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जातिप्रथा और उन्मूलन

jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar

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03 मे 2023
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     यद्यपि मैं धर्म के नियमों की निंदा करता हूं इसका अर्थ यह न लगाया जाए कि धर्म की आवश्यकता ही नहीं। इसके विपरीत मैं बर्फ के कथन के सहमत हूं जो कहता है : “सच्चा धर्म समाज की नींव है, जिस पर सब नागरिक सरकारें टिकी हुई हैं।"

     परिणामतः जब मैं यह अनुरोध करता हूं कि जीवन के ऐसे पुराने नियम समाप्त कर दिए जाएं, जब मैं यह देखने का उत्सुक हूं कि इसका स्थान धर्म के सिद्धांत' ले लें, तभी हम दावा कर सकते हैं कि यही सच्चा धर्म है। वास्तव में, मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि धर्म आवश्यक है। इसलिए मैं आपको कहना चाहता हूं कि धर्म में सुधार को मैं एक आवश्यक पहलू मानता हूं। मेरे विचार से धर्म में सुधार के मूलभूत मुद्दे इस प्रकार है: (1) हिन्दू धर्म की केवल एक और केवल एक ही मानक पुस्तक होनी चाहिए, जिसे सारे के सारे हिन्दू स्वीकार करें और मान्यता दें। इससे वस्तुतः मेरा तात्पर्य यह है कि वेदों, शास्त्रों और पुराणों को पवित्र और अधिकृत ग्रंथ मानने पर रोक लगे तथा इन ग्रंथों में निहित धार्मिक या सामाजिक मत का प्रवचन करने पर सजा का प्रावधान हो, (2) अच्छा होगा यदि हिन्दुओं में पुरोहिताई समाप्त की जाए। चूंकि ऐसा होना असंभव है, इसलिए पुरोहिताई पुश्तैनी नहीं होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति जो अपने को हिन्दू मानता है, उसे राज्य के द्वारा परीक्षा पास कर सनद प्राप्त कर लेने पर पुजारी बनने का अधिकार होना चाहिए, (3) बिना सनद के धर्मानुष्ठान करने को कानूनन वैध नहीं माना जाना चाहिए। जिनके पास सनद नहीं है, उनके द्वारा पुजारी का काम किए जाने पर सजा का प्रावधान हो, (4) पुजारी एक सरकारी नौकर होना चाहिए, जिसके ऊपर नैतिकता, आस्था तथा पूजा के मामलों में अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सके। इसके अलावा उस पर नागरिक कानून भी लागू होने चाहिएं, और (5) पुजारियों की संख्या को कानून द्वारा आवश्यकता के अनुरूप सीमित किया जाना चाहिए, जैसा कि आई सी एस के पदों की संख्या के बारे में किया जाता है। कुछ लोगों के लिए यह सुझाव अति सुधारवादी लग सकता है। लेकिन इसे मैं क्रांतिकारी कदम नहीं मानता हूं। भारत में प्रत्येक व्यवसाय का नियमन किया गया है। जैसे इंजीनियर द्वारा योग्यता दर्शाई जानी चाहिए। डाक्टर द्वारा योग्यता दर्शाई जानी चाहिए। वकील द्वारा भी योग्यता दशाई जानी चाहिए, इससे पहले कि वे अपने पेशे को अपनाएं। अपने पेशे के संपूर्ण समय के दौरान वे न केवल नागरिक और आपराधिक कानून मानने के लिए बाध्य हैं, बल्कि संबंधित पेशे में नैतिकता की विशेष आचार-संहिता भी मानने को वे बाध्य हैं। केवल पुजारी का ही पेशा ऐसा है, जिसमें योग्यता दर्शाने की आवश्यकता नहीं है। हिन्दू पुजारी का ही केवल ऐसा पेशा है, जिसके लिए कोई आचार-संहिता निर्धारित नहीं है। मानसिक रूप से पुजारी मुर्ख हो सकता है, शारीरिक रूप से वह किसी खराब बीमारी, जैसे सूजाक या सिफलिस से ग्रसित हो सकता है और नैतिक रूप से वह अधर्मी हो सकता है। इसके बावजूद वह पुण्य अनुष्ठान कर सकता है, हिन्दू मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश कर सकता है तथा हिन्दू देवताओं की पूजा कर सकता है। इसके लिए एक ही शर्त है कि वह पुरोहित की जाति में पैदा हुआ हो । यह सब घृणास्पद है और यह सब इस कारण है कि हिन्दू पुजारी पर न तो कोई काननू लागू है और न ही कोई नैतिकता की आचार संहिता । इनके लिए कोई कर्तव्य निर्धारित नहीं है। केवल अधिकार और सुविधाएं इन्हें मिली हुई हैं। यह एक ऐसी बला है, जिसे देवतागणों ने समाज के मानसिक तथा नैतिक पतन के लिए लाद दिया है। जैसा कि मैंने उससे पूर्व उल्लेख किया है, पुरोहित वर्ग को विधेयक द्वारा नियंत्रण में लिया जाना चाहिए । इससे लोगों का अनिष्ट करने और उन्हें गुमराह करने पर रोक लगेगी। इसमें पुरोहिताई प्रजातांत्रिक संस्था बन जाएगी तथा पुरोहित बनने के अवसर सभी के लिए खुल जाएंगे। इस प्रकार ब्राह्मणवाद को मारने में मदद मिलेगी और जातियों की समाप्ति के लिए भी मदद मिलेगी, जो ब्राह्मणवाद की ही देन है। ब्राह्मणवाद ऐसा जहर है, जिससे हिन्दूवाद खराब हुआ है। ब्राह्मणवाद को मारने के बाद ही आप हिन्दूवाद को बचाने में सफल हो पाएंगे। किसी भी ओर से इन सुधारों का विरोध नहीं होना चाहिए। आर्य समाजियों द्वारा भी इन सुझावों का स्वागत किया जाना चाहिए, क्योंकि ये उनके द्वारा अपनाए गए सिद्धांत 'गुणकर्म' के अनुरूप है।

Speech prepared by Dr Bhimrao Ambedkar for the annual conference of Lahore Jatpant Todak Mandal 1936

    चाहे आप ऐसा करें या न करें, आपको अपने धर्म को एक नया सैद्धांतिक आधार देना होगा, जो स्वतंत्रता, समानता और भाई-चारे के संक्षेप में, प्रजातंत्र के अनुरूप हो। मैं इस विषय का विशेषज्ञ नहीं हूं। लेकिन मुझे बताया गया है कि ऐसे धार्मिक सिद्धांत जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे के अनुरूप हों, उन्हें विदेश से लाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इस प्रकार के सिद्धांत उपनिषदों में वर्णित हैं। आप चाहें तो पूरा ढांचा बदले बिना कच्ची धातु की यथेष्ट कटाई-छटाई करके यह किया जा सकता है, जो मेरे कथन से अधिक है। इसका तात्पर्य है कि जीवन की मूलभूत धारणाओं को पूरी तरह बदला जाए। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य और चीजों के प्रति दृष्टिकोण तथा रवैये में पूरा बदलाव लाया जाए। इसका अर्थ है 'धर्म परिवर्तन' परंतु यदि आप इस शब्द को पसंद नहीं करते तो मैं कहूंगा इसका अर्थ है - नया जीवन । लेकिन एक नया जीवन मृत शरीर में प्रवेश नहीं कर सकता। नया जीवन केवल नए शरीर में ही प्रवेश कर सकता है। इससे पहले कि नया शरीर अस्तित्व में आए और उसमें नया जीवन प्रवेश कर सके, पुराने शरीर को हर हालत में मरना चाहिए। साधारण शब्दों में, इससे पहले कि नया जीवन डाला जाए और उसमें स्पंदन हो, पुराने ढर्रे को समाप्त होना चाहिए । यही मेरे कहने का अर्थ है, जब मैंने कहा था कि शास्त्रों की सत्ता को हटाओं और शास्त्रों का धर्म नष्ट कर दो।

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     मैंने आपको बहुत देर तक बिठाकर रखा है। अब समय आ गया है कि मैं अपना भाषण समाप्त करूं। यह एक सुविधाजनक बिंदु है, जहां मुझे रूक जाना चाहिए । लेकिन संभवतः हिन्दू श्रोताओं के बीच में ऐसे विषय पर मेरा अंतिम भाषण है, जो विषय हिन्दुओं के लिए प्राणाधार है। इससे पहले कि मैं भाषण देना बंद करूं, मैं हिन्दुओं के सामने ऐसे प्रश्न रखना चाहता हूं, जिसको मैं अति महत्वपूर्ण समझता हूं और मैं उन्हें उन पर विचार करने के लिए आमंत्रित करता हूं।

    सबसे पहले हिन्दुओं को विचार करना चाहिए कि क्या वे आस्था, आदतें, नैतिकता और जीवन के प्रति धारणा के बारे में नृजाति - विज्ञानियों के शांतिपूर्ण दृष्टिकोण को मानना काफी मानते हैं जो संसार के अलग-अलग लोगों में भिन्न-भिन्न रूप में पाए जाते हैं, या यह क्या आवश्यक नहीं है कि यह पता लगाने का प्रयास किया जाए कि संसार में किस प्रकार की नैतिकता, आस्था तथा दृष्टिकोण रखने वालो लोग पनपे हैं, मजबूत हुए हैं तथा उन्होंने इस पृथ्वी पर राज किया है। जैसाकि कि प्रोसेफर कारवर ने कहा है, "नैतिकता और धर्म जो नैतिक स्वीकृति और अस्वीकृति की संगठित अभिव्यक्ति है, अस्तित्व के संदर्भ में महत्वपूर्ण तत्व हैं जो आक्रमण और रक्षा के सच्चे हथियार, दांत और पंजे, सींग और खुर, फर और पंख, अर्थात् सब कुछ हैं। सामाजिक समूह, समुदाय, आदिम निवासी या राष्ट्र जो नैतिकता की अव्यवहार्य योजनाएं विकसित कर लेते हैं या इनके अंतर्गत ऐसे सामाजिक कर्म विकसित कर लेते हैं जो उन्हें अस्तित्व के लिए कमजोर और अक्षम बनाते हैं, आदतन स्वीकृति की भावना पैदा करते हैं, जब कि वे सामाजिक कर्म जो उन्हें मजबूत और विस्तार के लिए समर्थ बनाते हैं, आदतन तिरस्कार की भावना पैदा करते हैं और अंततः अस्तित्व के संघर्ष में मिट जाते हैं। इन आदतों की स्वीकृति या अस्वीकृति ही (ये धर्म और नैतिकता के परिणाम हैं) इन्हें उसी प्रकार पंगु बना देती है, जिस प्रकार मक्षिका के एक ओर दो पंख हों तथा दूसरी ओर कोई पंख न हो तो मक्षिका उड़ ही नहीं पाएगा। इस बात पर बहस बेकार है कि एक व्यवस्था अच्छी है तो दूसरी व्यवस्था भी अच्छी होगी।" इसलिए नैतिकता और धर्म केवल पसंद और नापसंदगी के मुद्दे नहीं हैं। आप नैतिकता की व्यवस्था को अत्यधिक नापसंद कर सकते हैं, जिसे एक राष्ट्र में सार्वभौमिक रूप से लागू किया जाए तो वह राष्ट्र पृथ्वी पर एक सबसे मजबूत राष्ट्र बन जाएगा। आपकी नापसंदगी के बाद भी ऐसा राष्ट्र मजबूत हो जाएगा। आप किसी एक नैतिकता की व्यवस्था और न्याय के आदर्श को अत्यधिक पसंद कर सकते हैं, जो यदि किसी राष्ट्र में सार्वभौमिक रूप से लागू किया जाए तो वह राष्ट्र अन्य राष्ट्रों के साथ संघर्ष में खड़ा नहीं रह पाएगा। आपकी इस प्रशंसा के बावजूद ऐसा राष्ट्र अंततः लुप्त हो जाएगा। हिन्दुओं को अपने धर्म और नैतिकता को अस्तित्व के मूल्यों के संदर्भ में परखना चाहिए।

     दूसरी बात यह है कि हिन्दुओं को इस पर विचार करना चाहिए कि उन्हें अपनी संपूर्ण सामाजिक धरोहर को सुरक्षित रखना है या जो उपयोगी हो उसे चुनकर भावी पीढ़ियों को केवल उतना ही हस्तांतरित करना है और उससे अधिक बिल्कुल नहीं। प्रोफेसर जॉन डिवी, जो मेरे शिक्षक रहे हैं तथा जिनका मैं ऋणी हूं ने कहा है, "प्रत्येक समाज छोटी सी बातों से, अतीत की सूखी लकड़ियों से तथा निश्चित रूप से विकृत चीजों से भार-ग्रस्त हो जाता है। चूंकि समाज अधिक प्रबुद्ध हो जाता है, इसलिए यह महसूस करता है कि वह संरक्षण के लिए उत्तरदायी नहीं है और अपनी वर्तमान समग्र उपलब्धियों के प्रेषण के लिए भी उत्तरदायी नहीं है, परंतु वह केवल इस बात का उत्तरदायी है कि अधिक श्रेष्ठ भावी समाज का निर्माण किया जाएं यहां तक कि बर्क फ्रांस की क्रांति में निहित सिद्धांतों के बदलाव का तीव्र विरोध करने के बावजूद यह मानने को बाध्य हुआ कि "ऐसा राज्य जो बदलाव के साधन से रहित है, वह राज्य के रक्षण के साधनों से भी रहित है। बदलाव के साधन के बिना ऐसे राज्य को संविधान के उस भाग का नुकसान होने का भी जोखिम उठाना पड़ेगा, जिस भाग की यह धर्मनिष्ठा से रक्षा करना चाहता है।" बर्क ने राज्य के बारे में जो कहा है, वही बात समाज के बारे में भी लागू होती है।

     तीसरी बात यह है कि हिन्दुओं को अतीत की पूजा बंद करने पर विचार करना चाहिए। इस पूजा के गलत परिणामों के बारे में प्रोफेसर डिवी ने कहा है, "व्यक्ति केवल वर्तमान में जी सकता है। वर्तमान, भूतकाल के बाद नहीं आता या इसे भूतकाल का परिणाम ही नहीं मानेंगे। जीवन इसी में है कि अतीत को वर्तमान के पीछे छोड़ दिया जाए। अतीत के परिणामों के अध्ययन से ही वर्तमान को समझने में मदद नहीं मिलेगी। अतीत का तथा अतीत की धरोहर का वर्तमान में प्रवेश करने को ही महत्त्वपूर्ण समझना, अन्यथा नहीं । अतीत के रिकार्ड तथा अवशेष को बनाने में हुई गल्तियों को शिक्षा का प्रमुख साधन बना देने से अतीत को हम वर्तमान का विरोधी बना देते हैं तथा वर्तमान को हम बहुत कुछ अतीत की नकल बना देते हैं।" ऐसा सिद्धांत जो वर्तमान के जीने एवं आगे बढने के कर्म को छोटा मानता है, वर्तमान को रिक्त समझता है तथा भविष्य को बहुत दूर । ऐसा सिद्धांत प्रगति का दुश्मन है और जीवन के तेज व अनवरत प्रवाह में बाधा पैदा करता है।

    चौथा, क्या हिन्दुओं को इस पर विचार कर मान नहीं लेना चाहिए कि कुछ भी स्थिर नहीं है, कुछ भी शाश्वत नहीं है और न ही कुछ सनातन है, हर चीज परिवर्तनशील है, व्यक्ति और समाज के लिए परिवर्तन जीवन का नियम है। एक बदलते हुए समाज में पुराने मूल्यों में सतत क्रांतिकारी बदलाव आना चाहिए तथा हिन्दुओं को यह महसूस करना चाहिए कि यदि कार्यों को मापने के कुछ मानक हैं तो उन मानकों को सुधारने के लिए तैयार रहना चाहिए।