हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर
Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar
शादी-विवाह के मामले में निर्धारित व्यवस्था जाति का समान होना है। विभिन्न जातियों के बीच अंतर्जातीय विवाह नहीं हो सकते। यह सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक योजना है, जिस पर जाति के संपूर्ण ढांचा खड़ा हुआ है।
खान-पान के मामलों में नियम यह है कि कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति के साथ खाना नहीं खा सकता, न उससे खाना ले सकता है, जो उसकी जाति से संबधित नहीं है। इसका मतलब यह है कि केवल वहीं लोग जो एक-दूसरे के साथ शादी विवाह नहीं कर सकते, वे साथ-साथ खाना भी नहीं खा सकते। दूसरे शब्दों में, जाति सजातीय इकाई है, साथ ही सामुदायिक इकाई भी है।
व्यवसाय के बारे में व्यवस्था यह है कि सभी व्यक्ति को वही व्यवसाय अपनाना चाहिए, जो उसकी जाति का परंपरागत व्यवसाय है, और यदि उस जाति का कोई व्यवसाय नहीं है, तो उस व्यक्ति को अपने पिता का व्यवसाय करना चाहिए ।
जहां तक किसी व्यक्ति की हैसियत का सवाल है, वह निर्धारित तथा पैतृक होती है। वह निर्धारित इसलिए होती है, क्योंकि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसकी उस जाति द्वारा निर्धारित की जाती है, जिस जाति का वह सदस्य होता है। यह पैतृक इसलिए है, क्योंकि एक हिंदू पर उस जाति का ठप्पा लगा होता है जिस जाति के उसके माता-पिता होते हैं। एक हिंदू की वंशानुगत हैसियत नहीं बदल सकती, क्योंकि वह अपनी जाति को नहीं बदल सकता। हिंदू जिस जाति में पैदा होता है उसी जाति के सदस्य के रूप में ही मर जाता है। एक हिंदू अपनी जाति के खो देने पर अपनी प्रतिष्ठा भी खो देता है। लेकिन वह कोई नई या बेहतर या पृथक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकता।
किसी जाति के सामने नाम का क्या महत्व है? इसका महत्व स्पष्ट हो जाएगा यदि हम दो प्रश्न पूछें, जो बहुत ही प्रासंगिक है और जाति की संस्था की पूरी तस्वीर के लिए प्रत्येक का सही-सही उत्तर आवश्यक है। सामाजिक समूह या तो संगठित होते हैं या असंगठित समूह की सदस्यता लेना तथा समूहों से संगठित होना तथा छोड़ना एक निश्चित सामाजिक व्यवस्था के अधीन होते हैं और इसमें उस समूह के अन्य सदस्यों के संबंध में कुछ विशिष्ट कर्तव्य तथा विशेषाधिकार शामिल होते हैं; तब वह समूह संगठित समूह होता है। कोई समूह ऐच्छिक समूह होता है, जिसमें सदस्य शामिल होते समय इस बात पर पूरा ज्ञान रखते है कि वे क्या कर रहे हैं और उन्हें उन उद्देश्यों का भी पता होता है, जो इस तरह का संबंध स्थापित करने से पूरे होंगे। दूसरी ओर, कुछ ऐसे भी समूह हैं, जिनका कोई भी व्यक्ति बिना किसी इच्छा शक्ति के सदस्य बन जाता है और उन सामाजिक नियमों तथा परंपराओं के अधीन हो जाता है, जिनके ऊपर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता ।
अब यह कहना आवश्यक नहीं रह जाता कि जाति बहुत ही संगठित सामाजिक समूह है। यह कोई शिथिल व्यवस्था का स्वतंत्र निकाय नहीं है। ठीक इसी प्रकार यह कहना भी आवश्यक नहीं है कि जाति एक अनिवार्य समूह है। हिंदू जाति में पैदा होता है और उस जाति के सदस्य के रूप में ही मरता है। कोई भी हिंदू बिना जाति के नहीं होता और जाति से बच नहीं सकता तथा वह जन्म से लेकर मृत्यु तक जाति से बंधा रहता है। वह उस जाति की व्यवस्थाओं पर परंपराओं का दास हो जाता है, जिनके ऊपर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता ।
किसी जाति के लिए पृथक नाम का महत्व इस बात में है कि इसमें जाति संगठित तथा अनिवार्य वर्ग के नाम से जानी जाती है। किसी जाति के पृथक तथा विशिष्ट नाम के कारण यह अपेक्षा की जाती है कि उसका एक स्थायी अस्तित्व हो और एक पृथक सत्ता की छाप हो। जाति पर लिखने वाले लेखकों द्वारा पृथक जातियों के लिए अलग-अलग नामों के महत्व को पर्याप्त रूप से नहीं समझा गया है। ऐसा करते समय वे जाति की सर्वाधिक विशिष्टता को नहीं देख पाए हैं। सामाजिक समूह हैं और वे सभी समाजों में हैं। कई देशों के कई सामाजिक समूहों की भारत में अनेक जातियों के साथ तुलना की जा सकती है और उनके समकक्ष माना जा सकता है। कुम्हार, धोबी, बुद्धिजीवी वर्ग जैसे सामाजिक समूह सर्वत्र हैं। लेकिन दूसरे देशों में वे असंगठित तथा ऐच्छिक समूह हैं, जबकि भारत में संगठित एवं अनिवार्य समूह हो गए हैं, अर्थात् वे जाति बन गए हैं, क्योंकि दूसरे देशों में सामाजिक समूहों को कोई नाम नहीं दिया जाता, जबकि भारत में उनको नाम दिया गया है। यही नाम जाति है जो सनातन बन जाती है। यह नाम ही है, जो यह बताता है कि उसके कौन-कौन से सदस्य हैं और अधिकांश मामलों में किसी जाति में पैदा हुआ व्यक्ति उस जाति के नाम को ही अपने नाम के आगे उपनाम के रूप में लगाता है। पुनः यह नाम ही है जो किसी जाति के लिए सरल बना देता है कि वह अपने विधि-विधान को लागू कर सके। इससे दो प्रकार की सरलता होती है। पहली तो यह है कि जिस व्यक्ति के नाम के सामने उपनाम के रूप में उसकी जाति का नाम है अपराध करने पर वह पकड़ा जाता है, क्योंकि इससे यह पता चल जाता है कि वह अन्य जाति का नहीं है और इस प्रकार वह जाति के न्यायाधिकार से नहीं बच पाता। दूसरे अपराध करने वाले व्यक्ति का पता चल जाता है तथा उस जाति का पता चला जाता है, जिस जाति के न्याय - क्षेत्र के अंतर्गत वह आता है, ताकि जाति के निमयों को भंग करने के लिए उसे आसानी से पकड़ा जा सके और दंडित किया जा सके।
जाति का यही मतलब होता है। अब हम जाति प्रणाली पर आते है। इसमें विभिन्न जातियों के बीच आपसी संबंधों का अध्ययन शामिल है। जाति में जमघटों को देखने पर पता चलता है कि जाति - प्रणाली कई विशेषताओं को प्रस्तुत करती है, जो दिन के उजाले की तरह दमकते हैं। पहले तो इस प्रणाली को बनाने वाली विभिन्न जातियों के बीच कोई परस्पर संबंध नहीं है। प्रत्येक जाति पृथक तथा विशिष्ट है। प्रत्येक जाति अपने आंतरिक क्रियाकलापों को करने तथा जातिगत व्यवस्थाओं को लागू करने के लिए स्वतंत्र तथा प्रभुसत्ता संपन्न है। ये जातियां एक दूसरे से जुड़ी तो हैं; पर उनमें अंतरंग संबंध नहीं हैं। दूसरी विशेषता उस व्यवस्था से संबंधित है, जिसके अंतर्गत इस प्रणाली में एक जाति का दूसरी जाति के साथ संबंध होता है। क्रम समस्तर न होकर ऊर्ध्वाकार है। जाति और जातिप्रथा ऐसी है प्रश्न यह है कि क्या यह हिंदू समाज-संगठन को जानने के लिए पर्याप्त हैं? हिंदू समाज की जड़ता ही जाति प्रथा का मूल है, इसी का उल्लेख पर्याप्त है। इन तथ्यों के अलावा और अधिक जानने का कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है कि हिंदू जातियों में बंटे हुए है और ये जातियां इस प्रणाली का जाल हैं जिसमें सभी एक धागे से लटके हुए हैं, जो इस प्रणाली में इस तरह से गुथा हुआ है किसी एक जाति को दूसरी जाति से अलग करते समय यह सभी को बंध लेता है मानों यह टेनिस की गेंदों की माला हो । लेकिन जाति के गतिशील स्वरूप को समझने के लिए यह पर्याप्त नहीं होगीं। किसी जाति के क्रियाकलाप को समझने के लिए यह आवश्यक है कि जाति -प्रणाली के अलावा जाति की दूसरी विशेषता - वर्ण व्यवस्था को समझा जाए।
जाति तथा वर्ण का अंतःसंबंध अत्यंत विसादास्पद रहा है। कुछ कहते हैं कि जाति वर्ण के समकक्ष है और उन दोनों में कोई अंतर नहीं है। अन्य का विचार है। कि जातियों का अभिप्राय: वर्ण के अभिप्रायः से मूल रूप से पृथक है। यह जाति प्रथा का वह पहलू है, जिसके बारे में और अधिक बाद में बताया जाएगा। अभी तो उस जाति -प्रणाली पर बल देना आवश्यक है, जिसके बारे में अभी तक कुछ नहीं कहा गया। वह यह है कि यद्यपि जाति पृथक है और वर्ण की संकल्पना के विरुद्ध है, तथापि जाति-प्रणाली जाति से पृथक एक ऐसी वर्ण व्यवस्था को मान्यता देती है, जो कुछ-कुछ उल्लिखित वर्गीकृत प्रतिष्ठा से भिन्न है। जैसे कि हिंदू कई जातियों में बंटे हुए हैं, जातियां भी उप-जातियों में बंटी हुई हैं। हिंदू, जाति के प्रति सावधान होता है। वह वर्ण के प्रति भी कठोर होता है। वह जाति के प्रति कठोर है या वर्ण के प्रति कठोर है, यह उस जाति पर निर्भर करता है, जिसके साथ उसका संघर्ष होता है। यदि जिस जाति के साथ उसका विवाद होता है और वह ऐसी जाति के जिसके अंतर्गत वह आता है, जिसका कि वह सदस्य है, तो वह जाति के प्रति सचेत होता है। यदि वह जाति उस वर्ण के बाहर की है जिसका कि वह सदस्य है, ऐसे समय वह वर्ण के प्रति जागरूक हो जाती है। यदि कोई इस संबंध में साक्ष्य चाहता है तो उसे मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में गैर- बाह्मण आंदोलन का अध्ययन करना होगा । इस प्रकार के अध्ययन से कोई संदेह नहीं रहेगा कि एक हिंदू के लिए जाति की परिधि भी उतनी ही वास्तविक है, जितनी कि वर्ण की परिधि, और जाति - भाव उतनी ही वास्तविक है जितना कि वर्ण-भेद ।
कहा जाता है कि जाति वर्ण-व्यवस्था का विस्तार है। बाद में बताऊंगा कि वह बकवास है। जाति वर्ण का विकृत स्वरूप है। यह विपरीत दिशा में प्रसार है। जात-पात ने वर्ण-व्यवस्था को पूरी तरह विकृत कर दिया है, लेकिन इसने जाति प्रथा वर्ण-व्यवस्था से अपनाई है। वास्तव में वर्ग-जाति प्रणाली वर्ण- प्रणाली के वर्ण-वैदीर्ण्य का निकटता से अनुसरण करती है।
इस दृष्टिकोण से जाति प्रणाली पर दृष्टि डालते हुए वर्ग - वैदीर्ण्य की हम कई रेखाओं को देखते है जो जातियों के एक पिरामिड से होकर गुजरती है और इस पिरामिड को जाति के ब्लॉकों में विभक्त करती हैं । वैदीर्ण्य की पहली रेखा विभाजन की उस रेखा का अनुसरण करती है जो प्राचीन चातुर्वर्ण्य प्रणाली में पाई जाती है। चातुर्वर्ण्य की प्राचीन प्रणाली में पहले तीन वर्णों ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों और शूद्र नामक चौथे वर्ण के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। पहले तीन वर्ण धर्म, संस्कार - संपन्न वर्ग थे। शूद्र को अब अधर्म संस्कार-सम्पन्न माना जाता है। यह अंतर इस तथ्य पर आधारित है कि पहले वाले यज्ञोपवीत धारण करने तथा वेदों का अध्ययन करने के हकदार थे। शूद्र न तो यज्ञोपवीत धारण कर सकते थे, न ही वेदों का अध्ययन कर सकते थे। यही कारण है कि उसे अब अधर्म संस्कार संपन्न वर्ग माना जाता है । वैदीर्ण्य की यह रेखा अब भी विद्यमान है और वह आज के वर्ण विभाजन का आधार है जो उन जातियों को जो शूद्रों के बहुत बड़े वर्ग से पैदा हुई है और उनको जो ब्राह्मण तथा क्षत्रियों तथा वैश्यों के तीन वर्गों से पैदा हुए हैं, अलग करती है। वर्ग- वैदीर्ण्य की यह रेखा ही है जो उच्च जाति तथा निम्न जाति जैसे शब्दों द्वारा व्यक्त होती है और जो उच्च वर्ग जाति तथा निम्न वर्ग जाति का संक्षेपण है।
वर्ग-वैदीर्ण्य की इस रेखा के बाद इस पिरामिड से होकर वैदीर्ण्य की एक दूसरी रेखा भी गुजरती है। यह रेखा निम्न वर्ग की जातियों से ठीक नीच होती है। यह चारों वर्गों से उत्पन्न जातियों के नीचे तथा निम्न जाति, जिन्हें मैं मात्र 'शेष' कहूंगा उसके ऊपर से गुजरती है। वर्ग-वैदीर्ण्य की यह रेखा पुनः वास्तविक है और सुपरिभाषित विशिष्टतायुक्त है जो कि चातुर्वर्ण्य प्रणाली का मौलिक सिद्धांत है। जैसा कि बताया गया है कि चातुर्वर्ण्य प्रणाली चारों वर्गों के बीच अंतर स्थापित करती थी, जिसमें तीन वर्णों को चौथे वर्ण के ऊपर माना जाता था। लेकिन इससे चातुर्वर्ण्य के अंतर्गत आने वाले तथा चातुर्वर्ण्य के बाहर आने वाली जातियों के बीच भी इतना ही स्पष्ट अंतर किया है, जो चातुर्वर्ण्य के अंतर्गत होते थे, उच्च या निम्न, ब्राह्मण या शूद्र, उन्हें सर्वण कहा जाता था, अर्थात् वे लोग जिन पर वर्ण की छाप होती थी। जो चातुर्वर्ण्य के बाहर होते थे उन्हें अवर्ण कहा जाता था, अर्थात् जिन पर वर्ण की कोई छाप नहीं लगी होती थी। इन चारों वर्णों से पैदा हुई सभी जातियां सवर्ण हिंदू कही जाती हैं, जिनको अंग्रेजी में 'कास्ट हिंदू' (हिंदू जाति) कहते हैं। 'शेष' को अवर्ण कहा जाता है जिनकी कि अभी बातचीत चल रही है और जिन्हें यूरोपियन 'नॉन कास्ट हिंदू' के नाम से पुकारते हैं, अर्थात् वे लोग जो इन चारों मूल जातियों का वर्णों की परिधि से बाहर हैं।
जो कुछ भी जाति प्रणाली के बारे में लिखा गया है, उसमें अधिकांशत: सवर्ण हिंदुओं की जाति-प्रणाली का ही उल्लेख है । अवर्ण हिंदुओं के बारे में न के बराबर जानकारी है। ये अवर्ण हिंदु कौन हैं, हिंदू समाज में उनकी ओर अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया गया है। मुझे विश्वास है कि इन प्रश्नों पर विचार किए बिना कोई भी हिंदू समाज - संरचना की सही तस्वीर का आकलन नहीं कर सकता, जिसका हिंदूओं ने निर्माण किया है। सवर्ण हिंदुओं तथा अवर्ण हिंदुओं के बीच वर्ण वैदीर्ण्य को छोड़ देना ठीक ग्रिम की परी कथाओं के समान होगा, जिसमें डायनों, बेतालों तथा पिशाचों को छोड़ दिया गया है।
अवर्ण हिंदुओं में तीन सम्मिलित हैं।
(अपूर्ण)