भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
३. जोर - जबर्दस्ती से धम्म-परिवर्तन नहीं
१. एक बार पांच सौ भिक्षुओं के महान् भिक्षुसंघ के साथ भगवान् बुद्ध राजगृह और नालंदा के बीच की सड़क पर जा रहे थे । और उसी समय अपने शिष्य ब्रह्मदत्त के साथ सुप्पिय परिव्राजक भी राजगृह और नालन्दा के बीच के महापथ पर चल रहा था ।
२. उस समय सुप्पिय परिव्राजक नाना प्रकार से बुद्ध की निन्दा कर रहा था, धम्म की निन्दा कर रहा था, संघ की निन्दा कर रह था । लेकिन उसका शिष्य तरुण ब्रह्मदत्त नाना प्रकार से बुद्ध की प्रशंसा कर रहा था, धम्म की प्रशंसा कर रहा था, तथा संघ की प्रशंसा कर रहा था ।

३. इस प्रकार वे दोनों गुरु- -शिष्य परस्पर विरोधी मत प्रकाशित करते हुए भिक्षुसंघ और तथागत के पीछे-पीछे चले आ रहे थे ।
४. अब भिक्षुसंघ सहित तथागत रात्रि विश्राम के निमित्त अम्बलट्ठिका वन के राज्योद्यान में ठहरे । इसी प्रकार तरुण शिष्य ब्रह्मद और उसके गुरु सुप्पिय परिव्राजक ने भी वहीं निवास किया । और वहाँ उस विश्राम स्थल पर भी गुरु शिष्य का वह विवाद ही रहा ।
५. प्रातःकाल होने पर जब भिक्षु उठे तो उनकी बातचीत का विषय सुप्पिय और ब्रह्मदत्त का परस्पर का विवाद ही था ।
६. भगवान् बुद्ध ने चर्चा के विषय के अनुमान किया और वे भी वहाँ पहुंचे तथा बिछे आसन पर बैठे । वहाँ बैठने पर उन्होंने पूछा: - "बातचीत का विषय क्या है? चर्चा किस विषय की हो रही है?” उन्होंने तथागत को सारी बात बता दी । तब तथागत ने कहा
७. “भिक्षुओं, यदि कोई मेरी निन्दा करे, धम्म की निन्दा करे अथवा संघ की निन्दा करे तो इसका तुम्हें बुरा नहीं मानना चाहिये, इससे तुम्हारे हृदय में जलन नहीं होनी चाहिये, इससे तुम्हें क्रोध नहीं आना ।
८. “यदि तुम इस कारण क्रोध को अपने मन में स्थान दोगे, तो इससे तुम्हारी ही हानि है । यदि जब कोई बुद्ध, धम्म या संघ की निन्दा करे और तुम उससे क्रोधित तथा उद्विग्न हो जाओं, तो क्या तुम इसका विचार कर सकोगे कि उसने जो कुछ कहा है वह ठीक कहा है या नही ?"
९. "भगवान्! हम विचार नहीं कर सकेंगे ।"
१०. “लेकिन जब दूसरे लोग मेरी निन्दा करें, धम्म की निन्दा करें, संघ की निन्दा करें तो जो बात अयथार्थ हो, उसे तुम्हें यथार्थ कहना चाहिये । तुम्हें बता देना चाहिये कि अमुक कारण से, यह बात ऐसी नहीं है, यह बात हममें नहीं पाई जाती, यह बात हमें नहीं होती ।
११. “लेकिन दूसरे लोग मेरी प्रशंसा भी कर सकते हैं, धम्म की प्रशंसा भी कर सकते हैं, संघ की प्रशंसा भी कर सकते है । तुम पूछोगे कि वे क्या कहकर मेरी प्रशंसा कर सकते है ?
१२. "कोई कह सकता है कि श्रमण गौतम प्राणी-हिंसा का त्याग कर जीव - हिंसा से विरत रहते है । उन्होंने दण्ड और तलवार का सर्वथा त्याग कर दिया है । वह कठोर व्यवहार से विरत है । वह करुणा की मूर्ति है । उसमें सभी प्राणियों के प्रति दया है । कोई सामान्य आदमी तथागत की चर्चा करते हुए इस प्रकार प्रशंसा कर सकता है ।
१३. “अथवा वह कह सकता है कि श्रमण गौतम अदिन्नादान (चोरी) से विरत हो, जो उसको नहीं है उसे लेने की इच्छा से रहित हो विहार करता है । जो दिया जाता है, उसे ही वह ग्रहण करता है। उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति का विश्वास है । वह अपना जीवन हृदय की स्वच्छता और पवित्रता से व्यतीत करता है ।
१४. “अथवा वह कह सकता है कि श्रमण गौतम अब्रह्मचार्य से विरत हो, ब्रह्मचार्य युक्त हो विहार करता है । वह अपने आप को मैथुन-धर्म से ही धर्म से बहुत दूर दूर रखता है ।
१५. “अथवा वह कह सकता है कि श्रमण गौतम मिथ्या भाषण का त्याग कर मृषावाद से दूर दूर रहता है । वह सत्य ही बोलता है । वह सत्य से नहीं हटता है । वह विश्वासनीय है । वह कभी अपने वचन को भंग नहीं करता ।
१६. “अथवा वह कह सकता है कि श्रमण-गौतम अपने आप को किसी की झूठी निन्दा से सुनकर, यहाँ के लोगों से दूर दूर रखता है । वह यहाँ झगडा लगाने के लिये, उस बात को वहाँ नहीं कहता, और यहाँ सुनकर, वहाँ के लोगों से झगडा लगाने के लिये, उस बात को यहाँ नहीं कहता । इस प्रकार वह झगडने वालों का मेल कराने वाला है, मित्रों की मैत्री बढाने वाला है, शान्ति का प्रशंसक है. शान्ति के लिये प्रयत्नशील रहता है तथा ऐसे ही शब्दों का व्यवहार करता है, जिससे शान्ति की स्थापना हो ।
१७. “अथवा वह कह सकता है कि श्रमण गौतम कटु शब्दों का त्याग कर कठोर वाणी से दूर दूर रहता है । जो वाणी निर्दोष होत है, जो वाणी कर्ण-प्रिय होती है, जो वाणी अच्छी लगने वाली होती है, जो वाणी हृदय को आकर्षित करने वाली होती है, शिष्ट होती है, लोंगो को खुश करती है, लोगों का मन हर लेती है--ऐसी ही वाणी बोलता है ।
१८. “अथवा वह कह सकता है कि श्रमण गौतम व्यर्थ बातचीत का त्याग कर बेकार बातचीत से दूर दूर रहता है। वह समयानुसार बोलता है, वह यथार्थ बात बोलता है, उसकी वाणी अर्थ भरी होती है, धाम्मिक होती है, विनयानुकूल होती है । वह समय पर बोलता है, ऐसी वाणी बोलता है जो दिल में घर बना लेती है, उदाहरण सहित बोलता है, जितना बोलना अवाश्यक हो, उतना ही बोलता है ।
१९. “अथवा वह कह सकता है कि श्रमण गौतम बीजों या पौधो की हानि करने से अपने आप को दूर दूर रखता है । वह केवल एक बार ही भोजन ग्रहण करता है, वह रात को भोजन ग्रहण नहीं करता, वह अपरान्ह में भोजन ग्रहण करने से विरत रहता है । 'वह नृत्य गीत और वादित युक्त खेल-तमाशों को देखने से विरत रहता है ।
‘वह माला, सुगन्धियों तथा लेपों से अपने आपको अलंकृत करने तथा सजाने से विरत रहता है ।
'वह ऊँची ऊंची महान् शय्याओं का उपयोग नही करता ।
'वह चाँदी सोना स्वीकार नहीं करता ।
'वह कच्चा अन्न स्वीकार नहीं करता ।
'वह स्त्रियों या लडकियों को स्वीकार नहीं करता ।
'वह दास दासियों को स्वीकार नहीं करता ।
'वह भेड़-बकरियों को स्वीकार नहीं करता ।
'वह मुर्गे- मुर्गियों तथा सूअरों को स्वीकार नहीं करता ।
'वह हाथियों, गाय-बैलों घोड़ों तथा घोडियो को स्वीकार नहीं करता ।
'वह ऊसर या बोई हुई जमीन को स्वीकार नहीं करता ।
'वह (शादी कराने आदि में) मध्यस्थ बनना स्वीकार नहीं करता ।
'वह खरीदना बेचना स्वीकार नहीं करता ।
'वह तराजू या बटखरों से किसी को ठगना स्वीकार नहीं करता ।
'वह रिश्वत, वंचना और ठगी के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से बचता है ।
‘वह किसी का अंग-भंग करने, किसी को मार डालने, किसी को बाँध डालने, किसी को लूट लेने किसी की हिंसा करने से विरत रहता है ।
२०. “भिक्षुओं! ऐसी कुछ बाते हैं जो एक सामान्य आदमी तथागत की प्रशंसा करते हुए कह सकता है । लेकिन ऐसा होने पर भी न तुम्हें विशेष हर्ष होना चाहिये, न तुम्हारा हृदय खुशी से फूल जाना चाहिये । यदि तुम ऐसे होगे तो इससे भी तुम्हारी साधना में पडेगी । जब दूसरे लोग मेरी, वा धम्म की वा संघ की प्रशंसा करें, तो तुम्हें जो बात यथार्थ हो उसे स्वीकार करना चाहियें । तुम्हें कहना चाहिये: 'इस कारण से यह ऐसा ही है । यह बात हमारे बीच है । यह गुण हममें है ।”
४. भिक्षु को धम्म प्रचार के लिये संघर्ष करना चाहिये
१. भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए एक बार भगवान् बुद्ध ने कहा:--
२. “भिक्षुओं! मैं संसार से नहीं झगडता हूँ । बल्कि संसार ही मुझसे झगडता है । सत्य का उपदेशक संसार में कभी किसी से नहीं झगडता । "
३. योधा, योधा हम अपने आप को कहते हैं । भगवान! हम योधा किस प्रकार है?"
४. “भिक्षुओं, हम युद्ध करते है, इसलिये योधा कहलाते हैं ।"
५. “भगवान्! हम किस बात के लिये युद्ध करते है ?"
६. “भिक्षुओं! हम श्रेष्ठशील के लिये युद्ध करते है, श्रेष्ठ अप्रमाद के लिये युद्ध करते हैं, श्रेष्ठ प्रज्ञा के लिये युद्ध करते हैं ।”
७. जहाँ शील को खतरा हो, संघर्ष से मत घबराओ । ऐसे समय भीगी बिल्ली बने मत बैठे रहो ।