( आलेख : राजेंद्र शर्मा )
क्या संघ-भाजपा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को बचाने के लिए, देश की जनता के खिलाफ, भारतीय जनतंत्र के खिलाफ और संविधान के खिलाफ बाकायदा युद्ध छेड़ने का फैसला कर लिया है? ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग की जनतंत्र को ही ध्वस्त करने वाली करतूतों के खिलाफ राजधानी दिल्ली समेत देश भर में पिछले करीब महीने भर में सामने आए जनता के विक्षोभ और एक ओर राजनीतिक विपक्ष, तो दूसरी ओर युवाओं, मजदूरों, किसानों, मध्यवर्गीय पेशेवरों, समाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों आदि के लगातार फैलते आंदोलन के सामने, मोदी-शाह की सरकार के साथ-साथ संघ-भाजपा जोड़ी के शीर्ष ने जो टकराव की मुद्रा अपनायी है, उससे उसके युद्ध के लिए सन्नद्ध होने का ही पता चलता है।
यह संयोग ही नहीं है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने, विजयादशमी के अपने परंपरागत संबोधन में एक तरह से इस युद्ध एलान किया है। इस ऐलान को यह तथ्य और भी अनिष्टकर अर्थ दे रहा था कि आरएसएस, विजयदशमी को अपना स्थापना दिवस मानता है और इस अवसर पर एक ओर अगर संघ प्रमुख का ‘मार्गदर्शक’ संबोधन होता है, तो दूसरी ओर ‘‘शस्त्र पूजा’’ का आयोजन किया जाता है। इस बार का विजयदशमी आयोजन इसलिए और भी खास था कि इसके साथ, देश-विदेश में हुए आरएसएस के शताब्दी वर्ष आयोजनों का समापन हो रहा था। इस तरह, संघ के एक सौ एक वें वर्ष में प्रवेश के मौके को संघ प्रमुख ने इस युद्ध की घोषणा करने के लिए चुना है, इससे इस घोषणा की मारकता और बढ़ जाती है।

संघ प्रमुख ने वोट चोरी से लेकर चुनाव की ही चोरी तक के असंख्य रहस्योदघाटनों की ओर एक नजर तक डालना गवारा नहीं किया, जो गोदी मीडिया के जरिए मुख्यधारा के लगभग समूचे मीडिया की लंबी चुप्पी के बावजूद, देश में ही नहीं, विदेश तक, भारतीय जनतंत्र पर वास्तविक चिंताएं पैदा कर रहे हैं। संघ प्रमुख ने यह सुनने के बजाए अपने कान बंद ही कर लिए कि सडक़ों पर उतर रहे प्रदर्शनकारी, ‘‘वोट के अधिकार’’ को बचाने की मांग कर रहे थे, जोकि जनतंत्र की बुनियादी इकाई है, वह ईंट है, जिससे जनतंत्र की इमारत खड़ी होती है। और संघ प्रमुख की जुबान से इसकी सराहना का एक शब्द तक नहीं निकला कि तिरंगा ओढ़ कर सबसे बढक़र युवा पीढ़ी ही आज जनतंत्र को बचाने की चिंता से संचालित होकर, सडक़ों पर उतर रही है।
जंतर मंतर-1 के फौरन बाद, भागवत ने संघ-भाजपा के राजनीतिक नुकसान को कम करने की सचेत कोशिश में, जेन-जी को पटाने के लिए जो कुछ अच्छी-अच्छी बातें कही थीं, उनसे भ्रमित हुए सहज-विश्वासी लोगों को जरूर, जंतर मंतर-1 और जंतर मंतर-2 के बीच, छ: महीने से भी कम में भागवत की इस पल्टी पर हैरानी होगी। लेकिन, वास्तव में इसमें हैरानी की कोई बात है नहीं। छ: महीने पहले का भागवत का ‘जेन-जी प्रेम’ भी, देश की सत्ता पर संघ-भाजपा की पकड़ को मजबूती देने के लिए था और अब उसी सत्ता के दमन चक्र के लिए तर्क जुटाने के लिए भागवत जेन-जी के हरकत में आने को ‘भारतविरोधी ताकतों के षडयंत्र’ का हिस्सा बताने से नहीं हिचकते हैं।
बिना नाम लिए, किंतु स्पष्टत: चुनाव की शुचिता सुनिश्चित करने के लिए जारी वर्तमान आंदोलन को देश के लिए ही खतरा बताते हुए संघ प्रमुख कहते हैं : ‘‘परंतु जब ... आंदोलन राजनीति का साधन बन जाता है, किसी व्यक्ति, समूह या विचार के प्रति विरोधी शत्रु भाव लेकर चलता है, तब इसका लाभ भारत को दबाना चाहने वाली शक्तियां लेती हैं। मतभेदों को और गहरा बनाकर मनभेद उत्पन्न करना, समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में अन्यायग्रस्तता (विक्टिमहुड) की भावना उत्पन्न करना आदि करते हुए, देश में देश की व्यवस्थाओं के प्रति अश्रद्घा उत्पन्न करना, कलह, उग्र असंतोष, अलगाव, अव्यवस्था व अराजकता का वातवरण बनाना, यह उनकी कार्य पद्धति है। भारत को दबाये रखना चाहने वाली विश्व की शक्तियां भी कभी-कभी इसमें अपना खेल करती रहती हैं।’’
इससे पहले, संघ प्रमुख आंदोलनों के लिए इसका उपदेश तो करते ही हैं कि, ‘‘परंतु आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए’’ और यह भी कि ‘‘भावनाएं तीव्र होने पर भी हमारे संविधान कानून की मर्यादा में, बोल चाल चलन के भद्र व्यवहार के संकेतों की मर्यादा में हमारी कृतियां हों, यह ध्यान रखना चाहिए। वोट, सस्ती लोकप्रियता अथवा राजनीतिक लाभ का लोभ, हमारे विवेक और सद्भावना पर हावी न हो, यह चिंता करनी ही पड़ेगी।’’ इससे आगे जाकर वह एक ओर तो वर्तमान संघ-भाजपा शासन को देश के सामने मौजूद समस्याओं के लिए जवाबदेही से बरी करते हुए कहते हैं कि, ‘‘समाज की सब समस्याएं शासन ही सुलझा सकता है...ऐसा भी अनुभव नहीं है।’’ दूसरी ओर, आंदोलन मात्र की सार्थकता को ही नकारते हुए वह दावा करते हैं, ‘‘आंदोलनों से ही समस्याएं सुलझती हैं, ऐसा भी अनुभव नहीं है।’’ भागवत क्या कहना चाहते हैं -- शासन समस्याएं सुलझाएगा नहीं, आंदोलन से समस्याएं सुलझेंगी नहीं ; लोगों को, जो है उसे नियति मानकर, हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना चाहिए। बेशक, संघ-भाजपा की सत्ता को बचाने के लिए जनता के लिए भागवत की यही सलाह है।
लेकिन, भागवत संघ-भाजपा के राज के संदर्भ में देशवासियों को निष्क्रियता का संदेश देने तक ही नहीं रहते हैं। इससे आगे बढ़कर वह मौजूदा शासन के पक्ष में युद्घ का आह्वान भी करते हैं। और ऐसा करते हैं, मौजूदा निजाम के तमाम विरोध को एक कल्पित ‘भारत-विरोधी षडयंत्र’ का हिस्सा बताने के जरिए। ‘‘पिछले दशकों में भारत ने स्वयं की शक्ति तथा सुनीति के कारण विश्व में धीरे-धीरे अपना स्थान बनाया है। भारत के समाज का पुरुषार्थ, सुदृढ़ नीतियां, नेतृत्व, देशाभिमान तथा विश्व के प्रति अपने दायित्व के बोध की जागृति के कारण सभी क्षेत्रों में यशस्वी हो रहा है। भारत की इस प्रकार की प्रगति के कारण विश्व के राष्ट्रों में अराजकता खड़ी कर अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए सहायक हो सकने वाले अपने पिट्ठुओं को वहां स्थापित करने का षडयंत्र करने वाली ताकतों के खेल बंद होंगे। इस वस्तुस्थिति को ये आसुरी ताकतें जानती हैं। इसलिए, भारत ही उनका निर्णायक व सबसे बलवान प्रतिस्पर्द्धी और अंतिम एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य है। भारत, हिंदू व संघ को किस प्रकार तोड़ सकते (डिस्मेंटलिंग) हैं, इसका विचार कर, योजना बनाकर वे कार्य करती हैं। उन्हीं की प्रकृति के कुछ लोग इसमें उन्हें सहायता के लिए मिल जाते हैं। क्षुद्र सत्ता स्वार्थ और विवेकहीनता के कारण कुछ महत्वाकांक्षी नेता लोग भी शामिल होते हैं।’’
लेकिन, संघ प्रमुख को भी इसका अंदाजा है कि ‘यशस्वी भारत’ के खिलाफ आसुरी ताकतों के हमले और ‘‘भारत, हिंदू व संघ को’’ डिस्मेंटल करने की उनकी साजिशों की उनकी गप्प को शायद लोग गंभीरता से नहीं लेंगे। शायद संघ के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले ‘समझदार’ लोग तक उस पर विश्वास नहीं करें। इसलिए, वह फौरन इस खतरे को पश्चिम योरपीय देशों में हाल में देखने को मिले जन-असंतोष के उस उभार से जोड़ देते हैं, जिसे वर्तमान आंदोलन से मोदीशाही के बचाव के लिए, संघ परिवारी प्रचारतंत्र ने और उसके सहयोगी के तौर पर गोदी मीडिया ने, इसके दौरान हिंसा और आगजनी की यहां-वहां हुई कुछेक घटनाओं में ही घटाने की कोशिश की है।
बेशक, संघ प्रमुख से फ्रांस, अल्बानिया आदि और अब इटली में भी उठी जन असंतोष की लहर के आर्थिक कारणों, खासतौर पर नव-उदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था के गहराते संकट के प्रभावों को पहचानने की तो उम्मीद नहीं की जाती है। लेकिन, इसे बहाना बनाकर, वह मानवता के लिए वैश्विक खतरे का को आख्यान रचते हैं, उससे कुछ हैरानी तो होती ही है। ‘‘समझदार लोग भी विचलित हों, ऐसा वातावरण है अथवा खड़ा किया जा रहा है। भारत सहित सारे विश्व में जो जो भद्रता, मांगल्य, सांस्कृतिक व मानवीय संस्कार है, वह सारा नष्ट-भ्रष्ट, उद्ध्वस्त करने की आसुरी प्रतिज्ञा लेकर पश्चिम से एक आंधी चली है। विश्व भर के तथाकथित प्रगत देश भी उससे त्रस्त, असहाय हैं।’’
जाहिर है कि यह जेन-जी हरकत में आने के बाद से, संघ-भाजपा के प्रचार तंत्र द्वारा जिस तरह श्रीलंका, नेपाल तथा बांग्लादेश के घटनाक्रम के भारत में दुहराए जाने का डर दिखाया जाता रहा है और पिछले दिनों ‘‘रिजीम चेंज’’ के खतरे के बहाने जिसका शोर मचाया जाता रहा है, पश्चिम के संदर्भ से उसी की अपडेटिंग है। जैसी कि उम्मीद की जाती थी, भागवत के ‘‘विदेशी षडयंत्र’’ के खतरे के प्रचार का अनुमोदन करने के बाद से, भाजपा की ओर से सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह ने, विपक्ष पर हमले की कमान संभाल ली है। लेकिन, विडंबना यह है कि संघ-भाजपा, किसी न किसी प्रकार के षड्यंत्र के आरोपों के जरिए, चुनाव की शुचिता की मांग के व्यापक आंदोलन को दबाने के जरिए, जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में विश्वसनीय चुनाव का रास्ता रोककर, वैसी ही घटनाओं के दोहराए जाने का रास्ता बना रहे हैं, जैसी घटनाओं का डर दिखाकर वे ज्ञानेश कुमार और उसकी चुनावी धांधली की व्यवस्थाओं को बचाना चाहते हैं।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं। )