मुख्य मजकुराकडे जा

हिंदुत्व का दर्शन - लेखक - डॉ. भीमराव आम्बेडकर

Hindutva Ka Darshan Written by dr Bhimrao Ramji Ambedkar

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04 ऑगस्ट 2023
Book
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     "एक और भी मूर्ति पूजक निम्न जाति है, जिसे जेरस कहते हैं। वे मिस्त्री, बढ़ई, लुहार, कसेरे तथा कुछ सुनार होते हैं। इनमें से सभी सामान्य स्तर के होते हैं जिनकी अलग जाति होती है और जिनकी मूर्तियां अन्य लोगों से भिन्न होती हैं। ये शादी करते हैं तथा इनके बेटे इनकी संपत्ति के हकदार होते हैं और अपने पूर्वजों के व्यवसाय की शिक्षा लेते हैं। "

     'इस देश में इससे भी निम्न स्तर की एक जाति होती है, जिसे मोजेरस कहा जाता है। वे ठीक लुआस की तरह होते है, लेकिन वे एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते। वे राजाओं का एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवास के समय सभी प्रकार का सामान ले जाने का काम करते हैं, लेकिन वे इस क्षेत्र में बहुत कम हैं। वे अलग जाति के होते हैं। इनके शादी-विवाह के कोई नियम नहीं होते हैं। इनमें से ज्यादातर समुद्र से जीवन यापन करते हैं; वे नाविक होते हैं, और उनमें से कुछ मछुआरे होते हैं; ये कोई मूर्ति-पूजा नहीं करते। वे नायरों के दास भी होते है । "

Hindutva ke Pratik Hindutva Ka Darshan author Dr Babasaheb Ambedkar

     “इससे भी निम्न जाति होती है जिसे मांकर कहा जाता है। मछली पकड़ने के अलावा इन लोगों (मछुआरों ) का कोई और कार्य नहीं होता। इनमें से कुछ बीढ़ों के जहाज चलाते हैं और कुछ मूर्ति पूजकों के जहाज चलाते हैं। ये बहुत ही कुशल नाविक होते हैं। यह जाति बहुत ही अक्खड़ होती है। वे बेशर्म चोर होते हैं, से शादी-विवाह करते हैं और इनके बेटे इनके उत्तराधिकारी होते हैं। इनकी औरतें चरित्रहीन होती हैं और किसी के साथ भी सो सकती हैं तथा इसे वे पाप नहीं समझतीं। इनकी अपनी मूर्ति-पूजा होती है। "

     "मलाबार क्षेत्र में मूर्ति पूजकों की एक दूसरी जाति भी होती है जो और भी निम्न स्तर की होती है। इसे बेतुनस कहते हैं। इनका व्यवसाय नमक बनाना तथा चावल उगाना है। इनका और कोई जीविका का साधन नहीं होता ।

     इनके घर सड़कों से दूर मैदानों में होते हैं, जहां भले लोग जाते नहीं हैं। इनकी अपनी मूर्ति-पूजा होती है। ये राजाओं तथा नायरों के दास होते हैं और अपना जीवन गरीबी में बिताते हैं। नायर उन्हें अपने से बहुत कदम पीछे चलने देते हैं और उनसे बात भी दूरी से करते हैं। ये किसी दूसरी जाति के साथ संबंध स्थापित नहीं कर सकते। "

     “मूर्ति-पूजकों की दूसरी जाति भी है जो इनसे निम्न तथा उजड्ड होती है, जिसे पाणिन कहते हैं। ये लोग बहुत बड़े जादूगर होते हैं तथा इसके अलावा उनका कोई और जीविका का साधन नहीं होता । "

     " इनसे भी निम्न स्तर की तथा अक्खड़ एक और जाति है, जिसे रिवोलिन कहा जाता है। ये लोग बहुत ही गरीब होते हैं और कस्बों में जलाने की लकड़ी तथा घास बेचते हैं। ये किसी को छू नहीं सकते और न कोई मृत्यु-दंड के भय से इन्हें छू सकता है। वे वस्त्रहीन होते हैं और केवल अपने गुप्तागों को फटे पुराने चीथड़ों से ढकते हैं। इनके शरीर के अधिकांश हिस्से खास पेड़ों की पत्तियों से ढके रहते हैं। इनकी महिलाएं अपने कानों में पीतल की बालियां पहनती हैं और अपनी गर्दन, बांह या पैरों में पीतल के बने आभूषण पहनती हैं। ये हार भी पहनती हैं। "

     "इन जातियों से निम्न मूर्ति-पूजकों की एक और जाति भी है जिसे पोलियाज कहते हैं। यह अन्य सभी जातियों में अभिशप्त और समाज से बहिष्कृत होती हैं। ये लोग मैदानों तथा खुले डेरों में गुप्त स्थानों में रहते हैं, जहां अच्छे लोग कभी नहीं जाते और यदि संयोगवश चले जाए तो अलग बात है। ये लोग झोपड़ियों में बड़े निम्न तरीके से रहते हैं। वे भैसों तथा बैलों की मदद से चावल उगाते हैं तथा भैंसे और बैल रखते हैं। ये नायरों से कभी नहीं बोलते हैं और कभी-कभी उनसे बोलते भी हैं तो काफी दूर से चिल्लाकर बोलते हैं ताकि वे सुन सकें। ये लोग चीखते-चिल्लाते हुए सड़क पर चलते हैं और जो कोई भी इनकी आवाज सुनता है, वह पेड़ के किनारे खड़ा रहकर इन्हें रास्ता दे देता है। यदि कोई पुरुष या स्त्री इन्हें छू लेती है तो उसके सगे-संबंधी उसे वही मार देते हैं तथा वे बदले की भावना से पोलियास की हत्या कर देते हैं, यदि कोई दंड भुगतने का भय न हो। "

     "इससे भी निम्न और हीन एक और भी जाति है, जिसे पारेन कहते हैं। ये लोग अन्य सभी जातियों से दूर निर्जन स्थानों पर रहते हैं। ये किसी व्यक्ति के साथ संबंध नहीं रखते और न ही अन्य कोई व्यक्ति इनके साथ संबंध रखता है। ये लोग भूत-पिशाचों से भी बुरे और तिरस्कृत समझे जाते हैं। इन्हें देखना भी अपवित्र और जाति बहिष्कृत माना जाता है। ये जिमीकंद तथा जंगली पौधों की जड़ें खाते हैं। ये लोग अपनी शरीर के मध्य भाग को पत्तियों से ढकते हैं जंगली जानवरों का मांस भी खाते हैं।"

     " इसके साथ ही मूर्ति पूजक जातियों के बीच विद्यमान अंतर का वर्णन समाप्त होता है। इन जातियों की संख्या कुल मिलाकर 18 है। इनमें से प्रत्येक एक-दूसरे से भिन्न हैं। ये लोग न तो एक-दूसरे को छूते हैं, और न ही एक दूसरे के साथ शादी-विवाह करते हैं। मलाबार की इन मूल जातियों के बारे में आपको बता चुका हूं। इनके अलावा इस क्षेत्र के अन्य विदेशी व्यापारी तथा व्यवसायी भी हैं जिनके अपने घर तथा जायदाद है और जो मूल निवासियों की तरह रहते है, लेकिन उनके रीति-रिवाज अपने ही हैं।"

     यह बात समझ में आती है कि ये विदेशी जाति के समग्र तथा विस्तृत चित्रण प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं थे, क्योंकि प्रत्येक विदेशी के लिए हिंदुओं को निजी जीवन पर्दे में होता है ओर उनके लिए यह संभव नहीं है कि वे इसे पैनी निगाह से देख सकें। भारत की सामाजिक रचना, उसकी प्रेरक शक्ति, अलग-अलग स्थानों पर स्थान परिवर्तन एवं निजी तथा अनूठे रिवाजों से संचालित होती है, न कि कानूनी तंत्र द्वारा, जिसे किसी कानूनी ग्रंथों से लिया जा सके। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन विदेशियों को हिंदू समाज की जातियां अत्यंत विचित्र और अत्यधिक विलक्षण लगीं। अन्यथा उन्होंने इसे लिखित रूप में दर्ज नहीं किया होता और उन्होंने वह सब कुछ नहीं लिखा होता, जो उन्होंने भारत में आने के बाद देखा ।

     इस प्रकार हिंदू समाज संगठन में जाति कुछ विशेष स्थान रखती हैं और हिंदुओं को अन्य कौमों से अलग करती हैं। जाति एक निरंतर बढ़ने वाली संस्था रही है। यह कभी भी एक समान नहीं रही है। जब मैगस्थनीज ने अपना लेखा-जोखा दिया था, उस समय जाति का स्वरूप तथा आकृति अलबरूनी के विवरण में दी गई जाति के स्वरूप तथा आकृति से भिन्न थी । वह जो पुर्तगालियों के समय में थी, अलबरूनी के समय से भिन्न थी। लेकिन जाति को समझने के लिए उसकी प्रवृत्ति का अत्यधिक विशुद्ध अध्ययन आवश्यक है, जिसे ये विदेशी समझने में असमर्थ थे।

     जाति के विषय पर चर्चा करने से पहले पाठक को कुछ मूल संकल्पनाओं से अवगत कराना आवश्यक है, जो हिंदू समाज - संगठन की आधार हैं। हिंदुओं में प्रचलित सामाजिक प्रणाली का सूत्रपात चार वर्णों के उद्भव के साथ शुरू होता है और विश्वास किया जाता है कि इनमें हिंदू समाज बंटा हुआ है। इन चारों वर्णों को चार नाम दिए गए (1) ब्राह्मण पुरोहित तथा शिक्षित वर्ग ( 2 ) क्षत्रिय, सैनिक वर्ग (3) वैश्य, व्यापारी वर्ग, तथा (4) शूद्र, सेवक वर्ग। कुछ समय तक ये वर्ण केवल वर्ण ही रहे। कुछ समय के बाद जो केवल वर्ण ही थे, वे जातियां बन गईं और वे चार जातियां चार हजार बन गई। इस प्रकार आधुनिक जाति-व्यवस्था प्राचीन वर्ग व्यवस्था का विकास मात्र है।

     निस्संदेह यह जाति-व्यवस्था वर्ण-व्यवस्था का ही विकास है। लेकिन वर्ण-व्यवस्था के अध्ययन द्वारा कोई भी जाति व्यवस्था के विचार को नहीं समझ सकता है। जाति का वर्ण से पृथक अध्ययन किया जाना चाहिए ।