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प्राचीन भारत में क्रांति तथा प्रतिक्रांति - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Prachin Bharat Me Kranti Aur Pratikranti dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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01 जून 2023
Book
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    ब्राह्मणवाद के समर्थक - ब्राह्मणवाद की श्रेष्ठता में उनका इतना दृढ़ विश्वास है कि अभी तक कोई व्यक्ति उसका समर्थन तर्क द्वारा करने के लिए तैयार नहीं है - उन प्रतिबंधों का उल्लेख करने से नहीं अघाते जो मनु ने ब्राह्मणों पर आरोपित किए हैं। ऐसा करने में उनका उद्देश्य यह प्रदर्शित करना है कि मनु ने ब्राह्मणों के लिए निर्धनता और सेवा - भावना का आदर्श निश्चित किया था। यह सत्य है कि मनु ने ब्राह्मणों के लिए कुछ सीमाएं निश्चित की हैं। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना अनुचित होगा और तथ्यों को सोद्देश्य तोड़ना-मरोड़ना होगा, जिसके लिए मनुस्मृति में कोई आधार भी नहीं है कि ब्राह्मणों के लिए मनु का आदर्श उसकी निर्धनता और सेवा भावना है।

    यह समझने के लिए कि मनु ने ये सीमाएं ब्राह्मणों के लिए क्यों निश्चित कीं, हमें दो बातें ध्यान में रखनी चाहिएं। पहली बात वह स्थान है, जो मनु ने समाज की सामान्य योजना में ब्राह्मणों के लिए निश्चित किया है, और दूसरी बात इन सीमाओं की प्रकृति है। मनु ने जो स्थान निश्चित किया है, उसकी विवेचना उसने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में की है। चूंकि यह विषय महत्त्वपूर्ण है, इसलिए मैं उन श्लोकों को पुनः उद्धृत कर रहा हूं, जिन्हें मैं पहले उद्धृत कर चुका हूं :

    1.93. ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने के कारण, ज्येष्ठ होने से, वेद के धारण करने से धर्मानुसार ब्राह्मण ही संपूर्ण सृष्टि का स्वामी होता है।

brahmanvad ki Vijay Raja Hatya Athva Prati Kranti ka Janm dr Bhimrao Ramji Ambedkar

    इस सीमा की प्रकृति पर विचार कीजिए ।

    4.2. ब्राह्मण विपत्ति के समय को छोड़कर शेष समय में अपनी आजीविका इस प्रकार ग्रहण करें कि जिसके कारण अन्य लोगों को कोई पीड़ा न हो या अत्यल्प पीड़ा हो।

    4.3. मात्र आजीविका प्राप्त करने के लिए, वह अपने शरीर को अनुचित रूप से कष्ट न देकर ऐसे अनिंदनीय व्यवसायों का अनुसरण कर धन का संग्रह करें, जो उसकी जाति के लिए निर्धारित हैं।

    8.337. चोरी करने पर शूद्र को आठ गुना वैश्य को सोलह गुना और क्षत्रिय को बत्तीस गुना पाप होता है।

    8.338. ब्राह्मण को चौंसठ गुना या एक सौ गुना या एक सौ अट्ठाईस गुना तक, इनमें से प्रत्येक को अपराध की प्रकृति की जानकारी होती है।

    8.383. उन दोनों जातियों की रक्षित स्त्रियों के साथ संभोग करने पर ब्राह्मण एक सहस्त्र पण दंड के रूप में देने के लिए बाध्य किया जाएगा, रक्षित शूद्र स्त्री के साथ संभोग करने पर क्षत्रिय या वैश्य को एक सहस्त्र पण का दंड दिया जाएगा।

    8.384. अरक्षित क्षत्रिय स्त्री के साथ संभोग करने पर वैश्य को पांच सौ पण का दंड दिया जाएगा, लेकिन इसी प्रकार अपराध करने पर क्षत्रिय का सिर गधे के पेशाब से मुंडवाया जाएगा या उतना ही (पांच सौ पण ) का दंड दिया जाएगा।

    8.385. जो ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य जाति की अरक्षित स्त्रियों या शूद्र जाति की स्त्री के साथ संभोग करता है, उसे पांच सौ पण का, लेकिन सबसे नीची जाति अर्थात् अन्त्यज की स्त्री के साथ संभोग करने पर एक हजार पण का दंड दिया जाएगा।

    मनु द्वारा ब्राह्मण को जो स्थान दिया गया है, उसके परिप्रेक्ष्य में इन सीमाओं का विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि इन सीमाओं का उद्देश्य यह नहीं था कि ब्राह्मण हानिकर स्थिति में रहे, बल्कि इससे तो यह स्पष्ट होता है कि मनु का उद्देश्य ब्राह्मण को उस उच्च पद से भ्रष्ट होने से बचाना था, जहां उसने उसे प्रतिष्ठित किया और उसका उद्देश्य उसे गैर-ब्राह्मणों से निंदित होने से बचाना था ।

    मनुस्मृति में दी गई अन्य व्यवस्थाओं से यह स्पष्ट होता है कि मनु का उद्देश्य ब्राह्मणों को दीनता और अभाव की स्थिति में रखना नहीं था। इस संबंध में मनुस्मृति में दिए गए आचरण संबंधी उन नियमों पर ध्यान देना होगा, जिनका ब्राह्मण को उस समय पालन करना चाहिए, जब वह विपत्ति में हो।

    10.80. जितने भी व्यवसाय हैं, उनमें ब्राह्मणों के लिए वेद का अध्यापन, क्षत्रिय के लिए लोगों की रक्षा करना और वैश्य के लिए व्यापार सर्वश्रेष्ठ व्यवसाय है।

    10.81. लेकिन यदि ब्राह्मण अपने उस व्यवसाय से, जिसका अभी उल्लेख किया गया है, जीवन - निर्वाह नहीं कर सके, तब क्षत्रिय के लिए निर्दिष्ट व्यवसाय को अपनाकर जीवन निर्वाह करे, क्योंकि वह पद के अनुसार उसके बाद आता है।

    10. 82. यदि यह पूछा जाए, 'अगर वह इन दोनों व्यवसायों में से किसी भी एक व्यवसाय से अपना जीवन निर्वाह नहीं कर सके, तब क्या किया जाए?' उत्तर है, वह वैश्य की जीवन-पद्धति अपना ले, स्वयं खेती करे और पशुपालन करे।

    10.83. परंतु जो ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय वैश्य की जीवन-पद्धति के अनुसार जीवन-यापन करता है, उसे सावधानी से कृषि कार्य से विरत रहना चाहिए, जिसमें अनेक जीवों की हिंसा होती है और जो दूसरों पर निर्भर करता है।

    10. 84. कुछ लोग कृषि को उत्तम कर्म कहते हैं, किंतु परोपकारी व्यक्ति जीविका के इस साधन को हेय कहते हैं, क्योंकि लोहे के मुख लगा लकड़ी का उपकरण भूमि और उसमें रहने वाले जीवों को क्षति पहुंचाता है।

    10.85. लेकिन जो व्यक्ति जीविका के उत्तम साधनों के अभाव में उचित व्यवसायों को नहीं अपना सकता है, वह उन वस्तुओं की बिक्री कर धन अर्जित कर सकता है, जो व्यापारी बेचते हैं। लेकिन इनमें निम्नलिखित वस्तुओं को शामिल न करे।

    यहां ध्यान देने की बात यह है कि जो सीमाएं ब्राह्मण पर आरोपित की गई, वह तभी तक रहती हैं जब तक वह अपने उन व्यवसायों से फलता-फूलता रहता है, जो किसी अधिकार के कारण उसके अपने हैं। ज्यों ही वह अपने लिए आरक्षित व्यवसाय के साथ-साथ जो भी उसे पसंद हो, वैसा हर प्रकार का कर्म करने के लिए स्वतंत्र है और वह ब्राह्मण भी बना रहता है। इसके अलावा यह निर्णय करना भी ब्राह्मण के अपने विवेक पर छोड़ दिया गया है कि वह विपत्तिग्रस्त है अथवा नहीं। इस प्रकार संपत्तिवान ब्राह्मण तक पर कोई रोक नहीं है कि वह अपने विवेक के आधार पर किसी भी परिस्थिति को विपत्ति कह किसी भी व्यवसाय को चुनकर जो उसके लिए खुला है, अपनी आय में वृद्धि न कर सके।

    मनुस्मृति में और भी व्यवस्थाएं हैं, जिनका उद्देश्य ब्राह्मणों को भौतिक दृष्टि से समृद्ध बनाना है। ये हैं, दक्षिणा और दान दक्षिणा वह शुल्क है, जो कोई ब्राह्मण तब लेने का अधिकारी होता है, जब उसे धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए बुलाया जाता है। ब्राह्मण धर्म में अनेक धार्मिक रीति और अनुष्ठान वर्णित हैं। हम इस बात का सहज अनुमान लगा सकते हैं कि यह प्रत्येक ब्राह्मण के लिए आय का कितना बड़ा स्रोत रहा होगा । शायद ही कोई ऐसा अवसर आता हो जब पुजारी को उसका शुल्क न दिया जाता हो । दक्षिणा के बारे में धार्मिक भावना उसके अनिवार्य रूप से दिए जाने का पर्याप्त कारण थी। लेकिन मनु ब्राह्मण को उसे अपना शुल्क लेने का अधिकार देना चाहता था ।

    11.38. जो ब्राह्मण संपत्तिशाली होने पर भी प्रजापति को अग्न्याधेय का अनुष्ठान करने पर शुल्क के रूप में पवित्र अश्व नहीं देता है, वह ऐसे व्यक्ति के समान है जिसने अग्निहोत्र नहीं किया है।

    11.39. जो व्यक्ति श्रद्धालु है, जिसे अपनी इंद्रियों पर संयम है, उसे अन्य पुण्य कार्य करने चाहिए, लेकिन उसे किसी भी दशा में ऐसे यज्ञ नहीं करने चाहिए, जिसमें वह (शास्त्र सम्मत शुल्क से) कम दक्षिणा दे ।

    11.40. जिस यज्ञ में बहुत थोड़ी दक्षिणा दी गई हो, ऐसा यज्ञ इंद्रिय, प्रतिष्ठा, स्वर्ग- - सुख, दीर्घ आयु, यश, संतान और पशुधन को नष्ट कर देता है, अतः थोड़ा धन वाले व्यक्ति को (श्रौत ) यज्ञ नहीं करना चाहिए।

    वह यह घोषित कर ब्राह्मण को इस सीमा तक क्षमा कर देता है कि अगर अपनी दक्षिणा प्राप्त करने के लिए वह कुछ भी अपराध करता है तो वह धर्म के अनुसार दंड का भागी नहीं होता।

    8.349. जो व्यक्ति आत्मरक्षा के लिए पूजा करने वाले पुजारी को उसकी दक्षिणा दिलाने, स्त्रियों और ब्राह्मणों की रक्षा करने जैसी परिस्थितियों में धर्म के निमित्त किसी की हत्या करता है, तो वह कोई पाप नहीं करता ।

    लेकिन दान का विधान ऐसा विधान है, जो ब्राह्मणों के लिए आय का प्रचुर स्रोत है। मनु राजा को ब्राह्मणों को दान देने के लिए प्रेरित करता है।

    7.79. राजा अनेक यज्ञ ( श्रौत कर्म) करें, जिनमें दक्षिणाएं दी जाएं और यश प्राप्त करने के लिए वह ब्राह्मणों को भोग के पदार्थ और धन दे।

    7.82. वह उन ब्राह्मणों की पूजा करे, जो गुरु के गृह से (वेद का अध्ययन करने के बाद) वापस आए हैं, क्योंकि जो धन ब्राह्मणों को दिया जाता है, वह राजाओं के लिए अक्षय कोष कहा गया है।

    7.83. उसे न तो चोर और न शत्रु ही लेते हैं और वह नष्ट नहीं हो सकता, इसलिए राजाओं द्वारा कोई अक्षय कोष ब्राह्मणों के पास अवश्य रखा जाना चाहिए।

    11.4. लेकिन राजा जैसा कि उचित है, यज्ञ विधानार्थ सभी प्रकार के रत्न और उपहार वेदज्ञाता ब्राह्मणों को दे।

    मनु की राजा को यह चेतावनी ब्राह्मणों के लिए केवल आशा के रूप में नहीं रही । इतिहास साक्षी है कि ब्राह्मणों ने इस उपदेश का पूरा-पूरा लाभ उठाया। इसके प्रमाण स्वरूप अनेक दान-पत्र हैं, जिन्हें पुरातत्वज्ञों ने खोज निकाला है और जो इसकी सूचना देते हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि ब्राह्मणों ने राजाओं को इतना मूर्ख बनाया कि उन्होंने गांव के गांव धूर्त, आलसी और अकर्मण्य ब्राह्मणों को हस्तांतरित कर दिए। निस्संदेह आज के ब्राह्मणों के पास जो संपत्ति है, वह इसी ठग विद्या के कारण है जिसका प्रयोग धूर्त ब्राह्मण धार्मिक प्रवृत्ति के किंतु मूर्ख राजाओं पर करते रहे। मनु इसी बात से संतुष्ट नहीं था कि दान के लिए ब्राह्मण राजा का शोषण करे। उसने दान के मामले में ब्राह्मण को जनता का भी शोषण करने की अनुमति दी । यह उसने तीन प्रकार से किया। सबसे पहले तो वह लोगों को उस कर्त्तव्य के एक भाग के रूप में दान देने के लिए प्रेरित करता है, जिसे धर्मनिष्ठ व्यक्ति अपना कर्त्तव्य समझता है। इसके साथ-साथ वह यह भी बताता है कि ब्राह्मण को दिया गया दान सर्वश्रेष्ठ होता है।

    85. जो ब्राह्मण नहीं है, उसको दिया गया दान सामान्य (फल), जो अपने को ब्राह्मण कहता है, उसको दिया गया दान दुगुना फल, जो ब्राह्मण विद्वान है उसको दिया गया दान दस लाख गुना फल, जो ब्राह्मण वेद और अंगों को जानता है उसको दिया गया दान अपरिमित फल देने वाला होता है।

    7.86. चूंकि दान प्राप्त करने वाले विशिष्ट गुणों के अनुसार और दान देने वाले की श्रद्धा के अनुसार दान के बदले कुछ थोड़ा या अधिक फल अगले जन्म में प्राप्त होगा।

    इसके आगे मनु यह कहता है कि कुछ परिस्थितियों में ब्राह्मण को दान देना अनिवार्य है।

    11.1. उसे जो संतान के लिए विवाह करने का इच्छुक है, उसे जो यज्ञ करना चाहता है, यात्री को, उसे जिसने अपनी सारी संपत्ति दे दी है, उसे जो अपने गुरु अपने पिता, अपनी माता के लिए भिक्षा मांगता है, वेद के विद्यार्थी को और रोगी को ।

    11.2. इन नौ ब्राह्मणों को स्नातक समझना चाहिए जो धर्म के अनुसार पवित्र कर्म करने के लिए भिक्षा लेते हैं, ऐसी इन निर्धन व्यक्तियों को उनकी विद्या के अनुसार दान देना चाहिए।

    11.3. द्विजों में इन सर्वश्रेष्ठ द्विज को अन्न और धन का दान देना चाहिए, यह घोषित किया जाता है कि अन्य लोगों को यज्ञ वेदी के बाहर अन्न दिया जाना चाहिए।

    11.6. वेद में निष्णात और अकेले रहने वाले ब्राह्मणों को अपनी क्षमता के अनुसार धन देना चाहिए। इस प्रकार वह व्यक्ति मृत्यु के बाद स्वर्ग का आनंद भोगता है।

    मनु ने दान देने का नियम बनाया। यह निस्संदेह आय का सुरक्षित और स्थाई स्रोत बन गया, जो बहुत ही स्पष्ट है। मनु ने दान को प्रायश्चित से जोड़ दिया। मनु की व्यवस्था में कोई भी अनुचित कार्य पाप हो सकता है, भले ही वह कोई अपराध न हो, या यह पाप और अपराध, दोनों हो सकता है। पाप के रूप में उसका दंड धर्मनिरपेक्ष कानून का विषय है। पाप के रूप में, वह अनुचित कार्य पातक कहा जाता है और इसके लिए जो दंड है, उसे प्रायश्चित कहते हैं। मनु की व्यवस्था में प्रत्येक पातक कर्म से प्रायश्चित का कर्म कर, मुक्त हुआ जा सकता है।

    11.44. जो कोई व्यक्ति निर्धारित कार्य नहीं करता या निंदनीय कार्य करता है या ऐन्द्रिक सुखोपभोग में लीन रहता है, उसे प्रायश्चित करना चाहिए।

    11.45. (सभी) ऋषि अज्ञान से किए गए कार्य के लिए प्रायश्चित का विधान करते हैं, कुछ उपलब्ध पाठ के साक्ष्य के आधार पर यह कहते हैं कि यह सोद्देश्य किए गए अपराधों के लिए किया जाए।

    11.46. जो पाप अज्ञान से किया जाता है, वह वेद की ऋचाओं का पाठ करने से दूर हो जाता है। लेकिन जो पाप (लोग) अपनी मूर्खतावश सोद्देश्य करते हैं, वह विभिन्न प्रकार के (विशेष) प्रायश्चित कर्म कर दूर किया जा सकता है।

    11.52. इस प्रकार पूर्व जन्म के बचे हुए दुष्कृत्यों के कारण मूर्ख, गूंगे, अंधे, बहरे और विकृत अंगों वाले मनुष्य पैदा होते हैं, जो गुणीजनों के द्वारा हेय समझे जाते हैं।

    11.53. इसलिए शुद्धि के लिए प्रायश्चित अवश्य करना चाहिए, क्योंकि जिनके पाप दूर नहीं होते हैं, वे अशोभनीय चिह्न लिए (पुनः) जन्म लेते हैं।

    मनु ने अनेक प्रकार के प्रायश्चित निर्धारित किए हैं। जिज्ञासु लोग यह जानने के लिए कि ये प्रायश्चित क्या हैं, मनुस्मृति देख सकते हैं। इन प्रायश्चितों के बारे में जो बात ध्यान देने की है, वह यह है कि इन प्रायश्चितों का कुछ इस प्रकार विधान किया गया है, जिससे ब्राह्मण को भौतिक लाभ हो। कुछेक प्रायश्चित का रूप ब्राह्मण को दान देना मात्र है। अन्य में कुछ धार्मिक कृत्य किए जाने का विधान है। लेकिन चूंकि धार्मिक कृत्य ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी अन्य के द्वारा नहीं किए जा सकते और धार्मिक कृत्य के लिए शुल्क देना होता है, अत: दान की प्रथा से केवल ब्राह्मण को ही लाभ होता है।

    अतः यह कहना निरर्थक बात होगी कि मनु ब्राह्मणों के सम्मुख विनम्रता, दीनता, सेवा का आदर्श प्रस्तुत करना चाहता था। ब्राह्मणों ने मनु को इस रूप में ग्रहण नहीं किया। निश्चय ही उनका यह विश्वास था कि उन्हें एक विशेष दर्जा दिया जा रहा है। उन्हें इसमें विश्वास ही नहीं था, बल्कि अन्य क्षेत्रों में भी उन्होंने अपने विशेषाधिकार समझे, जिनके बारे में बाद में चर्चा की जाएगी। उनका जो दृष्टिकोण था, उसमें वह पूरी तरह सही थे। मनु ने ब्राह्मणों को 'प्रभु' कहा है और (नियम) इतनी सावधानीपूर्वक बनाए कि वे सदा इसी रूप में बने रहे।

    ब्राह्मण-शासन और ब्राह्मण प्रभुता के लिए पूरी व्यवस्था करने के बाद मनु ने समाज को बदलने का विधान किया, जिससे उसका उद्देश्य पूरा हो सके।