डॉ. महेंद्र धावडे, संस्थापक अध्यक्ष, बलीराजा पार्टी
वरिष्ठ अधिवक्ता और राजनीतिज्ञ मनन कुमार मिश्रा के कार्यकाल, उनके राजनीतिक सफर और हालिया विवादों पर आधी रात पलटी ।
मनन कुमार मिश्रा बिहार के गोपालगंज से ताल्लुक रखते हैं और वर्ष 2014 से लगातार बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष पद पर बने हुए हैं. वर्ष 2025 में वे रिकॉर्ड सातवीं बार इस पद पर निर्विरोध चुने गए ।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष और भाजपा के राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा पर उनके आलोचकों, विपक्षी नेताओं और स्वतंत्र वकीलों द्वारा 'पक्षपातपूर्ण भूमिका' (Biased Role) निभाने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं।मनन कुमार मिश्रा एक स्वायत्त और निष्पक्ष वैधानिक संस्था (BCI) के सर्वोच्च पद पर आसीन हैं।इसके साथ ही वे सत्तारूढ़ दल (भाजपा) के राज्यसभा सांसद भी हैं।आलोचकों का तर्क है कि कानूनविदों की सर्वोच्च नियामक संस्था के अध्यक्ष का किसी राजनीतिक दल का सक्रिय सदस्य होना संस्था की निष्पक्षता से समझौता करता है।

उनके सहयोगियों (बार काउंसिल के अन्य सदस्यों) ने भी खुलकर आरोप लगाया है कि मनन मिश्रा के कई फैसले अधिवक्ताओं के हितों की रक्षा करने के बजाय न्यायपालिका और सरकार को खुश करने (Appease करने) के उद्देश्य से प्रेरित दिखाई देते हैं।बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष और भाजपा सांसद मनन कुमार मिश्रा पर अक्सर आरोप लगते हैं कि वे देश की कानूनी संस्था का उपयोग सरकार और न्यायपालिका के शीर्ष नेतृत्व के राजनीतिक एजेंडे को समर्थन देने के लिए करते हैं।
मनन मिश्रा ने सरकार के सुर में सुर मिलाते हुए कई बार यह माँग की है कि सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंचों पर सुप्रीम कोर्ट, सरकार की नीतियों या जजों की आलोचना करने वाले वकीलों और कार्यकर्ताओं पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।जब भी विपक्ष या नागरिक समाज सरकार के फैसलों या अदालती फैसलों पर सवाल उठाता है, तो मनन मिश्रा BCI के जरिए बयान जारी कर इसे "संस्थाओं को कमजोर करने की साजिश" बताते हैं।
केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन नए आपराधिक कानूनों (BNS, BNSS, BS) का जब देश भर के कई बार एसोसिएशनों ने विरोध किया, तो मनन मिश्रा ने सरकार का बचाव किया।उन्होंने वकीलों से हड़ताल बंद करने की माँग की और सरकार के इस रुख का समर्थन किया कि नए कानून देश के हित में हैं और इनमें किसी भी बदलाव की तुरंत आवश्यकता नहीं है।
सितंबर 2024 में BCI ने एक सर्कुलर जारी कर नए वकीलों के लिए कड़े क्रिमिनल बैकग्राउंड चेक और घोषणापत्रों की माँग की. आलोचकों के अनुसार, यह कदम सरकार की उस नीति के अनुकूल था जिसके तहत आंदोलनकारी या सरकार विरोधी छवि वाले युवाओं को कानूनी पेशे से दूर रखने की कोशिश की जा रही है।
मनन मिश्रा लगातार यह माँग करते रहे हैं कि वकील किसी भी नीति (चाहे वह सरकारी हो या प्रशासनिक) के विरोध में अदालतों का बहिष्कार या हड़ताल न करें।सरकार भी हमेशा अदालती कामकाज ठप होने के खिलाफ रही है, और मिश्रा ने BCI के अध्यक्ष के रूप में इस सरकारी रुख को कड़ाई से लागू करने का प्रयास किया है।
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) के मुद्दे पर, जहाँ सरकार जजों की नियुक्ति में अपनी भूमिका चाहती है, मनन मिश्रा के बयानों में अक्सर न्यायपालिका और कार्यपालिका (सरकार) के बीच 'संतुलन' बनाने की माँग झलकती है।
अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह (22 जनवरी 2024) के अवसर पर देश की अदालतों में छुट्टी घोषित करने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने एक आधिकारिक माँग की थी ।17 जनवरी 2024 को BCI के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ को एक औपचारिक पत्र लिखा।इस पत्र के माध्यम से उन्होंने माँग की कि 22 जनवरी 2024 को ऐतिहासिक राम मंदिर उद्घाटन के अवसर पर सुप्रीम कोर्ट, देश के सभी हाई कोर्टों और जिला अदालतों में पूर्ण अवकाश (Holiday) घोषित किया जाए।
'अंधभक्ति' और (NALSAR यूनिवर्सिटी ) विवाद-
हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के 2026 बैच के कुछ छात्रों ने दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को आमंत्रित करने का विरोध किया था।
इसके जवाब में BCI अध्यक्ष के तौर पर मनन मिश्रा ने एक आदेश जारी कर देश के सभी स्टेट बार काउंसिलों को NALSAR के 2026 बैच के छात्रों का वकील के रूप में नामांकन (Enrolment) रोकने का निर्देश दे दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर टिप्पणी की कि "छात्रों में देश विरोधी तत्व घुस गए हैं जिनका उद्देश्य देश को अस्थिर करना है"।
कानूनी बिरादरी, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और (CJP - एक सोशल मीडिया सटायर व एक्टिविस्ट ग्रुप) जैसे संगठनों ने इस कदम को तानाशाही और सत्ता की चाटूकारिता करार दिया. भारी विरोध और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस हस्तक्षेप पर कड़ा रुख अपनाने के बाद, मनन मिश्रा ने आधी रात तक अपने फैसले को बदलने मे निंद खराब कर दी ।
राजनीतिक सफर-
मनन कुमार मिश्रा का राजनीतिक सफर वास्तव में बहुजन समाज पार्टी (BSP), कांग्रेस और भाजपा जैसे विभिन्न राजनीतिक दलों के वैचारिक पड़ावों से होकर गुजरा है।उनके इस दलीय बदलाव और राज्यसभा तक पहुँचने के सफर।
वर्ष 2009 के आम चुनाव में बसपा ने उन्हें बिहार की वाल्मीकि नगर लोकसभा सीट से अपना आधिकारिक उम्मीदवार बनाया था. हालांकि, इस चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली।बसपा छोड़ने के बाद मनन मिश्रा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए।वर्ष 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें गोपालगंज जिले की बैकुंठपुर विधानसभा सीट से टिकट दिया।इस चुनाव में भी वे त्रिकोणीय मुकाबले में हार गए और तीसरे स्थान पर रहे।लगातार दो हार और देश की बदलती राजनीतिक लहर के बीच मनन मिश्रा ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थाम लिया।
भाजपा में शामिल होने के बाद, वे 2014 से लगातार बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष पद पर है ।अगस्त 2024 में भाजपा ने उनके इस लंबे अनुभव और राजनीतिक निष्ठा को देखते हुए उन्हें बिहार से राज्यसभा उपचुनाव के लिए नामांकित किया. 27 अगस्त 2024 को वे निर्विरोध (Unopposed) राज्यसभा सांसद चुने गए।
पहले बसपा के दलित-ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले का हिस्सा बनना, फिर कांग्रेस की शरण में जाना, और अंततः भाजपा के राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के नैरेटिव में फिट होकर राज्यसभा की कुर्सी हासिल करना यह दर्शाता है कि उन्होंने किसी एक राजनीतिक विचारधारा के बजाय व्यक्तिगत राजनीतिक रसूख और सत्ता को प्राथमिकता दी।मनन कुमार मिश्रा का राजनीतिक सफर यह दर्शाता है कि कैसे देश की एक सर्वोच्च कानूनी और स्वायत्त संस्था (BCI) का नेतृत्व करते हुए उन्होंने अपने राजनीतिक रसूख को बढ़ाया और अंततः देश के उच्च सदन (राज्यसभा) तक का सफर तय किया।एक राजनीतिक व्यक्ति के हाथ में BCI की कमान होने से 'बार' (वकील समुदाय) की वह रीढ़ कमजोर हो जाती है जो सत्ता के सामने निडर होकर सच बोलने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए जानी जाती है।इन सभी माँगों और प्रस्तावों की सूची से स्पष्ट होता है कि मनन कुमार मिश्रा ने BCI जैसी स्वायत्त संस्था के जरिए अधिकांश ऐसे प्रस्तावों और नियमों की वकालत की है, जो केंद्र सरकार की नीतियों, उनके राष्ट्रवाद के एजेंडे और असहमति की आवाजों को नियंत्रित करने की राजनीतिक लाइन से पूरी तरह मेल खाते हैं।
देश की सबसे बड़ी कानूनी संस्था को निष्पक्ष रहना चाहिए, लेकिन मनन कुमार मिश्रा का झुकाव और हालिया फैसले उनकी भूमिका को पूरी तरह से निष्पक्ष नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से एकतरफा (पक्षपातपूर्ण) साबित करते हैं।वहीं दूसरी तरफ एक स्वायत्त वैधानिक संस्था (BCI) के अध्यक्ष पद पर रहते हुए एक राजनीतिक दल के सांसद के रूप में उनके फैसलों को लेकर आलोचक उन पर वैचारिक पक्षपात और अत्यधिक निष्ठा (जिसे सामान्य बोलचाल में अंधभक्ति कहा जाता है) का आरोप लगाते हैं।
₹14 करोड़ के खर्च का हिसाब-
NALSAR विवाद के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक संगठनों (जैसे CJP) ने मनन मिश्रा को घेरना शुरू किया।सौरभ दास ने BCI के आधिकारिक ऑडिट आंकड़ों का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि BCI ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में सिर्फ बैठकों और सम्मेलनों पर ₹14.22 करोड़ खर्च किए। इसके अलावा यात्रा और आवास पर ₹12 करोड़ अलग से खर्च हुए । आलोचकों का कहना है कि जब BCI युवा वकीलों और लॉ स्कूलों के कल्याण के लिए कुछ खास नहीं कर पा रही है, तो जनता और वकीलों के पैसे को इन बैठकों पर इस तरह क्यों उड़ाया जा रहा है?
'बेटे को जज बनाने का मार्ग-
इस विवाद के साथ ही कानूनी गलियारों में न्यायपालिका और बार काउंसिल में फैले नेपोटिज्म (भाई-भतीजावाद) पर भी तीखी बहस छिड़ गई है। मनन कुमार मिश्रा 2014 से लगातार रिकॉर्ड 7वीं बार BCI के अध्यक्ष चुने गए हैं और वह भाजपा के राज्यसभा सांसद भी हैं। उनके इस लंबे एकाधिकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है, जिसमें BCI चेयरमैन के कार्यकाल की सीमा तय करने की मांग की गई है।
आलोचकों का आरोप है कि जब कोई व्यक्ति इतने लंबे समय तक वकीलों की सर्वोच्च संस्था (BCI) के शीर्ष पर बैठता है और साथ ही सत्तारूढ़ दल का सांसद भी होता है, तो उसका कॉलेजियम (जजों की नियुक्ति प्रणाली) और न्यायिक नियुक्तियों पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
न्यायपालिका में अक्सर शीर्ष वकीलों और बार पदाधिकारियों के बेटों/रिश्तेदारों को जज बनाने के लिए 'मार्ग प्रशस्त' करने के आरोप लगते रहे हैं। मनन मिश्रा के इस विवाद ने इस धारणा को और मजबूत किया है कि कानूनी तंत्र में कुछ रसूखदार लोग अपनी शक्तियों का इस्तेमाल अपने करीबियों और परिजनों को उच्च न्यायिक पदों (जैसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज) पर बैठाने के लिए सौदेबाजी या प्रभाव के रूप में करते हैं।
मनन कुमार मिश्रा का यह मामला भारतीय कानूनी बिरादरी में जवाबदेही की कमी और सत्ता के विकेंद्रीकरण की भारी आवश्यकता को दर्शाता है। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले तानाशाही आदेश, करोड़ों रुपये के संदेहास्पद खर्च और न्यायिक नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद के आरोपों ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।