजवादी पार्टी)इन्होंने भारतीय जनता पार्टी (BJP) समर्थित प्रत्याशी प्रमोद कुमार मिश्रा को 4,000 से अधिक प्रथम वरीयता के वोटों के अंतर से हराया। लाल बिहारी यादव भी अपनी इस सीट को बचाने में पूरी तरह कामयाब रहे हैं।

     वाराणसी प्रधानमंत्री मोदी का लोकसभा क्षेत्र है, इसलिए दोनों सीटों पर हार को स्थानीय संगठन, मतदाता संपर्क और प्रत्याशी चयन पर सवाल के रूप में देखा जा रहा है।

     राजनीतिक हलकों में इस सीट को "मुख्यमंत्री के दांव" या प्रतिष्ठा से जोड़कर इसलिए देखा जा रहा था क्योंकि नागपुर महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का गृह नगर है। साथ ही, यह केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का संसदीय क्षेत्र और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मुख्यालय भी है। इस सीट पर मिली हार को भाजपा के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

     राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों ही क्षेत्रों में शिक्षित युवाओं, प्रबुद्ध वर्ग और मध्यम वर्ग के भीतर स्थानीय स्तर पर नीतियों, बेरोजगारी और महंगाई को लेकर एक मूक असंतोष था, जो इस विशेष वोट बैंक के नतीजों में साफ झलका।

     राजनीतिक विश्लेषक इसे एक बड़ा संदेश मानते हैं। भले ही भाजपा ने राज्य स्तर पर (जैसे यूपी की 11 में से 6 सीटें जीतकर) अपनी बढ़त बनाए रखी हो, लेकिन अपनी वैचारिक 'मदरलैंड' (नागपुर) और सबसे प्रतिष्ठित राजनीतिक 'फादरलैंड' (वाराणसी) में स्नातक वर्ग से मिली यह मात दर्शाती है कि प्रबुद्ध वर्ग के बीच पकड़ बनाए रखने के लिए पार्टी को अपनी स्थानीय रणनीतियों पर दोबारा मंथन करना होगा।

तेली बनाम क़ुणबी

     नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का यह चुनाव पारंपरिक जातीय समीकरणों (तेली बनाम कुनबी) के बजाय पूरी तरह रणनीतिक गठजोड़, वरीयता मतों (Preference Votes) के गणित और सुशिक्षित मतदाताओं के मुद्दों पर केंद्रित था।जातिगत कार्ड के बजाय सीधे तौर पर शिक्षित युवाओं की बेरोजगारी, लंबित सरकारी भर्तियां, प्रतियोगी परीक्षाओं की विफलताएं और संविदात्मक (कॉन्ट्रैक्ट) नियुक्तियों जैसे ज्वलंत मुद्दों को उठाया। इस वर्ग का वोट पूरी तरह पारंपरिक जातीय खांचे से बाहर निकलकर भाजपा के खिलाफ एक आक्रोश के रूप में सामने आया।

     अतः यह कहना शत-प्रतिशत सही है कि विदर्भ के पारंपरिक आम चुनावों में दिखने वाला 'तेली बनाम कुनबी' का जातीय ताना-बाना इस बार स्नातक के प्रबुद्ध वर्ग के मतपत्रों पर पूरी तरह बेअसर साबित हुआ। यहाँ विशुद्ध रूप से स्थानीय नाराजगी, विपक्षी एकजुटता और वरीयता मतों के तकनीकी प्रबंधन की जीत हुई।