नागरिक परिक्रमा
(संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां)
आरटीआई कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ को धन्यवाद देना चाहिए कि फर्जी जीडीपी वृद्धि के शोर के बीच उन्होंने प्रधानमंत्री जन धन योजना की पोल खोल कर रख दी है। उन्हें आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार, 12 अगस्त 2026 की स्थिति में देश भर में कुल 59,03,74,907 जन धन खाते थे। लेकिन 5,72,35,490 जन धन खातों में कोई बैलेंस नहीं है और 15,36,77,009 खाते निष्क्रिय हैं, याने इनमें लंबे समय से कोई लेन-देन नहीं हुआ है। इन आंकड़ों के साथ थोड़ा-सा गुणा-भाग कर लें, तो हम पाएंगे कि निष्क्रिय खातों सहित जिन खातों में रकम जमा है, उनमें भी औसतन 6000 रूपये से ज्यादा की राशि जमा नहीं है।
मोदी के वर्ष 2014 से सत्ता में आते ही यह बहुमहत्वाकांक्षी योजना शुरू की गई थी, जिसका मुख्य मकसद आम जनता को बचत के लिए प्रोत्साहित करना तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा योजना से जोड़ना था। ये आंकड़ें बताते हैं कि यह योजना, नोटबंदी की तरह ही, अपने दोनों उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रही है। इस योजना के तहत आम जनता को, शून्य बैलेंस पर जनधन खाते खोलने की सुविधा दी गई थी। 59 करोड़ से ज्यादा खाते खुलने का अर्थ है कि हमारे देश की वयस्क आबादी के बहुत बड़े हिस्से को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया। इन आंकड़ों के सहारे गोदी मीडिया में मोदी सरकार ने देश के विकास के भारी-भरकम दावे भी किए थे।

लेकिन आंकड़ों से साफ है कि विकास के दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का अंतर है। पिछले 12 सालों में करोड़ों लोगों की कुल बचत 6000 रूपये से ज्यादा नहीं है, यानी साल भर में वे मुश्किल से 500 रूपये भी नहीं बचा पाते। कुल मिलाकर, प्रति व्यक्ति बचत लगभग शून्य ही है। अर्थशास्त्रीय नजरों से देखें, तो जीडीपी में वृद्धि के साथ ही प्रति व्यक्ति बचत भी बढ़ना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। न बचत हुई, न लोगों का जीवन स्तर ऊंचा हुआ। किसानों और मजदूरों के हर साल बढ़ रहे आत्महत्या के आंकड़ें बताते हैं कि मामला ठन-ठन गोपाल है या 'ऋणम् कृत्वा घृतम् पीबेत' का है। इसका साफ अर्थ है कि या तो जीडीपी के आंकड़े गलत है या विकास लोगों तक पहुंच नहीं रहा है।
लेकिन दोनों ही निष्कर्ष सही है। वे अर्थशास्त्री भी, जो कभी सरकार से जुड़े थे, जीडीपी के आंकड़ों को तथ्यों के साथ चुनौती दे रहे हैं। मोदी सरकार का दावा है कि "2023-24 से 2026-27 तक की चार साल की अवधि में यह पहली तिमाही की सबसे ज़्यादा वास्तविक जीडीपी विकास दर है।" लेकिन वे बता रहे हैं कि जिस कदर जीडीपी गणना का फर्जीकरण किया गया है, उसे हिसाब में लिया जाएं, तो इस वर्ष की पहली तिमाही की जीडीपी 2.6 प्रतिशत से ऊपर नहीं बैठती। यह जीडीपी भी देश की आम जनता के हाथ में नहीं पहुंची है, बल्कि कॉर्पोरेट-तिजोरी में कैद हो गई है। यही कारण है कि आज भारत में आय और संपत्ति की असमानता पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा है। इस असमानता के आंकड़ों को दुहराने की जरूरत नहीं है, केवल यही याद रखना काफी है कि मोदी सरकार के आंकड़ों के हिसाब से ही, देश की 80 करोड़ जनता 5 किलो मुफ्त राशन पर जिंदा है, इसके बावजूद सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कटौती जारी है। आज देश की आधी आबादी, अपने बच्चों और महिलाओं की बड़ी संख्या के साथ, भुखमरी और कुपोषण का शिकार है। सरकारी जीडीपी ने उनकी किस्मत की रेखाओं को बदला नहीं है। जीडीपी से जुड़कर रोजगार, औसत मजदूरी और निवेश बढ़ने की भी यही हकीकत है कि बढ़ा कुछ नहीं है, सर्वनाश चौतरफा है।
जब सरकार की आखिरी सांस चल रही होती है, तो तमाम फुलाए गए गुब्बारे भी फूटने लगते हैं। चलाचली की बेला में मोदी सरकार के साथ भी यही हो रहा है।
(टिप्पणीकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)