Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar - भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर - Page 2 मुख्य मजकूराकडे जा

भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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16 जून 2023
Book
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परिचय

     भारतीय जनता के एक वर्ग की बौद्ध धम्म में दिलचस्पी बढ़ती चली जा रही हैं - इसके लक्षण स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहे हैं । इसके साथ साथ एक और स्वाभाविक मांग भी उत्तरोत्तर बढती जा रही है और वह है भगवान् बुद्ध के चरित्र और उनकी शिक्षाओं के सम्बन्ध में एक स्पष्ट तथा संगत ग्रन्थ की ।

bhagwan buddha aur unka dhamma - Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar in Hindi

     किसी भी अबौद्ध के लिये यह कार्य अत्यन्त कठिन है कि वह भगवान् बुद्ध के चरित्र और उनकी शिक्षाओं को एक ऐसे रूप में पेश कर सके कि उनमें संपुर्णता के साथ साथ कुछ भी असंगति न रहे । जब हम दीघनिकाय आदि पालि ग्रन्थों के आधा भगवान् बुद्ध का जीवन चरित्र लिखने का प्रयास करते हैं तो हमें वह कार्य सहज प्रतीत नहीं होता, और उनकी शिक्षाओं की सुसंगत अभिव्यक्ति तो और भी कठिन हो जाती है । यथार्थ बात है और ऐसा कहने में कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं कि संसार में जितने भी धर्मो के संस्थापक हुए है, उनमें भगवान बुद्ध की चर्या का लेखा-जोखा हमारे सामने कई ऐसी समस्यायें पैदा करता है जिनका निराकरण यदि असम्भव नहीं तो अत्यन्त कठिन अवश्य है । क्या यह आवश्यक नहीं कि इन समस्याओं का निराकरण किया जाय और बौद्ध धम्म के समझने- समझाने के मार्ग को निष्कण्टक किया जाय ? क्या अब वह समय नहीं आ गया है कि बौद्धजन उन समस्याओं को ले, उन पर खुला विचार-विमर्श करें और उन पर जितना भी प्रकाश डाला जा सके डालने का प्रयास करें?

     इन समस्याओं की ही चर्चा को उत्पेरित करने के लिये मै उनका यहां उल्लेख कर रहा हूँ ।

     पहली समस्या भगवान् बुद्ध के जीवन की प्रधान घटना प्रव्रज्या के ही सम्बन्ध में है । बुद्ध ने प्रव्रज्या क्यों ग्रहण की ? परम्परागत उत्तर है कि उन्होने प्रव्रज्या इसलिये ग्रहण की क्योंकि उन्होने एक वृद्ध पुरुष, एक रोगी व्यक्ति तथा एक मुर्दे की लाश को देखा था । स्पष्ट ही यह उत्तर गले के नीचे उतरने वाला नहीं । जिस समय सिद्धार्थ (बुद्ध) ने प्रव्रज्या ग्रहण की थी उस समय उनकी आयु २९ वर्ष की थी । यदि सिद्धार्थ ने इन्ही तीन दृष्यों को देखकर प्रव्रज्या ग्रहण की तो यह कैसे हो सकता है कि २९ वर्ष की आयु तक सिद्धार्थ ने कभी किसी बूढे, रोगी, तथा मृत व्यक्ति को देखा ही न हो? यह जीवन की ऐसी घटनायें है जो रोज ही सैकडो हजारों घटती रहती है और सिद्धार्थ ने २९ वर्ष की आयु होने से पहले भी इन्हें देखा ही होगा । इस परम्परागत मान्यता को स्वीकार करना असम्भव है कि २९ वर्ष की आयु होने तक सिद्धार्थ ने एक बुढे, रोगी और मृत व्यक्ति को देखा ही नहीं था और २९ वर्ष की आयु होने पर ही प्रथम बार देखा । यह व्याख्या तर्क की कसौटी पर कसने पर खरी उतरती प्रतीत नहीं होती । तब प्रश्न पैदा होता है कि यदि यह व्याख्या ठीक नही तो फिर इस प्रश्न का यथार्थ उत्तर क्या है?

     दूसरी समस्या चार आर्य-सत्यों से ही उत्पन्न होती है । प्रथम सत्य है दुःख आर्य सत्य? तो क्या चार सत्य भगवान् बुद्ध की मूल शिक्षाओं मे समाविष्ट होते हैं ? जीवन स्वभावतः दुःख है, यह सिद्धान्त जैसे बुद्ध धम्म की जड़ पर ही कुठाराघात करता प्रतीत होता है । यदि जीवन ही दुःख है, मरण भी दुःख है, पुनरूत्पत्ति भी दुःख है, तब तो सभी कुछ समाप्त है। न धम्म ही किसी आदमी को इस संसार में सुखी बना सकता है और न दर्शन ही । यदि दुःख से मुक्ति ही नही है तो फिर धम्म भी क्या कर सकता है और बुद्ध भी किसी आदमी को दुःख से मुक्ति दिलाने के लिये क्या कर सकता है क्योंकि जन्म ही स्वभावतः दुःखमय है । यह चारो आर्य-सत्य-जिनमे प्रथम आर्य सत्य ही दुःख सत्य है - अबौद्धों द्वारा बौद्ध धम्म ग्रहण किये जाने के मार्ग में बड़ी बाधा है । ये उनके गले आसानी से नहीं उतरते । ऐसा लगता है कि ये सत्य मनुष्य को निराशावाद के गढ़े मे ढकेल देते है । ये 'सत्य' भगवान् बुद्ध के धम्म को एक निराशावादी धम्म के रूप में उपस्थित करते है । प्रश्न पूछा जा सकता है कि क्या ये चार आर्य सत्य भगवान बुद्ध की मूल-शिक्षायें ही है अथवा ये बाद का भिक्षुओ का किया गया प्रक्षिप्तांश है?

     एक तीसरी समस्या आत्मा, कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त को लेकर है । भगवान बुद्ध ने 'आत्मा' के अस्तित्व से इनकार किया । लेकिन साथ ही कहा जाता है कि उन्होने 'कर्म' तथा 'पुनर्जन्म' के सिद्धान्त का भी समर्थन किया है। प्रश्न पैदा हो सकता हैं, ‘आत्मा' ही नहीं तो कर्म कैसा ? 'आत्मा' ही नहीं तो पुनर्जन्म कैसा? ये सचमुच टेढ़े प्रश्न है। भगवान् बुद्ध ने 'कर्म' तथा 'पुनर्जन्म' शब्दों का प्रयोग किन विशिष्ट अर्थो मे किया है ? क्या भगवान् बुद्ध ने इन शब्दों का किन्ही ऐसे विशिष्ट अर्थो मे प्रयोग किया, जो अर्थ उन अर्थों से सर्वथा भिन्न थे, जिन अर्थो में भगवान् बुद्ध के समकालीन ब्राह्मण इन शब्दों का प्रयोग करते थे? यदि हां, तो वह अर्थ-भेद क्या था ? अथवा उन्होंने उन्हीं अर्थो मे इन शब्दों का प्रयोग किया जिन अर्थो मे ब्राह्मणजन इनका प्रयोग करते थे ? यदि हां तो क्या ‘आत्मा' के अस्तित्व के अस्वीकार करने तथा 'कर्म' और 'पुनर्जन्म' के सिद्धान्त को मान्य करने में भयानक असंगति नहीं है ?

     एक चौथी समस्या भिक्षु को ही लेकर है। भगवान बुद्ध ने किस उद्देश्य से भिक्षु संघ की स्थापना की ? क्या उनका उद्देश्य एक (समाज- निरपेक्ष ) आदर्श मनुष्य का निर्माण मात्र था ? उथवा उनका उद्देश्य आदर्श समाज सेवकों की रचना था जो इन सहायक के मित्र, मार्ग- दर्शक तथा दार्शनिक एक साथ हों । यह एक अत्यन्त महत्व का प्रश्न है । इस पर बौद्ध - धम्म का भविष्य तक निर्भर करता है । यदि भिक्षु एक “सम्पूर्ण मनुष्य” मात्र बना रहेगा तो उसका धम्मप्रचार कार्य में कोई उपयोग नहीं, क्योकि वह एक "सम्पूर्ण मनुष्य" होने के बावजूद एक "स्वार्थी" आदमी ही बना रहेगा । दूसरी ओर, यदि वह समाज सेवक भी है तो उससे बौद्ध- धम्म भी कुछ आशा रख सकता है । इस प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया ही जाना चाहिये; सैद्धान्तिक संगति बैठाने के लिये ही नहीं, भावी बौद्ध धम्म के हिताहित की दृष्टि से भी ।

     मै समझता हूँ कि मेरे द्वारा उठाये गये ये प्रश्न (जिन का उत्तर आप इस पुस्तक में पायेंगे -- अनु. ) पाठकों को कुछ सोचने- विचारने पर मजबूर करेंगे और वे भी यथासमय अपना मत जागृता से व्यक्त करेंगे ही।

आमुख

     “समय-समय पर प्रचलित और आनुवंशिक विश्वासों तथा विचारों पर पुनर्विचार करने, वर्तमान और विगत अनुभव के बीच सामजस्य स्थापित करने एवं ऐसी स्थिति तक पहुँचने के लिए जो भावना और चिंतन की माँगों को पूरा करती है और भविष्य का सामना करने के लिए स्व-विश्वास प्रदान करती है, मनुष्य अपने आपको बाध्य पाते हैं । यदि वर्तमान दिवस पर, व्यावहारिक और सैद्धांतिक दोनों के महत्व को आलोचनात्मक और वैज्ञानिक गवेषणा के विषय के रूप में धर्म ने वर्धमान ध्यान आकर्षित किया है, तो इसका श्रेय दिया जा सकता है (क) वैज्ञानिक ज्ञान और चिंतन की द्रुतगामी प्रगति, (ख) इस विषय में गहनतर बौद्धिक रूचि, (ग) विश्व के सभी भागों में धर्म को सुधारने अथवा पुननिर्मित करने, अथवा इसके स्थान पर किसी अधिक "बुद्धिवादी” और “वैज्ञानिक” या कम ‘अंधविश्वासपूर्ण चिंतन धारा को लाने की व्यापक प्रवृत्ति और (घ) उस प्रकार की अतीत की सामाजिक, राजनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं के प्रभाव को जिन्होंने धर्म को प्रभावित भी किया है और उससे प्रभावित भी हुई हैं | जब भी नीतिपरक अथवा नैतिक मूल्य की गतिविधियों या स्थितियों पर प्रश्न उठाया जाता है, तो उसमें धर्म का महत्व संलिप्त होता है और गहराई तक आंदोलित करने वाले सभी अनुभव 'मूल्य निरंतर' सर्वाधिक मूलभूत विचारों के पुनर्विचार को बाध्य करते हैं, चाहे वे प्रत्यक्ष रूप से धार्मिक हों अथवा नहीं । अंततोगत्वा, न्याय, मानव नियति, ईश्वर और संसार सम्बंधी समस्याएं उठती हैं और बदले में इनसे 'धार्मिक' तथा अन्य विचारों के पारस्परिक संबंध, सामाधरण ज्ञान की मान्यता और 'अनुभव' तथा 'वास्तविकता' की व्यावहारिक अवधारणाओं की समस्याएं संबद्ध होती हैं ।

- 'इन्साइक्लोपीडिया ऑफ रिलीजन ऐंड इथिक्स', खंड -x,  पृ. 669

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