भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
२. चमत्कारों (प्राति-हार्यो) द्वारा धम्म दीक्षा नही
१. तथागत एक बार मल्लों के नगर अनुपिय में विहार कर रहे थे ।
२. उस समय पूर्वाह में तथागत ने चीवर पहना तथा पात्र और चीवर ग्रहण किया और अनुप्रिय नगर में भिक्षा के लिये निकले ।

३. रास्ते में उन्हें लगा कि कदाचित भिक्षाटन के लिये अभी थोड़ी देर रुकना चाहिये । तब तक जहाँ भग्गव परिव्राजक रहता है, मैं वहाँ ही क्यों न चलू और उससे भेंट करूँ ?
४. इसलिये तथागत भग्गव परिव्राजक के आश्रम पर चले गये ।
५. तब भग्गव ने तथागत को कहा – “भगवान्! आप पधारे! भगवान्! आपका स्वागत है । आपने चिरकाल के बाद इधर आने की अनुकम्पा की है। आप कृपया आसन ग्रहण करे । आपके लिये आसन सज्जित है ।"
६. तब तथागत वहां विराजमान हुए । भग्गव परिव्राजक भी एक नीचा आसन लेकर पास ही बैठ गया । इस प्रकार बैठकर भग्गव परिव्राजक ने भगवान बुद्ध को कहा--
७. "कुछ दिन हुए, काफी दिन हुए, है श्रमण गौतम! सुनक्खत्त लिच्छवी हुए, मेरे पास आया था । कहता था कि अब श्रमण गौ का शिष्यत्व त्याग दिया है । क्या जैसा उसने कहा, वैसा ठीक है?"
८. “भग्गव! यह ऐसा ही है जैसा सुनक्खत्त लिच्छवी ने कहा है ।"
९. “कुछ दिन हुए, काफी दिन हुए सुनक्खत्त लिच्छवी मेरे पास आया था और कहने लगा- अब मैं तथागत के 'शिष्यत्व' का त्याग करता हूँ अब मैं तथागत का शिष्य नहीं रहूँगा । जब उसने मुझे यह कहा, तब मैंने उससे पूछा "सुनक्खत्त! क्या मैंने तुझे कभी कहा था कि सुनक्खत! तू आ और मेरा शिष्य बनकर मेरे पास रह?"
१०. “भगवान् ! नहीं। ऐसा आपने नहीं कहा था ।"
११. “अथवा तूने ही मुझे कभी कहा था कि मै तथागत को अपना 'गुरु' स्वीकार करता हूँ!”
१२. “भगवान्! नहीं! ऐसा मैंने कभी नहीं कहा । "
१३. "तब मैंने उससे पूछा-'जब न मैंने ही तुझे कहा और न तूने ही मुझे कहा तो क्या तो मैं हूँ और क्या तू है, जो तू त्यागने की बात कर रहा है! मूर्ख कहीं के, क्या इसमें तेरा अपना ही दोष नहीं है ? "
१४. सुनक्खत बोला --लेकिन भगवान! आप मुझे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे कोई चमत्कार प्रातिहार्य नहीं दिखाते?”
१५. “सुनक्खत! क्या मैंने कभी तुझे कहा था कि सुनक्खत तू आकर मेरा शिष्य बन जा, मैं तुझे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे कोई प्रातिहार्य दिखाऊंगा?”
१६. "भगवान्! ऐसा आपने कभी नहीं कहा । "
१७. “अथवा सुनक्खत! तूने ही मुझे कभी कहा था कि मैं भगवान् का 'शिष्यत्व' स्वीकार करता हूँ क्योंकि भगवान् मुझे सामान्य आदमियों की शक्ति से परे कोई प्रातिहार्य दिखायेंगे ।”
१८. “भगवान्! नहीं! मैंने ऐसा नहीं कहा था ।"
१९. “जब न मैंने ही तुझे कहा और न तूने ही मुझे कहा तो क्या तो मैं हूँ और क्या तू है, जो तू त्यागने की बात कर रहा है?
२०. “सुनक्खत्त! तू क्या सोचता है, चाहे सामान्य मनुष्यों की शक्ति से परे प्रातिहार्य दिखाये जायें और न दिखायें जायें, क्या मेरे धम्म का यही उद्देश्य नहीं है कि मेरे धम्म के अनुसार आचरण करेगा, वह अपने दुख का नाश कर सकेगा?”
२१. “भगवान्! चाहे प्रातिहार्य दिखाये जायें और चाहे न दिखाये जायें निश्चय से तथागत की धम्म- देशना का यही उद्देश्य है कि जो कोई भी तथागत के धम्म के अनुसार आचरण करेगा, वह अपने दुख का नाश कर सकेगा ।”
२२. “लेकिन भग्गव! सुनक्खत मुझे कहता रहा, भगवान ! मुझे सृष्टि के आरम्भ का पता नहीं देते ।"
२३. अच्छा तो सुनक्खत्त! मैंने तुझे कब कहा था कि आ सुनक्खत्त! तू मेरा तू शिष्य बन जा, मैं तुझे सृष्टि के आरम्भ का पता बताऊंगा?”
२४. "भगवान्! आपने नहीं कहा था ।"
२५. “अथवा तूने ही मुझे कभी कहा था कि मैं आपका शिष्य बनूँगा क्योंकि आप मुझे सृष्टि के आरम्भ का पता देंगे?"
२६. “भगवान्! मैंने नहीं कहा था ।"
२७. “जब न मैंने ही तुझे कहा और न तूने ही मुझे कहा तो क्या तो मैं हूँ और क्या तू है, जो तू त्यागने की बात कर रहा है ! सुनक्खत! तू क्या सोचता है, चाहे मैं सृष्टि के आरम्भ का पता बताऊं और चाहे न बताऊं, क्या मेरे धम्म का यही उद्देश्य नहीं है कि जो मेरे धम्म के अनुसार आचरण करेगा वह अपने दुःख का नाश कर सकेगा?"
२८. “भगवान्! चाहे आप सृष्टि के आरम्भ का पता बतायें और चाहे न बतायें, निश्चय से तथागत की धम्म- देशना का यही उद्देश्य है कि जो कोई भी तथागत के धम्म के अनुसार आचरण करेगा वह अपने दुःख का नाश कर सकेगा ।"
२९. “सुनक्खत! जब धम्म के उद्देश्य की सृष्टि से इसका कोई महत्व ही नहीं कि चाहे सृष्टि के आरम्भ का पता बताया जाय और चाहे न बताया जाय, तो तेरे लिये ही इसका मूल्य है कि सृष्टि के आरम्भ का पता बताया जाय ?”
३०. “सुनक्खत्त! तूने नाना प्रकार से वज्जियों में मेरी प्रशंसा की है।
३१. “सुनक्खत! तूने नाना प्रकार से वज्जियों में 'धम्म' की प्रशंसा की है ।
३२. "सुनक्खत्त! तूने नाना प्रकार से वज्जियों में संघ की प्रशंसा की है।
३३. “सुनक्खत्त! मैं तुझे बताता हूँ । सुनक्खत्त! मैं तुझे बताता हूँ । बहुत से लोग ऐसे होंगे जो तुम्हारे बारे में कहेंगे कि सुनक्खत लिच्छवी तथागत की अधीनता में पवित्र जीवन व्यतीत करने में असमर्थ रहा । और असमर्थ होने के ही कारण उसने श्रेष्ठ जीवन त्याग दिया और हीन जीवन अपना लिया । "
३४. “हे भग्गव! इस प्रकार मेरे कहे जाने पर, सुनक्खत लिच्छवी इस धम्म - विनय को छोड़कर चला गया, जैसे उसका अकल्याण सुनिश्चित हो।"
३५. तथागत के धम्म-विनय को छोड़ कर चले जाने के कुछ ही समय बाद सुनक्खत्त लोगों को बताता फिरता था कि तथागत धम्म-विनय में कुछ भी परा- प्राकृतिक नहीं हैं, तथागत का धम्म उनकी अपनी 'बोधि ' का ही फल है, और जो कोई इस धम्मो श्रवण करता है उसे दुःख का अन्त करने के लिये केवल इस धम्म के अनुसार चलना पडता है ।
३६. यद्यपि सुनक्खत्त अपनी समझ में बुद्ध की निन्दा कर रहा था, लेकिन वह जो कुछ लोगों को कह रहा था, वह सच ही था । क्योंकि भगवान् ने अपने धम्म प्रचार में किसी परा मानुषिक बात वा किसी चमत्कार आदि का कभी सहारा नहीं लिया ।