भागवत का धर्मनिरपेक्षता को ‘पश्चिमी अवधारणा’ बताना बुद्धिमानी नहीं, चालाकी है !

(आलेख : कृष्ण प्रताप सिंह)

     जैसे योगी आदित्यनाथ, हिमंता बिस्वा शर्मा और सुवेंदु अधिकारी जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) परिवार के सत्ताधीशों द्वारा धर्मनिरपेक्षता (जो देश के संविधान के सबसे पवित्र मूल्यों में से एक है) का लगातार उड़ाया जा रहा मजाक ही काफी न हो और उसके बावजूद कोई बड़ी ‘कसक’ बाकी रह गई हो, सरसंघचालक मोहन भागवत ने गत 18 सितंबर को मध्य प्रदेश के उज्जैन में ‘युवा धर्म संसद’ में एक बार फिर कहना जरूरी समझा कि आधुनिक धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी अवधारणा है, उसका भारत की पारंपरिक व्यवस्था से कोई मेल नहीं है और इस कारण वह भारतीय संदर्भ में फिट नहीं बैठती।

Constitution, Secularism, and Power copy

     उनके इस कथन के यों तो कई निहितार्थ हैं, लेकिन उनमें सबसे बड़ा यह है कि अब समूचा आरएसएस परिवार उस लज्जा के दायरे से पूरी तरह बाहर निकल आया है, जो सांप्रदायिक कहे जाने पर एक समय उसको महसूस होती थी (क्योंकि तब वह हमारे संवैधानिक मूल्यों को चुनौती देने के मामलों में निहुरे-निहुरे ऊंट चराने या धान कूटने और कांख ढकने की कहावत को चरितार्थ किया करता था। न साफ छुपता था और न सामने आता था) और उससे बचने के लिए अपनी राजनीतिक फ्रंट भाजपा के साथ बार-बार दोहराया करता था कि बहुसंख्यकों (उसके शब्दों में कहें तो हिंदुओं) के समावेशी सोच के कारण भारत सदियों से धर्मनिरपेक्ष रहा है, वह खुद भी है और उसे किसी से भी धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ने की जरूरत नहीं है।

     देशवासी अभी भी भूले नहीं होंगे कि तब वह अपने विरुद्ध खड़ी पार्टियों द्वारा बरती जाने वाली धर्मनिरपेक्षता को छद्म बताने के बावजूद संवैधानिक मूल्य के रूप में उसे इतनी हिकारत की निगाह से देखने और त्याज्य या कि अवांछनीय करार देने के बजाय उसे ‘सकारात्मक रूप’ में अपनाने की बात करता था।

     उसकी वह शर्म थोड़ी-बहुत भी बची होती, तो कहना मुश्किल है कि उसकी सरकारों के कुराज से नाराज जेन ज़ी पर डोरे डालने के लिए आयोजित उक्त युवा धर्म संसद में भागवत अपनी सरकारों की बहुसंख्यक सांप्रदायिकता और उसकी जाई नफरत को सदाबहार बना देने वाली कारस्तानियों को लेकर थोड़े क्षमा प्रार्थी होते, उस सांप्रदायिकता व नफरत को भी पश्चिम से आई बताते या उसकी शर्म से बाहर निकलने की कोशिश में भारत में उसकी कोई ‘परंपरा’ ढूंढते।

     बहरहाल, उनका और उनके लोगों का धर्मनिरपेक्षता को बार-बार इस तरह कुरूप करके याद करना मुंबई में जन्मे ब्रिटिश उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद के हिमायती पत्रकार व साहित्यकार रुडयार्ड किपलिंग की याद दिलाता है। किपलिंग ने 1889 में यह लिखकर बहुत शोहरत पाई थी कि, ‘पूरब पूरब है, पश्चिम पश्चिम और ये दोनों कभी नहीं मिलेंगे।' 

     आज की तारीख में उनके आलोचक कहते हैं कि उनकी विक्टोरियन सोच अपने समय में उन ‘चमत्कारों’ का अंदाज़ा ही नहीं लगा सकी, जो हम 21वीं सदी में होते देख रहे हैं और जिनके कारण अब पश्चिम पूरब को और पूरब पश्चिम को आने-जाने लगे हैं।

     इस तथ्य के बावजूद कि विडंबनाओं से भरी विश्व-व्यवस्था ने मेहनतकशों व आम लोगों के बजाय सिर्फ बड़ी पूंजी और उसके प्रवाह को निर्बंध किया है -- अलबत्ता, इस सीमा तक कि वे किसी भी राष्ट्र व राज्य की सीमाओं का ढिठाई से निर्भय अतिक्रमण कर सकें -- जिसके चलते प्रायः हर देश में निवेशक नागरिकों की छाती पर सवार हो गए हैं और शरणार्थियों के लिए प्रायः सारे दरवाजे बंद हैं।

     इन ‘चमत्कारों’ के बावजूद धर्मनिरपेक्षता को ‘पश्चिम की अवधारणा’ बताकर (जो वास्तव में अर्धसत्य  से ज्यादा कुछ नहीं है) उसकी लानत-मलामत के लिए हम भागवत को किपलिंग जैसा उपनिवेशवादी या साम्राज्यवादी भले न कहें, इतना कहना तो बनता है कि काश, उनके परिवार को पश्चिम की बहुरुपिया व मायावी कंपनियों से भी इतना ही परहेज़ होता, जिन्हें उनके द्वारा नियंत्रित कहें या उनके परिवार की सरकार ने देश भर में निर्द्वंद्व कुलांचें और पूंजी को ब्रह्म व मुनाफे को मोक्ष मानने वाली अपनी नीतियों से  सारा सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक ताना-बाना बिखेर डालने की इजाजत दे रखी है।

     ऐसे में उनसे यह पूछना भी बनता ही है कि यह पश्चिम और पूरब का कैसा बंटवारा कर रहे हैं वे, जिसमें उनको पश्चिमी देशों से पूंजी का निवेश तो भरपूर चाहिए, लेकिन ज्ञान-विज्ञान या अवधारणाओं का इधर आने वाला प्रवाह रंचमात्र भी नहीं। इसके विपरीत वे ऐसे किसी भी प्रवाह को ‘आयातित’ कहकर उसे हिकारत की निगाह से देखने के अभ्यस्त हैं।

     लेकिन इस बंटवारे को वे किस हिकमत से संभव कर सकते हैं, जब खुद इतने ‘मजबूर’ हैं कि शुभ-लाभ की देश की पारंपारिक अवधारणा की छाती पर मूंग दल रही शोषक पश्चिमी कारोबारी कंपनियों की लाभ-लोभ की संस्कृति के लिए भी देश की सीमाएं बंद नहीं कर पा रहे और उनके तुष्टिकरण के चक्कर में स्वदेशी के अपने पुराने आंदोलन को ही भूल गए हैं?

     शरीर, विचार, संस्कार व संस्कृति वगैरह सबके स्वदेशीकरण की हिमायत करते आए उनके शुभचिंतक एक बाबा तो अब खुद के धंधे के स्वदेशीकरण से ज्यादा कॉरपोरेटीकरण के लिए जाने जाते हैं।

     इस सिलसिले में एक मौजूं सवाल यह भी है कि क्या भागवत या उनके परिवारियों ने कोई ऐसी प्रविधि ढूंढ निकाली है, जिससे न कोई ज्ञान-विज्ञान यूनिवर्सल (सार्वत्रिक यानी दसों दिशाओं का) रह जाए, न ही उसकी अवधारणाएं। सब की सब पूरब, पश्चिम या उत्तर, दक्षिण की बताकर बांटी और संकीर्ण बाड़बंदियों  की शिकार बनाई जा सकें?

     अभी तो हम पूरी दुनिया में प्राकृतिक विज्ञान में रसायनशास्त्र, भौतिकी, जीवविज्ञान और गणित पढ़ते-पढ़ाते हैं, तो सामाजिक विज्ञान में इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति शास्त्र, मनोविज्ञान और समाजशास्त्र। इसी तरह मानविकी में पूरी दुनिया में भाषा, साहित्य, कला, धर्म, दर्शन, ज्योतिष व कला और संस्कृति जैसी शाखाएं शामिल हैं, जो मानवता के भावनात्मक, सांस्कृतिक और कलात्मक पहलुओं का अध्ययन करती हैं।

     इनके अलावा, कई उपशाखाएं भी हैं, जो विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्रदान करती हैं -- लेकिन यह नहीं होता कि पश्चिम में प्राकृतिक विज्ञान कुछ और हो, पूरब में कुछ और। या कि पूरब की मानविकी की अवधारणाएं पश्चिम पहुंचते ही मिसफिट हो जाएं या वहां उनका प्रवेश निषिद्ध कर दिया जाए।

     लेकिन भागवत या उनके लोग इनमें से किसी भी सवाल का सदाशयी जवाब देने से रहे, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता को खारिज करने के लिए उसे पश्चिमी बताने के पीछे उनकी बुद्धिमानी कम, चालाकी ज्यादा है। साफ कहें तो यह चालाकी बरतकर वे सीधे-सीधे यह कहने से बचना चाहते हैं कि उनको धर्मनिरपेक्षता इसलिए अभारतीय लगती है और उससे उनके ऐतराज़ इसलिए खत्म नहीं  होते, क्योंकि वह उनकी लाइलाज श्रेष्ठता ग्रंथि को तुष्ट करने के बजाय सभी धर्मों के प्रति समान आदर (सर्वधर्म समभाव) और तार्किक तटस्थता सुनिश्चित करती है।

     किसे नहीं मालूम कि भारत में यह ‘तार्किक तटस्थता’ उनको हजम नहीं होती? लेकिन आरएसएस के शताब्दी वर्ष के तहत वैश्विक संपर्क अभियान के सिलसिले में न्यूयॉर्क जाते हैं, तो विवादों के बीच कह देते हैं कि भारत की नियति दुनिया को यह दिखाना है कि विविधता के साथ एकता कायम रह सकती है। यह भी कि अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए, तो वह हिंदू नहीं रहेगा।

     कारण यह कि लोग अलग-अलग धर्मों को मान सकते हैं, लेकिन मानवता एक है और भारत की परंपरा धार्मिक पहचान के आधार पर किसी को अलग करने के बजाय अलग-अलग समुदायों को शरण देने की रही है।

     अब देश के ज्यादातर लोगों को उनकी इस उदात्तता के बावजूद उनकी, उनके स्वयंसेवकों और सरकारों की रीति-नीति व आचरण में इसका विलोम ही नजर आता रहे, तो यह उन लोगों की समस्या है, आरएसएस और उसके  नायकों को तो असत्यों व अर्धसत्यों और भयों व भ्रमों से अपना काम चलाते रहने का पुराना अभ्यास है।

     इस अभ्यास के रहते भागवत भला कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि धर्मनिरपेक्षता इसी देश की प्राचीन संस्कृति, बहुलवाद और सर्व-पंथ-समभाव की ऐतिहासिक परंपरा से निकली है, जिसमें सभी पूजा-पद्धतियों का समान रूप से सम्मान किया जाता है, उसके ही कारण संविधान के तहत राज्य सभी धर्मों से समान दूरी बनाए रखता है और अपेक्षा की जाती है कि वह किसी भी धर्म के साथ भेदभाव न करे। अलबत्ता, किसी धर्म में सामाजिक कुरीतियां (जैसे अस्पृश्यता या बाल विवाह) हों, तो उनके सुधार के लिए सकारात्मक हस्तक्षेप करे।

     लेकिन वे कहें कुछ भी, देश जानता है कि उनकी सबसे बड़ी मुश्किल धर्मनिरपेक्षता का देश के संविधान की प्रस्तावना में शामिल और उसके उस ‘मूल ढांचे’ का हिस्सा होना है, जिसे किसी भी हालत में बदला नहीं जा सकता। फिर भी वे यह नहीं समझना चाहते कि धार्मिक व सांस्कृतिक विविधता वाले इस विशाल देश को एकजुट रखने और बहुसंख्यकवाद या अल्पसंख्यक असुरक्षा से बचाने के लिए वह एक अनिवार्य माध्यम है। इसके विपरीत वे उससे इस सीमा तक खुन्नस रखते हैं कि उसे बदलने या हटाने के लिए संविधान को ही बदलने की हिमायत करने लग जाते हैं।

     याद कीजिए, सन् 2000 में सरसंघचालक बनने के बाद के. सुदर्शन ने कहा था कि भारत का संविधान पश्चिमी मूल्यों पर आधारित है और उसकी जगह ऐसे संविधान को लेनी चाहिए, जो भारतीय पवित्र पुस्तकों पर आधारित हो। तब भाजपा के कई बड़े नेताओं ने संविधान को बदलने को अपनी मुख्य मांग बना लिया था और बहुचर्चित अनंतकुमार हेगड़े भी उनमें से एक थे।

     2024 में तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने संवैधानिक पद पर रहते हुए भी कन्याकुमारी के तिरुवत्तार स्थित हिंदू धर्म विद्या पीठम के दीक्षांत समारोह के अपने संबोधन में धर्मनिरपेक्षता की बाबत भागवत जैसी बातें ही कहीं थीं: ‘धर्मनिरपेक्षता भारतीय अवधारणा नहीं है. यह यूरोपीय अवधारणा है. उसे वहीं रहने दें. उन्हें उसका आनंद लेने दें. मगर भारत अपने धर्म से दूर कैसे जा सकता है?’

     तो क्या भागवत के उज्जैन में फिर यही बात दोहराने के पीछे उनके परिवार की यह उम्मीद ही है कि वह इस आधे-अधूरे सच या झूठ को बार-बार दोहराकर उसे सच में बदलने में सफल हो जाएगा? अगर हां, तो उसे दो काम करने चाहिए। पहला, खुद को मशहूर शायर कृष्ण बिहारी नूर के इस शे’र के आईने  में देखना चाहिए : सच घटे या बढ़े तो सच न रहे, झूठ की कोई इंतिहा ही नहीं।

     और दूसरा, धर्मनिरपेक्षता और सद्भावना की रक्षा के लिए समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक राम पुनियानी के एक लेख की ये पंक्तियां पढ़नी चाहिए : पश्चिम में पुरोहित वर्ग का सुपरिभाषित ढांचा था और राज्य सत्ता से उसके रिश्ते स्पष्ट थे, तो दुनिया के अन्य क्षेत्रों में भी कुछ-कुछ ऐसा ही था। हिंदुओं में राजा-राजगुरु की जोड़ी थी और इस्लाम में नवाब-शाही इमाम की। राजा (जो सामंती व्यवस्था के शीर्ष पर था) और संगठित धर्म का बोलबाला था। उपनिवेशों, विशेषकर भारत में, एक ओर औपनिवेशिकता थी, तो दूसरी ओर उद्योपतियों, श्रमिकों, महिलाओं और शिक्षित वर्गों के धर्मनिरपेक्ष-बहुवादी संगठन थे। इन्हीं वर्गों ने धर्मनिरपेक्षता के पौधे को पाला-पोसा।

     बकौल राम पुनियानी : भारत में हिंदू धर्म के बारे में कहा जाता है कि वह पारंपरिक अर्थ में धर्म नहीं है (भागवत ने अपने इस संबोधन में भी यह बात कही है)। यह केवल लोगों को भ्रमित करने का तरीका है। जो लोग धर्म का रक्षक होने का दावा करते हैं, वे दरअसल जाति और लिंग पर आधारित प्राचीन ऊंच-नीच को बनाए रखना चाहते है। ये ताकतें लोकतंत्र के आगाज़ से पहले की दुनिया वापस लाना चाहती हैं। वे नहीं चाहतीं कि हर व्यक्ति का एक वोट हो। वे चाहतीं हैं कि राजा को ईश्वर से जोड़ा जाए और पुरोहित वर्ग उसे सहारा दे।

     अंत में, कामना ही की जा सकती है कि संघ परिवार के सारे घटाटोप के बीच देशवासी समझते रहेंगे कि धर्मनिरपेक्षता व लोकतंत्र एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और इनमें से किसी एक का भी विस्थापन दूसरे को हिलाकर रख देगा!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)