जातिप्रथा और उन्मूलन
jati Pratha aur Unmulan Answer given to Mahatma Gandhi dr bhimrao ambedkar
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मैंने उन लोगों के बारे में विचार किया है, जो आपके साथ नहीं हैं और जिनका आपके विचारों से खुला विरोध है। अन्य लोग भी हैं जो ऐसे हैं, जिनके साथ आप नहीं हैं, या जो आपके साथ नहीं हैं। मैं यह संकोच कर रहा था कि क्या उनके दृष्टिकोण पर विचार किया जाए। लेकिन आगे और विचार करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि मुझे उनके दृष्टिकोण पर विचार करना होगा। इसके दो कारण हैं। पहला, जाति संबंधी समस्या के प्रति उनका रुख मात्र एक तटस्थता वाला रुख नहीं है, बल्कि सशस्त्र तटस्थता वाला रुख है। दूसरा, शायद उनकी संख्या भी पर्याप्त है। इनमें एक वर्ग ऐसा है, जिसे हिन्दुओं की जाति-व्यवस्था में कोई विचित्र या निंदनीय चीज नहीं मिली है। ऐसे हिन्दू, मुस्लिमों, सिखों तथा ईसाइयों का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और इस बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि उनमें भी जातियां हैं। ऐसे प्रश्न पर विचार करते समय प्रारंभ में ही यह ध्यान रखना होगा कि मानव समाज कहीं भी एक संपूर्ण इकाई नहीं है। समाज सदैव बहु इकाई वाला रहा है। इस क्रियाशील विश्व में एक सीमा व्यक्ति है, तो दूसरी सीमा समाज। इन दोनों के बीच छोटी-बड़ी समस्त सहचारी व्यवस्थाएं, परिवार, मित्रता, सहकारी संस्थाएं, व्यापार प्रतिष्ठान, राजनीतिक दल, चोर और लुटेरों के गिरोह विद्यमान हैं। छोटे वर्ग आमतौर पर एक-दूसरे से मजबूती से जुड़े होते हैं और प्रायः जातियों जैसे होते हैं। उनकी संहिता संकीर्ण तथा भाव प्रवण होती है, जिसे प्रायः समाज-विरोधी कहा जा सकता है। यह बात यूरोप तथा एशिया के प्रत्येक समाज पर लागू होती है। यह निर्धारित करते समय कि क्या संबंधित समाज एक आदर्श समाज है, यह प्रश्न पूछा जा सकता है। क्या वह आदर्श समाज इसलिए नहीं है क्योंकि इसमें वर्ग हैं, लेकिन वर्ग तो सभी समाजों में होते हैं। यह निर्धारित करते समय कि आदर्श समाज कौन सा है, ये प्रश्न पूछे जा सकते हैं ऐसे हितों की संख्या कितनी है और वे कितने प्रकार के हैं, जो वर्गों से संबंधित हैं? अन्य समाजों के साथ उसका व्यवहार कितना पूर्ण एवं स्वतंत्र है? क्या वर्गों और जातियों को पृथक करने वाली शक्तियों की संख्या उन शक्तियों की संख्या से अधिक है, जो उनको जोड़ती हैं? वर्ग जीवन को क्या सामाजिक महत्व दिया गया है? क्या उसकी अनन्यता, रीति-रिवाज और सुविधा या धर्म का मामला है। इन प्रश्नों को ध्यान में रखते हुए किसी व्यक्ति को यह निर्णय लेना होगा कि क्या गैर-हिन्दुओं में वैसी ही जाति-व्यवस्था है जैसी कि हिन्दुओं में है। यदि हम इन विचारों को एक ओर मुसलमानों, सिखों और ईसाइयों की जातियों, और दूसरी ओर हिन्दुओं की जातियों पर लागू करें, तो यह पता चलेगा कि गैर हिन्दुओं की जाति-व्यवस्था हिन्दुओं की जाति-व्यवस्था से मूलतः भिन्न है। इसके कई कारण हैं। पहला, ऐसा कोई बंधन नहीं है, जो उन्हें एकता के सूत्र में बांधता हो, जब कि गैर हिन्दुओं में ऐसे अनेक बंधन हैं, जो उन्हें एकता के सूत्र में बांधते हैं। किसी समाज की शक्ति उसके संपर्क स्थलों तथा उसके विभिन्न वर्गों के बीच अंतरक्रिया की संभावनाओं पर निर्भर है। कार्लाइल ने इन्हें 'सुव्यवस्थित तंतु', अर्थात लचीले तंतु कहा है, जो विखंडित तत्वों को जोड़ने और उनमें पुनः एकता स्थापित करने में मदद करते हैं। हिन्दुओं में ऐसी कोई संघटनकारी शक्ति नहीं है, जो जातिप्रथा द्वारा किए गए विखंडन को समाप्त कर सकें। लेकिन गैर हिन्दुओं में ऐसे अनेक सुव्यवस्थित तंतु हैं, जो उन्हें एकता के सूत्र में बांधते हैं। इसके अतिरिकत यह भी स्मरण रखना होगा कि हालांकि गैर हिन्दुओं में भी वैसी ही जातियां हैं जैसी कि हिन्दुओं में हैं, लेकिन उनका गैर-हिन्दुओं के लिए सामाजिक महत्व उतना नहीं हैं, जितना कि हिन्दुओं के लिए है। किसी मुसलमान या सिख से पूछिए कि वह कौन है तो वह यही कहेगा कि वह मुसलमान या सिख है। वह अपनी जाति नहीं बताएगा, हालांकि उसकी जाति है। आप उसके इस उत्तर से संतुष्ट हो जाएंगे। जब वह यह बताता है कि वह मुसलमान है। तो उससे आगे यह नहीं पूछते कि वह शिया है या सुन्नी, शेख है या सैयद, खटीक है या पिंजारी | जब वह यह कहता है कि मैं सिख हूं तो आप उससे यह नहीं पूछते कि वह जाट है या रोडा, मजबी है या रामदासी । लेकिन आप इस बात से उस स्थिति में संतुष्ट नहीं होते, जबकोई अपने को हिन्दू बताता है। आप उसकी जाति अवश्य पूछेंगे। इसका कारण यह है कि हिन्दू के विषय में जाति का इतना महत्व है कि उसके जाने बिना आप यह निश्चित नहीं कर सकते कि वह किस तरह का व्यक्ति है। गैर हिन्दुओं में जाति का उतना महत्व नहीं है, जितना कि हिन्दुओं में है । यह बात उस स्थिति में स्पष्ट हो जाती है, जब आप जाति-व्यवस्था भंग करने के परिणामों पर विचार करते हैं। सिखों और मुसलमानों में भी जातियां हो सकती हैं, लेकिन वे उस सिख और मुसलमान का जाति - बहिष्कार नहीं करेंगे, जो अपनी जाति तोड़ता है। वास्तव में, सिख और मुसलमान जाति - बहिष्कार के विचार से परिचित नहीं हैं। लेकिन हिन्दुओं के विषय में यह बात एकदम भिन्न है। हिन्दू को यह निश्चित रूप से पता होता है कि यदि वह जाति का बंधन तोड़ेगा तो उसे जाति से निकाल दिया जाएगा। इससे यह प्रकट होता है कि हिन्दुओं और गैर-हिन्दुओं के लिए जाति के सामाजिक महत्व में कितना अंतर है। यह उनके बीच अंतर का दूसरा संकेत है। तीसरा संकेत भी है, जो और अधिक महत्वपूर्ण है। गैर हिन्दुओं में जाति की कोई धार्मिक पवित्रता नहीं होती, लेकिन हिन्दुओं में तो निश्चित रूप से होती है। गैर हिन्दुओं में जाति मात्र एक व्यवहार है, न कि एक पवित्र प्रथा । उन्होंने जाति की उत्पत्ति नहीं की। उनके मामले में तो जाति का मात्र अस्तित्व बना हुआ है। वे जाति को धार्मिक सिद्धांत नहीं मानते। धर्म हिन्दुओं को जातियों के पृथक्करण और अलगाव को एक सद्गुण मानने के लिए बाध्य करता है। लेकिन धर्म गैर हिन्दुओं को जाति के प्रति ऐसा रुख अपनाने के लिए बाध्य नहीं करता है। यदि हिन्दू लोग जाति को समाप्त करना चाहें तो धर्म आड़े आएगा। लेकिन गैर-हिन्दुओं के विषय में यह बात लागू नहीं होती। अतः गैर हिन्दुओं में जाति के मात्र अस्तित्व से संतुष्ट होना तब तक एक खतरनाक भ्रम साबित होगा, जब तक यह जानकारी प्राप्त न कर ली जाए कि उनके जीवन में जाति का क्या महत्व है और क्या कोई अन्य ऐसे 'सुव्यवस्थित तंतु' हैं, जो सामाजिक भावना को उनकी जाति - भावना के ऊपर ले आते हों। हिन्दुओं का यह भ्रम जितना शीघ्र दूर हो, उतना ही अच्छा है।

हिन्दुओं का एक अन्य वर्ग इस बात से इन्कार करता है कि हिन्दुओं के लिए जातिप्रथा से कोई समस्या उत्पन्न होती है। ऐसे हिन्दू इस दृष्टिकोण में संतोष व्यक्त करते हैं कि हिन्दू जाति जीवित रही है और वे इसे जीवित रहने का उपयुक्तता का प्रमाण मानते हैं। प्रो. एस. राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक 'हिन्दू व्यू ऑफ लाइफ' में इस दृष्टिकोण की अच्छी व्याख्या की है। हिन्दू धर्म का संदर्भ देते हुए वे कहते हैं, "सभ्यता कोई अल्पकालिक वस्तु नहीं रही है। इसका इतिहास चार हजार वर्ष से भी पुराना है, फिर भी वह एक ऐसी सभ्यता बन गई है जिसकी अविछिन्न धारा आज तक प्रवाहित है, यद्यपि कभी-कभी इसकी गति मंद और स्थिर भी रही है। इसने चार या पांच सहस्त्राब्दियों से भी अधिक समय से आध्यात्मिक विचारधारा एवं अनुभवों से प्रभावित होकर भी इसका मूलतत्व अक्षुण्ण रहा है। यद्यपि इतिहास के आदिकाल से भिन्न-भिन्न जातियों एवं संस्कृति के लोग भारत में आते रहे हैं, फिर भी हिन्दू धर्म ने अपनी सर्वोच्चता अक्षुण्ण रखी है, यहां तक कि राजनीतिक शक्ति द्वारा पोषित धर्म-परिवर्तनकारी जातियां भी अधिसंख्य हिन्दुओं को अपने विचार मनवा लेने के लिए बाध्य नहीं कर पाई हैं। हिन्दू संस्कृति में कुछ ऐसी जीवन शक्ति है जो अन्य शक्तिशाली धाराओं में नहीं मिल सकती। यह देखने के लिए हिन्दू धर्म के वृक्ष को काटना आवश्यक नहीं है कि क्या उसमें आज भी रस निकल रहा है।" इस विषय में तो राधाकृष्णन का नाम ही काफी है कि वे जो कुछ कहते हैं उसमें गंभीरता होती है, और पाठकों को प्रभावित करते हैं। पर मुझे अपना विचार प्रकट करने में संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि मुझे इस बात की आशंका है कि कहीं उनका कथन इस गलत तर्क का आधार न बन जाए कि अस्तित्व जीवित रहने की उपयुक्तता का प्रमाण है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि सवाल यह नहीं है कि कोई समुदाय जीवित रहता है या समाप्त हो जाता है, बल्कि यह है कि वह कैसे सम्मान के साथ जीवित रहता है। जीवित रहने के विभिन्न प्रकार हैं। लेकिन वे सबके सब सम्मानजनक नहीं हैं। किसी व्यक्ति और समाज के लिए मात्र जीवनयापन करने और सम्मानपूर्वक जीवनयापन करने में पर्याप्त अंतर है। युद्ध में लड़ना और गौरवपूर्ण जीवन व्यतीत करना, जीवित रहने का एक प्रकार है। पराजित होना, आत्म-समर्पण करना और एक बंदी के रूप में जीवन व्यतीत करना भी अस्तित्व का एक प्रकार है। किसी हिन्दू के लिए इस बात से संतुष्ट होना व्यर्थ है कि वह और अन्य जीवित रहे हैं। मुझे यह सोचना होगा कि उसके जीवन की गुणवत्ता क्या है। यदि वह ऐसा सोचेगा तो मुझे विश्वास है, वह मात्र अस्तित्व का दंभ छोड़ देगा। हिन्दु के जीवन में तो सतत पराजय ही रही है। उसे जो यह प्रतीत होता है कि उसका जीवन तो सतत प्रवाहमान रहा है, वह सतत प्रवाहमान नहीं रहा है, बल्कि वस्तुतः वह ऐसा जीवन रहा है, जिसका सतत ह्रास होता रहा है।
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मेरी राय में इसमें कोई संदेह नहीं है कि जब तक आप अपनी सामाजिक व्यवस्था नहीं बदलेंगे, तब तक कोई प्रगति नहीं होगी। आप समाज को रक्षा या अपराध के लिए प्रेरित कर सकते हैं। लेकिन जाति-व्यवस्था की नींव पर आप कोई निर्माण नहीं कर सकते : आप राष्ट्र का निर्माण नहीं कर सकते, आप नैतिकता का निर्माण नहीं कर सकते । जाति-व्यवस्था की नींव पर आप कोई भी निर्माण करेंगे, वह चटक जाएगा और कभी भी पूरा नहीं होगा।
अब केवल एक प्रश्न रहता है, जिस पर विचार करना है। वह एक है कि 'हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में सुधार कैसे किया जाए?' जातिप्रथा को कैसे समाप्त किया जाए? यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा विचार व्यक्त किया गया है कि जाति-व्यवस्था में सुधार करने के लिए पहला कदम यह होना चाहिए कि उप जातियों को समाप्त किया जाए। यह विचार इस उप- धारणा पर आधारित है कि जातियों के बीच तौर-तरीकों और स्तर के अपेक्षाकृत उप-जातियों के तौर-तरीकों तथा स्तर में अधिक समानता है। मेरे विचार से यह एक गलत धारणा है। डकन तथा दक्षिण भारत के ब्राह्मणों की तुलना में उत्तर तथा मध्य भारत के ब्राह्मण सामाजिक रूप से निम्न श्रेणी के हैं। उत्तर तथा मध्य प्रांत के ब्राह्मण केवल रसोइया और पानी पिलाने वाले हैं, जब कि डकन और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों का सामाजिक स्तर बहुत ऊंचा है। दूसरी ओर, उत्तरी भारत के वैश्य और कायस्थ बौद्धिक एवं सामाजिक रूप से डकन और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों के समकक्ष होते हैं। इसके अतिरिक्त, आहार के मामले में भी डकन और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों और कश्मीरी और बंगाल के ब्राह्मण में कोई समानता नहीं है। दक्षिण के ब्राह्मण शाकाहारी होते हैं, जब कि कश्मीर और बंगाल के ब्राह्मण मांसाहारी। जहां तक आहार का संबंध है, डकन और दक्षिण भारत के ब्राह्मणों और ब्राह्मणेतर गुजराती, मारवाड़ी, बनियों और जैन जैसी जातियों में काफी समानता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक से दूसरी जाति में संक्रमण को आसान बनाने के लिए उत्तरी भारत के कायस्थों और दक्षिण भारत की अन्य ब्राह्मणेतर जातियों को डकन तथा द्रविड़ प्रदेश की ब्राह्मणेर जातियों में मिला देना दक्षिण भारत के ब्राह्मणों को उत्तर भारत के ब्राह्मणों में मिला देने के अपेक्षाकृत अधि व्यावहारिक होगा। लेकिन यदि यह मान लिया जाए कि उप जातियों का विलय संभव है, तो इस बात की क्या गारंटी है कि उप जातियों के समाप्त होने के परिणामस्वरूप जातियां निश्चित रूप से समाप्त हो जाएंगी। इस स्थिति में उप-जातियों के समाप्त होने से जातियों की जड़ें और मजबूत हो जाएंगी और वे शक्तिशाली बन जाएंगी। परिण मस्वरूप वे अधिक हानिकर सिद्ध होंगी। अतः यह उपाय न तो व्यवहार्य है और न ही कारगर । यह उपाय निश्चित रूप से गलत सिद्ध होगा। जाति व्यवस्था समाप्त करने की एक और कार्य-योजना है कि अंतर्जातीय खान-पान का आयोजन किया जाए। मेरी राय में यह उपाय भी पर्याप्त नहीं है। ऐसी अनेक जातियां हैं, जो अंतर्जातीय खान-पान की अनुमति देती हैं। इस विषय में सामान्य अनुभव यह रहा है कि अंतर्जातीय खान-पान की व्यवस्था जाति-भावना या जाति-बोध को समाप्त करने में सफल नहीं हो पाई हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि इसका वास्तवकि उपचार अंतर्जातीय विवाह ही है। केवल खून के मिलते ही रिश्ते की भावना पैदा होगी और जब तक सजातीयता की भावना को सर्वोच्च स्थान नहीं दिया जाता, जब तक जाति-व्यवस्था द्वारा उत्पन्न की गई पृथकता की भावना, अर्थात् पराएपन की भावना समाप्त नहीं होगी। हिन्दुओं में अंतर्जातीय विवाह सामाजिक जीवन में निश्चित रूप से महान शक्ति का एक कारक सिद्ध होगा। गैर हिन्दुओं में इसकी इतनी आवश्यकता नहीं है। जहां समाज संबंधों के ताने-बाने से सुगठित होगा, वहां विवाह जीवन की एक साधारण घटना होगी। लेकिन जहां समाज छिन्न-भिन्न है, वहां बाध्यकारी शक्ति के रूप में विवाह की परम आवश्यकता होती है। अतः जाति व्यवस्था को समाप्त करने का वास्तविक उपाय अंतर्जातीय विवाह ही है। जाति व्यवस्था समाप्त करने के लिए जाति विलय जैसे उपाय को छोड़कर और कोई उपाय कारगर सिद्ध नहीं होगा। आपके जातपांत तोड़क मंडल ने आक्रमण की यही नीति अपना रखी है। यह सीधा और सामने का आक्रमण है। मैं आपके सही निदान और हिन्दुओं से यह कहने का साहस दिखाने के लिए आपको बधाई देता हूं कि वास्तव में उनमें (हिन्दुओं) क्या दोष है । सामाजिक अत्याचार के मुकाबले राजनीतिक अत्याचार कुछ भी नहीं है और वह सुधारक जो समाज का विरोध करता है, उस राजनीतिज्ञ से अधिक साहसी होता है, जो सरकार का विरोध करता है। आपका यह कहना सही है कि जाति व्यवस्था उसी स्थिति में समाप्त होगी । जब रोटी-बेटी का संबंध सामान्य व्यवहार में आ जाए। आपने बीमारी की जड़ का पता लगा लिया है। लेकिन क्या बीमारी के लिए आपका नुस्खा ठीक है, यह प्रश्न अपने आपसे पूछिए । अधिसंख्य हिन्दू रोटी-बेटी का संबंध क्यों नहीं करते? आपका उद्देश्य लोकप्रिय क्यों नहीं है? उसका केवल एक ही उत्तर है और वह है कि रोटी-बेटी का संबंध उन आस्थाओं और धर्म-सिद्धांतों के प्रतिकूल है, जिन्हें हिन्दू पवित्र मानते हैं। जाति ईंटों की दीवार या कांटेदार तारों की लाइन जैसी कोई भौतिक वस्तु नहीं है, जो हिन्दुओं को मेल - मिलाप से रोकती हो और जिसे तोड़ना आवश्यक हो जाति तो एक धारणा है और यह एक मानसिक स्थिति है। अतः जाति-व्यवस्था को नष्ट करने का अर्थ भौतिक रूकावटों को दूर करना नहीं है। इसका अर्थ विचारात्मक परिवर्तन से है। जाति-व्यवस्था बुरी हो सकती है। जाति के आधार पर ऐसा घटिया आचरण किया जा सकता है, जिसे मानव के प्रति अमानुषिकता कहा जा सकता है। फिर भी, यह स्वीकार करना होग कि हिन्दू समुदाय द्वारा जातिप्रथा मानने का कारण यह नहीं है कि उनका व्यवहार अमानुषिक और अन्यायपूर्ण है। वह जातपांत को इसलिए मानते हैं, क्योंकि वह अत्यधिक धार्मिक होते हैं। अतः जातपांत मानने में लोग दोषी नहीं हैं। मेरी राय में उनका धर्म दोषी है, जिसके कारण जाति-व्यवस्था की धारणा का जन्म हुआ है। यदि यह बात सही है तो यह स्पष्ट है कि वह शत्रु जिसके साथ आपको संघर्ष करना है, वे लोग नहीं है जो जातपांत मानते हैं, बल्कि वे शास्त्र हैं, जिन्होंने जाति-धर्म की शिक्षा दी है। रोटी-बेटी का संबंध न करने या समय-समय पर अंतर्जातीय खान-पान और अंतर्जातीय विवाहों का आयोजन न करने के लिए लोगों की आलोचना या उनका उपहास करना वांछित उद्देश्य को प्राप्त करने का एक निरर्थक तरीका है। वास्तविक उपचार यह है कि शास्त्रों से लोगों के विश्वास को समाप्त किया जाए। यदि शास्त्रों ने लोगों के धर्म, विश्वास और विचारों को ढालना जारी रखा तो आप कैसे सफल होंगे? शास्त्रों की सत्ता का विरोध किए बिना, लोगों को उनकी पवित्रता और दंड विधान में विश्वास करने के लिए अनुमति देना और फिर उनके अविवेकी और अमानवीय कार्यों के लिए उन्हें दोष लगाना और उनकी आलोचना करना सामाजिक सुधार करने का अनुपयुक्त तरीका है। ऐसा प्रतीत होता है कि महात्मा गांधी समेत अस्पृश्यता को समाप्त करने वाले समाज सुधारक यह महसूस नहीं करते हैं कि लोगों के कार्य मात्र उन धर्म-विश्वासों के परिणाम हैं, जो शास्त्रों द्वारा उनके मन में पैदा कर दिए गए हैं। लोग तब तक अपने आचरण में परिवर्तन नहीं करेंगे, जब तक वे शास्त्रों की पवित्रता में विश्वास करना नहीं छोड़ देते, जिस पर उनका आचरण आधारित है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि ऐसे प्रयासों का कोई सकारात्मक परिणाम न निकले। आप भी वही गलती कर रहे हैं, जो अस्पृश्यता को समाप्त करने के उद्देश्य से काम करने वाले समाज सुधारक कर रहे हैं। रोटी-बेटी के संबंध के लिए आंदोलन करना और उनका आयोजन करना कृत्रिम साधनों से किए जाने वाले, बलात् भोजन कराने के समान है। प्रत्येक पुरुष और स्त्री को शास्त्रों के बंधन से मुक्त कराइए शास्त्रों द्वारा प्रतिष्ठापित हानिकर धारणाओं से उनके मस्तिष्क का पिंड छुड़ाइए, फिर देखिए, वह आपके कहे बिना अपने आप अंतर्जातीय खान-पान तथा अंतर्जातीय विवाह का आयोजन करेगा / करेगी।
वाद विवाद में फंसने से कोई लाभ नहीं है। लोगों से यह कहने में कोई लाभ नहीं है कि शास्त्रों में वैसा नहीं कहा गया है, जैसा कि वे विश्वास करते हैं, व्याकरण की दृष्टि से पढ़ते हैं या तार्किक ढंग से उनकी व्याख्या करते हैं। यह कोई बात नहीं है कि लोग शास्त्रों का ज्ञान किस प्रकार से ग्रहण करते हैं। आपको ऐसा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जैसा कि बुद्ध ने किया था। आपको वह मोर्चा लेना होगा जो गुरु नानक ने लिया था। आपको शास्त्रों की केवल उपेक्षा ही नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनकी सत्ता स्वीकार करने से इन्कार करना होगा, जैसा कि बुद्ध और नानक ने किया था। आपको हिन्दुओं से यह कहने का साहस रखना चाहिए कि दोष उनके धर्म का है वह धर्म जिसने आपमें यह धारणा पैदा की है कि जाति व्यवस्था पवित्र है। क्या आप ऐसा साहस दिखाएंगे।