जातिप्रथा और उन्मूलन
jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar
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क्या आप तर्क का प्रश्न उठा सकते हैं और हिन्दुओं से यह कह सकते हैं कि वे जाति-व्यवस्था को समाप्त करें, क्योंकि वह तर्क के विरुद्ध है? इससे यह प्रश्न उठता है : क्या हिन्दू अपने तर्क का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं? मनु ने तीन अनुशास्तियां विहित की हैं, जिनके अनुसार प्रत्येक हिन्दू को आचरण करना चाहिए:
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः
यहां तर्क का प्रयोग करने के लिए कोई स्थान नहीं है हिन्दु को 'स्मृति' या 'सदाचार' का पालन करना होगा। वह किसी अन्य का पालन नहीं कर सकता। इस संबंध में सबसे पहला प्रश्न यह उठता है कि यदि वेंदों और स्मृतियों के अर्थों के संबंध में कोई संदेह उठता है तो उनके पाठ का निर्वचन कैसे किया जाएगा? इस महत्वपूर्ण प्रश्न के संबंध में मनु के निश्चित विचार हैं। वे कहते हैं :
योऽवमन्येत ते मूले हेतुशास्त्राश्रयात् द्विजः ।
स साधुभिर्बहिष्कार्यो नास्तिको वेद निन्दकः ।
इस नियम के अनुसार वेदों और स्मृतियों की व्याख्या करने वाले सिद्धांत के रूप में तर्कणावाद को पूर्णतः निराकृत किया गया है। इसे नास्तिकता के समान ही अनैतिक माना गया है और इसके लिए बहिष्कार करने की दंड व्यवस्था की गई है। इस प्रकार जहां कोई विषय वेद या स्मृति से संबंधित होगा, वहां हिन्दू तर्कपूर्ण विचार नहीं कर सकता । यहां तक कि जहां वेदों और स्मृतियों में उन विषयों पर विरोध है जिनमें उन्होंने स्पष्ट निषेधाज्ञा जारी कर रखी है, वहां भी तर्क का प्रयोग नही किया जाएगा। यदि दो श्रुतियों में विरोध है तो उनकी प्रामाणिकता समान मानी जाएगी। दोनों में से किसी एक का पालन किया जा सकता है। लेकिन यह ज्ञात करने का कोई प्रयास नहीं किया जाएगा कि तर्क के आधार पर कौन सी श्रुति प्रामाणिक है। इसे मनु ने इस प्रकार स्पष्ट किया है :

श्रुतिद्वैधं तु यत्र स्याप्तत्र धर्मावुभौ स्मृतो ।
“यदि ‘श्रुति' और 'स्मृति' के बीच विरोध है तो 'श्रुति' को प्रामाणिक माना जाएगा ।" इनके विषय में भी यह ज्ञात करने का प्रयास नहीं किया जाएगा कि तर्क के आधार पर दोनों में से कौन सी प्रामाणिक है। इसका उल्लेख मनु ने निम्नलिखित श्लोक में किया है :
या वेदबायाः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टः ।
सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि तः स्मृताः । ।
इसके अतिरिक्त, यदि दो स्मृतियों में विरोध है तो 'मनु स्मृति' को प्रामाणिक माना जाएगा, लेकिन यह प्रयास नहीं किया जाएगा कि तर्क के आधार पर कौन सी स्मृति प्रामाणिक है। वृहस्पति द्वारा दी गई व्यवस्था इस प्रकार है :
वेदायत्वोपनिबंधृत्वत् प्रमाण्यं हि मनोः स्मृतं ।
मन्वर्थविपरीता तु या स्मृतिः सान शस्यते । ।
अतः यह स्पष्ट है कि कोई भी हिन्दू उस किसी भी विषय में जिसमें श्रुतियों और स्मृतियों ने सुस्पष्ट निर्देश दे दिया है, अपनी तर्क शक्ति का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र नहीं है। 'महाभारत' में भी यही नियम विहित किया गया है:
पुराणं मानवो धर्मः सांगा वेदश्चिकित्सितं ।
आज्ञासिद्धानिक चत्वारि न हन्तव्यानि हेतुभिः ।।
हिन्दू को इन निर्देशों का पालन करना होगा। जाति तथा वर्ण ऐसे विषय हैं, जिन पर वेदों और स्मृतियों में विचार किया गया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि यदि किसी हिन्दू से तर्क करने का आग्रह किया जाए तो उस पर कोई असर नहीं होता। जहां तक जाति और वर्ण का संबंध है, शास्त्रों में केवल यही नहीं कहा गया है कि हिन्दू किसी प्रश्न पर निर्णय लेने में तर्क का आधार नहीं ले सकता, बल्कि यह भी कहा गया है कि जाति और वर्ण-व्यवस्था में उसके विश्वास के आधार की समीक्षा तार्किक ढंग से नहीं की जाएगी। अनेक गैर-हिन्दू लोगों के लिए यह मौन मनोरंजन का विषय साबित होगा, जब वे यह देखेंगे कि कुछ अवसरों जैसे रेल यात्रा तथा विदेश यात्रा में अनेक हिन्दू जाति का बंधन तोड़ देते हैं, लेकिन फिर भी वे अपने शेष जीवन में जाति-व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास करते रहते हैं। यदि इस घटना की व्याख्या की जाए तो ज्ञात होगा कि हिन्दुओं की तर्क शक्ति पर एक और नियंत्रण है। मनुष्य का जीवन सामान्यतः आभ्यासिक तथा अचिंतनशील होता है। किसी धर्म विश्वास या ज्ञान के कल्पित रूप के संबंध में सक्रिय, संगत एवं श्रमसाध्य विचार की दृष्टि से (उसके समर्थक आधार तथा संभावित निष्कर्षों के परिप्रेक्ष्य में चिंतनशील विचार यदा-कदा और केवल धर्मसंकट में किया जाता है। किसी हिन्दू के जीवन में रेल यात्राएं और विदेश यात्राएं वास्तव में ऐसे ही धर्मसंकट होते हैं। ऐसे अवसरों पर किसी हिन्दू से यह आशा करना स्वाभाविक है कि वह अपने आपसे यह पूछे कि जब वह सदैव जाति व्यवस्था का पालन नहीं कर सकता तो वह जाति व्यवस्था को मानता ही क्यों है । लेकिन वह यह प्रश्न अपने आपसे नहीं करता है। वह एक कदम पर जातपांत को तोड़ देता है और दूसरे कदम पर कोई प्रश्न उठाए बिना उसका पालन करने लगता है। ऐसा आश्चार्यजनक आचरण करने का कारण शास्त्रों के नियम में मिलेगा जो उसे यह निर्देश देता है कि उसे यथासंभव जाति-व्यवस्था का पालन करना चाहिए और पालन न करने की स्थिति में उसे प्रायश्चित करना चाहिए। प्रायश्चित के इस सिद्धांत के अनुसार शास्त्रों ने समझौते वाली भावना का पालन करते हुए जाति-व्यवस्था को हमेशा के लिए जीवनदान दे दिया और चिंतनशील विचारों की अभिव्यक्ति को दबा दिया, क्योंकि ऐसा न करने पर जाति-व्यवस्था की धारणा नष्ट हो सकती थी ।
ऐसे अनेक समाज सुधारक हुए हैं, जिन्होंने जातिप्रथा तथा अस्पृश्यता का उन्मूलन करने के लिए कार्य किया है। उनमें रामानुज, कबीर आदि प्रमुख हैं। क्या आप इन समाज सुधारकों के कार्यों का समर्थन कर सकते हैं और हिन्दुओं को उपदेश दे सकते हैं कि वे उनका पालन करें? यह सच है कि मनु ने श्रुति और स्मृति के साथ अनुशास्ति के रूप में सदाचार को भी शामिल कर दिया है। वास्तव में सदाचार को शास्त्रों के अपेक्षाकृत उच्च स्थान प्रदान किया गया है :
यद्यद्दाचर्यते येन धम्यं वाऽधर्म्यमेव वा ।
देशस्याचरणं नित्यं चरितं तद्धिकीर्तितम् ।।
सदाचार - भले ही शास्त्रों के अनुसार धर्म्य या अधर्म्य हो या शास्त्रों के प्रतिकूल हो, लेकिन उसका पालन करना होगा । सदाचार का अर्थ क्या है? यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि सदाचार का अर्थ किसी भले या धार्मिक व्यक्ति के उचित या नेक कार्यों से है तो यह उसकी सबसे बड़ी गलती होगी। सदाचार का अर्थ नेक कार्यों या नेक व्यक्ति के कार्यों से नहीं है। इसका अर्थ अच्छी या बुरी- प्रचीन प्रथा से है। यह बात निम्नलिखित श्लोक में स्पष्ट की गई है:
यस्मिन् देशे य आचारः पारंपर्यक्रमागतः ।
वर्णानां किल सर्वेषां स सदाचार उच्यते ।।
लोगों को इस विचार के विरुद्ध चेतावनी देने के लिए कि सदाचार का अर्थ नेक कार्यों या नेक व्यक्ति के कार्यों से नहीं है और इस बात की आशंका करते हुए कि लोग इसका अर्थ वैसा ही समझ सकते हैं और नेक व्यक्तियों के कार्यों का अनुसरण कर सकते हैं, स्मृतियों में हिन्दुओं को स्पष्ट आज्ञा दी गई है कि वे नेक कार्यों के लिए देवताओं का भी अनुसरण न करें, यदि वे श्रुति, स्मृति और सदाचार के प्रतिकूल हैं। इसे आप चाहे असाधारण या अत्यंत विकृत विचार कह सकते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि 'न देव चरितं चरेत्' एक निषेधाज्ञा है, जो हिन्दुओं को उनके शास्त्रों द्वारा दी गई है। किसी भी सुधारक के शास्त्रागार में तर्क और नैतिकता दो ही शक्तिशाली हथियार होते हैं। यदि उससे ये दोनों हथियार छीन लिए जाएं तो वह कार्य करने में असशक्त हो जाएगा। आप जाति-व्यवस्था को कैसे समाप्त कर पाएंगे, जब लोगों को यह सोचने की स्वतंत्रता नहीं है कि क्या यह नैतिकता के अनुकूल है? जाति व्यवस्था के चारों तरफ बनाई गई दीवार अभेद्य है और जिस सामग्री से इसका निर्माण किया गया है, उसमें तर्क और नैतिकता जैसी कोई ज्वलनशील वस्तु नहीं है। इसी दीवार के पीछे ब्राह्मणों की फौज खड़ी है उन ब्राह्मणों की जो एक बुद्धिजीवी वर्ग हैं, उन ब्राह्मणों की जो हिन्दुओं के प्राकृतिक नेता हैं, उन ब्राह्मणों की जो वहां मात्र भाड़े के सैनिकों के रूप नहीं हैं, बल्कि अपने देश के लिए लड़ती हुई सेना के रूप में हैं। अब आप समझ गए होंगे कि मैं ऐसा क्यों सोचता हूं कि हिन्दुओं की जातिप्रथा को समाप्त करना प्रायः असंभव है। बहरहाल, इसे समाप्त करने से पहले कई युग बीत जाएंगे। चाहे कार्य करने में समय लगता है या चाहे उसे तुरंत किया जा सकता है, लेकिन आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि आप जातिप्रथा में दरार डालना चाहते हैं तो इसके लिए आपको हर हालत में वेदों और शास्त्रों में डाइनामाइट लगाना होगा, क्योंकि वेद और शास्त्र किसी भी तर्क से अलग हटाते हैं और वेद तथा शास्त्र किसी भी नैतिकता से वंचित करते हैं। आपको "श्रुति' और 'स्मृति' के धर्म को नष्ट करना ही चाहिए। इसके अलावा और कोई चारा नहीं है। यही मेरा सोचा- विचारा हुआ विचार है।
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कुछ लोग नहीं समझ सकते कि धर्म के विनाश से मेरा आशय क्या है; कुछ को यह धारणा विद्रोही लग सकती है और कुछ को यह क्रांतिकारी विचार लग सकता है। इसलिए मैं अपनी स्थिति स्पष्ट करना चाहता हूं। मैं नहीं जानता कि क्या आप सिद्धांतों और नियमों में भेद करते हैं या नहीं। लेकिन मैं इनके बीच भेद मानता हूं। मैं न केवल इनको अलग- अलग मानता हूं, बल्कि यह भी मानता हूं कि इनमें भेद वास्तविक और महत्वपूर्ण है। नियम व्यावहारिक होते हैं इनके निर्धारित मानदंड के अनुसार काम करने के प्रथागत रास्ते हैं। परंतु सिद्धांत बौद्धिक होते हैं, ये चीजों को परखने के उपयोगी साधन हैं। ये नियमकर्ता को बताते हैं कि किसी कार्य को करने के लिए कौन सी कार्यविधि अपनाई जाए। सिद्धांत कोई निश्चित कार्यविधि निर्धारित नहीं करते। नियम खाना बनाने की विधि की तरह बतातेहैं कि क्या किया जाए और कैसे किया जाए। सिद्धांत, जैसे न्याय के सिद्धांत प्रमुख शीर्ष बताते हैं, जिसके संदर्भ में उसे अपनी इच्छाओं और लक्ष्यों के दिशाकोण पर विचार करना होता है, ये उसे सुझाव देकर उसका मार्गदर्शन करते हैं कि उसे किन महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखना चाहिए। नियम और सिद्धांतों का भेद उसके किए गए कार्य के गुण और विषय-वस्तु से अंतर स्पष्ट हो जाता है। कोई अच्छा कार्य करना जिसे नियम अच्छा मानते हैं, तथा सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में अच्छा कर्म करना, दो अलग-अलग बाते हैं। सिद्धांत गलत भी हो सकता है, लेकिन इसके अंतर्गत किया गया कर्म सचेतन होता है और इसका एक उत्तरदायित्व होता है। नियम सही हो सकता है और इसके अंतर्गत किया गया कर्म मशीनी होता है। कोई धार्मिक कर्म सही कर्म न भी हो किन्तु इस कर्म का एक उत्तरदायित्व होता है। इस उत्तरदायित्व के कारण धर्म केवल सिद्धांतों पर आधारित होता है। यह नियमों का विषय नहीं हो सकता जिस क्षण सिद्धांत विकृत होकर नियम में बदल जाता है, उसी समय यह धर्म नहीं रह जाता क्योंकि वह उत्तरदायित्व को समाप्त कर देता है जो वास्तविक धार्मिक कर्म का सार होता है। हिन्दू धर्म क्या है? क्या वे सिद्धांतों का समूह है या नियम-संहिता ? वेदों और स्मृतियों में वर्णित हिन्दू धर्म कुछ भी नहीं है, यह केवल बलि, सामाजिक, राजनैतिक तथा स्वच्छता के नियम और विनियमन का मिलाजुला पुंज है। हिन्दू जिसे धर्म कहते हैं, वह और कुछ भी नहीं केवल आदेशों तथा निषेधाज्ञों का पुलिंदा है। आध्यात्मिक सिद्धांतों के रूप में धर्म यथार्थ में सार्वभौमिक होता है, जो सारी प्रजातियों और देशों पर हर काल में समान रूप से लागू होता है। ये तत्व हिन्दू धर्म में विद्यमान नहीं हैं और यदि हैं भी तो ये हिन्दू के जीवन को संचालित नहीं करते। हिन्दू के लिए 'धर्म' शब्द का अर्थ स्पष्ट रूप से आदेशों और निषेधाज्ञों से है और धर्म शब्द वेदों और स्मृतियों में इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है तथा ऐसा ही टीकाकारों द्वारा समझा गया है। वेदों में प्रयुक्त 'धर्म' शब्द का तात्पर्य धार्मिक अध्यादेशों या अनुष्ठानों से है। वहां तक कि जेमिनी ने अपनी 'पूर्व मीमांसा' में धर्म की परिभाषा इस प्रकार की है, "एक इच्छित लक्ष्य या परिणाम जो आदेशार्थ है। जिसे वैदिक परिच्छेदों में बताया गया है।" सरल और सीधी भाषा में कहा जाए तो हिन्दू 'धर्म' को कानून या अधिक से अधिक कानूनी वर्ग-नीति मानते हैं। स्पष्ट रूप से कहा जाए तो मैं इस अध्यादेशीय संहिता को 'धर्म' मानने से इन्कार करता हूं। गलत रूप से धर्म कही जाने वाली इस अध्यादेशीय संहिता की पहली बुराई यह है कि यह नैतिक जीवन की स्वतंत्रता और स्वेच्छा से वंचित करती है तथा बाहर से थोपे गए नियमों द्वारा चिंतित और चाटुकार बना देती है। इसके अंतर्गत आदर्शों के प्रति निष्ठा नहीं है, केवल आदेशों का पालन ही आवश्यक है। इस अध्यादेशीय संहिता की सबसे बड़ी बुराई यह है कि इसमें वर्णित कानून कल, आज और हमेशा के लिए एक ही हैं। ये कानून असमान हैं तथा सभी वर्गों पर समान रूप से लागू नहीं होते। इस असमानता को चिरस्थायी बना दिया गया है क्योंकि इसे सभी पीढ़ियों के लिए एक ही प्रकार से लागू किया गया है। आपत्तिजनक बात यह नहीं है कि इस संहिता को किसी पेगम्बर या कानूनदाता कहे जाने वाले महान व्यक्ति ने बनाया है। आपत्तिजनक बात यह है कि इस संहिता को अंतिमता व स्थिरता प्रदान की गई है। मन की प्रसन्नता किसी व्यक्ति की अवस्थाओं तथा परिस्थितियों के अनुार बदलती रहती है। मन की प्रसन्नता अलग-अलग व्यक्तियों के लिए अलग-अलग काल में भी बदलती रहती है। इस स्थिति में मानवता कब तक शिकंजे में जकड़े और अपंग बने रहकर इस बाहरी कानून की संहिता को सहन कर सकती है? इसलिए यह कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है कि ऐसे धर्म को नष्ट किया जाना चाहिए तथा ऐसे धर्म को नष्ट करने का कार्य अधर्म नहीं कहलाएगा। वास्तव में, मैं कहता हूं कि आपका परम कर्तव्य यह है कि आप इस मुखौटे को उतार दो जो गलत रूप से कानून को धर्म बताता है। आपके लिए यह एक आवश्यक कार्य है। एक बार आप लोगों को साफ-साफ बता देते हैं कि यह धर्म, धर्म नहीं है, यह वस्तुतः एक कानून है। तब आप यह कहने की स्थिति में होंगे कि इसमें संशोधन किया जाए या इसे समाप्त किया जाए। जब तक लोग इसे धर्म मानते रहेंगे, तब तक वे इसमें संशोधन के लिए तैयार नहीं होंगे, क्योंकि यदि आमतौर पर कहा जाए तो धर्म को बदल डालने का विचार मान्य नहीं होता है। लेकिन कानून की धारणा बदलाव की धारणा से जुड़ी होती है और जब आप समझ जाते हैं कि यह धर्म एक पुराना तथा पुरातत्वीय है, तब तो इसे बदलने के लिए तैयार हो जाएंगे क्योंकि लोग जानते हैं कि कानून बदला जा सकता है।