भगवान बुद्ध और उनका धम्म - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Bhagwan Buddha aur Unka Dhamma Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
६. महाराजा प्रसेनजित की धम्म दीक्षा
१. जब यह सुना कि शाक्य मुनि गौतम बुद्ध पधारे हैं तो राजा प्रसेनजित् अपने रथ पर चढ़कर जेतवन पहुँचा । दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करने के अनन्तर उसने कहा-
२. “यह मेरे राज्य का भाग्य है कि आप यहां पधारे हैं। आपके समान धम्मराजा के रहते मेरे राज्य पर कोई भी आपत्ति आ ही कैसे सकती है?"
३. “अब जब आपके दर्शन हो गये तो कुछ धम्मामृत भी पान करने को मिले ।”

४. “सांसारिक सम्पति अनित्य है और नाशवान् है, किन्तु जो धम्म रूपी धन है वह अनन्त है और नाशवान् नहीं है । राजा होने पर भी संसारी आदमी दुःखी ही रहता है । किन्तु एक साधारण आदमी भी, यदि वह धम्मपरायण है, सुखी रहता है ।”
५. धन और काम-भोग की तृष्णा के कारण भारी हुए राजा के चित्त की अवस्था पहचान कर तथागत ने उपदेश दिया-
६. “जिनका जन्म अति सामान्य स्थिति में हुआ रहता है वे भी जब किसी धम्म-परायण आदमी को देखते हैं तो उनके मन में उस आदमी के लिये आदर की भावना पैदा हो जाती है, तो फिर जिसने पहले बहुत पुण्य अर्जित किये है, ऐसे राजा का तो क्या ह कहना ?"
७. “और अब जब मैं संक्षेप में धर्मोपदेश देने जा रहा हूं, महाराज! मेरे शब्दों को ध्यानपूर्वक सुनें और उन्हें हृदयगम करें!”
८. "हमारे अच्छे या बुरे कर्म छाया की तरह हमारा पीछा करते रहते हैं ।"
९. "जिस चीज की सर्वाधिक आवश्यकता है, वह है मैत्रीपूर्ण हृदय ।"
१०. “ अपनी प्रजा को अपनी अकेली सन्तान के समान समझें । उन्हे कष्ट न दें, उन्हें नष्ट न करें। अपने शरीर के सभी अंगों को संयत रखें । कुमार्ग छोड़कर, सन्मार्ग पर चलें । दूसरों को नीचे गिराकर अपने को ऊपर न उठायें । दुःखी को सुख- और सान्तवना दें।"
११. “राजकीय ठाट-बाट को अधिक महत्व न दे और खुशामदियों की मीठी लगने वाली बातें न सुनें ।”
१२. “अपने आपको काय-क्लेश द्वारा पीड़ित करने से कुछ लाभ नहीं है, लेकिन 'धम्म' और 'सुपथ' का विचार करें ।”
१३. “हम चारों ओर से शोक तथा दुःख को चट्टानों में घिरे हुए हैं और धम्म का विचार करने से ही हम इस दुःखों के पर्वत को लांघ सकते हैं।"
१४. “तब अन्याय करने में लाभ ही क्या है?"
१५. “सभी बुद्धिमान शारीरिक ऐशो आराम की उपेक्षा करते हैं । वे कामनाओं से दूर रहकर अपना आध्यात्मिक विकास करने के लिये प्रयत्नशील रहते हैं ।"
१६. “जब कोई वृक्ष आग से झुलस रहा हो तो पक्षी उस पर अपने घोंसले कैसे बना सकते हैं? जहां राग का निवास है, वहां सत्य कैसे टिक सकता है? यदि किसी को इस बात का ज्ञान नहीं तो किसी विद्वान् को ऋषि मानकर चाहे उसकी प्रशंसा ही क्यों न की जाती हो, वह अज्ञानी ही है ।"
१७. “जिसे यह ज्ञान प्राप्त है, उसे ही प्रज्ञा की प्राप्ति होती है । प्रज्ञा की प्राप्ति ही मानव जीवन का एकमात्र उद्देश्य है । इसकी उपेक्षा, जीवन की असफलता की द्योतक है ।”
१८. “सभी धार्मिक मतों की शिक्षाओं का यही एक केन्द्र-बिन्दू होना चाहिये । इसके बिना सब निरर्थक है ।"
१९. “यह सत्य कोई प्रव्रजितों के ही लिए नहीं है, इसका सम्बन्ध मानव मात्र से है, साधु और गृहस्थ से समानरूप से । व्रतधारी प्रव्रजित में और गृहस्थ में मूलतः कोई भेद नहीं है । प्रव्रजित भी पतित होकर विनाश को प्राप्त होते हैं और गृहस्थ भी ऋषियों के दर्जे तक पहुँचते हैं ।"
२०. “कामाग्नि का खतरा सभी के लिये समान है, यह दुनिया को बाढ़ की तरह बहा ले जाता है । जो एक बार इस भँवर-जाल में फस गया, उस का बच निकलना कठिन है। लेकिन प्रज्ञा की नौका विद्यमान है और विचार शक्ति का चप्पु । धम्म की यही मांग है कि आप अपने आप को मार रूपी शत्रु से सुरक्षित रखें ।”
२१. “क्योंकि कर्मों के फल से बच निकलना असम्भव है, इसलिए हम शुभ कर्म ही करें।"
२२. “हम अपने विचारों की चौकसी रखें ताकि हम से कोई बुरा काम न हो, क्योंकि जैसा हम बोयेंगे वैसा ही हम काटेंगे ।”
२३. “आदमी प्रकाश से अंधेरे में और फिर अंधेरे से प्रकाश में जा सकता है। अंधेरे से और भी अधिक अंधेरे की ओर अग्रसर होने के भी मार्ग है, इसी प्रकार प्रकाश से अधिक प्रकाश की ओर बुद्धिमान् आदमी ज्ञान के अनुसार आचरण करेगा ताकि उसे और भी अधिक ज्ञान प्राप्त हो। वह लगातार सत्य की ओर अग्रसर होता रहेगा ।"
२४. “बुद्धिसंगत-व्यवहार और सदाचार-परायण जीवन द्वारा सच्चे श्रेष्ठत्व का प्रकाश हो । भौतिक वस्तुओं की तुच्छता पर गहराई से विचार किया जाय और जीवन की अस्थिरता को अच्छी तरह समझ लिया जाय ।"
२५. “अपने विचारों को ऊंचा उठाओ, श्रद्धा और दृढ़ता को अपनाओ । राजधम्म के नियमों का उल्लंघन न करो। अपनी प्रसन्नता का आधार बाह्य-पदार्थो को नहीं, बल्कि अपने प्रीती युक्त मन को ही बनाओ । इससे सुदूर भविष्य तक के लिये तुम्हारा यश अमर रहेगा ।"
२६. राजा ने बड़े ध्यान से तथागत के अमृत वचनों का पान किया और हर वचन को हृदयंगम किया । उसने जीवन पर्यन्त 'उपासक' बने रहने की इच्छा से तथागत की शरण ग्रहण की।
७. राज वैद्य जीवक की धम्म दीक्षा
१. जीवक ने राजगृह की एक वेश्या शालवती के गर्भ से जन्म धारण किया था ।
२. जन्म के तुरन्त बाद ही, उसे एक टोकरी में डाल कर कूडे के एक ढेरी पर फेंक दिया गया --अज्ञात पिता का पुत्र जो था ।
३. बहुत से लोग कुडे के ढेर के पास खड़े होकर 'बच्चे' को देख रहे थे । राजकुमार 'अभय' का उधर से गुजरना हुआ । उसने लोगों से पूछा । लोगों ने बताया 'यह जीवित है' ।
४. इसीलीये उस का नाम जीवक पड़ा । अभय ने उसे अपना लिया और पालन-पोषण कर बड़ा किया ।
५. जब जीवक बड़ा हुआ तो उसे पता लगा कि किस प्रकार उसका जीवन सुरक्षित रहा था । उसकी उत्कट अभिलाषा हुई कि वह अपने आप को दूसरों का जीवन बचाने के ही अधिकाधिक योग्य बनाये ।
६. इसलिये वह अभय को बिना बताये ही तक्षशिला विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिये चला गया और वहां उसने अध्ययन में सात वर्ष बिताये ।
७. राजगृह लौट कर उसने चिकित्सा करनी आरम्भ की और अचिरकाल में ही बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली ।
८. सर्वप्रथम उसने सांकेत के एक सेठ की स्त्री की चिकित्सा की । उसके अच्छा हो जाने पर उसे सोलह हजार कार्षापण, एक दास, एक दासी और घोडे सहित एक गाड़ी मिली ।
९. उसकी योग्यता जान, अभय ने उसे अपने ही भवन में रख लिया ।
१०. राजगृह में ही उसने राजा बिम्बिसार का भयानक भगन्दर रोग अच्छा किया। कहा जाता है कि इससे प्रसन्न होकर राजा की सभी पाँच सौ रानियो ने अपने अपने सभी गहने जीवक को दे दिये ।
११. उल्लेख करने लायक चिकित्साओं में उसकी एक वह शल्यचिकित्सा थी जो जीवक ने राजगृह के एक सेठ की खोपड़ी की की थी, और दूसरी बनारस के उस श्रेष्ठी के लड़के की जो अन्तडियो के रोग से चिर- काल से दुःखी था ।
१२. जीवक को राजा ने अपना तथा अपने रनिवास का 'राज- वैद्य' नियुक्त किया ।
१३. लेकिन जीवक की तथागत में बड़ी भक्ति थी । वह शाक्य मुनि गौतम बुद्ध और संघ का भी चिकित्सक था ।
१४. वह तथागत का उपासक बना । भगवान बुद्ध ने उसे भिक्षु नहीं बनाया, क्योंकि वह चाहते थे कि वह चिकित्सा द्वारा रोगियों और जीवकों की सेवा करता रहे।
१५. बिम्बिसार की मृत्यु के अनन्तर जीवक उसके पुत्र अजात शत्रु का भी चिकित्सक रहा । पितृ-हत्या का पाप कर चुकने के बाद अजात शत्रु को तथागत के समीप लाने में मुख्य हाथ जीवक का ही था ।