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हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक -  डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar

Page 87 of 92
25 ऑगस्ट 2023
Book
5,7,2,1,,

     दो ढकोसले कलियुग के संबंध में हैं। ब्राह्मणों ने इस बात पर अत्यधिक बल दिया है कि कलियुग में दो ही वर्ण हैं, ब्राह्मण और शूद्र। उनका कहना है कि क्षत्रिय और वैश्य का अस्तित्व नहीं है। इस मान्यता का आधार क्या है ? इसका अर्थ क्या है ? क्या वे दो वर्ण ब्राह्मणों में विलीन हो गए या उनका अस्तित्व नहीं है ?

Kaliyuga Ki Paheliyan - Riddle of Hinduism - Written by Dr Babasaheb Ambedkar     भारतीय इतिहास का वह कौन सा काल है जब यह मान्यता आरम्भ हुई?

     क्या इसका अर्थ है कि इन दोनों वर्णों का ब्राह्मण में विलीन होना कलियुग का आरम्भ है?

     कलियुग के संबंध में दूसरी मान्यता है कलि वर्ज्य, जिसका अर्थ है, कलियुग में किन कार्यों का निषेध है। विभिन्न पुराणों में यत्र-तत्र उनका प्रसंग है। परन्तु आदित्य पुराण में उनका संहिताबद्ध किया गया है और संग्रहीत कर दिया गया है। कलि वर्ज्य के अन्तर्गत जो व्यवहार में आता है, वह निम्नांकित है: ¹

     “1. विधवा से पुत्र उत्पन्न करने हेतु जेठ की नियुक्ति । "²

     “2. किसी (विवाहित) स्त्री के पति की मृत्यु के बाद उसका पुनर्विवाह³ (जिसके साथ सहवास न हुआ हो। ) और ( जिसके साथ सहवास हो चुका हो) ।”

     “3. तीनों⁴ द्विज वर्णों के बीच अन्य वर्ण की कन्या से विवाह⁵ । "

     “4. आततायी⁶ ब्राह्मण का सीधे युद्ध में भी वध⁷।"


1. कलि वर्ज्य, पी.वी. काणे, पृ. 8-16
2. यह नियोग के संदर्भ है जिसे गौतम की मान्यता प्राप्त है 18-9-14, नारद स्त्रीपम श्लोक 58 याज्ञवल्क्य की मान्तया है 1, 64-68 यद्यपि मनु ने इसकी निंदा की है 9, 64-68, बृहस्पति को भी अस्वीकार्य है। 3. यह विधवाओं के पुनर्विवाह के संदर्भ में है नारद ( स्त्रीपम श्लोक, 98-100) के अनुसार विधवा ब्राह्मण
स्त्रियों तक को कुछ दशाओं में पुनर्विवाह की मान्यता है। पराशर का भी यही मत है जबकि वशिष्ठ (17.74) और बौधायन धर्मसूत्र (4.1.12) के अनुसार प्रथम विवाह विच्छेद बिना पुनर्विवाह कर सकती है। इस परिच्छेद को बालिका क्षतयोनिका के नाम से भी जाना जाता है। इसका अर्थ है एक विवाहित बालिका जिसका विवाह विच्छेद नहीं हुआ है जबकि दूसरे स्थान पर कहा गया है दो प्रकार की विधवाएं (जिसका विवाह विच्छेद हो गया और जिसका न हुआ हो) ।
4. कलि वर्ज्य, पी.वी. काणे, पृष्ठ 8-16
5. सबसे पुरानी स्मृति में अनुलोम विवाह की अनुमति है जैसे बौधायन धर्मसूत्र 1.8.2-5, वशिष्ठ 1.24-27, मनु 3, 14-17, याज्ञवल्क्य 1 56-57
6. कलि वर्ज्य, पी.वी. काणे, पृष्ठ 8-16
7. धर्म ग्रंथकारों ने इस विषय पर बहुत लिखा है; मनु 8, 350-51, विष्णु 5, 180-80, वशिष्ठ 3, 15-18 में एक आततायी ब्राह्मण के वध की अनुमति देते हैं जबकि सुमंतु ने कहा है “किसी आततायी के वध से कोई पाप नहीं है, ब्राह्मण और गाय इसके अपवाद हैं।" इन्होंने आततायी ब्राह्मण के वध पर प्रतिबंध लगाया है। देखें, यज्ञ पर मिताक्षरी 2 21 इस विषय पर विचार |


     “5. किसी द्विज से व्यवहार ( उसके साथ खान पान जैसा व्यवहार) जो समुद्रयात्रा पर जाता है, चाहे उसने प्रायश्चित भी क्यों न कर लिया हो¹। "

     "6. सात्र का उपनयन करना । "

     " 7. कमण्डल लेकर चलना ।² "

     “8. महायात्रा³ पर जाना। "

     " 9. गोमेध⁴ में गाय की बलि । "

     "10. श्रौतमणि यज्ञ तक में मद्यपान⁵ । "

     “11-12. अग्निहोत्र के पश्चात् पुनः प्रयोग हेतु उसमें प्रयुक्त कलछी को चाटना⁶।"

     “13. शास्त्रानुसार वैखानस जीवनयापन⁷ । "

     “14. (जन्म और मृत्यु होने पर) व्यवहार और वैदिक ज्ञान के आधार पर अशुचिता की अवधि घटाना⁸ ।


1. बौधायन धर्मसूत्र 1.1.20 में समुद्रयात्रा की निंदा की गई है जो उत्तरापथ के ब्राह्मणों की विशिष्टता थी । इन्हें पतितों में सबसे पहला स्थान दिया गया है (11.1.41 ) । कुछ विद्वान कहते हैं कि यह प्रतिबंध बार-बार समुद्रयात्रा के विषय में है "समुद्रगा" पतित बताए गए हैं (जीवानंद पृ. 525 )
2. बौधायन - धर्मसूत्र 1.3.4 में स्नातकों के लिए व्यवस्था है कि वे मिट्टी अथवा काठ के पात्र में पानी ले जाएं। वशिष्ठ 12.14 और मनु 4.36 और याज्ञ 1.132 भी यही कहते हैं जबकि मदन पारिजात पृ. 15-16 में कहा गया है कि कमंडल धारण का अर्थ है चिर ब्रह्मचर्य परंतु यह सत्य नहीं है क्योंकि नारदीय पुराण में उपरोक्त का उल्लेख है कि दोनों भिन्न हैं और प्रतिबंधित हैं।
3. इसका संदर्भ है वानप्रस्थों के लिए पूर्वोत्तर की ओर प्रस्थान मनु छठा 31 और याज्ञ. 3.55 और वृद्ध व्यक्तियों द्वारा महायात्रा ( आत्महत्या) की प्रथा अर्थात् जब तक चलते रहना जब तक बेदम होकर गिर न जाये। प्रयाग जैसे पवित्र स्थल पर गंगा में जलसमाधि लेना अथवा अग्नि में प्रवेश कर जाना अपरार्क पृ. 536 जहां स्मृति में यह अनुमति दी गई है। उल्लेखनीय है कि मृच्छकटिकम के रचयिता शूद्रक ने रघुवंश 8, 94 के अनुसार अग्नि में प्रवेश किया था। अत्रि श्लोक 218-19 का मेधातिथि ने उल्लेख किया है कि मनु 5.88 के अनुसार राजा प्रयाग में जलसमाधि लेते थे ।
4. देखें सांख्यायन सूत्र 14.15.1, कात्यायन स्रोत 22 11.34 और मनु 11.74
5. यह इन्द्र के लिए दी जाने वाली आहुति से मुख्यतः संबंधित है जब आश्विन, सरस्वती और इन्द्र को तीन कटोरे मदिरा भेंट करने के लिए एक ब्राह्मण को धन देकर नियुक्त किया जाता था कि वह कव्य प्राप्त करे। देखें तैत्तिरीय ब्राह्मण 1.8.62, सांख्यायन स्रोत 15.15.1.14 और पूर्वमीमांसा सूत्र 3.5.14.5 6. देखें तैत्तिरीय ब्राह्मण 2.1.4 और सत्यसाधस्त्रोत ।
7. आप. धर्मसूत्र 11.9.21 18.11.9 23.2, मनु 1-32, वशिष्ठ 9.1.11 में इस संबंध में विस्तृत नियम दिए गए हैं।
8. उपरोक्त में उद्धत पराशर जिसमें कहा गया है कि जो ब्राह्मण वैदिक ज्ञान और अग्निहोत्र में प्रवीण है केवल एक दिन की अशुचिता (किसी निकट संबंधी की मृत्यु पर ) माने जिसका केवल अध्ययन है। वह तीन दिन की अशुचिता माने बृहस्पति ने हरदत्त के अनुसार 14.1 में कहा है कि कलियुग में सभी के लिए समान रूप से 10 दिन की अशुचि का विधान है। याज्ञ पर विश्वरूप का विस्तृत शास्त्रार्थ में कहना है (3.30) कि दस दिन बाद अशुचिता से मुक्ति मिल जाती है। कहा गया है कि केवल अथर्ववेद का अर्थ है कि स्वार्थ के अभाव और सद्गुणों की प्रशंसा की गई है। यह समझना युक्तिसंगत नहीं है कि विश्वरूप को कोई महत्व दिया गया है या उसके कलिवर्ज्य पर ये श्लोक प्रसिद्ध हैं यह पराशर के समक्ष उनकी व्याख्या में विफल न होता।


     “15. प्रायश्चित स्वरूप ब्राह्मण की मौत का विधान¹ । "

     “16. नैतिक पाप (स्वर्ण) चोरी की छोड़कर और पापियों (महापातकों) के साथ सम्पर्क होने पर (गुप्त) प्रायश्चित²। "

     "17. वर, अतिथि और पितरों को मंत्रों के साथ मांस की भेंट³।"

     “18. औरत⁴ तथा दत्तक पुत्र के अतिरिक्त अन्य को पुत्रों के रूप में स्वीकार करना⁵।"

     “19. उन व्यक्तियों के साथ प्रायश्चित के उपरांत भी सम्पर्क जिन्होंने उच्च जाति की महिला के साथ संभोग किया है⁶। "

     “20. यदि किसी वृद्ध अथवा सम्भावित व्यक्ति की पत्नी ने परपुरुष से संभोग किया है और उसके लिए वह प्रताड़ित की गई है उसका परित्याग⁷ । "

     "21. किसी⁸ एक व्यक्ति के लिए दूसरे का वध⁹ । "

     "22. जूठन छोड़ना¹⁰ ।


1. मनु (2.89 और 146) ने कहा है कि जानबूझ कर की गई ब्रह्म हत्या और मदिरापान का प्रयश्चित मृत्यु है। गौतम 21.7 का भी यही कथन है।
2. मनु 11.54 उन अपराधियों के सम्यकों की गणना चार महापातकों के साथ पांचवे महापातक के रूप में करता है। गौतम 24 और वशिष्ठ 25 ब्रह्म हत्या के महापातकों तक के लिए गुह्य प्रायश्चित का विधान करता है। इस नियम के अनुसार ब्रह्म हत्या के लिए कलि में गुह्य प्रायश्चित की आवश्यकता नहीं है, न मदिरापान और न निकट संबंधियों के साथ संभोग करने वाले के लिए यह आवश्यक है देखें अपरार्क पृ. 1212 जिसमें उनका जिक्र है जो गुह्य प्रायश्चित करें।
3. मधुपर्क सम्मानित अतिथियों को दिया जाता है जिसमें वर भी शामिल है। देखें गौतम 5.25-35, याज्ञ. 1.109, श्राद्ध में पितरों की संतुष्टि के लिए विभिन्न पशुओं के मांस का उल्लेख है। देखें याज्ञ 1.258-360, मनु 3, 123 आश्वलायन गृह्य सूत्र के अनुसार ( 1.24-36 ) मधुपर्क बिना मांस के न परोसा जाए। देखें वशिष्ठ 6.5-6
4. काणे, कलिवर्ज्य, पृ. 8-16
5. मनु, 9.165-80, याज्ञ. 2.128-132 और अन्य 12 प्रकार के पुत्रों का उल्लेख करते हैं।
6. गौतम (4.20 और 22.23) निम्न जाति के व्यक्ति द्वारा उच्च जाति की स्त्री के साथ संभोग की निंदा करते हैं और उनके वंशजों को धर्महीन कहते हैं।
7. वशिष्ठ ने 21.10 में चार प्रकार की स्त्रियों का उल्लेख किया है जैसे: वह जिसने विद्यार्थी के साथ संभोग किया हो या पति के गुरु से वह जिसने अपने पति की हत्या कर दी हो या जो निम्न जाति के पुरुष से व्यभिचार करती हो, उन्हें त्याग देना चाहिए ।
8. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 8-12
9. स्मृतियों में कहा गया है ब्राह्मण और गाय की रक्षा में जान की परवाह न करें, मनु 9.79 और विष्णु 3,45
10. वशिष्ठ 14.20.21 के अनुसार जूठन अथवा उससे छुआ भोजन न खाया जाए। इसका अर्थ है जूठन अन्य को दे देना कुछ स्मृतियों के उच्छिष्ट, शूद्रों आदि को देने की बात है यहां उस पर प्रतिबंध है, देखें गौतम 10.61 और मनु 10.125


     "23. जीवन के लिए ( पैसा लेकर ) किसी देवता विशेष की मूर्ति की पूजा का संकल्प।"

     "24. मृत्यु संबंधी अशुचिता के अधीन फूल चुनने के पश्चात् उन व्यक्तियों का स्पर्श | "

     "25. ब्राह्मण द्वारा पशु की वास्तविक बलि । "

     "26. ब्राह्मण' द्वारा सोम पौधे का विक्रय ।"

     "27. समय तक भूखा रहने के उपरांत ब्राह्मण का शूद्र से भोजन ग्रहण करना ।"

     28. (ब्राह्मण) गृहस्थ का अपने शूद्र वर्ण के दास के हाथ से बना भोजन भोजन करना जो उसकी बटाई ग्रहण करना, गोशाला और उन व्यक्तियों के हाथ का पर खेती करते हैं। "

     "29. बहुत लम्बी दूरी की तीर्थयात्रा पर जाना। "

     “30. गुरुपत्नी के साथ वैसा ही व्यवहार जैसा स्मृतियों में गुरु के लिए निर्धारित है। "

     “31. ब्राह्मण द्वारा विपरीत परिस्थितियों में जीवनयापन के लिए कल के लिए भोजन की परवाह न करना । "


1. मनु 3 152 धन लेकर पूजा करने वाला ब्राह्मण श्राद्ध अथवा देव कर्म में आमंत्रित न किया जाए।
2. फूल चुनने का कार्य दाह संस्कार के चौथे दिन किया जाए। विष्णु 19, 10-12 वैखानस स्मृतिसूत्र खण्ड 7. समवर्त श्लोक 38-39
3. काणे, कलि वर्ज्य, पू. 13
4. कात्यायन सूत्र (7, 6: 2-4) के अनुसार सोम कौत्स गोखीय, ब्राह्मण अथवा शूद्र से खरीदा जाए परन्तु मनु 10.88 में अन्य बातों के अतिरिक्त सोम विक्रय का निषेध करते हैं चाहे वह कृषि कार्य भी करता हो या वैश्यवृत्ति करता हो और मनु 3.158 और 170 के अनुसार सोम विक्रेता ब्राह्मण को श्राद्ध में बुलाने का कुपात्र समझते हैं।
5. मनु 9.16 में अनुमति देते हैं कि कोदई ब्राह्मण तीन दिन से भूखा हो तो व निम्न कर्मवालों से भी एक दिन भोजन ले सकता है। याज्ञ. 3.43 के अनुसार यदि 'हीनकर्म' पढ़ें तो इसका अर्थ (भिक्षावृत्ति और चोरी जैसा कि नारद अभ्युपेत्य सुश्रुषा 5-7 में वर्णित है) है।
6. यदि कोई शूद्र ब्राह्मण का दास है, नाई है, ग्वाला है, बटाई पर खेती करता है या वंशानुगत भिन्न है तो मनु स्मृति के अनुसार ब्राह्मण उसके यहां का पका भोजन भी ले सकता है, देखें गौतम 17.6, मनु 4.253, याज्ञ. 1.166 (इसका पूर्वाद्ध भी वैसा ही है), अंगिरस 120. पराशर 11
7. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 14
8. मनु ने 2.210 में व्यवस्था दी है कि गुरु पत्नियां यदि उसी वर्ण की हों जिसका गुरु है तो उनका सम्मान गुरु के समान किया जाए। यदि वे उसी वर्ण की नहीं तो उनकी अगवानी के लिए उठकर प्रणाम किया जाए।


     "32. जातकर्म¹ होम के समय ब्राह्मण द्वारा अरनी स्वीकार करना जिसके अनुसार शिशु के जातकर्म से उसके पाणिग्रहण तक के संस्कार कराने का कार्यक्रम हो² । "

     “33. ब्राह्मण द्वारा सतंत् यात्रा । "

     “34. बांस की फूंकनी³ के बिना आग में फूंक मारना । "

     “35. शास्त्रों में वर्णित प्रायश्चित के पश्चात् भी किसी ऐसी स्त्री को जाति में सम्मिलित होने की स्वीकृति देना, जो बलात्कार से कलंकित हो चुकी हो⁴। "

     “36. संन्यासी⁵ द्वारा सभी वर्णों (शूद्रों सहित ) से भोजन की भिक्षा ग्रहण करना⁶। "

     "37. जमीन से निकाले जाने वाले जल का पान करने हेतु दस दिन तक प्रतीक्षा।"

     “38. अध्यापक को दीक्षांत पर ( मांगने पर ) शास्त्रानुसार दक्षिणा⁷ ।”

     “39. ब्राह्मण⁸ और अन्यों के लिए शूद्रों से भोजन बनवाना⁹ । "

     “40. वृद्धों द्वारा चट्टान से अथवा आग में कूद कर आत्महत्या¹⁰ । "


1. गौतम 7, 1-7, आप ध. सू. 1.7 2011-17, 21.4, याज्ञ. 3.35, 44 और अन्य  के अनुसार संकट  काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की वृत्ति कर सकता है। मनु 4.7 के  अनुसार ब्राह्मण का आदर्श है कि वह तीन दिन से आवश्यकता से अधिक का अथवा एक ही दिन का आवश्यकता से अधिक अनाज संग्रह न करे। यहां यह कठोर सीमाएं प्रतिबंधित हैं।
2. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 14
3. संस्कार कौस्तुभ के गृह परिशिष्ट में ऐसा उद्धरण है।
4. मनुस्मृति 453 में भी यह प्रतिबंध है। वैदिक साहित्य के अनुसार अग्नि को मुंह से फूंक मार कर प्रज्ज्वलित करने की अनुमति है। देखें आप ध. सू. 1.5.15.20 पर हरदत्त ।
5. इतने बाद में भी स्मृति देवला ( मंत्र 47 ) में यदि किसी स्त्री के साथ म्लेच्छ ने भी बलात्कार किया है तो 3 दिन के प्रायश्चित के बाद वह शुद्ध हो जाती है। आदित्य पुराण बेकसूर और अभागी स्त्रियों के प्रति अत्यंत कठोर है।
6. काणे, कलि वर्ज्य, पू. 15
7. बौधायन धर्मसूत्र 2.10 में संन्यासी को सभी वर्गों से भिक्षा में भोजन मांगने की छूट है परंतु मनु (4.43) और याज्ञ. 3.59 में विधान है कि वह शाम को ही भिक्षा मांगे वशिष्ठ ( 10.7) के अनुसार भी बिना पूर्ण निर्णय के 7 घरों से भिक्षा मांगे किंतु बाद में वशिष्ठ ने कहा है (10.24) कि उसे ब्राह्मणों के यहां से प्राप्त भिक्षा से ही संतुष्ट हो जाना चाहिए।
8. याज्ञ 1.51 के अनुसार ब्रह्मचारी वेदाध्ययन और व्रत के पश्चात् गुरु को उसकी मनोवांछित गुरुदक्षिणा दे और पर्वस्नान करे।
9. काणे, कलि वर्ज्य, पृ. 15
10. आप, ध, सूत्र 2 2.3.4 में शूद्रों को अनुमति है कि वे आर्यों की देखरेख में तीन उच्च वर्णों के लिए भोजन बनाएं।


     “41. जूठे पानी का सम्मानित व्यक्तियों द्वारा आचमन, चाहे वह गाय का ही झूठा क्यों न हो।¹ "

     "42. पिता और पुत्र के बीच विवाद ² । "

     “43. संन्यासी जहां रात हो जाए, वहीं शयन करें³। "

     इस कलिवर्ज्य संहिता की सबसे अजीब बात यह है कि इसके महत्व को पूरी तरह समझा नहीं गया। इसका उल्लेख केवल इसी रूप में किया जाता है कि यह एक उन व्यवहारों की सूची है, जिन पर कलियुग में प्रतिबंध हैं। परंतु इन निषेधों की सूची से भी आगे कुछ और है। निःसंदेह कलिवर्ज्य संहिता में वर्णित सूची के व्यवहार प्रतिबंधित हैं। बहरहाल प्रश्न है कि क्या ये व्यवहार अनैतिक और निंदित हैं, पाप है या किसी दृष्टि से समाज के लिए हानिकर हैं? इसका उत्तर है नहीं। हम यह जानना चाहेंगे कि यदि यह प्रतिबंध लगाए गए हैं तो क्या वे निंदित कार्य हैं? कलिवर्ज्य संहिता की यही सबसे गूढ़ पहेली है। किसी व्यवहार को निंदित घोषित किए बिना प्रतिबंधित करना पूर्व युगीन परम्पराओं का एक विरोधाभास है। एक उदाहरण है। आपस्तंब धर्म सूत्र ने ज्येष्ठतम पुत्र को ही सारी सम्पत्ति देने के व्यवहार को प्रतिबंधित किया। लेकिन इसकी भी निंदा की। ब्राह्मणों ने यह क्या तरीका खोज निकाला कि किसी बात पर प्रतिबंध तो लगा दें परंतु उसकी निंदा न करें ? इसके पीछे कोई कारण होना चाहिए। वह कौन-सा कारण है ?


1. वशिष्ठ 3.35 के अनुसार गड्ढा में भरा पानी यदि ऐसा है जो गाय की प्यास बुझा सके तो उसका आचमन किया जा सकता है। देखें मनु 5.128 और याज्ञ. 1.192
2. याज्ञ. 2.239 में विधान है कि पिता-पुत्र विवाद के साक्षी को तीन पण का अर्थदण्ड दिया जाए। 3. इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि संन्यासी शाम को बस्ती में रहे।