डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
आंध्रप्रदेश 2026 के स्थानीय निकाय चुनावों में इसे आमतौर पर नामांकन दाखिल करने से प्रतिद्वंद्वियों को रोकने, धमकी, हिंसा और निर्विरोध जीत सुनिश्चित करने जैसे आरोपों के संदर्भ में इस्तेमाल किया जा रहा है ।
आंध्रप्रदेश 2026: क्या हो रहा है
१) राज्य निर्वाचन आयोग ने 100 शहरी निकायों, फिर MPTC/ZPTC और ग्राम पंचायत चुनावों की अधिसूचना जारी की थी; मूल रूप से निकाय चुनाव 28 अक्टूबर को होने थे।
२) नामांकन प्रक्रिया के दौरान TDP और YSRCP ने एक-दूसरे पर हिंसा, धमकी और नामांकन पत्रों को फाड़ने के आरोप

आंध्रप्रदेश के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में नामांकन के दौरान हिंसा, धमकी और नामांकन भरने से रोकने के आरोपों के बाद सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) ने 100 शहरी निकायों में चुनाव प्रक्रिया रोक दी है।
३) नामांकन भरने के दौरान कम से कम 11 जिलों में 76 हिंसक घटनाएं दर्ज की गईं; वाईएसआरसीपी ने आरोप लगाया कि उसके उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोका गया। टीडीपी ने भी SEC से हिंसा, धमकी और नामांकन-केंद्रों पर बाधा के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की; दोनों दलों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाए।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
21 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने SEC को उम्मीदवारों की अंतिम सूची का प्रकाशन 25 अक्टूबर तक टालने को कहा और उसे शिकायतकर्ता पार्टियों तथा उम्मीदवारों द्वारा पेश साक्ष्य व इलेक्ट्रॉनिक सामग्री पर विचार करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन क्षेत्रों में उम्मीदवार नामांकन नहीं भर पाए, वहां नामांकन की अंतिम तिथि बढ़ाने का निर्णय 22 अक्टूबर तक लिया जाए; यदि बढ़ाई जाए तो न्यूनतम 48 घंटे की अवधि दी जाए।
SEC की कार्रवाई
१) SEC ने 21 अक्टूबर को सभी 100 शहरी स्थानीय निकायों—13 नगर निगम और 87 नगर पालिका/नगर पंचायतों—में चुनाव प्रक्रिया रोक दी।
२) राज्य निर्वाचन आयुक्त अनिल चंद्र पुनेथा ने पहले सात जिलों की 19 नगर पालिकाओं में चुनाव स्थगित किया था; बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसे सभी 100 निकायों तक बढ़ाया गया।
३) कडप्पा, राजमपेट, तिरुपति नगर निगम और मैदुकुरु नगर पालिका में नामांकन की समयसीमा 48 घंटे बढ़ाई गई।
४) चुनाव अब पहले निर्धारित 28 अक्टूबर के बजाय 1 नवंबर को होने की सूचना है।
पुलिस और जांच
चुनाव आयोग ने कलेक्टरों, जिला निर्वाचन अधिकारियों, पुलिस आयुक्तों और एसपी को नामांकन केंद्रों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त पुलिस तैनात करने का निर्देश दिया था। रिपोर्ट्स में नामांकन-विवाद से जुड़ी 54 लोगों को नामजद करने और 45 घटनाओं का उल्लेख है, हालांकि यह आंकड़ा अलग रिपोर्ट से है और इसकी पुष्टि आधिकारिक विस्तृत बयान से करनी चाहिए।
राजनीतिक स्थिति
मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने वाईएसआरसीपी पर हिंसा और चुनाव में बाधा का आरोप लगाया, जबकि वाईएसआरसीपी ने टीडीपी सरकार, पुलिस और SEC पर पक्षपात का आरोप लगाया। इसलिए अभी यह स्पष्ट नहीं है कि हिंसा की जिम्मेदारी किस पर थी; निर्णय जांच, साक्ष्य और चुनावी प्रक्रिया के पुनर्निर्धारण पर निर्भर करेगा।
चुनाव जिहाद
“वोट जिहाद” या “चुनाव जिहाद” जैसे शब्द राजनीतिक भाषण में डर और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए इस्तेमाल होते हैं; ये स्वयं में किसी अपराध या साजिश का प्रमाण नहीं होते किंतु अब आंध्रप्रदेश में चुनाव जीतने के लिए विपक्ष उम्मीदवारों को घेरकर नामांकन दाखिला फाड़ना और चोरी करना अपराध है फिर भी चुनाव आयोग इस पर कड़ी कार्रवाई करते नजर नहीं आ रहा है ।
चुनाव से जुड़ी वास्तविक समस्याएँ—जैसे हिंसा, नामांकन में बाधा, मतदाता सूची विवाद, या पुलिस पक्षपात के आरोप—इन्हें कानूनी शिकायत, चुनाव आयोग और अदालत के जरिए जांचा जाना चाहिए।
किसी भी दल या समुदाय पर बिना साक्ष्य के सामूहिक आरोप लगाना गलत है; दोषी व्यक्तियों या संस्थाओं की पहचान जांच से होनी चाहिए।
आंध्र प्रदेश में चुनावी हिंसा और प्रक्रिया संबंधी विवाद गंभीर मुद्दे हैं और उनकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। लेकिन “आंध्रप्रदेश मॉडल झाकी है, पूरा भारत बाक़ी है” जैसा दावा एक अपुष्ट राजनीतिक आरोप है, न कि स्थापित तथ्य; इसे सावधानी और साक्ष्य के आधार पर देखना चाहिए।
वाईएसआरसीपी ने आरोप लगाया है कि स्थानीय निकाय चुनावों में सत्तारूढ़ गठबंधन को फायदा पहुंचाने के लिए पुलिस और चुनावी अधिकारियों के साथ मिलीभगत हुई, नामांकन पत्र छीने गए और उम्मीदवारों को रोका गया।
मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने इसके बदले विपक्ष पर हिंसा का आरोप लगाया है; यानी दोनों पक्ष एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोप रहे हैं।
५६ इंच सरकार के आखो में पट्टी
अभी तक सार्वजनिक रिपोर्टिंग में यह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं है कि राज्य सरकार ने इन आरोपों पर कोई औपचारिक जांच या स्पष्टीकरण जारी किया है। इसलिए “५६ इंच सरकार मौनी है” एक विपक्षी राजनीतिक टिप्पणी के रूप में समझी जा सकती है, अब तक दिल्ली की सरकार की कोई प्रतिक्रिया नही आयी है । जबकि इसकी पुष्टि के लिए सरकारी बयान, एफआईआर, जांच आदेश या निर्वाचन आयोग की कार्रवाई देखनी होगी।
सोशल मीडिया पर आंध्रप्रदेश की हजारों तस्वीरो से ज्ञात होता कि भारत का चुनाव नहीं कहीं चुनाव का जिहाद चल रहा है ऐसा लग रहा है ।