Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar - भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 4 मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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प्रथम भाग: जन्म से प्रव्रज्या

१. कुल

१. ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तर भारत सर्व प्रभुत्व सम्पन्न एक राज्य न था ।

२. देश अनेक छोटे बड़े राज्यों में बँटा हुआ था । इनमें से किसी-किसी राज्य पर एक राजा का अधिकार था, किसी-किसी पर किसी एक राजा का अधिकार न था ।

३. जो राज्य किसी एक राजा के अधीन थे उनकी संख्या सोलह थी । उनके नाम थे अंग, मगध, काशी. कोसल, (वज्जि), मल्ल, चेदि, वत्स, कुरु, पंचाल, मल्ल, सौरसेन, अष्मक, अवन्ति, गन्धार तथा कम्बोज ।

४.. जिन राज्यो, में किसी एक 'राजा' का आधिपत्य न था, वे थे कपिलवस्तु के शाक्य, पावा तथा कुसीनारा के मल्ल, वैशाली के लिच्छवि, मिथिला के विदेह, रामगाम के कोलिय, अल्लकप्प के बुलि, केसपुत के कालाम, कलिंग, पिपलवन के मौर्य, तथा भग्ग (भर्ग) जिनकी राजधानी सिंसुमारगिरि थी ।

५. जिन राज्यों पर किसी एक 'राजा' का अधिकार था वे जनपद कहलाते थे और जिन राज्यों पर किसी एक 'राजा' का अधिकार न था वे 'संघ' या 'गण' कहलाते थे ।

६. कपिलवस्तु के शाक्यों की शासन पद्धति के बारे में हमे, विशेष जानकारी नहीं है। हम नहीं जानते कि वहाँ प्रजातन्त्र था अथवा कुछ लोगों का शासन था ।

७. इतनी बात हम निश्चयपूर्वक कह सकते है कि शाक्यों के जनतन्त्र में कई राज परिवार थे और वे एक दुसरे के बाद क्रमश: शासन करते थे ।

८. राज परिवार का मुखिया राजा कहलाता था ।

९. सिद्धार्थ गौतम के जन्म के समय शुद्धोदन की 'राजा' बनने की बारा थी ।

१०. शाक्य राज्य भारत के उत्तर-पूर्व कोने में था। यह एक स्वतन्त्र राज्य था । लेकिन आगे चलकर कोशल- नरेश ने इसे अपने शासन- क्षेत्र में शामिल कर लिया था ।

११. इस ‘अधिराजिक-प्रभाव क्षेत्र में रहने का परिणाम यह था कि कोशल नरेश की स्वीकृति के बिना शाक्य-राज्य स्वतन्त्र रीति से अपने कुछ राजकीय अधिकारों का उपयोग न कर सकता था ।

१२. उस समय के राज्यों में कोशल एक शक्तिशाली राज्य था । मगध राज्य भी ऐसा ही था । कोशल- नरेश प्रसेनजित् और मगध- नरेश बिम्बिसार सिद्धार्थ गौतम के समकालीन थे।

Birth of Gautama Buddha

२. पूर्वज

१. शाक्यों की राजधानी का नाम कपिलवस्तु था । हो सकता है कि इस नगर का यह नाम महान बुद्धिवादी मुनि कपिल के ही नाम पर पड़ा हो ।

२. कपिलवस्तु में जयसेन नाम का एक शाक्य रहता था। सिंह हुन उसका पुत्र था । सिंह हुन का विवाह हुआ था कच्चाना से । उसके पांच पुत्र थे । शुद्धोदन, धौतोदन, शुक्लोदन, शाक्योदन तथा अमितोदन । पांच पुत्रों के अतिरिक्त सिंह- हुन की दो लडकियाँ थीं -- अमिता तथा प्रमिता ।

३. परिवार का गोत्र आदित्य था ।

४. शुद्धोदन का विवाह महामाया से हुआ था । उसके पिता का नाम अंजन था और मां का सुलक्षणा । अंजन कोलिय था और देवदह नाम की बस्ती में रहता था ।

५. शुद्धोदन बड़ा योद्धा था । जब शुद्धोदन ने अपनी वीरता का परिचय दिया तो उसे एक और विवाह करने की भी अनुमति मिल गई। उसने महाप्रजापति को चुना । महाप्रजापति महामाया की बड़ी बहन थी

६. शुद्धोदन बड़ा धनी आदमी था । उसके पास बहुत बड़े-बड़े खेत थे और नौकर-चाकर भी अनगिनत थे । कहा जाता है कि अपने खेतों को जोतने के लिये उसे एक हजार हल चलवाने पड़ते थे ।

७. वह बड़े अमन-चैन की जिन्दगी बसर करता था । उसके कई महल थे ।

३. जन्म

१. सिद्धार्थ गौतम ने शुद्धोदन के घर में जन्म ग्रहण किया था । उनके जन्म की कथा इस प्रकार है ।

२. शाक्य - राज्य के लोग आषाढ़ के महिने में एक महोत्सव मनाया करते थे । इस उत्सव में क्या राजा, क्या प्रजा सभी सम्मिलित होते थे ।

३. सामान्यरूप से यह महोत्सव सात दिन तक मनाया जाता था ।

४. एक बार महामाया ने इस उत्सव को बड़े ही आमोद-प्रमोद के साथ, बडी ही शान-शौकत के साथ, फूलों के साथ और सुगन्धियों के साथ मनाने का निश्चय किया। हाँ उसमें सुरामेरय आदि नशीली वस्तुओ का सर्वथा परित्याग था ।

५. . सातवें दिन वह प्रात:काल उठी। सुगन्धित जल से स्नान किया । चार लाख कार्षापणों का दान दिया । अच्छे से अच्छे गहने- कपडे पहने । अच्छे से अच्छे खाने खाये । व्रत रखे । तदनंतर वह खूब सजे-सजाये शयनानगर में सोने के लिये चली गई ।

६. उस रात शुद्धोदन और महामाया निकट हुए और महामाया ने गर्भ धारण किया । राजकीय शय्या पर पड़े पड़े उसे नींद आ गई । निद्रा- ग्रस्त महामाया ने एक स्वप्न देखा ।

७. उसे दिखाई दिया कि चतुर्दिक महाराजिक देवता उसकी शय्या को उठा ले गये हैं और उन्होने उसे हिमवन्त प्रदेश में एक शाल वृक्ष के नीचे रख दिया है। वे देवता पास खड़े हैं।

८. तब चतुर्दिक महाराजिक देवताओं की देवियाँ वहा आई और उसे उठाकर मानसरोवर ले गई ।

९. उन्होने उसे स्थान कराया, स्वच्छ वस्त्र पहनाये, सुगन्धियों का लेप किया और फूलो से ऐसा और इतना सजाया कि वह किसी दिव्यात्मा का स्वागत कर सके ।

१०. तब सुमेध नाम का एक बोधिसत्व उसके पास आया और उसने प्रश्न किया, "मैने अपना अन्तिम जन्म पृथ्वी पर धारण करने का निश्चय किया है, क्या तुम मेरी माता बनना स्वीकार करोगी?” उसका उत्तर था -- "बड़ी प्रसन्नता से ।” उसी समय महामाया देवी की आँख खुल गई ।

११. दूसरे दिन महामाया ने शुद्धोदन से अपने स्वप्न की चर्चा की । इस स्वप्न की व्याख्या करने में असमर्थ राजा ने स्वप्न-विद्या में प्रसिद्ध आठ ब्राह्मणो को बुला' भेजा ।

१२. उनके नाम थे राम, ध्वज, लक्ष्मण, मन्त्री, यण्ण, भोज, सुयाम और सुदत्त । राजा ने उनके योग्य स्वागत की तैयारी की ।

१३. उसने जमीन पर पुष्पवर्षा कराई और उनके लिये सम्मानित आसन बिछवाये ।

१४. उसने ब्राह्मण के पात्र चांदी-सोने से भर दिये और उन्हें घी, मधु, शक्कर, बढ़िया चावल तथा दूध से पके पकवानों से संतर्पित किया ।

१५. जब ब्राह्मण खा-पीकर प्रसन्न हो गये, शुद्धोदन ने उन्हें महामाया का स्वप्न कह सुनाया और पूछा -- “मुझे इसका अर्थ बताओ।”

१६. ब्राह्मणों का उत्तर था, “महाराज! निश्चित रहें। आपके यहाँ एक पुत्र होगा। यदि वह घर में रहेगा तो वह चक्रवर्ती राजा होगा, यदि गृहत्याग कर संन्यासी होगा तो वह बुद्ध बनेगा - संसार के अन्धकार का नाश करने वाला ।”

१७. पात्र में तेल धारण किये रहने की तरह महामाया बोधिसत्व को दस महीने तक अपने गर्भ में धारण किये रही । समय समीप आया जान उसने अपने मायके जाने की इच्छा प्रकट की । अपने पति को सम्बोधित करके उसने कहा- “मैं अपने मायके देवदह जाना चाहती हूँ ।"

१८. शुद्धोदन का उत्तर था-- “तुम जानती हो कि तुम्हारी इच्छा की पूर्ति होगी ।” कहारों के कन्धों पर ढोई जाने वाली सुनहरी पालकी में बिठवा कर अनेक सेवक-सेविकाओं के साथ शुद्धोदन ने महामाया को उसके मायके भिजवा दिया ।

१९. देवदह के मार्ग में महामाया को शाल वृक्षों के एक उद्यान-वन में से गुजरना था, जिसके कुछ वृक्ष पुष्पित थे कुछ अपुष्पित । यह लुम्बिनी-वन कहलाता था ।

२०. जिस समय पालकी लुम्बिनी-वन में से गुजर रही थे, सारा लुम्बिनी वन दिव्य चित्र लता की तरह अथवा किसी प्रतापी राजा सुसज्जित बाजार जैसा प्रतीत होता था ।

२१. जड से वृक्षों की शाखाओं के छोर तक पेड़ फलों और फूलों से लदे थे । नाना रंग के भ्रमर-गण गुन्जार कर रहे थे । पक्षी चहचहा रहे थे ।

२२. यह मनोरम दृश्य देखकर महामाया के मन में इच्छा उत्पन्न हुई कि वह कुछ समय वहाँ रहे और क्रीडा करे । उसने पालकी ढोने वालों को आज्ञा दी कि वह उसकी पालकी को शाल उद्यान में ले चले और वहाँ प्रतीक्षा करें ।

२३. महामाया पालकी से उतरी और एक सुन्दर शाल-वृक्ष की ओर बढ़ी । मन्द पवन बह रहा था, जिससे वृक्ष की शाखायें ऊपर- नीचे हिल डोल रही थी । महामाया ने उनमें से एक को पकड़ना चाहा ।

२४. भाग्यवश एक शाखा काफी नीचे झुक गई । महामाया ने पंजों के बल खड़ी होकर उसे पकड़ लिया । तुरन्त शाखा ऊपर की ओर उठी और उसका हलका सा झटका लगने से महामाया को प्रसव वेदना आरम्भ हुई । उस शाल वृक्ष की शाखा पकडे, खडे ही खडे महामाया ने एक पुत्र को जन्म दिया ।

२५. ५६३ ई. पू.. में वैशाख पुर्णिमा के दिन बालक ने जन्म ग्रहण किया ।

२६. शुद्धोदन और महामाया का विवाह हुए बहुत समय बीत गया था । लेकिन उन्हें कोई सन्तान न हुई थी । आखिर जब पुत्र- लाभ हुआ तो केवल शुद्धोदन और उसके परिवार द्वारा बल्कि सभी शाक्यों द्वारा पुत्र जन्मोत्सव बड़ी ही शान-बान और बड़े ही ठाट-बाट के साथ अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक मनाया गया ।

२७. बालक के जन्म के समय अपनी बारी से, शुद्धोदन पर कपिलवस्तु का शासन करने की जिम्मेदारी थी । वह 'राजा' कहलाया, और इसीलीये स्वाभाविक तौर पर बालक भी राजकुमार ।

४. असित का आगमन

१. जिस समय बालक का जन्म हुआ, उस समय हिमालय में असित नाम के एक बड़े ऋषि रहते थे ।

२. असित ने सुना कि आकाश स्थित देवता "बुद्ध" शब्द की घोषणा कर रहे है। उसने देखा कि वह अपने वस्त्रों को ऊपर उछाल- उछाल प्रसन्नता के मारे इधर-उधर घूम रहे है । वह सोचने लगा कि मैं वहाँ क्यों न जाऊँ, जहाँ 'बुद्ध' ने जन्म ग्रहण किया है ।

३. जब असित ऋषि ने समस्त जम्बुद्वीप पर अपनी दिव्यदृष्टि डाली, तो देखा कि शुद्धोदन के घर में एक दिव्य बालक ने जन्म ग्रहण किया है और देवताओं की भी इतनी अधिक प्रसन्नता का यही कारण है।

४. इसलिये वह महान ऋषि असित अपने भानजे नरदत्त के साथ राजा शुद्धोदन के घर आये और उसके महल के द्वार पर खड़े हए ।

५. अब असित ऋषि ने देखा कि शुद्धोदन के द्वार पर लाखों आदमियों की भीड एकत्रित है। वह द्वारपाल के पास गये और कहा -- “अरे ! जाकर राजा से कहो की दरवाजे पर एक ऋषि खड़े हुए।"

६. द्वारपाल राजा के पास गया और हाथ जोड़कर विनती की "राजन ! द्वार पर एक वृद्ध ऋषि पधारे है और आप से भेंट करना चाहते हैं ।"

७. राजा ने असित ऋषि के बैठने के लिये आसन की व्यवस्था की और द्वारपाल को कहा - "ऋषि को आने दो ।" महल के बाहर आकर द्वारपाल ने असित से कहा- “कृपया भीतर पधारें।”

८. असित ऋषि राजा के सामने उपस्थित हुए और उसे खड़े-खड़े आशीर्वाद दिया- "राजन ! आपकी जय हो । राजन! आपकी जय हो । आप चिरकाल तक जियें और अपने राज्य पर धर्मानुसार शासन करें ।”

९. तब शुद्धोदन ने असित ऋषि को साष्टांग दण्डवत् किया और उन्हें बैठने के लिये आसन दिया। जब उसने देखा कि असित ऋषि सुखपूर्वक आसीन है तो शुद्धोदन ने कहा -- “ऋषिवर ! मुझे स्मरण नहीं है कि इसके पूर्व आपके दर्शन हुए हों । आपके यहाँ आगमन का क्या उद्देश्य है? आपके यहाँ पधारने का क्या कारण है?"

१०. तब असित ऋषि ने राजा शुद्धोदन से कहा, "राजन! तुम्हें पुत्र लाभ हुआ है। मैं उसे देखने के लिये आया हूँ।”

११. शुद्धोदन बोला, “ऋषिवर! बालक सोया है । क्या आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करने की कृपा करेंगे?" ऋषि का उत्तर था, “राजन! इस तरह के दिव्य विभूतियाँ देर तक सोती नहीं रहतीं । वे स्वभाव से ही जागरूक होती है ।”

१२. तब बालक ने ऋषि पर अनुकम्पा करके अपने जागते रहने का संकेत किया ।

१३. यह देख कि बालक जाग उठा है, शुद्धोदन ने उसे दृढ़तापूर्वक दोनो हाथो में लिया और असित ऋषि के सामने ले आया । १४. असित ने देखा कि बालक बत्तीस महापुरुष-लक्षणों तथा अस्सी अनुव्यञ्जनों से युक्त है। उसने देखा कि उसका शरीर शुक्र और ब्रह्मा के शरीर से भी अधिक दीप्त है और उसका तेजोमण्डल उनके तेजोमण्डल से लाख गुणा अधिक प्रदीप्त है । उसके मुँह से तुरन्त यह वाक्य निकला -- "निस्सन्देह यह अद्भुत पुरुष है ।" वे अपने आसन से उठे, दोनों हाथ जोड़े और उसके पैरों पर गिर पड़े । उन्होने बालक की परिक्रमा की और उसे अपने हाथों में लेकर विचार-मग्न हो गये ।

१५. असित ऋषि पुरानी भविष्यवाणी से परिचित थे कि जिसके शरीर में गौतम की ही तरह के बत्तीस महापुरुष-लक्षण होंगे, वह इन दो गतियों में से एक को निश्रित रूप से प्राप्त होगा, तीसरी को नहीं । “यदि वह गृहस्थ रहेगा, तो वह चक्रवर्ती नरेश होगा ।, लेकिन यदि वह गृहत्याग कर प्रव्रजित हो जायेगा तो वह सम्यक सम्बुद्ध होगा ।”

१६. असित ऋषि को निश्चय था कि यह बालक गृहस्थ नहीं बनेगा । १७. बालक की ओर देखकर, वह सिसकियाँ भर भर कर रोने लगा ।

१८. शुद्धोदन ने देखा कि असित ऋषि सिसकियाँ भर भर कर रो रहा है ।

१९. उसे इस प्रकार रोता देखकर, शुद्धोदन के रोंगटे खडे हो गये । उसने असित ऋषि से निवेदन किया -- “ऋषिवर ! आप इस प्रकार रो क्यों रहे हैं? आंसू क्यों बहा रहे हैं? ठंडी साँस क्यों ले रहे हैं? मैं समझता हूँ कि बालक का भविष्य तो निर्विघ्न ही है ?"

२०. असित ऋषि ने राजा को उत्तर दिया – “राजन ! मैं बच्चे के लिये नहीं रो रहा हूँ । इसका तो भविष्य निर्विघ्न है । मैं अपने लिये रो रहा हूँ ।"

२१. "ऐसा क्यों?” शुद्धोदन ने पूछा । असित ऋषि का उत्तर था, "मै जरार्जीर्ण हूँ, वयः प्राप्त हूँ और यह बालक निश्चयात्मक रूप से ‘बोधि' लाभ करेगा, सम्यकसंबुद्ध होगा । तदनन्तर वह लोक-कल्याण के लिये अपना धम्म चक्र प्रवर्तित करेंगा, जो इससे पहले इस संसार में कभी प्रवर्तित नहीं हुआ है।"

२२. "जिस श्रेष्ठ जीवन की, जिस सद्धर्म की वह घोषणा करेगा वह आदि में कल्याणकारक होगा, मध्य में कल्याणकारक होगा और अन्त में कल्याणकाकरक होगा । वह अर्थ तथा व्यञ्जन की दृष्टि से निर्दोष होगा । वह परिशुद्ध होगा । वह परिपूर्ण होगा ।

२३. “जिस प्रकार राजन ! कभी कहीं इस संसार में उदुम्बर ( गूलर ) पुष्पित होता है, उसी प्रकार अनंत युगों के अनन्तर इस संसार में कहीं बुद्धोत्पाद होता है । राजन! इसी प्रकार निश्चय से यह बालक 'बोधि' लाभ करेगा, सम्यक् सम्बुद्ध होगा और तदनन्तर अनन्त प्राणियों को इस दुःखमय सागर के पार ले जाकर सुखी करेगा ।

२४. “लेकिन राजन्! मै उस बुद्ध को नहीं देख सकूंगा ! इसलिये राजन! मैं इस दुःख से दुखी हूं और रो रहा हूँ । मेरे भाग्य में उस बुद्ध की पूजा करना नहीं बदा है ।"

२५. तब राजा ने असित ऋषि और उसके भानजे नाहक (नरदत्त) को श्रेष्ठ भोजन से संतर्पित किया और वस्त्र दान दे उनकी परिक्रमा कर वन्दना की ।

२६. तब असित ने अपने भानजे नालक को कहा, "नरदत्त ! जब कभी तुम्हें यह सुनने को मिले कि यह बालक 'बुद्ध' हो गया है तो जाकर शरण ग्रहण करना । यह तेरे सुख, कल्याण और प्रसन्नता के लिये होगा ।” इतना कहकर असित ने राजा से विदा ली और अपने आश्रम चला गया ।

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