( आलेख : भूपेन सरमा, अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते )
असम का पर्यावरण नदियों और उनकी सहायक नदियों के एक बड़े नेटवर्क से बना है। ये नदियाँ अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मिज़ोरम, मणिपुर की पहाड़ियों और पड़ोसी देश भूटान से निकलती हैं और ब्रह्मपुत्र व बराक नदियों में मिलकर एक बहुत ही गतिशील और जटिल नदी प्रणाली बनाती हैं। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियाँ, बराक नदी प्रणाली के साथ मिलकर, मानसून के दौरान लगभग हर साल असम के मैदानी इलाकों के बड़े हिस्से को डुबो देती हैं। राज्य की पारिस्थितिकीय प्रणाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने के नाते, असम में बाढ़ का सीधा संबंध कई महत्वपूर्ण मुद्दों से है, जैसे कि बाढ़ के मैदानों का प्रबंधन, नदी के किनारों का कटाव, आर्द्रभूमि (वेटलैंड) का संरक्षण, शहरीकरण, तटबंध नीति, खेती पर बाढ़ का असर और लंबे समय तक चलने वाला आपदा प्रबंधन।
असम में बाढ़ की बार-बार आने की प्रकृति
असम में बाढ़ को आम तौर पर एक लगातार बनी रहने वाली प्राकृतिक आपदा माना जाता है। राष्ट्रीय बाढ़ आयोग के आकलन के अनुसार, राज्य का बाढ़-प्रभावित क्षेत्र 31,500 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग 39.58% है और देश के कुल बाढ़-प्रभावित क्षेत्र का लगभग 9.4% हिस्सा है। बाढ़ की सबसे बुरी आपदा 2019 में आई थी, जब 73 लाख से ज़्यादा लोग प्रभावित हुए थे। इसी तरह, 2020 में लगभग 58 लाख और 2022 में 57.50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए थे।

साल 2024 में भी राज्य में बाढ़ से हालात बहुत गंभीर थे। सरकारी सूत्रों के अनुसार, 7,794 गांवों में लगभग 43 लाख लोग प्रभावित हुए थे और बाढ़ व भूस्खलन से कुल 121 लोगों की मौत हुई थी। बार-बार आने वाली बाढ़ की समस्या को दिखाते हुए, असम में 2025 में बाढ़ की तीन अलग-अलग लहरें आईं। पहली लहर 31 मई से 22 जुलाई तक चली, जिसमें 2,630 गांव और 1,04,123 लोग प्रभावित हुए और 24 लोगों की मौत हुई थी। दूसरी लहर से 45,930 लोग प्रभावित हुए, जबकि तीसरी लहर ने 1,08,232 लोगों को प्रभावित किया और दो और लोगों की जान गई थी। ये असम में बार-बार आने वाली बाढ़ के कुछ ही उदाहरण हैं।
बाढ़ के साथ आमतौर पर नदी के किनारों का कटाव और भारी मात्रा में गाद का जमाव भी होता है, जिससे बड़े पैमाने पर लोगों को विस्थापित होना पड़ता है और आबादी के ढांचे पर इसका साफ़ असर दिखता है। इसलिए, असम में आने वाली बाढ़ को उससे जुड़े सभी सामाजिक-आर्थिक संकटों को ध्यान में रखकर समझना ज़रूरी है, क्योंकि इसका खेती, घरों, पशुधन, बुनियादी ढांचे और आजीविका पर बहुत बुरा असर पड़ता है।
मुख्य कारण
असम में बाढ़ और नदी के किनारों का कटाव सबसे बड़ी पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक समस्याएँ हैं। निस्संदेह, इनकी जड़ें ब्रह्मपुत्र और बराक नदी प्रणालियों की खास जल-संबंधी और भू-आकृति संबंधी विशेषताओं में हैं। ब्रह्मपुत्र और उसकी कई सहायक नदियाँ -- जैसे सुबनसिरी, रंगा नदी, दिखो, धनसिरी, जिया-भराली, मानस, बेकी, आइ, संकोश आदि -- असम से होकर बहती हैं। अपने ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश के बाद इनमें जलस्तर तेज़ी से बढ़ता है। बहरहाल, असम में बाढ़ को केवल किसी खास साल में हुई भारी बारिश का ही नतीजा नहीं माना जा सकता। राज्य की भू-आकृति को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, जो नदी प्रणालियों के जटिल नेटवर्क और उसके कारण होने वाले तलछट जमाव, ज़मीन के इस्तेमाल में बदलाव से आर्द्रभूमि को होने वाले लगातार नुकसान और नदी के वातावरण में इंसानों के अनियोजित और अवैज्ञानिक दखल से बहुत ज़्यादा प्रभावित होती है। इन कारकों के मेल से पैदा हुए संकट को अब वैश्विक तापमान में वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) ने और भी ज्यादा गंभीर बना दिया है, जिससे यह समस्या और ज़्यादा विकट और जटिल हो गई है।
एक और पहलू माफिया का
ऊपरी असम के शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट ज़िलों में हाल ही में आई बाढ़, पानी भरने की रफ़्तार और गहराई, दोनों ही मामलों में अनोखी थी। 20-22 जुलाई तक, इस भयानक और असामान्य रूप से विनाशकारी बाढ़ ने हज़ारों हेक्टेयर कृषि भूमि को बुरी तरह नुकसान पहुँचाया या डुबो दिया, और मरने वालों की कुल संख्या 100 से ज़्यादा हो गई। इसने लाखों लोगों को प्रभावित किया, जिनमें से कई लोगों ने पहले कभी ऐसी आपदा का सामना नहीं किया था।
शुरुआत में सरकारी सूत्रों ने बताया था कि जुलाई में आई भयानक बाढ़ असम-नागालैंड सीमा पर ज़बरदस्त बादल फटने और बहुत ज़्यादा बारिश की वजह से आई थी। बहरहाल, यह दावा पूरी तरह से सही नहीं लगता और इस भयानक घटना को सिर्फ़ हर साल आने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं माना जा सकता। ऊपरी असम के ज़िलों में हाल ही में आई बाढ़ ने बाढ़ रोकने के पारंपरिक तरीकों की कमियों, एकीकृत नदी-जलाशय के प्रबंधन, बाढ़ क्षेत्र में असरदार योजना, तटबंधों के रखरखाव, कटाव रोकने के उपायों और शीघ्र-चेतावनी प्रणाली वगैरह की ज़रूरत पर सवाल उठाने के अलावा, बड़े पैमाने पर संगठित और गैर-कानूनी तरीके से की जा रही खुदाई और दोहन की गतिविधियों के खतरनाक नतीजों को भी उजागर किया है।
कई गैर-सरकारी स्रोतों के अनुसार, असम और नागालैंड की सीमा से लगे पहाड़ी इलाकों में बड़े पैमाने पर और कथित तौर पर बिना किसी नियम-कानून के कोयले और पत्थर के खनन ने ऊपरी असम में बाढ़ की स्थिति को और गंभीर बना दिया है। नदी-घाटियों के किनारों पर बड़े पैमाने पर खुदाई करके किए गए कोयला और पत्थर के खनन से भारी मात्रा में ढीली मिट्टी और गाद जमा हो गई है, जिससे नदियों की पानी ढोने की क्षमता भी काफी कम हो गई है। आरोप है कि ऐसी गैर-कानूनी गतिविधियों को राज्य की मौजूदा भाजपा सरकार के कुछ बड़े राजनीतिक नेताओं का संरक्षण प्राप्त है, जिससे एक प्राकृतिक आपदा "माफिया द्वारा पैदा की गई तबाही" में बदल गई है।
राज्य और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया
राज्य में विनाशकारी बाढ़ के प्रति भाजपा सरकार का रवैया बहुत ही लापरवाहीपूर्ण रहा है। सरकार की कार्रवाई मुख्य रूप से कुछ बचाव कार्यों, राहत शिविर लगाने, खाना बांटने और बाढ़ में मारे गए लोगों के परिवारों को मुआवज़ा देने की घोषणा तक ही सीमित है। संकट के चरम पर, जब लगभग दस लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए थे, तब भी हज़ारों पीड़ितों तक राहत नहीं पहुँच पाई, क्योंकि सरकारी राहत तंत्र आपदा की गंभीरता के हिसाब से सही ढंग से काम करने में नाकाम रहा है।
खासकर शिवसागर, चराइदेव और जोरहाट में आपदा की गंभीरता ने भाजपा सरकार के ढीले-ढाले रवैये की पोल खोल दी। बड़ी संख्या में, बाढ़ से प्रभावित लोगों को लगभग पूरी तरह से राज्य भर के आम लोगों और अन्य राजनीतिक संगठनों द्वारा चलाए जा रहे राहत कार्यों पर निर्भर रहना पड़ा है। सीपीआई (एम) और अन्य जन-संगठनों, खासकर एसएफआई, डीवाईएफआई और सीटू की भूमिका उल्लेखनीय रही है। बड़ी संख्या में बाढ़ से प्रभावित लोगों को ज़रूरी सामान तुरंत पहुँचाने के अलावा, पार्टी और अन्य जन-संगठनों ने कई प्रभावित इलाकों में किसानों के लिए धान की पौध का भी इंतज़ाम किया। इसके विपरित, जहाँ बड़ी संख्या में बाढ़ से प्रभावित लोग अभी भी अपनी ज़िंदगी बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, राज्य की भाजपा सरकार असम में 40 लाख परिवारों को रामायण और महाभारत की प्रतियाँ बाँटकर नरेंद्र मोदी का जन्मदिन मनाने की योजना बना रही है।
यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि असम में बाढ़ कोई कभी-कभार होने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह एक बार-बार होने वाली ऐसी संरचनात्मक आपदा है, जो राज्य की खेती, आजीविका, बस्तियों, बुनियादी ढांचे और पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। बहरहाल, भारत सरकार का रवैया मुख्य रूप से आपातकालीन राहत के लिए अपर्याप्त मदद देने तक ही सीमित रहा है। उसकी बुनियादी संरचनात्मक समस्याओं को हल करने में कोई रुचि नहीं है। ऐसी मदद मुख्य रूप से राज्य आपदा मोचन कोष (एसडीआरएफ) और राष्ट्रीय आपदा मोचन कोष (एनडीआरएफ) के ज़रिए मिलती है। इस मदद की अपर्याप्तता इस बात से साफ़ है कि असम सरकार के अनुमान के अनुसार, 2014 और 2024 के बीच राज्य को कुल 37,780 करोड़ रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ, जबकि इस दौरान राज्य ने केंद्र सरकार से कुल 27,270 करोड़ रुपये की मांग की थी। बहरहाल, भारत सरकार ने राज्य को कुल मिलाकर सिर्फ़ 6,542.83 करोड़ रुपये जारी किए, जो अनुमानित नुकसान का केवल 17 प्रतिशत था।
फिर भी, ब्रह्मपुत्र बेसिन में जलविद्युत (हाइड्रोपावर) की भारी क्षमता से आकर्षित होकर, भारत सरकार ने अरुणाचल प्रदेश के पहाड़ी ऊपरी इलाकों में बड़ी संख्या में बांध बनाने में मदद की है। बहरहाल, ये बांध सब-बेसिन और बेसिन स्तर पर सामूहिक प्रभाव के किसी भी आकलन के बिना बनाए गए थे। नतीजन, असम पर ऐसे बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं के कारण निचले इलाकों में पड़ने वाले असर का ठीक से आकलन नहीं किया गया है। ऐसा ही एक अनसुलझा मुद्दा सुबनसिरी लोअर जलविद्युत परियोजना है। यह 2,000 मेगावाट की परियोजना है, जिसमें 250 मेगावाट की आठ इकाईयाँ हैं। यह असम-अरुणाचल प्रदेश सीमा पर सुबनसिरी नदी पर स्थित है और इसे राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (एनएचपीसी) द्वारा लागू किया जा रहा है। 2014 तक इसके निर्माण के दौरान भाजपा ने इस परियोजना का पुरजोर विरोध किया था। बहरहाल, सत्ता में आने के बाद, उसी पार्टी ने इस परियोजना का समर्थन करना शुरू कर दिया। इस परियोजना की दो इकाईयाँ पहले ही चालू हो चुकी हैं, जबकि बाकी इकाईयों को दिसंबर 2026 तक चरणबद्ध रूप से चालू करने की योजना है।
इसलिए, यह साफ़ है कि असम में बार-बार आने वाली बाढ़, नदी की प्राकृतिक गतिविधियों और इंसानों के कई अवैज्ञानिक और अनियोजित कामों के बीच जटिल तालमेल का नतीजा है। राज्य में आने वाली भयानक बाढ़ को सिर्फ़ असम सरकार नहीं संभाल सकती ; इसके लिए भारत सरकार और असम के पड़ोसी राज्यों की सरकारों की मिली-जुली कोशिशों की ज़रूरत है। बहरहाल, सत्ताधारी भाजपा का नज़रिया वैज्ञानिक और समावेशी होना चाहिए। बाढ़ के पानी को तालाबों और दूसरे जल-भंडारों में बदलने की योजना अपनाकर असम को "बाढ़-मुक्त" बनाने के केंद्रीय गृह मंत्री के ख्याली पुलाव का त्याग करके, भारत सरकार को इस बार-बार होने वाली समस्या से निपटने के लिए एक वैज्ञानिक और समावेशी तरीका अपनाना चाहिए।
( लेखक जन विज्ञान आंदोलन के कार्यकर्ता और शोध अध्येता हैं। )