प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar
ब्राह्मणवाद अपनी विजय के बाद मुख्य रूप से जिस कार्य में जुट गया, वह था वर्ण को जाति में बदलने का कार्य, जो बड़ा ही विशाल और स्वार्थपूर्ण था। हमारे पास उन उपायों के बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं है, जो ब्राह्मणवाद ने इस प्रकार के परिवर्तन को लाने के लिए किए। इसके बजाए 'वर्ण' और 'जाति' के बीच के संबंध के बारे में कुछ भ्रांत विचारधाराएं हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि वर्ण और जाति एक ही बात है। जो लोग इन्हें अलग-अलग समझते हैं, उनका यह विश्वास है कि जब सामाजिक व्यवस्था में अंतर्विवाह निषिद्ध समझा जाने लगा, तब वर्ण जाति बन गया। वस्तुतः यह सब गलत है और यहां गलती इस तथ्य में है कि वर्ण को जाति में बदलते समय मनु ने अपने उद्देश्य की कहीं भी व्याख्या नहीं की और न यही स्पष्ट किया कि उसके साधन उन उद्देश्यों के साथ किस प्रकार संबद्ध हैं। ऑस्कर वाइल्ड का कहना है कि इसे समझने के लिए खोज करनी आवश्यक है । मनु किसी की पकड़ में नहीं आना चाहता था। इसलिए वह अपने लक्ष्यों और साधनों के विषय में मौन है। वह यह काम लोगों के लिए छोड़ देता है कि वह इनके बारे में अनुमान करें। हिंदुओं के लिए यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है, जिससे मनु की योजना के बारे में विभिन्न व्यक्तियों के अनुमानों के कारण उत्पन्न भ्रांतियों को दूर किया जा सके और यह स्पष्ट किया जा सके कि ब्राह्मणवाद ने समाज के आधार के रूप में वर्ण की मूल संकल्पना को किस प्रकार गलत और घातक स्वरूप दे दिया।
जैसा कि मैंने कहा है, मनु ने जो उपाय अपनाए, उन्हें उसने व्यक्त नहीं होने दिया, उन्हें प्रच्छन्न रखा। इसलिए हम जाति के रूप में वर्ण के इस परिवर्तन का ब्यौरेवार और तिथिक्रम से विवरण नहीं दे सकते। लेकिन सौभाग्य से कुछ ऐसे संकेत उपलब्ध हैं, जिनसे इस बात की पर्याप्त रूप से स्पष्ट जानकारी मिलती है कि यह परिवर्तन किस प्रकार किया गया।
यह बताने से पहले कि यह परिवर्तन किस प्रकार किया गया, मैं उस भ्रांति को स्पष्ट करना चाहता हूं जो लोगों के दिमाग में वर्ण और जाति को लेकर फैली हुई है। इसे दूर करने का सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम इन दोनों के बीच समान तत्वों और विषमताओं पर गौर करें। वर्ण और जाति कानूनी अर्थ में एक-दूसरे के पर्यायवाची हैं। दोनों का अभिप्राय पद और व्यवसाय से है। पद और व्यवसाय, दो ऐसी अवधारणाएं हैं जो वर्ण और जाति, दोनों की धारणाओं में सन्निहित हैं। लेकिन वर्ण और जाति, दोनों का एक विशेष महत्व है जिसके कारण दोनों एक-दूसरे से भिन्न हैं। वर्ण तो पद या व्यवसाय किसी भी दृष्टि से वंशानुगत नहीं है। दूसरी ओर, जाति में एक ऐसी व्यवस्था निहित है जिसमें पद और व्यवसाय, दोनों ही वंशानुगत हैं और इसे पुत्र अपने पिता से ग्रहण करता है।
जब मैं यह कहता हूं कि ब्राह्मणवाद ने वर्ण को जाति में बदल दिया, तब मेरा आशय यह है कि इसने पद और व्यवसाय को वंशानुगत बना दिया ।
यह परिवर्तन किस प्रकार किया गया? जैसा मैंने कहा, कि इस परिवर्तन को करने के लिए ब्राह्मणवाद ने जो उपाय किए, उनके कोई पदचिह्न उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन ऐसे संकेत हैं जो हमें इसका स्पष्ट चित्र देते हैं कि यह योजना किस प्रकार कार्यान्वित की गई।
यह परिवर्तन विभिन्न चरणों में संपन्न किया गया। जाति के रूप में वर्ण के रूपांतरण में तीन चरण तो बिल्कुल स्पष्ट हैं। पहला चरण तो यह था जब व्यक्ति का वर्ण, अर्थात् पद और व्यवसाय केवल निर्धारित अवधि के लिए होता था। दूसरा चरण वह था कि जब किसी व्यक्ति के वर्ण में निहित पद और व्यवसाय केवल उसके जीवन काल तक सुनिश्चित रहा। तीसरा चरण वह था जब वर्ण का पद और व्यवसाय वंशानुगत हो गया । कानून की शब्दावली में कहा जाए तो यह कि वर्ण द्वारा प्रदत्त संपदा शुरू में केवल किसी एक अवधि के लिए थी। इसके बाद यह जीवन भर के लिए ही बनी और अंत में यही संपदा वंशानुगत बन गई। इस प्रकार वर्ण जाति में परिवर्तित हो गए। ऐसा प्रतीत होता है। कि इस बात की पुष्टि के लिए परंपरा के आधार पर पर्याप्त प्रमाण हैं, जिसका उल्लेख धार्मिक साहित्य' में हुआ है कि वर्ण जिन अवस्थाओं में से होकर जाति बने, वह यही तीन अवस्थाएं हैं। इस परंपरा को कुछ इस प्रकार समझने का कोई कारण नहीं है कि यह वास्तविक स्थिति की प्रतीक न हो। इस परंपरा के अनुसार किसी भे व्यक्ति के वर्ण का निश्चय करने का काम अधिकारियों के एक दल द्वारा किया जाता था, जिन्हें मनु और सप्तर्षि कहते थे। व्यक्ति के समूह में से मनु उनका चुनाव करता था, जो क्षत्रिय और वैश्य होने के योग्य होते थे और सप्तर्षि उन व्यक्तियों को चुनते थे जो ब्राह्मण होने के योग्य होते थे। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होने के लिए मनु और सप्तर्षियों द्वारा व्यक्तियों का चुनाव करने के बाद बाकी व्यक्ति जो नहीं चुनने जा सकते थे, वे शूद्र कहलाते थे। इस प्रकार जो वर्ण-व्यवस्था निश्चित की जाती थी, वह एक युग, अर्थात् चार वर्ष की अवधि तक रहती थी। हर चौथे वर्ष अधिकारियों का नया दल नयाचुनाव करने के लिए नियुक्त होता था। जिसकी पद संज्ञा, वही मनु और सप्तर्षि, होती थी। इस प्रक्रिया में यह होता था जो लोग पिछली बार केवल शूद्र होने के योग्य बच जाते थे, वे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुन लिए जाते थे, जबकि पिछली बार जो लोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य होने के लिए चुने गए थे, वे केवल शूद्र होने के योग्य होने के कारण रह जाते थे। इस प्रकार वर्ण के व्यक्ति बदलते रहते थे। यह एक प्रकार से निश्चित अवधि पर होने वाला परिवर्तन था। जैसे ताश के पत्ते हर बाजी के बाद फेंट दिए जाते हैं, और व्यक्तियों का चुनाव उनकी मानसिक और शारीरिक अभिरुचि और व्यवसायों के आधार पर होता था, जो समाज के जीवन के लिए अनिवार्य होते थे। जिस काल में वर्णों में व्यक्तियों की अदला-बदली होती थी, उसे ‘मन्वन्तर' कहते थे। इस शब्द का अर्थ वह अवधि भी है, जिसके लिए किसी व्यक्ति को वर्ण निश्चित किया जाता था। व्युत्पत्ति की दृष्टि से इसका अर्थ मनु द्वारा किया गया वर्ण-व्यवस्था के आवश्यक तत्वों को अभिव्यक्त करता है, ये दो तत्व थे। पहला यह कि वर्ण का निश्चय लोगों की एक स्वतंत्र सत्ता के द्वारा किया जाता था, जिसे मनु और सप्तर्षि कहते थे। दूसरा यह कि अमूक वर्ण किसी अवधि का था, जिसके बाद मनु द्वारा परिवर्तन किया जाता था² पुराणों में वर्णित प्राचीन परंपरा के अनुसार जितनी अवधि के लिए किसी भी व्यक्ति का वर्ण मनु और सप्तर्षि द्वारा निश्चित किया जाता था, वह चार वर्ष की होती थी और उसे युग कहते थे। चार वर्ष की अवधि की समाप्ति पर मन्वन्तर होता था जिसके द्वारा हर चार वर्ष बाद सूची में संशोधन कर दिया जाता था। इस संशोधन के अधीन कुछ का पिछला वर्ण बदल जाता था, कुछ का बना रहता था, कुछ अपने वर्ण को गंवा देते थे और कुछ को लाभ हो जाता था । ¹
1. मैं यहां श्री दफ्तरी और प्रज्ञानेश्वर यति के शोध में प्राप्त विवरण को अपने लेख में अपना आधार बना रहा हूं। श्री दफ्तरी की धर्म रहस्य और श्री यति की चातुर्वर्ण्य नामक पुस्तक में उनके दृष्टिकोण सर्वथा मौलिक हैं, अतः ये बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। उन्होंने जो रूपरेखा दी है, उसके आधार पर निस्संदेह आगे अनुसंधान किया जाना चाहिए।
2. इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि सुमति भार्गव ने अपनी संहिता का नाम मनुस्मृति क्यों रखा। इससे वह मनु को आदृत और प्राधिकृत करना चाहता था।
ऐसा लगता है कि मूल पद्धति का उद्देश्य प्रौढ़ व्यक्तियों के वर्ण का निर्धारण करना था। यह किसी पूर्ण प्रशिक्षण या प्रवृत्ति और अभिरुचि के सूक्ष्म परीक्षण पर आधारित नहीं थी। मनु और सप्तर्षि एक प्रकार का चयन मंडल था, जो साक्षात्कार के आधार पर प्रत्येक व्यक्ति के वर्ण का निर्धारण करता था। वर्ण का निर्धारण अनियमित रीति से होता था। ऐसा लगता है कि यह पद्धति व्यवहार में नहीं रही। इसके स्थान पर एक पद्धति शुरू हुई। इसे गुरुकुल पद्धति कहा जाता था । गुरुकुल एक प्रकार का विद्यालय होता था। इसका भार एक गुरु पर होता था, जिसे आचार्य भी कहते थे। सभी बच्चे इसी गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाते थे। शिक्षा की अवधि बारह वर्ष होती थी । जब तक कोई बालक गुरुकुल में रहता था, वह ब्रह्मचारी कहलाता था। जब शिक्षा की अवधि पूरी हो जाती, तब उसके बाद अत्यंत महत्वपूर्ण उपनयन समारोह होता था । यही वह समारोह होता था, जिसमें आचार्य प्रत्येक विद्यार्थी का वर्ण निश्चित करते थे और उसे संसार में अपने वर्ण के कर्तव्य को पूरा करने के लिए वापस भेज देते थे। आचार्य द्वारा उपनयन वर्ण को निश्चित करने का नया तरीका था, जो मनु और सप्तर्षि द्वारा निर्धारण करने की पद्धति के स्थान पर प्रचलित हुआ। यह नई प्रणाली पुरानी प्रणाली की तुलना में निस्संदेह श्रेष्ठ थी। इसमें पुरानी प्रणाली का वास्तविक तत्व निहित था, अर्थात् वर्ण का निर्धारण तटस्थ और स्वतंत्र सत्ता द्वारा किया जाना चाहिए । लेकिन इसमें एक नया तत्व आया, अर्थात् वर्ण के निर्धारण के लिए पूर्व प्रशिक्षण आवश्यक हो गया। इसका कारण यह है कि प्रशिक्षण ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करता है और किसी भी व्यक्ति के वर्ण का निर्धारण करने का सबसे निरापद उपाय उसके व्यक्तित्व का परिचय प्राप्त करना है। इस नए तत्व के समावेश से निस्संदेह बहुत सुधार हुआ।
आचार्य वाली गुरुकुल प्रणाली के शुरू होने से वर्ण की अवधि में परिवर्तन हुआ। कोई वर्ण किसी अवधि तक रहने के बजाए, जीवन पर्यन्त हो गया। लेकिन यह वंशानुगत नहीं था ।
स्पष्ट है कि ब्राह्मणवाद उस पद्धति से असंतुष्ट था। इस पद्धति के अधीन इस बात की पूरी संभावना बनी रहती थी कि आचार्य ब्राह्मण के बालक को केवल शूद्र होने के योग्य घोषित कर दे। स्वाभाविक है कि ब्राह्मणवाद इस परिणाम की संभावना को दूर करने के बारे में अधिक चिंतित था। वह वर्ण को वंशानुगत बनाना चाहता था। वह वर्ण को वंशानुगत बनाकर ही ब्राह्मण के बालक को शूद्र घोषित किए जाने से बचा सकता था। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए ब्राह्मणवाद ने जितनी ढिठाई के साथ कोशिश की, उसकी कल्पना शायद असंभव है।
1. मनु का यह कथन है कि शूद्रों को वेदों का पाठ नहीं करना चाहिए और न उन्हें सुनना चाहिए। इस कथन के संदर्भ में यह कहना कि वेदों में कुछ शब्द शूद्रों द्वारा विरचित हैं, एक गूढ़ प्रश्न है। इस प्रश्न का समाधान इसी सिद्धांत से हो सकता है।