फासीवाद का बर्बर भागवत पुराण

नागरिक परिक्रमा

( संजय पराते की राजनैतिक टिप्पणियां )

     क्या अब भी किसी को कोई शक है कि हमारा देश संघी गिरोह की सरपरस्ती में फासीवादी के एक ऐसे नए दौर से गुजर रहा है, जिसकी कल्पना एक नागरिक के रूप में हममें से किसी ने नहीं की थी। संविधान, लोकतंत्र, कायदे-कानून सब एक तरफ धरे रह गए हैं, इनकी जगह संघी गिरोह के मौखिक निर्देशों ने ले ली है। इन निर्देशों पर अमल करने वाला लठैतों का एक गिरोह भी संगठित रूप से काम कर रहा है, जिसकी सत्ता के सभी अंगों तक आसान पहुंच सर्वविदित है। इस पहुंच के बल पर अब वह सरे आम नागरिकों को सजा देने की हिमाकत कर रहा है और न्यायपालिका नाम की संस्था की कोई जरूरत ही नहीं रह गई है। एक नागरिक, एक लेखक, एक रचनाकार, एक चिंतक के रूप में बोलना, लिखना, सोचना, असहमति जाहिर करना, सवाल खड़े करना, अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना -- ये सब आज गुनाह है। इसके लिए आप देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी, पाकिस्तानी ... आदि विशेषणों से नवाजे जा सकते हैं और दंडित किए जा सकते है। अब वही काम सही है, जो सत्ता को सुहाए, उसकी चापलूसी करे, सत्ता में बैठे लोगों की राष्ट्र के नाम पर जयकारे लगाए। फासीवाद को अपनी मुहिम आगे बढ़ाने के लिए नागरिक नहीं चाहिए, आज्ञपालक प्रजा चाहिए, जो उसके दिए खैरात को बिना ना-नुकुर स्वीकार करें और सत्ता का गुणगान करें। जो ऐसा नहीं कर सकता, उसे इस देश में रहने का भी कोई अधिकार नहीं है, नागरिकता भी उससे छीन ली जाएगी। ब्रर्टोल्ट ब्रेख्त ने फासीवाद के बारे में कहा था कि वह अपने लिए जनता भी चुन सकती है। भारत में आज यही हो रहा है। एसआईआर के नाम पर करोड़ों नागरिकों की नागरिकता छीन लिए जाने, उन्हें मताधिकार ही नहीं, राज्य की कल्याणकारी सुविधाओं और उनके बुनियादी नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिए जाने का वास्तविक खतरा साकार होता हम अपनी आंखों से देख रहे हैं और इस बर्बरता के खिलाफ न्यायपालिका की चुप्पी भी हम देख रहे हैं। कानून के शासन की जगह अब संघी लठैतों ने ले ली है, जो कहीं जन संघर्षों, जन आंदोलनों पर हमला कर रही है, जो कहीं अल्पसंख्यकों पर, तो कहीं पत्रकारों पर और कहीं यात्रियों और पशु-व्यापारियों पर हमले कर रही हैं।

Fascism Ka Barbaric Bhagwat Purana

     फासिस्टों का कोई सगा नहीं होता। वह देश, संस्कृति, धर्म, रिश्ते-नाते सबको ठगकर फलता-फूलता है। वह कट्टरपंथियों की एक ऐसी जमात पैदा करता है, जिसका मकसद ही अब तक की श्रेष्ठ मानव उपलब्धियों को कुचलना होता है। विचारहीनता, अवैचारिकता और अवैज्ञानिकता उसकी विचार प्रक्रिया के अभिन्न अंग होते हैं। विज्ञान और तार्किकता से उसको सबसे ज्यादा चिढ़ होती है, क्योंकि मानव सभ्यता के पास यही एक पूंजी होती है, जो फासीवाद के मकसद को नाकाम कर सकती है।

     पिछले 60 सालों में हमने जिस लोकतंत्र को विकसित किया, उसमें बहुत-सी कमजोरियां, बहुत-सी बुराइयां थीं। लेकिन संघी गिरोह ने पिछले 12 सालों में जिस फासीवाद को पनपाया है, वह चाहे कितना भी मजबूत हो, मजबूत दिखे, लेकिन एक कमजोर लोकतंत्र का विकल्प नहीं हो सकता। इसलिए कि फासीवाद की पूरी दृष्टि ही मानवद्रोही होती है। वह मनुष्य को, उसकी मेहनत और सृजनात्मकता को केवल कॉर्पोरेटों की तिजोरियों को भरने का साधन समझती है। इसके लिए विमर्श और समावेशिता की सोच और प्रक्रिया को जीवन से बेदखल करने की जरूरत पड़ती है। 'मोदी चालीसा' के नाम पर आज यही हो रहा है : जो मोदी कहे, वही सही, बाकी सभी देशद्रोही। ऐसी दृष्टि का लोकतंत्र, समावेशीकरण और देश की एकता की रक्षा के लक्ष्य से कोई संबंध नहीं हो सकता। ऐसी दृष्टि मूल्यांकन भी नहीं कर सकती : न देश का, न जनता का, न अर्थव्यवस्था का, यहां तक कि सत्ता पक्ष का। ये केवल वैचारिक गुलाम होते है। एक विचार उभरता है उस कॉर्पोरेट-शीर्ष से, सत्ता का केंद्र जिसका बंधक है और यह विचार बिना किसी परिवर्धन, संशोधन, विमर्श और आलोचना के एक तीखे दुर्गंध के रूप में पूरे देश में फैलाकर बताया जाता है कि यही सुगंध है, इसे स्वीकार करो। जो इसके लिए तैयार नहीं है, वह इसी के साथ जीने को अपनी मजबूरी समझे। यही हिंदुत्व है, जिसका वास्तव में भारतीय विचार परंपरा और चिंतन के साथ कोई संबंध नहीं है। इस हिंदुत्व का असली उद्देश्य सत्ता के साथ गलबहियां करना है और अपने कॉर्पोरेट मित्रों को लाभ पहुंचाना है। इसके लिए विचारहीनता का संजाल बुनना जरूरी होता है।

     दुनिया में बर्बरता रही है और लूट भी है। लेकिन मानव सभ्यता कभी भी इसके पक्ष में नहीं रही है, उल्टे वह इसके खिलाफ़ लड़कर ही विकसित हुई है। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। बर्बरता और लूट के खिलाफ जमीनी और वैचारिक संघर्ष जारी रहेगा और कोई तटबंध इस विचार प्रवाह को बांधकर नहीं रख सकता। फासीवाद के मानवद्रोही दृष्टि पर लोकतंत्र की उदार मानवपेक्षी दृष्टि ही विजयी होगी, जेन-ज़ी और जेन-अल्फा का उभरता संघर्ष इसी बात का संकेत है। संघी गिरोह के सरदार मोहन भागवत ने अमेरिका में जो प्रवचन दिया है, उससे भी यही बात साबित होती है कि विश्व बंधुत्व के विचारों पर नफरत का कोई भी विचार हमेशा के लिए हावी नहीं हो सकता। यह अलग बात है कि विवेकानंद बनने की कोशिश में 'भागवत-प्रवचन' हाथी का दिखने वाला दांत ही साबित हुआ है। भागवत की अमेरिका में कथनी से उनके संघी गिरोह की भारत में एकदम उल्टी करनी पूरी दुनिया देख रही है।

( टिप्पणीकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650 )