चंद्रपुर : केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई जनगणना प्रक्रिया में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए अलग कॉलम शामिल नहीं किए जाने के विरोध में राष्ट्रीय ओबीसी महासंघ ने अपना असहयोग आंदोलन जारी रखने का निर्णय दोहराया है। महासंघ ने स्पष्ट किया है कि जब तक ओबीसी की स्वतंत्र गणना संबंधी आधिकारिक राजपत्र (गजट नोटिफिकेशन) जारी नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन वापस नहीं लिया जाएगा। इस मुद्दे को लेकर सोमवार को जिला प्रशासन और राष्ट्रीय ओबीसी महासंघ के पदाधिकारियों के बीच महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई।

जिलाधिकारी वसुमता पंत की अध्यक्षता में जिला कलेक्ट्रेट के सभागार में आयोजित इस बैठक में अतिरिक्त जिलाधिकारी, विभिन्न विभागों के अधिकारी तथा राष्ट्रीय ओबीसी महासंघ के प्रमुख पदाधिकारी और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। बैठक का मुख्य उद्देश्य जनगणना प्रक्रिया में आ रही बाधाओं तथा ओबीसी समाज की मांगों पर चर्चा करना था।
प्रशासन ने बैठक में बताया कि जिले में चल रही जनगणना प्रक्रिया को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है। कई स्थानों पर लोगों द्वारा जनगणना कार्य में रुचि नहीं दिखाई जा रही है, जिससे प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। प्रशासन की ओर से महासंघ से अपील की गई कि वह अपना असहयोग आंदोलन वापस लेकर जनगणना कार्य को सुचारु रूप से संपन्न कराने में सहयोग करे। अधिकारियों ने यह भी आश्वासन दिया कि ओबीसी समाज से संबंधित जानकारी आगामी चरणों में एकत्रित किए जाने पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, राष्ट्रीय ओबीसी महासंघ के पदाधिकारियों ने इस आश्वासन को अपर्याप्त बताते हुए इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। महासंघ का कहना है कि पूर्व में भी कई बार इसी प्रकार के आश्वासन दिए गए, लेकिन उन्हें व्यवहार में लागू नहीं किया गया। इसलिए अब केवल मौखिक आश्वासनों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। महासंघ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक ओबीसी समाज के लिए अलग कॉलम का प्रावधान करते हुए राजपत्र जारी नहीं किया जाता, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
राष्ट्रीय ओबीसी महासंघ के महासचिव सचिन राजुरकर ने कहा कि ओबीसी जनगणना केवल आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि यह समाज के संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और भविष्य के प्रतिनिधित्व से जुड़ा अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा है। उन्होंने कहा कि ओबीसी समाज की वास्तविक जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का सही आकलन तभी संभव है, जब उसकी अलग से गणना की जाए। इसी आधार पर सरकार की नीतियां, योजनाएं और आरक्षण संबंधी निर्णय अधिक प्रभावी और न्यायसंगत बन सकते हैं।
राजुरकर ने समाज के लोगों से आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होने का आह्वान करते हुए कहा कि 28 जून को आयोजित होने वाले महामोर्चे में बड़ी संख्या में भाग लेकर अपनी एकजुटता प्रदर्शित करें। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं, बल्कि सामाजिक अधिकारों और समान प्रतिनिधित्व की मांग के लिए चलाया जा रहा है।
बैठक के दौरान महासंघ के नेताओं ने वर्ष 2018 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह द्वारा ओबीसी समाज की अलग जनगणना कराने संबंधी दिए गए आश्वासन का भी उल्लेख किया। साथ ही केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय द्वारा लोकसभा में दिए गए उस बयान का हवाला दिया गया, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया था कि ओबीसी की जातिवार जनगणना कराने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। महासंघ का कहना है कि इन परस्पर विरोधी बयानों के कारण समाज में भ्रम और अविश्वास की स्थिति उत्पन्न हुई है।
महासंघ ने कहा कि ओबीसी समाज देश की आबादी का बड़ा हिस्सा है, लेकिन उसकी वास्तविक संख्या और सामाजिक स्थिति का अधिकृत रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण समाज को कई योजनाओं और नीतिगत निर्णयों में अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। इसलिए अलग ओबीसी कॉलम की मांग पूरी तरह न्यायसंगत और आवश्यक है।
बैठक में राष्ट्रीय ओबीसी महासंघ के जिला अध्यक्ष रामदास कामडी, एडवोकेट दत्ता हजारे, प्रोफेसर अनिल शिंदे, प्रोफेसर माधव गुरुनुले, श्रीहरी सातपुते, कविंद्र रोहनकर, पवन राजुरकर, सोनूने सर, अक्षय येरगुडे, मोरेश्वर सूरकर, रतन शिलावार, शंकर पाल, महिला महासंघ की शहर अध्यक्ष मनस्वी गिरहे, जिला महासचिव मनीषा बोबडे तथा नगरसेविका प्रतीक्षा येरगुडे सहित अनेक पदाधिकारी उपस्थित रहे।
बैठक के अंत में महासंघ ने पुनः स्पष्ट किया कि जब तक ओबीसी समाज के लिए अलग कॉलम संबंधी राजपत्र जारी नहीं होता, तब तक असहयोग आंदोलन जारी रहेगा और आगामी दिनों में आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा।