(दिल्ली से गुजरात ७२ वा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार )
डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
यह सफर केवल दो फिल्म उद्योगों का रिश्ता नहीं है, बल्कि यह कला, प्रतिभा, पूंजी और कहानियों के लेन-देन का एक बेहद खूबसूरत और ऐतिहासिक चक्र (Cycle) है।शुरुआती दौर में जहां गुजरात के फिल्मकारों ने मुंबई जाकर बॉलीवुड की नींव रखी, वहीं आज का आधुनिक ‘ढॉलीवुड’ (अर्बन गुजराती सिनेमा) वापस बॉलीवुड को टक्कर दे रहा है और उसे बेहतरीन कहानियां दे रहा है।
72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (2026) या अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (IFFI) के संदर्भ में है, क्योंकि 2026 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों ने अपना 72वां संस्करण मनाया और पहली बार दिल्ली से बाहर गुजरात में आयोजित किया गया।
महाराष्ट्र -जिस तरह मुंबई, आंध्र प्रदेश (टॉलीवुड), तमिलनाडु (कोलीवुड) और पश्चिम बंगाल का भारत के सिनेमाई इतिहास में एक बहुत बड़ा और केंद्रीय योगदान रहा है, ठीक उसी तरह गुजरात की पृष्ठभूमि का भी भारतीय चित्रपट जगत (सिनेमा) के उद्भव और विकास में एक बेहद गहरा और महत्वपूर्ण नाता रहा है।

जिस तरह मुंबई (बॉलीवुड) को भारतीय सिनेमा की राजधानी माना जाता है, उसकी शुरुआत और आर्थिक नींव में गुजरातियों का सबसे बड़ा हाथ था।भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर के सबसे बड़े स्टूडियो और फिल्म कंपनियां (जैसे 'कोहिनूर फिल्म कंपनी', 'रणजीत मूवीटोन', और 'बॉम्बे टॉकीज़') द्वारकादास संपत, चंदूलाल शाह और चिमनलाल देसाई जैसे गुजराती फिल्मकारों ने मुंबई में स्थापित की थीं।सिनेमा के जनक दादा साहब फाल्के के बाद, भारत में मूक और बोलती फिल्मों का सबसे बड़ा कारोबार मुंबई और गुजरात के व्यापारियों (पारसी और गुजराती उद्योगपतियों) के सहयोग से ही फला-फूला।
दक्षिण -आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु ने जिस तरह अपनी समृद्ध लोक कलाओं, 'कुचिपुड़ी' और 'भरतनाट्यम' जैसी सांस्कृतिक विधाओं और पौराणिक कथाओं (Mythology) को सिनेमा में उतारा, ठीक वही भूमिका गुजरात ने भी निभाई।शुरुआती गुजराती सिनेमा पूरी तरह से गुजरात के पारंपरिक लोक नाट्य 'भवाई' (Bhavai), संतों के जीवन (जैसे नरसिंह मेहता, मीराबाई) और क्षेत्रीय लोककथाओं (जैसे जेसल-तोरल) पर आधारित था। इन सांस्कृतिक कहानियों ने क्षेत्रीय दर्शकों को सिनेमा से जोड़ा, जैसा दक्षिण भारत में हुआ।
पश्चिम बंगाल - को सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और महान साहित्यिक फिल्मों (जैसे शरतचंद्र और रवींद्रनाथ टैगोर की कृतियों) के लिए जाना जाता है। गुजरात का सिनेमाई इतिहास भी साहित्यिक रूप से बहुत समृद्ध रहा है।महान गुजराती उपन्यासों जैसे गोवर्धनराम त्रिपाठी की 'सरस्वतीचंद्र' और कन्हैयालाल मुंशी की कृतियों पर कई ऐतिहासिक फिल्में और धारावाहिक बने।इसके अलावा, समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema) या आर्ट फिल्मों के दौर में श्याम बेनेगल की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म 'मंथन' (1976) (जो अमूल डेयरी आंदोलन पर आधारित थी) की पूरी पृष्ठभूमि और निर्माण गुजरात में ही हुआ था, जिसे गुजरात के 5 लाख किसानों ने 2-2 रुपये देकर स्पॉन्सर किया था।
गुजरात -आज जिस तरह दक्षिण (तमिल/तेलुगु) सिनेमा या बंगाली सिनेमा अपनी मजबूत और अनूठी कहानियों के लिए पूरे देश में सराहा जाता है, वैसे ही आज का अर्बन गुजराती सिनेमा भी रीमेक कल्चर से बाहर निकलकर अपनी पहचान बना रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण फिल्म 'शैतान' (Shaitaan) है, जो मूल रूप से ब्लॉकबस्टर गुजराती थ्रिलर फिल्म 'वाश' (Vash) का रीमेक थी।
भले ही मुख्य गुजराती फिल्म उद्योग (ढॉलीवुड) का आकार मुंबई या दक्षिण के उद्योगों जितना बड़ा न रहा हो, लेकिन भारतीय सिनेमा को तकनीक, पूंजी, कलाकार और कहानियां देने में गुजरात की पृष्ठभूमि उतनी ही मजबूत रही है जितनी इन अन्य राज्यों की।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
72 वर्ष का सफर (1954–2026)
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की शुरुआत 1954 में “स्टेट अवॉर्ड्स फॉर फिल्म्स” के नाम से हुई थी, जो बाद में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार बन गए।
पहला समारोह - 1954 में दिल्ली के विज्ञान भवन/नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी ऑडिटोरियम में आयोजित हुआ।
दिल्ली परंपरा - 72 वर्षों तक यह समारोह लगभग हमेशा नई दिल्ली में ही होता रहा। 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह को 22 सितंबर 2026 को गुजरात के एकता नगर (पूर्व केवड़िया) में आयोजित किया गया—यह पहली बार था जब यह समारोह दिल्ली से बाहर हुआ।
विजेता - 18 जुलाई 2026 को विजेताओं की घोषणा हुई; ‘आर्टिकल 370’, मम्मूटी, कार्तिक आर्यन, यामी गौतम जैसे कलाकारों को सम्मानित किया गया।
अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (IFFI): 1952 से अब तक
यदि आपका तात्पर्य अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (IFFI) से है, तो इसकी शुरुआत 1952 में मुंबई में हुई थी, जिसमें लगभग 40 फीचर फिल्में और 100 लघु फिल्में दिखाई गईं।
1952 में जवाहरलाल नेहरू के संरक्षण में आयोजित।शुरुआत में मुंबई, मद्रास, कोलकाता और दिल्ली में घूम-घूम कर आयोजित होता रहा।1965 से यह प्रतिस्पर्धी महोत्सव बना।2004 के बाद से IFFI गोवा में नियमित रूप से आयोजित हो रहा है।
2024 में प्रायोजक (Jio) के हटने के बाद महोत्सव छोटा किया गया; 2025 का संस्करण रद्द कर दिया गया, लेकिन 2026 में नए लोगो और स्वतंत्र/क्षेत्रीय सिनेमा पर जोर के साथ वापसी की योजना बनाई गई।
महत्व
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 72 वर्षों में यह भारत का सबसे प्रतिष्ठित सिनेमाई सम्मान बना है, जो केवल बॉलीवुड नहीं, बल्कि सभी क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों को मान्यता देता है।IFFI जैसे एशिया के प्रमुख फिल्म महोत्सवों में से एक, जो वैश्विक सिनेमा और भारतीय फिल्मों के बीच सेतु का काम करता है।
भारत भर की प्रतिक्रिया
समर्थकों का कहना है कि यह दिल्ली-केंद्रित परंपरा को तोड़ने वाला सकारात्मक कदम है। गुजरात का एकता नगर भव्य और प्रतीकात्मक स्थल है, इसलिए वहां आयोजन से पर्यटन और राष्ट्रीय एकता का संदेश मजबूत हो सकता है।
आलोचकों का तर्क है कि मुंबई, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल या हैदराबाद जैसे राज्यों का भारतीय फिल्म उद्योग में अधिक ऐतिहासिक और प्रत्यक्ष योगदान है। इसलिए यदि समारोह दिल्ली से बाहर ले जाना था, तो किसी बड़े फिल्म-केंद्र को चुना जा सकता था।
फिल्मकार राहुल ढोलकिया ने सवाल उठाया कि गुजरात को क्यों चुना गया और फिल्म-उद्योग में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले राज्यों को यह अवसर क्यों नहीं मिला। सोशल मीडिया पर भी कुछ लोगों ने इसे सांस्कृतिक विकेंद्रीकरण बताया, जबकि कुछ ने राजनीतिक निर्णय के रूप में आलोचना की।
प्रशासनिक और सांस्कृतिक विकेंद्रीकरण के रूप में, या फिर गुजरात को राजनीतिक-सांस्कृतिक रूप से प्रमुखता देने के रूप और बदलते राजनीतिक परिदृश्य में प्रधानमंत्री पद कोई राज्य का नहीं होता अपितु सम्पूर्ण देश का होता हैं जो ढोलकिया जी ने सवाल उठाया वो वाजिब है ।
गुजरात में स्थापित और केंद्रित किए गए कुछ सबसे प्रमुख उद्योग और वैश्विक व्यापार केंद्र निम्नलिखित हैं।
१)GIFT City (गुजरात इंटरनेशनल फाइनेंस टेक-सिटी(२)अंतर्राष्ट्रीय बुलियन एक्सचेंज (IIBX)(३)टाटा-ताइवान सेमीकंडक्टर प्लांट (४)माइक्रोन टेक्नोलॉजी (Micron Technology) (५)टाटा-एयरबस सी-295 सैन्य विमान परियोजना (६)PM मित्रा पार्क (Surat) और बल्क ड्रग पार्क (७)वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (WDFC) (८)कच्छ का सबसे बड़ा सोलर पार्क आदि से आलोचकों और विपक्ष में गुजरात के प्रधानमंत्री है या देश के ऐसी भावना निर्माण होकर ७२ वे राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से भारत वर्ष में पहली बार पुरस्कार महोत्सव के दौरान नई बहस को जन्म दिया है ।