भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
तीसरा भाग भिक्षु के कर्तव्य
१. दूसरो को धम्म दीक्षा देना भिक्षु का कर्तव्य है
१. यश कुल-पुत्र और उसके मित्रों धम्म में दीक्षित हो जाने का समाचार दूर दूर तक फैल गया । परिणाम यह हुआ कि ऊंचे ऊंचे कुलो के कुल-पुत्र और उनके निचले दर्जे के कुलो के भी कुल-पुत्र तथागत के पास शिक्षा ग्रहण करने और 'बुद्ध तथा धम्म की शरण ग्रहण करने के लिये आने लगे ।

२. 'धम्म' की शिक्षा ग्रहण करने के लिये तथागत के पास बहुत लोग आने लगे । भगवान् बुद्ध जानते थे कि हर किसी को व्यक्तिशः शिक्षा देना उनके लिये भी आसान नहीं । उन्हें इसकी भी आवश्यकता अनुभव हुई कि रोज रोज बढती हुई प्रव्रजितों की 'जमात' को एक संघ में संगठित कर दें ।
३. इसलिये उन्होंने प्रव्रजितों को 'संघ' का सदस्य बना दिया और अनुशासन क्रम या शिस्त के अपेक्षित नियम भी बना दिये, जो 'विनय' कहलाये । 'संघ' के सदस्यों के लिये 'विनय' के नियमों का पालन अनिवार्य था ।
४. तथागत ने आगे चलकर 'भिक्षु' बनने के इच्छुक किसी भी श्रावक के लिये दो सिढियाँ आवश्यक ठहरा दी । पहली अवस्था में उसे ‘ प्रव्रजित — होना होता था और एक 'प्रव्रजित' की ही हैसियत से उसे कई वर्षो तक किसी भिक्षु की देख-रेख में रहना होता था । जब उसका ‘शिक्षण' समाप्त हो जाता तो उसे 'उपसमपन्न होने की अनुमति मिलती थी, लेकिन यह तभी कि जब उसके 'परिक्षक' इस विषय में अपना संतोष कर लेते थे कि वह 'संघ' का सदस्य बनने के योग्य है ।
५. धम्म-प्रचार की आरम्भिक अवस्था में इस तरह की व्यवस्था करने की गुंजाईश न थी । उस समय तथागत ने उन्हें 'भिक्षु' बनाया और चारों दिशाओं में “धम्म- दूत" की हैसियत से धम्म प्रचार करने के लिये भेजा ।
६. उन्हें धम्म-प्रचारार्थ विदा करने से पूर्व तथागत ने कहा- “भिक्षुओं! मैं जितने भी दिव्य तथा मानुष बन्धन है, उन सभी से मुक्त हूँ । तुम भी भिक्षुओं! जितने भी दिव्य तथा मानुष-बन्धन है, उन सभी से मुक्त हो । भिक्षुओं, अब जाओं बहुत जनों के हित के लिये ,बहुत जनों के सुख के लिये, संसार पर अनुकम्पा करने के लिये, और देवताओं तथा मनुष्यों के हित, सुख और कल्याण के लिये विचरण करो ।
७. “तुम में से कोई दो एक दिशा में मत जाओ! भिक्षुओं, उस धम्म की देशना करो, जो आदि में कल्याणकारक है, जो मध्य में कल्याणकारक है, जो अन्त में कल्याणकारक है । भिक्षुओं अर्थ और व्यज्जन (शब्दों) से युक्त ऐसे धम्म की देशना करो जो परिशुद्ध और श्रेष्ठ जीवन है।
८. “इसलिये प्रत्येक जनपद में विचरो, जो अभी धम्म में अदीक्षित है, उन्हें दीक्षित करो, दुःख से दग्ध इस समस्त संसार में विचरो, हर जगह शिक्षा दो । सभी अज्ञानियों को ज्ञान का दान दो ।
९. “जाओ, जहाँ कहीं महर्षि रहते हों, राजर्षि रहते हों, ब्रह्मर्षि रहते हों, वहाँ रहो और उनके अपने अपने मत के अनुसार उन्हें प्रभावित करो।
१०. “इसलिये जाओ, अकेले अकेले जाओ । अनुकम्पा से प्रेरित होकर जाओं । लोगों को (बन्धन) मुक्त करो और उनको दीक्षित करो ।"
११. तथागत ने उन भिक्षुओं को यह भी कहा--
१२. “धम्म-दान सब दानों से बढकर है, धम्म का माधुर्य सब माधुर्यों से बढकर है, धम्म का आनन्द सब आनन्दों से बढकर है ।
१३. “खेत (व्यर्थ की) घास से नष्ट हो जाते है । प्रजा राग के होने से नष्ट हो जाती है। इसलिये धम्म - दान का महान् फल है ।
१४. “खेत (व्यर्थ की) घास से नष्ट हो जाते हैं । प्रजा द्वेष के होने से नष्ट हो जाती है। इसलिये धम्म-दान का महान् फल है ।
१५. “खेत (व्यर्थ की) घास से नष्ट हो जाते हैं । प्रजा मान के होने से नष्ट हो जाती है। इसलिये धम्म-दान का महान् फल है ।
१६. “खेत (व्यर्थ की) घास से नष्ट हो जाते है । प्रजा तृष्णा के होने से नष्ट हो जाती है । इसलिये धम्म-दान का महान् फल है ।
१७. तब वे साठ भिक्षु धम्म प्रचारार्थ चारों दिशाओं में फैल गये ।
१८. तथागत ने उन्हें 'धम्म दीक्षा' के विषय में और भी हिदायतें दी ।