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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
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     बौद्ध धर्म पर विजय प्राप्त करने के बाद ब्राह्मणवाद ने जो कार्य किए, उस सूची में से अब तीसरे कार्य पर विचार किया जाए । यह कार्य ब्राह्मणों को गैर-ब्राह्मणों के प्रभाव से अगल करना और गैर-ब्राह्मणों को विभिन्न सामाजिक स्तरों में बांटना था ।

     पुष्यमित्र की ब्राह्मण क्रांति का उद्देश्य चातुर्वर्ण्य की प्राचीन सामाजिक व्यवस्था का उद्धार करना था, जिसे बौद्ध शासन में काल की कसौटी पर परखा जा रहा था। लेकिन जब बौद्ध धर्म पर ब्राह्मणवाद ने विजय प्राप्त कर ली, तब उसे चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को उसी रूप में, जिस रूप में वह पहले थी, पुनः स्थापित करने पर भी संतोष नहीं हुआ। बौद्ध पूर्व समय में चातुर्वर्ण्य व्यवस्था एक उदार व्यवस्था थी और उसमें गुंजाइश थी। इसका कारण यह है कि इसका विवाह व्यवस्था से कोई संबंध नहीं था । चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में जहां चार विभिन्न वर्गों के अस्तित्व को स्वीकार कर लिया गया था, वहां इन वर्गों में आपस में विवाह संबंध करने पर कोई निषेध नहीं था। किसी भी वर्ण का पुरुष विधिपूर्वक दूसरे वर्ण की स्त्री के साथ विवाह कर सकता था। उस दृष्टिकोण की पुष्टि में अनेक दृष्टांत उपलब्ध हैं। मैं नीचे कुछ दृष्टांत दे रहा हूं, जो ऐसे प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के हैं, जिन्हें हिंदुओं की पवित्र भाषाओं में काफी यश प्राप्त है:

brahmanvad ki Vijay Raja Hatya Athva Prati Kranti ka Janm dr Bhimrao Ramji Ambedkar

  पति वर्ण पत्नी वर्ण
1. शांतनु क्षत्रिय गंगा शूद्र अनामिका
2. शांतनु क्षत्रिय मत्स्यगंधा शूद्र धींवर स्त्री
3. पाराशर ब्राह्मण मत्स्यगंधा शूद्र धींवर स्त्री
4. विश्वामित्र क्षत्रिय मेनका अप्सरा
5. ययाति क्षत्रिय देवयानी ब्राह्मण
6. ययाति क्षत्रिय शर्मिष्ठा आसुरी - अनार्य
7. जरत्कारू ब्राह्मण जरत्कार नाग- अनार्य

     जिस किसी को इस बारे में शंका हो कि विभिन्न वर्गों में समाज के विभाजन में इन चार वर्णों में परस्पर अन्तर्विवाह का कोई निषेध नहीं था, उससे मेरा आग्रह है कि वह महान ब्राह्मण ऋषि व्यास के परिवार की वंशावली पर ध्यान देने की कृपा करें, जो नीचे दी गई है-

व्यास की वंशावली

Vyas ki vanshavali by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
     ब्राह्मणवाद ने पशु की तरह घोर नृशंस हो विभिन्न वर्गों के बीच अंतर्विवाहों को रोक देने का काम जारी रखा। मनु एक नया नियम बना देता है। यह नियम निम्न प्रकार से है:

     3.12. द्विजों के प्रथम विवाह के लिए समान जाति की स्त्रियां श्रेष्ठ होती हैं।

     3.13. यह सच है कि शूद्र स्त्री ही किसी शूद्र की पत्नी हो सकती है।

     3.14. किसी भी (प्राचीन) आख्यान में ब्राह्मण या क्षत्रिय की ( प्रथम ) पत्नी के शूद्र होने का उल्लेख नहीं किया गया है, हालांकि इन्होंने कष्टपूर्ण जीवनयापन किया है।

     3.15. जो द्विज लोग मोह में नीची (शूद्र) जाति की स्त्रियों के साथ विवाह कर लेते हैं, वे शीघ्र ही अपने परिवारों और उनके बच्चों को शूद्रों की स्थिति में ला देते हैं।

     3.16. अत्रि का और उतथ्य के पुत्र (गौतम) का मत है कि जो शूद्र स्त्री के साथ विवाह कर लेता है, वह जातिच्युत हो जाता है, शौनक का और भृगु का मत है कि जब किसी के केवल शूद्र स्त्री से किसी संतान का जन्म होता है ( तब वह जातिच्युत हो जाता है)।

     3.17. जो ब्राह्मण किसी शूद्र स्त्री के साथ शैया पर संभोग करता है, वह (मृत्यु के बाद) नरक में जा गिरता है।

     यदि वह उससे संतान उत्पन्न करता है, तो वह ब्राह्मणत्व से भ्रष्ट हो जाता है।

     3.18. जो व्यक्ति मुख्यत: ( शूद्र पत्नी की) सहायता से देव कार्य या पितृ कार्य और अतिथि भोजनादि करता है, उसके हव्य और कव्य को क्रमशः देवता और पितर स्वीकार नहीं करते और ऐसा व्यक्ति स्वर्ग को नहीं प्राप्त करता ।

     3.19. जो व्यक्ति शूद्र स्त्री का अधर पान करता है, जो उसके श्वास से दूषित होता है और जो उससे संतान उत्पन्न करता है, उसकी किसी प्रायश्चित से शुद्धि नहीं हो सकती।

     ब्राह्मणवाद अंतर्विवाह का निषेध कर संतुष्ट नहीं हुआ। उसने इससे आगे सहभोज का भी निषेध किया।

     मनु ने भोजन करने के बारे में कुछ आरोप लगाए हैं। कुछ स्वास्थ्य संबंधी हैं, कुछ सामाजिक हैं। जो सामाजिक हैं, उनमें से निम्नलिखित ध्यान देने योग्य हैं :

    4.218. राजा के द्वारा दिया गया भोजन उसके तेज को नष्ट करता है, शूद्र वर्ग के द्वारा दिया गया भोजन उसके ब्रह्म वर्चस्व को सुनार के द्वारा दिया गया भोजन उसके जीवन को और चर्मकार के द्वारा दिया गया भोजन उसके यश को नष्ट करता है।

    4.219. रसोइया या इस प्रकार के शूद्र शिल्पियों के द्वारा दिया गया भोजन उसकी संतति को और धोबी के द्वारा दिया भोजन शारीरिक बल को नष्ट करता है।

     4.221. अन्य के द्वारा दिया गया भोजन, जिनका उल्लेख क्रम से किया गया है, कभी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, उनके अन्न को बुद्धिमान चमड़े, हड्डी और सिर के बाल कहते हैं।

     4.222. यदि इस प्रकार के व्यक्तियों में से किसी का भी अन्न अज्ञानपूर्वक ग्रहण कर लिया गया है, तब तीन दिन का उपवास करना चाहिए, लेकिन यदि ज्ञानपूर्वक ग्रहण कर लिया हो, तब उसे वैसा ही कृच्छव्रत करना चाहिए, मानो उसने शुक्र मल और मूत्र ग्रहण कर लिया हो।

    मैंने यह कहा है कि ब्राह्मणवाद ने अंतर्विवाह और सहभोज पर रोक लगाने का काम पशु की तरह नृशंस होकर किया। यदि किसी को उसमें संदेह हो, तो अनुरोध है कि मनु की भाषा पर विचार करना चाहिए। शूद्र स्त्री के संबंध में मनु जो घृणा व्यक्त करता है, उस पर ध्यान दीजिए। शूद्र के भोजन के बारे में मनु जो कुछ कहता है, कहता है, उस पर ध्यान दीजिए। वह कहता है कि वह अशुद्ध है, जैसे शुक्र या मूत्र ।

    इन दो नियमों ने जातिप्रथा को जन्म दिया। अंतर्विवाह और सहभोज का निषेध दो स्तंभ हैं, जिन पर जातिप्रथा टिकी हुई है। जातिप्रथा और अंतर्विवाह तथा सहभोज से संबंधित नियम एक-दूसरे से ऐसे जुड़े हुए हैं, जैसे उद्देश्य के साथ उसको पूरा करने वाले उपाय। निश्चय ही यह उद्देश्य किन्हीं अन्य उपायों द्वारा पूरे नहीं किए जा सकते थे।

    इन उपायों की योजना से यह स्पष्ट होता है कि ब्राह्मणवाद का उद्देश्य जातिप्रथा को जन्म देना था और यही उसका अंतिम लक्ष्य था। ब्राह्मणवाद ने अंतर्विवाह और सहभोज के विरूद्ध निषेध के नियम बनाए। लेकिन, ब्राह्मणवाद सामाजिक व्यवस्था में अन्य परिवर्तनों का भी सूत्रपात किया। अगर इन परिवर्तनों का प्रयोजन वही था जिनकी संभावना की मैंने अभी चर्चा की है, तब इस तथ्य को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि ब्राह्मणवाद जातिप्रथा को कायम रखने के बारे में इतना अधिक आतुर था कि इसने इसके लिए प्रयुक्त साधनों के उचित या अनुचित, नैतिक या अनैतिक होने की कोई परवाह नहीं की। मैं लड़कियों के विवाह और विधवाओं के जीवन के संबंध में मनुस्मृति में उल्लिखित नियमों की ओर ध्यान दिला रहा हूं। स्त्रियों के विवाह के संबंध में मनु जो नियम बनाता है, उन्हें देखिए:

    9.4. वह पिता दोषी है जो उचित समय आने पर ( अपनी पुत्री को) विवाह में नहीं देता है।

    9.88. पिता, समान जाति के श्रेष्ठ और सुंदर वर को अपनी पुत्री, चाहे उसकी आयु उचित न भी हो, अर्थात् वह ऋतुमती न हुई हो, निर्धारित विधि के अनुसार दे।

    इस नियम के अनुसार मनु यह निर्देश देता कि चाहे कोई लड़की गर्भ धारण करने योग्य न हुई हो, अर्थात् चाहे वह बच्ची ही हो, तब भी उसका विवाह कर देना चाहिए। विधवाओं के संबंध में मनु निम्नलिखित नियम घोषित करता है:

    5.157. वह (अर्थात् विधवा) अपने सुख के लिए स्वेच्छापूर्वक शुद्ध पुष्पों, कंदमूल और फलों का आहार कर अपने शरीर को क्षीण कर ले, लेकिन वह अपने पति के निधन के बाद किसी दूसरे पुरुष का नाम भी न ले।

    5.161. परंतु जो विधवा संतानोत्पत्ति की इच्छा से दुबारा विवाह कर अपने दिवंगत पति का अनादर करती है, वह इस लोक में निंदा का पात्र बनती है और वह (स्वर्ग में) अपने पति के सामीप्य से वंचित रहेगी ।

    5.162. पति के अतिरिक्त किसी दूसरे पुरुष से उत्पन्न स्त्री की संतान उसकी संतान नहीं कहलाती, पत्नी के अतिरिक्त किसी दूसरी स्त्री से उत्पन्न किसी पुरुष की संतान उसकी नहीं कहलाती पतिव्रता स्त्री का दूसरा पति कहीं भी नहीं निर्धारित है।

    स्त्री के लिए यह आरोपित वैधव्य के नियम हैं। यहां सती या उस विधवा के संबंध में चर्चा कर ली जाए जो अपने पति की चिता पर स्वयं को भस्म कर देती है और अपने जीवन का अंत कर देती है। मनु इस संबंध में मौन है।

     याज्ञवल्क्य' नामक विद्वान जो मनु जितना ही महान है, कहता है कि स्त्री को अलग या अकेले नहीं रहना चाहिए।

86. जब किसी स्त्री का पति दिवंगत हो जाए, तब वह अपने पिता, मां, पुत्र, भाई, सास या अपने मामा से अलग न रहे, अन्यथा वह निंदा की पात्र बन सकती है।

    यहां याज्ञवल्क्य ¹ यह नहीं कहता कि विधवा को सती हो जाना चाहिए लेकिन याज्ञवल्क्य स्मृति की टीका मिताक्षरा के लेखक प्रज्ञानेश्वर उक्त श्लोक की टीका करते हुए निम्नलिखित मत व्यक्त करते हैं: 'यह विष्णु'² के पाठ के अनुसार विकल्प के रूप में ब्रह्मचर्य का जीवनयापन करने की स्थिति में होता है। पति की मृत्यु के बाद या तो ब्रह्मचर्य या उसके साथ चिंता में बैठना । प्रज्ञानेश्वर³ इसमें अपना मत जोड़ते हैं कि उसके बाद चिता में बैठने का बड़ा महत्व है।

     इससे कोई भी बड़ी सरलता और स्पष्टतापूर्वक यह जान सकता है कि सती होने का नियम किस प्रकार बना। मनु का नियम था कि कोई भी विधवा दुबारा विवाह नहीं कर सकती। लेकिन प्रज्ञानेश्वर के कथन से ऐसा प्रतीत होता है कि विष्णुस्मृति के समय से मनु के नियम की कुछ भिन्न व्याख्या की जाने लगी थी। इस नई व्याख्या के अनुसार मनु के नियम का आशय विधवा स्त्री को दो विकल्पों में किसी एक का चुनाव करने का अधिकार देना था : ( 1 ) या तो तुम अपने पति की चिता में भस्म हो जाओ, और (2) यदि तुम ऐसा नहीं करतीं, तब अविवाहित रहो । निस्संदेह यह बिल्कुल गलत व्याख्या थी और मनु के स्पष्ट शब्दों में निहित आशय के ठीक विपरीत थी। यह किसी प्रकार ग्राह्य हो गई। विष्णुस्मृति तीसरी या चौथी शताब्दी के आसपास की रचना है। अतः यह कहा जा सकता है कि सती होने का नियम उसी समय बना था।


1. याज्ञवल्क्यस्मृति, सन् 150-200 की रचना है।
2. विष्णुस्मृति, अध्याय 25.14
3. उन्होंने सन् 1070 और 1100 के बीच मिताक्षरा की रचना की।