भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
५. महामाया की मृत्यु
१. पांचवें दिन नामकरण संस्कार किया गया । बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया । उसका गोत्र गौतम था । इसीलिये जनसाधारण में वह सिद्धार्थ गौतम से प्रसिद्ध हुआ ।
२. बालक के जन्म की खुशियाँ और उसके नामकरण की विधियाँ अभी समाप्त नहीं हुई थीं कि महामाया अचानक बीमार पड़ी और उसके रोग में गम्भीर रूप धारण कर लिया ।
३. अपना अन्त समय निकट आया जान उसने शुद्धोदन और प्रजापति को अपनी शय्या के समीप बुलाया और कहा -- "मुझे विश्वास है कि असित ने मेरे बच्चे के बारे में जो भविष्यवाणी की है, वह सच्ची निकलेगी। मुझे यही अफसोस है कि मैं इस वाणी को पूरा हुआ न देख सकूंगी । "
४. “प्रजापति! मैं अपना बच्चा तुम्हे सौंप जाती हूँ। मुझे विश्वास है कि उसके लिये तुम उसकी माँ से भी बढ़कर होगी।”
५. “मेरा बालक शीघ्र ही मातृ-हीन बालक हो जायेगा । लेकिन मुझे इसकी तनिक चिन्ता नहीं है कि मेरे बाद यथायोग्य विधि से उसका लालन-पालन नही होगा ।"
६. “अब दुखी न हों । मुझे मरने दें । मेरा अन्त समय आ पहुँचा है । यमदूत मेरी प्रतीक्षा कर रहे है।” इतना कहते-कहते महामाया ने अन्तिम सांस ले ली । शुद्धोदन और प्रजापति दोनों को ही बड़ा दुःख हुआ । दोनों फूटफूटकर रोने लगे ।
७. जब सिद्धार्थ की माता का देहान्त हुआ तो उसकी आयु केवल सात दिन की थी ।”
८. सिद्धार्थ का एक छोटा भाई भी था । उसका नाम था नन्द । वह शुद्धोदन का महाप्रजापति से उत्पन्न पुत्र था ।
९. उसके ताया-चाचा की भी कई सन्तानें थीं । महानाम और अनुरुद्ध शुक्लोदन के पुत्र थे तथा आनन्द अमितोदन के । देवदत्त उसकी बुआ अमिता का पुत्र था । महानाम सिद्धार्थ की अपेक्षा बड़ा था और आनन्द छोटा ।
१०. सिद्धार्थ उनके साथ खेलता - खाता बड़ा हुआ ।
६. बचपन तथा शिक्षा
१. जब सिद्धार्थ थोड़ा चलने-फिरने योग्य हो गया, शाक्य जनपद के मुखिया इकट्ठे हुए और उन्होने शुद्धोदन से कहा कि बालक को ग्राह- देवी अभया के मन्दिर में ले चलना होगा ।
२. शुद्धोदन ने स्वीकार किया और बालक को कपड़े पहना देने के लिये महाप्रजापति से कहा ।
३. जब वह उसे वस्त्र पहना रही थी सिद्धार्थ ने अत्यन्त मधुर वाणी में अपनी मौसी से पूछा कि उसे कहाँ ले जाया जा रहा है? जब उसे पता लगा कि उसे मन्दिर ले जाया जा रहा है तो वह मुस्कराया । लेकिन शाक्यों के रीति-रिवाज का ध्यान कर वह चला गया ।
४. आठ वर्ष की आयु होने पर सिद्धार्थ ने अपनी शिक्षा आरम्भ की।
५. जिन्हें शुद्धोदन ने महामाया के स्वप्न की व्याख्या करने के लिये बुलाया था और जिन्होंने सिद्धार्थ के बारे में भविष्यवाणी की थी वे ही आठ ब्राह्मण उसके प्रथम आचार्य हुए ।
६. जो कुछ वे जानते थे जब वे सब सिखा चुके तब शुद्धोदन ने उदिच्च देश के उच्च कुलात्पन्न प्रथम कोटि के भाषा-विद् तथा वैयाकरण, वेद, वेदांग तथा उपनिषदों तेनु पूरे जानकर सब्बमित्त को बुला भेजा । उसके हाथ पर समर्पण का जल सिंचन कर शुद्धोदन ने सब्वमित्त को ही शिक्षण के निमित्त सिद्धार्थ को सौप दिया । वह उसका दूसरा आचार्य था ।
७. उसकी अधीनता में सिद्धार्थ ने उस समय के सभी दर्शन - शास्त्रों पर अपना अधिकार कर लिया ।
८. इसके अतिरिक्त उसने भारद्वाज से चित्त को एकाग्र तथा समाधिस्थ करने का मार्ग सीख लिया था । भारद्वाज आलार कालाम का शिष्य था । उसका अपना आश्रम कपिलवस्तु में ही था ।
