(छत्तीसगढ़ (भिलाई) में २२-२३ अगस्त को ओबीसी संगम अवसर पर ओबीसी वर्ग की अपेक्षा)
डॉ. महेंद्र धावड़े, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
उक्त संगम में मुझे आयोजकों द्वारा आमंत्रित किया गया लेकिन अन्य व्यस्तता से उपस्थित होने का अवसर प्राप्त नही हो सका इसलिये मैंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुऐ लिखा है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को दिल्ली में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में जाति जनगणना को मंजूरी दे दी गई। 1947 के बाद से जाति जनगणना नहीं हुई। जाति जनगणना की जगह कांग्रेस ने जाति सर्वे कराया, यूपीए सरकार में कई राज्यों ने राजनीतिक दृष्टि से जाति सर्वे किया है। सरकार ने आगामी जनगणना में जातिगत जनगणना को भी शामिल करने का फैसला किया है। भारत में आखिरी बार जनगणना साल 2011 में हुई थी और देश में आखिरी पूर्ण जाति आधारित जनगणना 1931 में ब्रिटिश शासन के दौरान ही कराई गई थी।
चुनावी मुद्दा - सरकार ने आगामी जनगणना में जातिगत जनगणना को शामिल करने का फैसला किया है, क्योंकि विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर दबाव बना रहा था और यह एक महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बन गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि जातिगत गणना से नीतियां बनाने में मदद मिलेगी और क्षेत्रीय दलों के लिए भी यह फैसला राहत की बात है।जब तक सरकार SC,ST जैसा OBC का जात निहाय गिनती नहीं करेगी तब तक इसका लाभ ओबीसी समुदाय को नहीं मिलेगा ।मंडल आयोग (1980) ने केंद्र सरकार की नौकरियों में OBC को 27% आरक्षण देने की सिफारिश की। लेकिन सटीक जातिगत डेटा की कमी से OBC की जनसंख्या का सही अनुमान लगाना मुश्किल था।

SECC यूपीए सरकार ने 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना कराई, लेकिन इसका जातिगत डेटा आज तक पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किया गया।राज्यों के प्रयास: बिहार, कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्यों ने खुद अपने जातिगत सर्वे करवाए। बिहार के 2023 के सर्वे के अनुसार, OBC और अत्यंत पिछड़े वर्ग (EBC) राज्य की कुल आबादी का 63% से अधिक हैं।
राज्य में सर्वे- संविधान के अनुच्छेद 246 के अनुसार जनगणना का मामला केंद्र सरकार का है, लेकिन कर्नाटक, बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाए। चूंकि संवैधानिक रूप से ये जातिगत जनगणना नहीं करा सकते थे, लिहाजा इन्होंने इसे कास्ट सर्वे का नाम दिया। कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार ने 2015 में कास्ट सर्वे कराया था, लेकिन उसका नतीजा सामने नहीं आ सका है। वहीं, बिहार में JDU-RJD सरकार ने 2023 में जातिगत सर्वे कराया और इसके नतीजे भी जारी किए। तेलंगाना में भी कांग्रेस सरकार ने 2023 में सामाजिक, आर्थिक एवं जातिगत सर्वे कराया और नतीजे जारी किए।
बिहार में महागठबंधन की सरकार के दौरान 2023 में जातिगत सर्वे के आंकड़े जारी किए गए थे। उस वक्त नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू और आरजेडी की राज्य में सरकार थी। बाद में तेलंगाना और कर्नाटक जैसे कुछ गैर BJP शासित राज्यों में जाति आधारित सर्वे भी कराए गए हैं।
कर्नाटक, बिहार और तेलंगाना में जातिगत सर्वे के बाद अब राष्ट्रीय स्तर पर जातिवार जनगणना की राह तैयार हो गई है। साल 2011 में कांग्रेस की यूपीए सरकार ने पूरे देश में कास्ट सेंसस के लिए कदम उठाया था। तब सोशियो इकनॉमिक कास्ट सेंसस (SECC) कराया गया, लेकिन उसके आंकड़े जारी नहीं हुए। अब मोदी सरकार ने अगली जनगणना में कास्ट सेंसस शामिल करने का फैसला किया है। ऐसा होने पर किस जाति के कितने लोग देश में हैं, यह जानकारी आजाद भारत में पहली बार सामने आएगी क्योंकि इस तरह की आखिरी गणना आजादी से पहले 1931 में कराई गई थी। इस जानकारी से सामाजिक और आर्थिक रूप से अहम जानकारी सामने आएगी। सरकार को भी कल्याणकारी नीतियों का संचालन और नियोजन करने के लिये बाध्य होगा ।
पहली जनगणना - आजादी से पहले साल 1853 में नॉर्थ वेस्टर्न प्रॉविंसेज में अंग्रेजों ने पहली जनगणना कराई थी। इसके बाद उन्होंने जातिवार गणना के बारे में सोचा। तब सेंसस एडमिनिस्ट्रेटर एच एच रिजले की अगुवाई में फोकस किया गया कि पहले यह तय हो कि किसे किस जाति का माना जाए। उन्होंने वर्ण व्यवस्था और पेशे के आधार पर अलग-अलग जाति समूह बनाए, जिनमें कई जातियों को शामिल कर लिया। अंग्रेजों ने 1901 में भारत में पहली जनगणना तो करा ली, लेकिन कास्ट सेंसस वे 1931 में करा सके।
1951 से 2011 तक हुई हर जनगणना में SC और ST की आबादी भी दर्ज की गई, लेकिन ओबीसी जाति समूह के लोगों की गणना नहीं की गई। यूपीए सरकार ने 2011 में सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC) कराई, जो आजाद भारत में राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का पहला कदम था। 2014 मई में यूपीए सरकार की विदाई हो गई। मोदी सरकार ने जून 2014 में लोकसभा को बताया था कि SECC का काम पूरा होने में और 3 महीने लगेंगे। हालांकि उसके आंकड़े कभी जारी नहीं हो सके। 2018 में सरकार ने लोकसभा को बताया कि ‘कास्ट डेटा की प्रोसेसिंग में कुछ गलतियों का पता चला है।’ 2021 में मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दिया और कहा कि एससी, एसटी के अलावा अन्य लोगों का कास्ट सेंसस ‘कराना नामुमकिन है ।
U Turn - समय देख कर मोदी वाली सरकार पलटी मारती गई किंतु २०२४ के चुनावी नतीजे ने मोदी NDA सरकार को पंगू बना दिया यही डर का कारण बना और जाति आधारित जनगणना करने का फैसला करना पड़ा ।
OBC में ब्राम्हण - 2011 के SECC में राष्ट्रीय स्तर पर 46 लाख जातियों, उपजातियों का आंकड़ा बहुत बड़ा पाया गया।- राष्ट्रीय और राज्यों के स्तर पर जातियों के मामले में बहुत घालमेल है। ओबीसी की सेंट्रल लिस्ट में जहां करीब ढाई हजार जातियां हैं, वहीं राज्यों के स्तर पर ओबीसी में 3 हजार से ज्यादा जातियां हैं। कई ऐसी जातियां हैं, जो स्टेट ओबीसी लिस्ट में हैं, लेकिन सेंट्रल ओबीसी लिस्ट में नहीं हैं।- चुनौती इस तरह की भी है कि जहां यूपी में कुछ ब्राह्मण जातियां OBC लिस्ट में हैं, वहीं कुछ राज्यों में वैश्य समुदाय की कुछ जातियां OBC तो कुछ राज्यों में जनरल लिस्ट में हैं। कुछ राज्यों में जाट OBC लिस्ट में नहीं हैं। वहीं, कर्नाटक की ओबीसी लिस्ट में गौड़ सारस्वत ब्राह्मण भी हैं।
संगम से अपेक्षा
ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) समाज या संगठनों के 'संगम' (एकजुटता/महासंगम) से समाज, युवाओं और देश को कई मुख्य अपेक्षाएं (उम्मीदें) होती हैं। इसका मुख्य उद्देश्य सामाजिक न्याय, अधिकारों की रक्षा और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाना है।
१) सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षण संस्थानों और स्थानीय निकायों में ओबीसी वर्ग को आबादी के अनुपात में पूरा और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व मिले।
२) SC,ST को असंवैधानिक क्रीमी लेयर (Creamy Layer) लागू करने के आदेश को भारत सरकार ने निरस्त किया वैसा ही OBC आरक्षण में लगे असंवैधानिक क्रीमी लेयर को हटाने की बात ओबीसी संगम में होना चाहिए।
३) ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के ओबीसी छात्रों के लिए बेहतर स्कूलों, कॉलेजों और हॉस्टलों की व्यवस्था कराना।
४) उच्च शिक्षा और विदेशों में पढ़ाई के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्कॉलरशिप और फेलोशिप की संख्या बढ़ाना।
५) युवाओं को केवल नौकरियों पर निर्भर न रखकर नए स्टार्टअप्स और व्यापार के लिए तकनीकी व आर्थिक मदद दिलाना।
६) ओबीसी समाज में आने वाली सैकड़ों उप-जातियों को एक मंच पर लाकर उनके बीच ऊंच-नीच की भावना को समाप्त करना।
७) ओबीसी वर्ग के भीतर जो जातियां (जैसे Extremely Backward Classes) अभी भी बहुत पीछे हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष प्रयास करना।
८) पारंपरिक व्यवसायों (जैसे किसान, शिल्पकार, बुनकर आदि) से जुड़े लोगों के लिए आधुनिक उपकरण, लोन और बाजार की व्यवस्था सुनिश्चित करना।
९) राज्य और केंद्र स्तर पर ओबीसी कल्याण के लिए समर्पित विभागों या मंत्रालयों के माध्यम से बजट का सही आवंटन कराना।
१०) समाज के जमीनी और योग्य कार्यकर्ताओं को राजनैतिक मंचों पर आगे बढ़ाना ताकि वे नीति-निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकें।
११) समाज की मांगों को किसी भी सरकार के सामने पूरी ताकत, अनुशासन और संवैधानिक तरीकों से रखना।
ओबीसी संगम से यह अपेक्षा होती है कि वह केवल एक भीड़ न बनकर समाज के शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक बदलाव का एक मजबूत जरिया (Catalyst) बने और निर्देशित ११ बिंदु पर चर्चा और मंथन करके भारत सरकार को अपने हक और अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करने के लिये प्रेरित करे ।