राजनैतिक व्यंग्य - समागम
2. "तड़ीपार सदन में हाजिर हो!" : संजय पराते
इस नई सदी में हमारे देश के प्रजातंत्र में नेताओं और आपराधिक कृत्यों का चोली-दामन का साथ हैं। यदि नहीं होता, तो गृह मंत्री अमित शाह तड़ीपार नहीं होते। और तड़ीपार नहीं होते, तो शायद ही गृहमंत्री बनते। संसद का सत्र चल रहा है। सरकार और समूचा मंत्रिमंडल संसद के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत कई मंत्री इस जवाबदेही को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। सदन से वे तड़ीपार हैं और समूचा विपक्ष इन तड़ीपारों को सदन में हाजिर होने की पुकार लगा रहा है, ठीक वैसे ही, जैसे अदालत का कोई अर्दली पुकार लगाता है। अर्दलियों की पुकार अदालत की दीवारों से बाहर नहीं आती, लेकिन संसद में जो पुकार हो रही है, वह पूरे देश में गूंज रही है कि तड़ीपार सदन में हाजिर हो! आखिर सदन ही तो देश की सबसे बड़ी अदालत है, जनता की अदालत। और जनता की अदालत के सामने तो सुप्रीम अदालत भी छोटी ही होती है। कॉकरोच टिप्पणी के मामले में सबने यही देखा है।
यह अजीब बात है कि देश में गृहमंत्री अमित शाह की पहचान गृहमंत्री से ज्यादा तड़ीपार के रूप में ही होती है। सदन से वे अपनी इच्छा से तड़ीपार हैं, लेकिन साल 2010 में वे अपनी इच्छा से नहीं, सुप्रीम कोर्ट की इच्छा से तड़ीपार होने के लिए मजबूर हो गए थे। कथित सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें गुजरात से दो साल के लिए तड़ीपार कर दिया था और उन्हें गुजरात में घुसने की भी अनुमति नहीं थी। तभी से वे तड़ीपार की उपाधि धारण किए हुए हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई कथित संत शिरोमणि की उपाधि कसकर पकड़े रहता है।

तड़ीपार होना किसी साधारण आदमी के बस की बात नहीं है। इसके लिए उसके पास अमित शाह जैसे तड़ीपारों का जिगर होना चाहिए। यह क्या कम साहस की बात है कि हमारा तड़ीपार गृहमंत्री संसद के गलियारों में पूरे समय चहलकदमी कर रहा है, अपने एसी कक्ष में बैठकर कॉफी और चाय सुड़के जा रहा है, टीवी स्क्रीन पर सदन की कार्यवाही देख रहा है, देख रहा है कि विपक्ष उन्हें सदन में हाजिर करने की मांग पीठासीन से कर रही है, पीठासीन "ऑर्डर-ऑर्डर" के हथौड़े मार रहा है, थक-हारकर वह भी गृहमंत्री से संसद में आने की गुहार कर रहा है, लेकिन मजाक है कि गृहमंत्री की खलवाट खोपड़ी में कोई जूं रेंगे। उसे अपनी सत्ता का अहसास होता है कि यदि वह चाहे तो, पूरे सदन को ही कॉफी या चाय की तरह सुड़क सकता है। लेकिन वह ऐसा नहीं करता। उसे अपने नाम पर हंगामा होते देख और मजा आता है। तब और मजा आता है, जब सदन में और-और जोर से हंगामा होता है और सदन स्थगित हो जाता है। वह अपनी खोल से बाहर निकलकर विपक्ष को कोसता है कि वह सदन को ठप्प लिए हुए हैं, वह अपनी जिम्मेदारी से भाग रहा है। अमृतकाल में सदन चलाना अब विपक्ष की जिम्मेदारी है, सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी तो लाठी, गोलियां, पैलेट गन चलाकर लोगों को अनुशासित करना है। सदन में जवाब देने से यह अनुशासन टूटता है। सवाल यही है कि गृहमंत्री के रूप में उसकी जिम्मेदारी ज्यादा कहां है? : वह सदन में जबान चलाए या मैदान में हथियार?
यही हाल प्रधानमंत्री का है। उन्हें प्रधानमंत्री के पद से प्यार है, उसके कामों से नहीं। वे 2047 तक, जब तक वे बूढ़े होकर मर नहीं जाते, प्रधानमंत्री बने रहने की लालसा है। इसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं। वे चुनाव आयोग को अपनी जेब में डाल सकते हैं, वे ईवीएम बदल सकते हैं, यहां तक कि वे अपने मतदाता भी चुन सकते हैं। इससे भी आसान तरीका है कि संविधान में संशोधन कर दिया जाएं और आजन्म अपने प्रधानमंत्री रहने की घोषणा कर दें। वैसे वे सांसदों और विधायकों की खरीदकर इसी महान उद्यम में लगे हैं। उनकी लीला अपरम्पार है, अवर्णनीय है, क्योंकि वे अजैविक हैं, जिसका कोई भी बाल बांका नहीं कर सकता। कबीरदास जी भी बता ही गए हैं कि यदि पूरे समुद्र के पानी से स्याही बना लें, पूरे जंगल की लकड़ियों से कलम बना लें और पूरी धरती को कागज बना लें, तो भी प्रभु की लीला का बखान नहीं किया जा सकता। कबीरदास जी दूरदर्शी थे, उन्हें मालूम था कि 21वीं सदी में भारत की पुण्य धरा पर क्या होने वाला है। यह भारत का सौभाग्य है कि उसे राम और कृष्ण के बाद नरेंद्र मोदी जैसा अजैविक अवतार मिला, जिसका सीना सीधे-सीधे 56 इंच का है। वाल्मीकि और वेद व्यास राम और कृष्ण के सीने का नाप नहीं बता गए तो, अच्छा ही किया, वरना बेचारों की तो शामत ही आ जाती। वैसे विपक्ष के 56 इंच का छोटा बंदर कहने भर से क्या होता है! वैसे ऐसे कहने से यह पता नहीं चलता कि विपक्ष ने भी 56 इंच के उनके जुमले को मान लिया है! वैसे उन्होंने तो अपने को शेर मान लिया है, भले ही देश की जनता उन्हें बंदर कहती फिरे। जनता है, जनता का क्या, आज यहां, तो कल वहां!
बहरहाल, जंतर मंतर से बाहर निकलकर जेन-ज़ी नाम का हौवा पूरे देश में फैल चुका है। कहीं से जेन-अल्फा भी उभर रहा है। सड़कों पर उबाल है। जहां देखो वहीं, कॉकरोच ही कॉकरोच भरे पड़े हैं। बड़े जीवट हैं ये कॉकरोच। लाठियों से पीटो, पैरों से मसलो, गोलियों से छलनी करो, इनका कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। ये अजर-अमर हैं। इनकी प्रजनन दर बहुत ज्यादा है, दिन-रात इनकी संख्या बढ़ रही है। ये संसद की ओर रेंग रहे हैं, जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। ये बर्तन-थाली को बजाने से इंकार कर रहे है, न अंधेरे में टॉर्च जलाने के लिए तैयार हैं। इन्हें पूरी रोशनी चाहिए। प्रधान के इस्तीफे से इन्हें संतोष नहीं मिला है, इन्हें अब प्रधानजी का भी इस्तीफा चाहिए। इस्तीफा रोग ही ऐसा है कि एक जगह लगा, तो तेजी से फैलता है। वे समझते हैं कि इस रोग को फैलने से बचाना ही उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है, देशभक्ति है।
देश भक्ति की धुन में वे नाच रहे हैं। समूचा मंत्रिमंडल नाच रहा है। लेकिन कॉकरोचों की फौज संसद का दरवाजा खटखटा रही है। इस फौज में मक्खी, मच्छर, पिस्सू भी शामिल हो गए हैं। तड़ीपारों के मुकाबले वे भी अपने अजर-अमर होने की घोषणा कर रहे हैं। विपक्ष उनका स्वागत कर रहा है। इस बेमेल गठजोड़ को देखकर अचानक तड़ीपारों को कमर के नीचे शरीर के मध्य भाग में कुछ गीला-गीला-सा महसूस होता है। उनके अवतारी शरीर को बोध होता है कि वे संसद में नहीं, सड़क पर नंगे खड़े हैं, अपने भागवत, अपने पुराण के साथ। वे हिंदुओं को हिंदू होने का बोध कराते हुए अपने को बहलाने की कोशिश कर रहे हैं। एक बच्चा जोरों से हंस रहा है, चिल्ला रहा है -- राजा तो नंगा है। यह साहित्य का स्थायी भाव है। चलाचली की बेला में यह राजनीति का भी स्थायी भाव बन जाता है।
(व्यंग्यकार अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)