हिंदू धर्म की पहेलियां - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindu Dharm Ki Paheliyan dr Bhimrao Ramji Ambedkar
तीसरी पहेली
वेदों की उत्पत्ति पर अन्य शास्त्रों के साक्ष्य
I
वेदों की उत्पत्ति की खोज वेदों के साथ ही उत्पन्न हो गई थी। ऋग्वेद में वेदों की उत्पत्ति का प्रसंग है। वह प्रसिद्ध पुरुष सूक्त में उपलब्ध है। उसके अनुसार एक पौराणिक पुरुष के यज्ञ से वेद उत्पन्न हुए जो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद कहलाए ।
सामदेव और यजुर्वेद वेदों की उत्पत्ति के बारे में कुछ भी नहीं कहते। जिस अन्य वेद में यह संदर्भ है वह है अथर्ववेदा उसने वेदों की उत्पत्ति की अनेक व्याख्याएं की हैं। एक व्याख्या¹ इस प्रकार है:
"काल से ऋक् ऋचाएँ प्रस्फुटित हुई और यजुर काल से उपजा । "
अथर्ववेद में इस विषय पर दो अन्य प्रसंग हैं। इनमें से प्रथम बहुत विवेकपूर्ण नहीं है, जिसे उसी की भाषा में इस प्रकार² कहा जा सकता है :
घोषित करो की स्कंभ कौन है ( संवर्धक सिद्धांत) जो आदि ऋषियों, ऋक्, साम, यजुर, पृथ्वी और ऋषियों का पालक है.....
"बताओ वह स्कंभ कौन है जिससे ऋक्, ऋचाएँ, प्रस्फुटित हुई जहाँ से वे यजुर में संक्रमित हुई जिससे साम मंत्र उत्पन्न हुए। अथर्वन और अंगिरस के मंत्र उसकी वाणी है।"
स्पष्ट यह है कि यह उनके लिए चुनौती है जो कहते हैं कि ऋक्, साम और यजुर्वेद स्कंभ से उत्पन्न हुए ।
अथर्ववेद की दूसरी व्याख्या है कि ऋक्, साम और यजुर्वेद इन्द्र³ प्रदत्त हैं।
1. अथर्ववेद 19 54.3 म्यूर द्वारा संस्कृत टैक्स्ट में उद्धृत खंड 1, 3, पृ. 4
2. अथर्ववेद 10 7.14 प्यूर द्वारा संस्कृत टैक्स्ट में उद्धृत खंड 1,
3, पृ. 3 3. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट खंड 3. पू. 4
II
वेदों को अपनी उत्पत्ति के बारे में स्वयं ही बताना है। वेदों के पश्चात् ब्राह्मण ग्रन्थ आते हैं। हमको यह पूछताछ करनी ही चाहिए कि वे इस संबंध में क्या कहते हैं। केवल शतपथ ब्राह्मण, तैत्तरीय ब्राह्मण, ऐतरेय ब्राह्मण, कौषीतकि ब्राह्मण में वेदों की उत्पत्ति की व्याख्या की गई है।
शतपथ ब्राह्मण में कई व्याख्याएँ हैं। एक प्रजापति¹ को वेदों का सृष्टा मानती है। उसके अनुसार:
"आरंभ में एकमेव प्रजापति ही ब्रह्माण्ड थे, उनकी इच्छा हुई "मेरी अभिवृद्धि हो, मेरा विस्तार हो।" उन्होंने उपासना की, तप किया । "
"जब वे उपासनालीन थे, ध्यानस्थ थे तो तीन तत्वों की उत्पत्ति हुई, पृथ्वी, वायु और आकाश । उन्होंने इसमें ऊष्मा का संचार किया। उस ऊष्मा से तीन तेज उत्पन्न हुए, अग्नि जो शुद्ध करती है, पवन अथवा वायु और सूर्य । इन तीनों तेजों में ऊष्मा का संचार किया। उनके ताप से तीन वेद उत्पन्न हुए। अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद, सूर्य से सामवेद। उन्होंने उन तीन वेदों में ऊष्मा का संचार किया, उनमें से तीन तेजोमय तत्वों की उत्पत्ति हुई । "भू" ऋग्वेद से, “भुवः" यजुर्वेद से और "स्व" सामवेद से निकले। अब ऋग्वेद अध्वर्यु का अधिष्ठाता बना, और सामवेद उद्गत्रि का कर्ता बना और तीन विधाओं से ब्राह्मण का कार्य, इन तत्वों के माध्यम से निर्धारित हुआ (जैसे कि तीनों वेद आपस में एक हैं) "।
शतपथ ब्राह्मण प्रजापति से वेदों की उत्पत्ति² की भिन्न व्याख्या करता है। वह कहता है कि प्रजापति ने जल से वेदों की रचना की। शतपथ ब्राह्मण कहता है कि:
"पुरुष प्रजापति की इच्छा हुई, "मेरी अभिवृद्धि हो, मेरा विस्तार हो"। वे उपासना में बैठ गए, उन्होंने घोर तप किया। इस तप से उन्होंने सर्वप्रथम पवित्र त्रिवेद विज्ञान प्रज्ञा की रचना की। यह उनका आधार बना। उन्होंने कहा प्रज्ञा ब्रह्माण्ड का मूल है। वेदों के अध्ययन के पश्चात् पुरुष को स्थायी आधार मिलता है क्योंकि प्रज्ञा उसकामूल है। इस आधार पर प्रजापति ने घोर तप किया। उन्होंने वाच (वाणी) से जल की रचना की। उन्होंने वाच की भी रचना की थी। उसके विस्तरण से जल "अप्प" कहलाया । उसकी सर्वत्र व्यापकता से वह "वार" बना। उन्होंने चाहा "मेरा जल से विस्तार हो" इस त्रिवेद विज्ञान से वे जल में प्रविष्ट हुए । तब एक अण्डज उभरा। उन्होंने उसे सरकाया और कहा - " भव भव पुनर्भव"। तब प्रज्ञा का जन्म हुआ त्रिवेद विज्ञान। फिर पुरुष ने कहा प्रज्ञा ब्रह्मांड की प्रथम सृष्टि है। पुरुष के समक्ष सर्वप्रथम प्रज्ञा की रचना हुई, इसलिए यह उसका मुख बनी। इस प्रकार वे आगे कहते हैं, “वह अग्नि के समान हैं क्योंकि प्रज्ञा अग्नि का मुख है । "
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 3, पृ. 5
2. वही पृ. 8
शतपथ ब्राह्मण में तीसरी व्याख्या इस¹ प्रकार दी गई है-
"मस्तिष्क सागर है। मानस सागर से वाच द्वारा भगवान ने कुदाली से त्रिवेद विज्ञान को खोद कर बाहर निकाला। तत्पश्चात् इस मंत्र का उच्चारण किया - प्रज्ञावान देवता जाने ।” उन्होंने उस सामग्री को कहाँ रखा जिसे ईश्वर ने तेजधार कुदाली से खोदकर बाहर निकाला था। मस्तिष्क समुद्र है, वाच तीव्रधार कुदाली है। त्रिवेद विज्ञान समिधा है। इस संदर्भ में इस मंत्र को उच्चारा । वह मस्तिष्क में समा गया। "
ब्राह्मण की तीन व्याख्याएँ हैं। वह कहता है कि वेदों के कर्ता प्रजापति हैं। वह यह भी कहता है कि प्रजापति ने राजा सोम को बनाया और तत्पश्चात् तीन वेदों की रचना² की गई। इस ब्राह्मण की दूसरी व्याख्या³ का प्रजापति से कोई तात्पर्य नहीं । इसके अनुसार:
“वाच (वाणी) अविनाशी है, यह पूज्यों में प्रथम प्रसूत है, वेदों की जननी और अनश्वरता का केन्द्र बिंदु है, हममें आनंदोपार्जन कर वह यज्ञ में प्रवेश करती है। मेधावी ऋषि, मंत्रों के सृष्टा, जिसका अनुग्रह, तप और कठोर उपासना से प्राप्त करते हैं, ऐसी रक्षा की देवी सरस्वती मेरा आह्वान सुनने को उद्धत हो । "
इस सबके ऊपर ब्राह्मण तीसरी व्याख्या देता है। वह कहता है कि वेद प्रजापति⁴ की दाढ़ी से उत्पन्न हुए।
III
उपनिषदों ने भी वेदों की उत्पत्ति की व्याख्या की है।
छान्दोग्य उपनिषद की व्याख्या शतपथ ब्राह्मण के समान⁵ है। अर्थात् ऋग्वेद अग्नि से उत्पन्न हुआ। यजुर्वेद वायु से और सामदेव सूर्य से ।
बृहदारण्यक उपनिषद ने दो व्याख्याएँ दी हैं। एक स्थान पर उसमें कहा गया है ⁶:
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 9-10
2. वही पृ. 8
3. वही पृ. 10
4. वही पृ. 10
5. वही पृ. 5
6. वही पृ. 8
आर्द्र काठ से अग्नि उपजी, उससे भिन्न-भिन्न धुएँ उठे इसकी श्वांस प्रक्रिया से महान ऋग्वेद बना, यजुर्वेद बना, सामवेद बना, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विज्ञान, उपनिषद, श्लोक, सूत्र विभिन्न प्रकार के भाष्य बने। यह सब उसका श्वास है।"
अन्य स्थान पर वह कहता है¹ :
"प्रजापति द्वारा वाच की रचना की गई, और उसके और आत्मा के माध्यम से वेदों सहित समस्त तत्वों का सृजन हुआ है।'
"उसी वाच और आत्मा के आध्यम से उसने सबका सृजन किया, चाहे वह ऋग्वेद हो, यजुस, साम, छंद, यज्ञ या विभिन्न जीव-जंतु हों। "
तीन वेद, तीन तत्व हैं - वाच, मानस और श्वांस । वाच ऋग्वेद है। मानस यजुर्वेद है और श्वांस सामवेद
1. म्यूर, संस्कृत टैक्स्ट, खंड 1, पृ. 9