( आलेख : विजय प्रसाद, अनुवाद : संजय पराते )
25 अक्टूबर से पहले के हफ़्ते में ब्राज़ील बहुत व्यस्त था। ऐसा लग रहा था कि ब्राजील की 20 करोड़ से ज़्यादा आबादी में से हर एक की राष्ट्रपति चुनाव के बारे में एक राजनैतिक राय थी। देश पूरी कट्टरता से ध्रुवीकृत था। जनमत सर्वेक्षणों से संकेत मिला था कि मुकाबला कड़ा होने वाला था, अधिकांश सर्वेक्षणों में पूर्व राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनारो के बेटे और एक विशिष्ट प्रकार के अति-दक्षिणपंथ के ध्वजवाहक, फ्लेवियो बोल्सोनारो का पक्ष लिया गया था। लेकिन वर्तमान राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला डा सिल्वा, जिन्हें लूला भी कहा जाता है और जो 2003 से 2011 तक तथा 2023 से ब्राज़ील के राष्ट्रपति हैं, ने जनमत सर्वेक्षणों को अपने रास्ते में आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने देश के कोने-कोने की यात्रा की और लोगों को अपने पक्ष में मतदान के लिए प्रेरित करने हेतु विशाल व ऊर्जावान रैलियां आयोजित कीं। मतदान के पहले दौर में 21 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान नहीं किया, जबकि यह प्रक्रिया अनिवार्य है (और मतदान करने वालों में से एक बड़े तबके ने राष्ट्रपति पद के हिस्से को या तो खाली छोड़ दिया या अमान्य कर दिया)। 15.87 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से बोल्सोनारो (जिन्होंने पहले दौर में 47 प्रतिशत वोट हासिल किए थे) और लूला के बीच मात्र 22 लाख मतों का अंतर था। 4 अक्टूबर (पहले दौर) और 25 अक्टूबर (दूसरे दौर) के बीच जीत हासिल करने के लिए, लूला को या तो उन लोगों को अपनी ओर खींचना था, जिन्होंने बोल्सोनारो को वोट दिया था या उन लोगों को, जिन्होंने मतदान नहीं किया था या अपने मतपत्र अमान्य कर दिए थे। ब्राज़ील के आधुनिक इतिहास में किसी अन्य उम्मीदवार ने इतने बड़े अंतर को नहीं पाटा था। लेकिन लूला ने ऐसा कर दिखाया।
सड़कों पर
पहले और दूसरे दौर के बीच के तीन हफ़्तों में, लूला और उनकी टीम ने ब्राज़ील के बड़े शहरों के साथ-साथ कई छोटे, लेकिन महत्वपूर्ण कस्बों में भी लाखों लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया। इन विशाल लामबंदियों ने यह भावना पैदा की कि लूला पहले दौर के बाद मतदान के आंकड़ों से सामने आई गणितीय कमी को पूरा कर लेंगे। सभी चुनावी विश्लेषण यही कह रहे थे से कि बोल्सोनारो दूसरे दौर में आसानी से जीत जाएंगे और लूला की जीत असंभव लग रही थी। लेकिन वामपंथ इसकी जकड़बंदी में नहीं आया, बल्कि वह और ज्यादा आक्रामक हो गया।
पहले दौर में बोल्सोनारो ने 22.28 लाख वोटों की बढ़त हासिल की, लेकिन दूसरे दौर में लूला 44.3 लाख वोटों से आगे रहे। जीत के अंतर में 66.6 लाख वोटों का बदलाव आया। ये वोट बड़े शहरों से मिले : एक लाख से अधिक आबादी वाले उन 319 शहरों से, जहां ब्राज़ील की 57% जनसंख्या निवास करती है। इन महानगरों ने 66.6 लाख में से 38.9 लाख वोटों का अंतर दिया। लूला को उन नगरों में अधिक जनसमर्थन मिला, जो ईसाई बहुल धार्मिक, धनी, श्वेत, अधिक शिक्षित और अधिक शहरी हैं। इसका अर्थ यह था कि उन्होंने बोल्सोनारो के आधार पर भारी सेंध लगाई, जो कि लूला के सहयोगियों के लिए भी आश्चर्य की बात थी। इस कायापलट का मुख्य आधार सामाजिक आंदोलनों द्वारा संचालित जन-लामबंदी थी, जिसका नेतृत्व भूमिहीन मजदूर आंदोलन (एमएसटी) ने किया।

प्रगति
लूला के तीन कार्यकाल के दौरान, ब्राज़ील के लोगों की सामाजिक हालत में ज़बरदस्त प्रगति हुई है। बोल्सा फ़ैमिलिया (एक सरकारी कल्याणकारी योजना, जिसमें इस शर्त के साथ गरीब परिवारों को नगद सहायता दी जाती है कि उनके बच्चे स्कूल जाएं और टीकाकरण/स्वास्थ्य जांच करवाएं), न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों का विस्तार, और पारिवारिक खेती को सहायता ने उन घरों में खाना, आय और अवसरों का विस्तार किया, जिससे शासक वर्ग लंबे समय से पीछा छुड़ाता आया था। इन उपलब्धियों ने करोड़ों लोगों का जीवन बदल दिया और यह स्थापित किया कि सार्वजनिक कार्रवाई के माध्यम से गरीबी का मुकाबला किया जा सकता है। फिर भी, जिस राजनीतिक सूत्रीकरण ने इस प्रगति को संभव बनाया है, वह अपने चरम पर पहुँच गया है। लूला ने गरीबों के जीवन स्तर को सुधारने का प्रयास किया है, इसके साथ ही वित्त, कृषि व्यवसाय और ब्राजीलियाई पूंजी के प्रभावशाली हिस्सों के प्रभाव को भी साधने की कोशिश की है। उनके पहले दो कार्यकाल के दौरान, अनुकूल अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों ने इस संतुलन के लिए अवसर प्रदान किया। परंतु आर्थिक शक्ति के समरूप रूपांतरण के बिना पुनर्वितरण ने असमानता की नींव को अक्षुण्ण रखा, जिससे पुरानी व्यवस्था के लाभार्थियों को परिवर्तन में बाधा डालने और उसके लाभों को पलटने के साधन मिल गए।
उनके तीसरे कार्यकाल में, राजकोषीय प्रतिबंधों, महंगे ऋण और रूढ़िवादी संसदीय ताकतों पर निर्भरता के चलते सुधार की गुंजाइश को सीमित कर दिया है। सामाजिक कार्यक्रम अनिवार्य बने हुए हैं, लेकिन वे अपने दम पर असुरक्षित रोजगार, घरेलू कर्ज, अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाओं, या भूमि और धन के संकेंद्रण को दूर नहीं कर सकते। यह थकान शासन की एक ऐसी रणनीति से उपजी है, जिसके साथ समझौते उनके वादों को पूरा करने में लगातार बाधा बन रहे हैं। लूला का व्यक्तिगत प्राधिकार जन-आकांक्षाओं और ताकतवर तबकों की माँगों के बीच की खाई को अनिश्चित काल तक नहीं पाट सकता। एक नवीकृत परियोजना के लिए मजदूरों, किसानों और शहरी परिधि के निवासियों की संगठित शक्ति की आवश्यकता होगी। वास्तव में ये वे लोग हैं, जो लूला का आधार बनाते हैं, तथा उनके पास कृषि सुधार, सार्वजनिक निवेश, औद्योगिक विकास और वित्त पर लोकतांत्रिक नियंत्रण का एजेंडा है। सड़कों पर उतरे जन-आंदोलनों को सरकार की दिशा निर्धारित करने के लिए अधिक ताकत हासिल करनी होगी। दक्षिणपंथ को परास्त करने से यह संभावना पैदा होती है, परंतु लूला के शासनकाल की सामाजिक उपलब्धियों को बचाने के लिए उन संरचनाओं से निपटना होगा, जो उन्हें बार-बार खतरे में डालती हैं।
ट्रंप की हार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उनके उप राष्ट्रपति जेडी वेंस और मियामी में रहने वाले ब्राज़ीलियाई प्रवासियों ने लूला को हराने के लिए हर संभव कोशिश की है। ब्राज़ील, जो दक्षिण अमेरिका का आधा हिस्सा है और लैटिन अमेरिका की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, अब लैटिन अमेरिका में हावी कट्टर दक्षिणपंथी सरकारों की लहर के सामने सबसे अलग खड़ा दिखता है। ब्राजीलियाई चुनावों में हस्तक्षेप अब एक स्वीकृत तथ्य है, जब मेटा ने मुकाबले के एक निर्णायक दौर में लूला के खातों को ब्लॉक कर दिया और फंडिंग तथा सोशल मीडिया के हस्तक्षेप की अन्य रिपोर्टें सामने आईं।
ट्रंप को उम्मीद थी कि ब्राज़ील में बोल्सोनारो की जीत हो जाएगी, जिससे वे मार्च 2026 में मियामी से शुरू हुई 'शील्ड ऑफ़ द अमेरिकाज़' प्रक्रिया को और अधिक सुदृढ़ कर सकेंगे। इस प्रक्रिया को ट्रंप द्वारा सुरक्षा समन्वय, और इसके साथ ही जन आंदोलनों और वामपंथ को कुचलने के लिए, एक संस्थागत स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लूला की जीत से मोनरो सिद्धांत पर अमल करने का ट्रंप का रास्ता बंद हो गया है। इसका यह अर्थ भी है कि ट्रंप के लिए ब्राजील के महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंचना या अमेज़न डेल्टा बेसिन में तेल की नई खोज पर वर्चस्व स्थापित करना इतना आसान नहीं होगा।
लूला के सामने आने वाली बाधाओं के बावजूद, उनकी जीत ने यह साबित कर दिया है कि अति-दक्षिणपंथी अजेय नहीं हैं।
( लेखक इतिहासकार, पत्रकार और लेफ्टवर्ड बुक्स के मुख्य संपादक हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650 )