मेहनत करे मुर्गा अंडा खाये फ़क़ीर !

( लालकृष्ण अडवाणीजी का सफ़रनामा )

डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी 

     के इतिहास पर नज़र रखने वालों के बीच यह लोकोक्ति लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन और प्रधानमंत्री पद की उनकी आकांक्षाओं के संदर्भ में बिल्कुल सटीक बैठती है।

     1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा केवल 2 सीटों पर सिमट गई थी। इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी की कमान संभाली और देशव्यापी 'राम रथ यात्रा' निकाली।

     1990 के दशक के मध्य में जब भाजपा गठबंधन सरकार बनाने के करीब थी, तब आडवाणी जी की कट्टर छवि (Hardliner image) के कारण अन्य सहयोगी दल उनके नाम पर तैयार नहीं थे। इसलिए, आडवाणी जी ने खुद बड़े दिल का परिचय देते हुए अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। वाजपेयी जी देश के प्रधानमंत्री बने और आडवाणी जी उप-प्रधानमंत्री पद तक ही सीमित रहे।

The Architect Who Never Got the Corner Office lal krishna Advani the BJP and the Price of Loyalty

     2009 के चुनाव में हार के बाद, जब 2014 में भाजपा के सत्ता में आने की पूरी जमीन तैयार हो चुकी थी, तब पार्टी की कमान और नेतृत्व की बागडोर नरेंद्र मोदी के हाथों में चली गई।

     साल 2006 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के 200 से अधिक सांसदों ने तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को एक ज्ञापन सौंपा था। इस ज्ञापन में तत्कालीन चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की मांग की गई थी।

     १) लालकृष्ण आडवाणी और विपक्षी सांसदों का आरोप था कि नवीन चावला निष्पक्ष नहीं हैं और उनका झुकाव तत्कालीन सत्ताधारी दल कांग्रेस (UPA सरकार) की तरफ है। विपक्ष को डर था कि वे चुनाव आयोग में रहकर किसी राजनीतिक दल के हित में काम कर सकते हैं।

     )विपक्ष ने यह मुद्दा भी उठाया था कि आपातकाल के दौरान ज्यादतियों की जांच करने वाले 'शाह आयोग' (Shah Commission) ने नवीन चावला के प्रशासनिक आचरण को लेकर गंभीर और प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं।

     ३)नवीन चावला और उनकी पत्नी से जुड़े कुछ निजी ट्रस्टों को कांग्रेस के सांसदों द्वारा अपने सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) फंड से धन दिए जाने के मामले सामने आए थे। विपक्ष ने इसे 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) और वित्तीय अनुचितता का मामला बताया था।

     जनवरी 2009 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने राष्ट्रपति को चुनाव आयुक्त नवीन चावला को पद से हटाने की सिफ़ारिश भेजी थी।

     तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी के इस क़दम से स्वाभाविक रूप से बड़ा विवाद खड़ा हुआ और इसकी वैधता, समय और औचित्य को लेकर सवाल उठे।

     तब इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि गोपालस्वामी की सिफ़ारिश की उसके पास 93 पन्नों वाली कॉपी थी और उन्होंने चावला पर कांग्रेस के पक्ष में झुकाव रखने का आरोप लगाया था।

     इस पूरे मामले की शुरुआत 2006 में हुई एक याचिका से हुई थी।विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी और 200 से अधिक सांसदों ने राष्ट्रपति को चावला को चुनाव आयुक्त के पद से हटाने की मांग करते हुए याचिका दी थी।इसकी एक प्रति तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त को भी भेजी गई थी।

     सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं होने पर BJP के जसवंत सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया था. अदालत में गोपालस्वामी ने कहा कि था कि मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उन्हें अपने स्तर पर किसी चुनाव आयुक्त को हटाने की सिफ़ारिश करने का अधिकार है।मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने गोपालस्वामी के इस दावे का विरोध किया था।

     BJP ने सुप्रीम कोर्ट से अपना मामला वापस लेने और अपनी याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष पेश करने की अनुमति मांगी।अदालत ने अगस्त 2007 में इसकी अनुमति दे दी।

     इसके कई महीने बाद, 30 जनवरी 2008 को यानी मुख्य चुनाव आयुक्त के आदेश से क़रीब एक साल पहले बीजेपी ने नवीन चावला को हटाने की मांग करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के समक्ष याचिका दायर की।

     सरकार की सलाह के मुताबिक़ तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने एन. गोपालस्वामी की चुनाव आयुक्त नवीन चावला को हटाने की सिफ़ारिश ख़ारिज कर दी थी।

     राष्ट्रपति के इस फ़ैसले से चावला के लिए गोपालस्वामी के पद छोड़ने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त बनने का रास्ता साफ़ हो गया था।जनवरी में जब यह विवाद पहली बार सामने आया था, तब भी क़ानून मंत्री ने गोपालस्वामी की आलोचना करते हुए साफ़ कर दिया था कि चावला को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जाएगा।

EVM बनाम BJP

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी (L.K. Advani) की भूमिका शुरुआती और प्रमुख आलोचकों में से एक रही है। 2009 के आम चुनावों में भाजपा की हार के बाद, उन्होंने देश में EVM की सुरक्षा और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए थे।

    भाजपा के तत्कालीन नेता जी.वी.एल. नरसिम्हा राव ने EVM की कमियों और तकनीक पर एक किताब लिखी थी, जिसका नाम था "Democracy at Risk: Can We Trust Our Electronic Voting Machine?"। इस किताब की प्रस्तावना (Foreword) स्वयं लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी।

     गोपालस्वामी की सिफ़ारिश से यह विवाद 2009 के आम चुनावों से ठीक पहले पैदा हुआ था. गोपालस्वामी 2009 में 20 अप्रैल को पद छोड़ने वाले थे और उनकी जगह नवीन चावला पद संभालने वाले थे।

टीएन शेषन मामला

     देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने 1993 के एक राष्ट्रपति अध्यादेश को रद्द करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया था और इसे असंवैधानिक बताया था।

     इस अध्यादेश के ज़रिए शेषन के अलावा दो चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करके चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय संस्था बना दिया गया था।शेषन ने इस अध्यादेश को चुनौती देते हुए कहा था कि यह पहले से स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है।

     सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह अध्यादेश संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुरूप था।अदालत ने कहा था, "चुनाव आयोग एक सदस्यीय संस्था भी हो सकता है और बहुसदस्यीय भी।”

     अदालत ने आगे कहा, "अनुच्छेद 324 की व्यवस्था यह है कि एक स्थायी संस्था होगी, जिसे चुनाव आयोग कहा जाएगा और उसका एक स्थायी पदाधिकारी होगा, जिसे मुख्य चुनाव आयुक्त कहा जाएगा।”

     अदालत ने कहा था, "अगर मुख्य चुनाव आयुक्त को इस अर्थ में सर्वोच्च माना जाए कि उसका फ़ैसला अंतिम होगा, तो चुनाव आयुक्त निष्क्रिय या महज़ सजावटी पद बन जाएंगे।अनुच्छेद 324 से ऐसी मंशा निकालना मुश्किल है और न ही हम इसे संविधान निर्माताओं की मंशा मान सकते हैं।”

     सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही कहा कि पदाधिकारियों का कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनके बीच अहम का टकराव न हो।अदालत ने कहा था, "हम इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि जब संविधान निर्माताओं ने बहुसदस्यीय चुनाव आयोग का प्रावधान किया, तो वे इस संभावना से अनजान नहीं थे कि हर मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकती थी लेकिन उन्होंने निश्चित रूप से ऐसे उच्च पदस्थ अधिकारियों से अपेक्षा की होगी कि वे अपने मतभेदों को गरिमापूर्ण तरीक़े से सुलझाएं।”

     सुप्रीम कोर्ट ने 1993 में चुनाव आयोग को बहुसदस्यीय संस्था बनाने और फ़ैसले बहुमत से लेने की व्यवस्था को बरकरार रखा था. तब टीएन शेषन इससे सहमत नहीं थे ।

     सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले पर भारत के जाने-माने क़ानूनविद् एफ एस नरीमन ने कहा था कि अदालत बहुसदस्यीय चुनाव आयोग की व्यवस्था को व्यावहारिक रूप से रद्द नहीं कर सकती थी, क्योंकि ऐसी संस्था को सर्वसम्मति या बहुमत के आधार पर ही काम करना है।लेकिन फ़ैसले ने चुनाव आयोग को पहले की तुलना में संस्थागत रूप से कम स्वतंत्र छोड़ दिया था।

     1950 के बाद क़रीब 30 वर्षों तक चुनाव आयोग में केवल मुख्य चुनाव आयुक्त होता था और उसे व्यापक रूप से स्वतंत्र माना जाता था।अक्तूबर 1989 में पहली बार दो चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए, लेकिन तीन महीने के भीतर ही यह व्यवस्था वापस ले ली गई।

     1991 के कानून ने मुख्य चुनाव आयुक्त के वेतन और पेंशन को सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर किया और चुनाव आयुक्तों को हाई कोर्ट के जजों के बराबर रखा, लेकिन चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त के समान कार्यकाल की सुरक्षा नहीं दी।

     नरीमन जी का मानना था कि "अदालत को 1993 के बदलावों को बरकरार रखते हुए भी क़ानून के ज़रिए स्थायी तीन सदस्यीय चुनाव आयोग अनिवार्य करना चाहिए था।चुनाव आयुक्तों को निश्चित और सुरक्षित कार्यकाल देना चाहिए था ताकि उन्हें उनके कार्यकाल के दौरान आसानी से हटाया न जा सके।चुनाव आयुक्तों की संख्या और उनकी नियुक्ति के समय को लेकर सरकार के बिना किसी स्पष्ट दिशा-निर्देश वाले विवेकाधिकार को ख़त्म करना चाहिए था।”

     नरीमन जी के नुसार चुनाव आयुक्त निर्णय लेने में समान भागीदारी का दावा कर सकते थे और जनता को यह भरोसा दिलाया जा सकता है और चुनाव आयोग सरकारी दबाव से मुक्त रहेगा ।

    चुनाव आयोग के पास वोटर लिस्ट को साफ और सही रखने के लिए नाम हटाने की शक्ति है, लेकिन किसी भी वैध और पात्र भारतीय नागरिक का नाम बिना उचित जांच और बिना नोटिस दिए काटना कानून का उल्लंघन माना जाता है।

     भाजपा को एक वटवृक्ष बनाने के लिए जो खाद-पानी और कड़ी मेहनत लालकृष्ण आडवाणी ने दी थी, उसका अंतिम राजनीतिक फल (प्रधानमंत्री का पद) उनके बजाय वाजपेयी जी और बाद में नरेंद्र मोदी को मिला। यह इतिहास आज के बीजेपी के नेता ने विपक्ष पर निशाना साधने के पहले पढ़ लेना चाहिए।